विषय सूची
1. कैसे खायें.....
1.1 ध्यान दें
1.2 आभार के भाव के साथ खायें
1.3 जमीन पर पालथी लगा कर बैठें और खायें
1.4 अपने हाथ से खायें
1.5 अपना खाना चौबीस बार चबायें
1.6 खाते समय बातें न करें
2.कब खायें.....
2.1 दो मिनिट रुक कर खायें
2.2 पाचन के लिये अपनी उम्र और गतिविधि पर ध्यान दें
2.3 दिन में दो बार खायें - बीच में कोई नाश्ते नहीं
2.4 मन और शरीर खाली पेट सबसे अच्छा काम करते हैं
2.5 रात के खाने का समय और सोने का समय
2.6 एकादशी का उपवास
3.क्या खायें.......
3.1 सतर्क, सजग और जीवंत रखने वाला खाना ही खायें
3.2 जरूरत से ज्यादा खाना न खायें
3.3 ताजा खाना खायें
3.4 वो खायें जो आपसे (विकास के अर्थों में) दूर हो
3.5 इसे पचायें
3.6 स्थानीय चीजें खायें
3.7 खुशहाली के लिये खायें
3.8 मौसमी चीजें खायें
3.9 वनस्पति आधारित आहार
3.10 फलों का आहार
3.11 कई अनाजों का आहार
3.12 यात्रा में सही खायें

सदगुरु : मैंने अभी ही कहीं पढ़ा कि अमेरिका में 20% खाना चलती कारों में खाया जाता है। अगर 20% खाना कार में खाया जा रहा हो तो और 20% शायद शराबखानों में खाया जाता होगा। मुझे नहीं मालूम कि कितने लोग टेबल पर, बैठ कर, शांति से, जागरूकतापूर्वक, आसपास के लोगों में और अपने खाने में पूरी तरह से शामिल हो कर खाना खाते हैं? क्या खाना चाहिये, इसके बारे में आजकल सारी दुनिया में शायद लोगों को बहुत जानकारी है पर, लोग, ज़रूरी बदलाव नहीं ला रहे। हम जो भी खाते हैं, वो निश्चित तौर पर, बहुत असर करता है पर उतना ही महत्वपूर्ण ये भी है कि हम उसे ‘कैसे’ खा रहे हैं - हर तरफ, क्या खाना चाहिये, इसके बारे में बड़ी बड़ी बातें बहुत होती हैं पर खाना कैसे खाया जाये, इसके बारे लोगों जागरूकता लाने का प्रयास शायद नहीं हो रहा। आप चाहे किसी जानवर को खायें या कोई सब्जी या और कुछ, भोजन के रूप में सब कुछ जीवन है। जो अपने आप में जीवन था, वो अब आपका ही भाग बन रहा है। खाने की प्रक्रिया सिर्फ पाचन के बारे में नहीं है, ये तो एक दूसरे जीवन में मिलने की बात है।

आपको कब खाना चाहिये, किस मुद्रा में बैठना चाहिये और अपने अंदर भोजन का स्वागत कैसे करना चाहिये, इन बातों पर आजकल बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता।

#1. कैसे खायें.......

#1.1 ध्यान दें

खाना बस रोजाना किया जाने वाला कोई सामान्य काम नहीं है। आपको इस पर बहुत ध्यान देना चाहिये। आज आपके शरीर को इतना खाना चाहिये तो आप उतना ही खाएं। कल, हो सकता है कि आपके शरीर को उतने की ज़रूरत न हो। हर जानवर ये जानता है। अगर आपके घर पर कुत्ता हो तो ज़रा देखिये, वो भी कुछ खास दिनों में खाने के लिये मना करता है। पर, आजकल, लोगों ने बेवकूफी से कुत्तों पर भी अनुशासन, नियम लागू कर दिये हैं तो वो रोज खा लेता है वरना स्वाभाविक रूप से वो कुछ खास दिनों में नहीं खाता।

सभी प्राणियों में ये जागरूकता है पर मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग सिर्फ ये तय करने के लिये करते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिये? (क्या, कब कैसे खाना चाहिये, इसके बारे में अपनी बुद्धि और समझ शक्ति का उपयोग बहुत कम करते हैं)

हमारी शिक्षण प्रणाली कुछ ऐसी है कि हमने विचारों को कुछ ज्यादा ही महत्व दिया है। हमें मालूम ही नहीं कि हमारे पास जो सबसे अच्छी चीज़ है, वो हमारे विचार नहीं बल्कि ध्यान देने की योग्यता है। हमारे विचार उन जानकारियों से निकलते हैं, जो हमनें इकट्ठा की हुई हैं पर विचार हमें कहीं नहीं ले जाते। ये हमारी ध्यान देने की इच्छा, उत्सुकता और तीव्रता है जो हमें जीवन जीने के एक आयाम से दूसरे आयाम की ओर ले जा सकती है।

#1.2 आभार के भाव के साथ खायें

हमें खाना ज़रूर चाहिये पर कृतज्ञता के भाव के साथ खाना चाहिये कि ये हमें पोषण दे रहा है, उसके स्वाद का आनंद लेते हुए इस भाव के साथ खाना चाहिये कि इसका हमारे जीवन के लिये कितना महत्व है! इसका मतलब ये नहीं है कि हम खाने की खुशी या उसके सुख को छीन लें। खाने का सच्चा आनंद इसमें है कि आपको इसके बारे में जागरूक होना चाहिये कि कई दूसरे जीव आपके जीवन के साथ मिल कर 'आप' बन रहे हैं।

मनुष्य को जितने भी सुख मालूम हैं, उनमें सबसे बड़ा सुख ये है कि जो आप नहीं है वो किसी तरह से आपका एक भाग बन रहा है। इसी को हम प्रेम कहते हैं। यही भक्ति है। यही आध्यात्मिक प्रक्रिया का आखिरी लक्ष्य है। ये चाहे वासना हो, जुनून/जोश हो, भक्ति हो या अंतिम आत्मज्ञान, सब अलग-अलग स्तर पर एक ही हैं। अगर ये दो लोगों के बीच होता है तो हम इसे जुनून/जोश/उत्साह कहते हैं, ये अगर एक बड़े समूह के साथ हो तो हम इसे प्रेम कहते हैं, अगर ये बिना विचार के या बहुत ज्यादा शामिल करने वाला हो, तो हम इसे करुणा कहते हैं।

ये अगर बिना किसी आकार/रूप से जुड़े भी होने लगे, तो हम इसे भक्ति कहते हैं, और जब ये अंतिम स्तर पर होता है तो इसे आत्मज्ञान कहते हैं। भोजन लेना अस्तित्व की एकात्मकता दिखाता है। आपके खाना खाने के समय ये प्रक्रिया हर दिन होती है। जो पहले कोई पौधा, बीज, जानवर, पक्षी या मछली या कोई और जीवन था, उसका मनुष्य में मिल कर खुद मनुष्य बन जाना साफ तौर पर अस्तित्व के एकत्व का परिचय देता है और ये भी बताता है कि सृष्टिकर्ता का हाथ हर चीज़ में है। 

#1.3 जमीन पर पालथी लगा कर बैठें और खायें

योग संस्कृति में आपको बताया जाता है कि आप को हमेशा पालथी लगा कर बैठना चाहिये और किसी ऊर्जा आकार के सामने पैर फैला कर नहीं बैठना चाहिए। ये इसलिये है कि इससे कई तरीकों से आपकी तरफ आने वाली चीजों को आप प्राप्त कर सकें। योग सोच हमेशा से यही है कि आपके जीवन के ज्यादा ऊँचे पहलुओं से मिलने वाली हर चीज़ को आप प्राप्त करें। जब कोई प्राणप्रतिष्ठित स्थान हो तो इसका मतलब ये है कि वहाँ शक्तिशाली ऊर्जा है जिससे आपके रूपांतरित होने की संभावना है।

आप जिसे प्राप्त कर सकते हों ऐसी सबसे बड़ी संभावना की ओर से आपकी तरफ ये ऊर्जा आनी चाहिये। हम अपनी टिके रहने (जीवन चलाने) की प्रक्रियाओं को बड़ा करना नहीं चाहते, हम अपने जीवन के दूसरे आयामों को बड़ा करना चाहते हैं। हमारा टिके रहना बहुत ज़रूरी है पर किसी दूसरे की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह से टिके रहना किसी जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। ये तो समय गँवाना होगा क्योंकि आप चाहे जो कर लें, आप हमेशा के लिये टिके नहीं रह सकते। आपकी टिके रहने की इच्छा आपके तीन निचले चक्रों में होती है - मणिपूरक, स्वाधिष्ठान और मूलाधार।

इन सब से छूटने और हर चीज़ के परे जाने की इच्छा विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार चक्रों में होती है। अनाहत इनका मिलन बिंदु है। जिस स्थान पर आपको लगता है कि शक्ति और ऊर्जा है, वहाँ आप पालथी लगा कर ही बैठते हैं क्योंकि उस शक्ति और ऊर्जा को अच्छी तरह से प्राप्त करने के लिये आप अपने शरीर के निचले भागों को बंद कर के रखना चाहते हैं। आप किसी प्राणप्रतिष्ठित स्थान के सामने पैर फैला कर नहीं बैठते क्योंकि इससे एक बिल्कुल ही अलग ढंग की ऊर्जा आपकी ओर आयेगी, जो नुकसानकारक होगी। आप चाहेंगे कि आपके शरीर का ऊपरी भाग, अनाहत चक्र के ऊपर का भाग, उस ऊर्जा को सही ढंग से प्राप्त करे।

जब भी आप कोई शक्तिशाली आकार देखते हैं तो अपने पैर मोड़ कर, पालथी लगा कर बैठना बहुत महत्वपूर्ण है। भोजन भी एक बहुत शक्तिशाली चीज़ है। अगर आपने तीन दिन से कुछ न खाया हो तो आप ये समझेंगे। ये महत्वपूर्ण है कि जब भोजन आपके सामने आये तब आप पालथी लगा कर, पैर मोड़ कर बैठे हों। अगर आप भूखें हों और भोजन आपके शरीर के सभी भागों की ओर हो तो ये आपके लिये अच्छा नहीं है। ऐसे मनुष्य जिनके अंदर कुछ खास शक्तियाँ हों, प्राणप्रतिष्ठित स्थान और भोजन, इन सब के सामने कभी भी पैर खुले रख कर नहीं बैठना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से आपकी प्रणाली में गलत किस्म की ऊर्जा आती है।

#1.4 अपने हाथ से खायें

अगर आप भोजन को हाथों से छूते नहीं हैं तो आपको पता नहीं चलता कि वो कैसा। अगर खाना छूने के लिये अच्छा न हो तो मुझे नहीं मालूम कि ये खाने के लिये कितना अच्छा हो सकता है! और एक बात ये है कि आपके हाथ कितने साफ हैं ये आपके ही हाथों में है पर एक चम्मच या काँटा कितना साफ है, इसके बारे में आप कुछ नहीं कह सकते क्योंकि ये आपके हाथों में हो ये ज़रूरी नहीं।

आपके हाथों को और किसी ने नहीं, बस आपने ही इस्तेमाल किया है और आप जानते हैं कि खाने के लिये ये कितने साफ हैं? पर चम्मच, काँटों के बारे में आपको कुछ नहीं पता कि उन्हें किसने, कैसे और किसलिये इस्तेमाल किया है? वे तो उन्हें बस टिश्यू पेपर से पोंछ देंगे और वे साफ ही दिखेंगे! सबसे बड़ी बात, आप जब चम्मच, काँटों का इस्तेमाल करते हैं तो आपको खाने का अहसास नहीं होता।

जब आपके सामने खाना आये तो उस पर अपने हाथ कुछ पलों के लिये रख कर अनुभव कीजिये कि खाना कैसा है? मेरी थाली में अगर कुछ चीज़ें रखीं जायें तो उनका बस अनुभव कर के, बिना स्वाद लिये, मैं जान जाता हूँ कि मुझे क्या खाना चाहिये और क्या नहीं? खाने को जानने के लिये मेरे हाथ पहला स्तर हैं।

#1.5 खाने को 24 बार चबायें

योग में कहते हैं, "जब आप खाने का एक कौर लेते हैं तो इसे 24 बार चबायें"। इसके पीछे बहुत सा विज्ञान है, पर मूल रूप से, ऐसा करने से हमारा भोजन मुँह में ही 'पचने के लिये तैयार' अवस्था में आ जाता है और शारीरिक प्रणाली को सुस्त नहीं बनाता। इसे 24 बार चबाने से उस भोजन की जानकारी प्रणाली को समझ में आ जाती है और शरीर की हर कोशिका ये निर्णय लेने में सक्षम हो जाती है कि आपके लिये क्या सही है और क्या नहीं -स्वाद की दृष्टि से नहीं बल्कि इस हिसाब से कि सारी प्रणाली के लिये क्या ठीक है - इसे कुछ देर तक करने से शरीर की हर कोशिका ये जान जायेगी कि उसे क्या पसंद है और क्या नहीं। 

#1.6 खाते समय बातें न करें

मैं जब पहली बार अमेरिका आया तो मैंने देखा कि सार्वजनिक जगहों पर - खास तौर पर स्कूलों में और उन ग्रीष्मकालीन शिविरों (समर कैम्प्स) में जहाँ हम कार्यक्रम करते थे - सूचनायें लगीं थीं कि अगर खाना खाते समय किसी के गले में कुछ फँस जाये तो क्या करना चाहिये? ये मुझे समझ नहीं आता कि गले में खाना कैसे फँस सकता है? कोई जलाशय में डूब जाये तो ये बात समझ में आती है क्योंकि हम मछली की तरह नहीं बने हैं।

हमें तैरना सीखना पड़ता है। जो सही ढंग से तैर नहीं सकता, वो डूब सकता है पर खाना किसी के गले में कैसे फँस सकता है? खाना गले में तभी फँस सकता है जब हम खाते वक्त बहुत बातें करते हैं। हम ये आसान सी चीज़ नहीं समझते कि हमें बस यही करना चाहिये कि हम चुपचाप खाना खायें और उसका आनंद लें। जब बच्चे खाते समय बातें करना चाहते हैं तो हम उन्हें कहते हैं, "शशश..., चुप, खाते समय बोलो मत"!

इसकी वजह यही है कि बोलना अंदर से बाहर आता है और उसी समय खाना बाहर से अंदर जा रहा होता है - आप दोनों काम एक ही समय कैसे कर सकते हैं? जब मुझे बोलना है - तो मेरे मुँह में से कुछ तो बाहर आना है और जब खाना है तो कुछ तो बाहर से अंदर जाना है। अगर मैं ये दो काम एक ही साथ करूँ तो कुछ गड़बड़ हो सकती है।

#2. कब खायें......

#2.1 दो मिनिट रुक कर खायें :

जब आपको भूख लगी हो और आप खाना चाहते हों तो न खाना भी साधना का एक भाग है, जिससे आपकी खाने के लिये जो मजबूरी है, विवशता है, वो निकल जाये। किसी भी चीज़ के लिये आपकी कोई मज़बूरी नहीं होनी चाहिये। खाना एकदम मूल बात है। इसके आधार पर जीवन के कई सारे पहलू हमारी मजबूरी बन जाते हैं। आश्रम में आप में से बहुतों ने ये यातना झेली होगी। खाने का समय है, आप वाकई भूखे हैं और भोजन कक्ष में आते हैं।

खाना आपके सामने आते ही आप इसे तुरंत लेना चाहते हैं पर आप देखते हैं कि लोग प्रार्थना के लिये आँखें बंद कर रहे हैं और हाथ जोड़ रहे हैं। इसके पीछे की सोच यही है कि जब आप बहुत भूखे हों तब भी भोजन आने पर दो मिनिट रुकें। आप मर नहीं जायेंगे और ये आपको ज्यादा मजबूत बनायेगा। गौतम बुद्ध तो इस हद तक कहते थे, "जब आप बहुत भूखे हों और आपको भोजन की बहुत जरूरत हो तो अपना खाना किसी और को दे दें। आप ज्यादा मजबूत हो जायेंगे"। मैं उतनी दूर नहीं जा रहा! बस, इतना ही कह रहा हूँ, "दो मिनिट रुकें", ये ज़रूर ही आपको ज्यादा मजबूत बनायेगा। अपने शरीर की मजबूरी की इस आदत को निकाल देना बहुत ही महत्वपूर्ण है। आपके शरीर और मन का एक मेल है।

भूतकाल की सब तरह की जो छाप आप पर है, उन्होंने आपके रुझान बना दिये हैं और ये आपकी मजबूरियाँ, आदतें बन गयी हैं। अगर आप उन्हीं के हिसाब से चलते हैं तो इसका मतलब यही होगा कि आपने तय ही कर लिया है कि आप अपना क्रमिक विकास नहीं करेंगे, एक तयशुदा ढर्रे पर ही चलने का आपने तय कर रखा है और आप अपनी आदतों को तोड़ कर नयी संभावनायें तलाशना नहीं चाहते। खाना बहुत मूल और सरल चीज़ है पर आपका इस पहलू को संभालने का ढंग काफी फर्क ला देता है। आपकी ये यात्रा ज्यादा जागरूक ढंग से काम करने की है जिससे आप धीरे धीरे अपने आपको उस जानकारी से दूर ले जाते हैं जो पहले से आपके पास है और अंदर से आपको चला रही है। बंधन बहुत अलग-अलग स्तरों पर हैं पर आपके बंधनों का आधार आपका शरीर है और इसीलिये आपको अपने शरीर पर काम करना है। 

#2.2 पाचन महत्वपूर्ण है, अपनी उम्र और गतिविधि के हिसाब से खायें

आप जिसे अपना शरीर और मन कहते हैं, वो यादों का एक ढेर भर है। इन यादों या जानकारियों के कारण ही आपके शरीर ने ये आकार लिया है। हम जो खाना खाते हैं, वो इन्हीं यादों के आधार पर हमारा शरीर बन जाता है। मान लीजिये, मैं एक आम खाता हूँ, तो, ये आम मुझमें जा कर आदमी बन जाता है। अगर यही आम कोई स्त्री खाये तो उसके अंदर जा कर ये स्त्री बन जायेगा। अगर इसे गाय खा ले तो ये गाय बन जायेगा। ये आम मेरे अंदर जा कर आदमी क्यों बनता है, स्त्री या गाय क्यों नहीं? ये यादों की वजह से है, जो खास यादें मेरी प्रणाली में हैं, उनकी वजह से!

ऐसा क्यों होता है कि मैं जो आम खाता हूँ उसका एक भाग मेरी चमड़ी बनता है और उसी रंग की चमड़ी, जैसी मेरी है। ऐसा नहीं होता कि आपको मेरे हाथ पर आम के रंग का एक छोटा सा टुकड़ा दिख जाये। यादों की संरचना इतनी मजबूत है कि मैं जो कुछ भी अपने अंदर डालूँ , इन यादों की वजह से, सिर्फ 'मैं' ही बनता है, कोई दूसरा व्यक्ति नहीं! जैसे जैसे आपकी उम्र बढ़ती जाती है, खाने को शरीर के साथ मिलाने की शारीरिक शक्तिकम होती जाती है क्योंकि आपकी आनुवांशिक यादों की, और, विकास कराने वाली यादों की, खायी हुई चीज़ को बदलने की क्षमता कम होती जाती है।

ये हो सकता है कि आप स्वस्थ हों और खायी हुई चीज़ को पचा भी लें पर आम को मनुष्य के शरीर में बदलने की शरीर की क्षमता उतनी मजबूत नहीं रह जाती। पाचन क्रिया होगी पर एक जीवन को दूसरे में बदलने की प्रक्रिया नहीं होगी क्योंकि यादें कमज़ोर हो रही हैं। अगर आप 35 साल से ऊपर हैं तो दिन में बस दो बार ही खाना आपके लिये ज्यादा स्वास्थ्यदायक होगा। हाँ, अगर आप बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत करते हैं या कोई ऐसी मेडिकल समस्या है जिसके कारण ज्यादा बार खाना पड़े तो बात अलग है, अन्यथा बस दो बार ही खाईये। इस बात के साथ शरीर तालमेल बैठा लेगा। आप कैसे और क्या खाते हैं, इसके बारे में अगर आप जागरूक हैं तो ये तालमेल आप ज्यादा समझदारी से बैठा सकेंगे।

ज्यादा खा कर आप अपनी प्रणाली पर बेकार ही बोझ डालते हैं। अब आपको उतने खाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि आपका शारीरिक विकास पूरा हो चुका है। अगर आपको कुछ भूख लगती है या आप थक गये हैं तो एकाध फल काफी है। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप बहुत अच्छी तरह जियेंगे। आपके लिये ये आर्थिक रूप से बेहतर होगा, पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल होगा और आपको स्वस्थ भी रखेगा।

#2.3 दिन में दो बार खाना और बीच में कोई नाश्ता नहीं :

जब पेट में पाचन प्रक्रिया चल रही हो तो कोशिकाओं के स्तर पर शरीर का शुद्धिकरण लगभग बंद हो जाता है। आप अगर दिन भर कुछ न कुछ खाना जारी रखें तो कोशिकाओं में अशुद्धियाँ ज्यादा देर तक रहती हैं। आँतों से मल बाहर निकलने की प्रक्रिया भी सही ढंग से नहीं होती क्योंकि मल का मलाशय तक आना एक बार में नहीं पर लगातार होता रहता है। मलाशय का साफ न रहना समस्याओं को बुलाना ही है। योग में कहा गया है कि गंदा मलाशय और मानसिक गड़बड़ियाँ सीधे जुड़े हुए हैं। जब मलाशय साफ न हो तो मन भी स्थिर नहीं रखा जा सकता।

भारतीय पारंपरिक औषधीय प्रणालियों, जैसे आयुर्वेद और सिद्ध में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मरीज की समस्या क्या है? वे पहला काम आपकी पाचन प्रणाली को शुद्ध करने का ही करेंगे क्योंकि आपकी ज्यादातर समस्यायें कचरा भरे हुए मलाशय की वजह से ही हैं। जिस ढंग से लोग आजकल खा रहे हैं, उनके लिये मलाशय को साफ रखना एक गंभीर चुनौती है।

मान लीजिये, जैसा कि हम सामान्य रूप से आश्रम में करते हैं, आप दिन में दो बार ही खाते हैं और बीच में कुछ नहीं खाते या बहुत ज्यादा सक्रिय होने की वजह से शायद बीच में एकाध फल खा लेते हैं, तो आपका मलाशय हमेशा साफ ही रहेगा। यौगिक संस्कृति में हम कहते हैं कि दो भोजन के बीच में कम से कम 6 से 8 घंटे का अंतर होना चाहिये। ये अगर संभव न हो तो कम से कम 5 घंटे का फर्क तो होना ही चाहिये। इससे कम अंतर पर खाने का मतलब अपने लिये तकलीफ खड़ी करना ही है।

#2.4 आपका मन और शरीर खाली पेट सबसे अच्छा काम करते हैं

आपको ये लग सकता है कि दिन भर कुछ न कुछ कहने से आप ज्यादा सक्रिय रह सकेंगे। पर, अगर आप देखें कि खाली पेट और भरे पेट आपका शरीर कैसे महसूस करता है तो आप पायेंगे कि आपका शरीर और मस्तिष्क खाली पेट ही सबसे अच्छा काम करते हैं। अगर खाने को पचाने की प्रक्रिया आपके पाचन तंत्र में लगातार चल रही हो, तो कुछ ऊर्जा हमेशा इसी काम में लगी रहेगी जिससे आपका शरीर और मस्तिष्क सबसे अच्छा काम नहीं कर सकेंगे। अपनी पूरी क्षमता से काम करने के लिये आपको जागरूक होकर उस तरह का भोजन करना चाहिये जो 1.5 से 2.5 घंटों में आपके पेट से निकल कर आँतों में पहुँच जाये और पेट खाली हो जाये।

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इसके बाद आपका शरीर ज्यादा ऊर्जा खर्च नहीं करेगा। योग इस बात पर बहुत जोर देता है कि 12 से 18 घंटों के बीच खाना आपकी प्रणाली से पूरी तरह से बाहर हो जाना चाहिये। अगर आप इतनी जागरूकता रखें तो आप हमेशा काफी ज्यादा ऊर्जा, सतर्कता और सजगता का अनुभव करेंगे। आप चाहे कोई भी काम करते हों, जीवन को सफलतापूर्वक जीने के ये मुख्य घटक (तरीके) हैं। आध्यात्मिक प्रक्रिया जो कुछ भी है, उसके एक स्तर का मतलब ये है कि आप अपने शरीर और मन में एक खास तरह की सत्यनिष्ठा (समग्रता) लायें। सत्यनिष्ठा लाने से मेरा मतलब ये है कि आपकी पूरी प्रणाली एक खास तरह से संगठित हो। अगर ये ढीली ढाली होगी तो किसी भी बात का अनुभव नहीं कर पायेगी, कुछ बड़ी बातें भी हो जायें तो आप चूक जायेंगे।

योगी और योग के साधक दिन में बस एक या दो बार ही क्यों खाते हैं और बीच में क्यों कुछ नहीं खाते इसका कारण यही है कि वे अपने शरीर को कहीं से, किसी भी चीज़ के लिये खुला नहीं छोड़ना चाहते। हवा और पानी के सिवा बाकी सारी चीजें उनकी शारीरिक, मानसिक प्रणालियों में ज्यादा न जायें, वे इसके लिये बहुत सावधान रहते हैं क्योंकि संवेदनशीलता के संदर्भ में वे अपनी प्रणाली के संगठन को ढीला छोड़ना नहीं चाहते। आप जो कुछ भी हैं, संवेदनशीलता ही उसकी सबसे बाहरी सतह है। अपने आपको बहुत ही संवेदनशील रखने के लिये ये ज़रूरी है कि आपके सामने आने वाली हरेक चीज़ के लिये आप अपनी प्रणाली को खुला न छोड़ें। अच्छी तरह से भरपेट खाईये, पर दिन में कई बार नहीं!

#2.5 रात के खाने का समय और सोने का समय :

रात में आप सोने जायें, इसके कम से कम 3 घंटे पहले आपको भोजन कर लेना चाहिये। अगर, खाने के बाद, 20 से 30 मिनिट हल्की शारीरिक गतिविधि हो, जैसे आराम से चलना, तो आपका शरीर ज्यादातर स्वस्थ ही रहेगा। आपके सोने के समय खाना पेट में ही होना (यानी, खाने के बाद तीन घंटे न बीतना), आपकी प्रणाली में एक खास तरह की जड़ता पैदा करेगा। शारीरिक तौर पर ये जड़ता कुछ ऐसी है जैसे मृत्यु की ओर आपका तेज गति से आगे बढ़ना।

मृत्यु तो आखिरी जड़ता है ही। इसका दूसरा आयाम ये है कि अगर आप भरे पेट सो जाते हैं तो इससे आपके पेट के दूसरे अंगों पर दबाव पड़ता है जिसकी वजह से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें पैदा होती हैं। इसीलिये ये महत्वपूर्ण है कि सोते समय आपके पेट से खाना निकलकर आंत तक चला गया हो। आप अलग अलग मुद्राओं में सोते हैं तो पेट की वजह से दूसरे अंगों पर दबाव नहीं पड़ना चाहिये।

#2.6 एकादशी का उपवास :

कभी-कभी भोजन न करना, उपवास रखना अच्छा होता है। अगर आप जबर्दस्ती खाना खाये बगैर रहते हैं तो इससे आपकी प्रणाली को नुकसान भी हो सकता है। अगर आप उपवास करना चाहते हैं तो मानसिक और शारीरिक, दोनों तरह से अपने आपको तैयार करना चाहिये जिससे आप बिना किसी प्रयास के, आराम से, भोजन के बिना रह सकें।

हमारी संस्कृति में, चंद्रमा कैलेंडर के अनुसार, महीने के कुछ दिन ऐसे पाये गये हैं, जब पाचन क्रिया अच्छी तरह से नहीं चलती। महीने के इन दो दिनों में, जिन्हें हम एकादशी कहते हैं और जो अमावस्या और पूर्णिमा के बाद के ग्यारहवें दिन आती है, ये बहुत अच्छा होगा अगर आप हल्का खाना लें या बिल्कुल ही न खायें। एकादशी हमारी शरीर की व्यवस्था का एक भाग है। पूरे दिन उपवास रखना बहुत अच्छा होगा पर, अगर ये संभव न हो तो सिर्फ फलों का आहार लें।

#3. क्या खायें....

#3.1 वही खायें जो आपको सतर्क, सजग और जीवंत रखे

कोई खास चीज़ आपको खानी चाहिये या नहीं, इस बारे में फैसला हर दिन बदलता है क्योंकि आपका शरीर हर दिन और हर पल अलग अलग होता है। अगर आप खाने को महसूस करें तो आपको पता लग सकता है कि उस दिन ये चीज़ आपको खानी है या नहीं। अगर जरूरी जागरूकता आ जाये तो हमें लोगों को ये बताना नहीं पड़ेगा कि उन्हें क्या खाना चाहिये? हर खाने के समय उन्हें ये तय करना चाहिये कि उस वक्त वे क्या खायें? ऐसा कोई एक सूत्र नहीं दिया जा सकता कि आप अपनी बाकी ज़िन्दगी क्या खायें? हाँ, शक्कर और कार्बोहाइड्रेटस कोई गंभीर मसले नहीं हैं पर लोगों को मांसाहार से दूर करना एक लंबे समय तक चलने वाली चुनौती है।

अमेरिका में हर साल हर व्यक्ति लगभग 200 पौंड माँस खाता है और लोग स्वास्थ्य के लिये 3 ट्रिलियन डॉलर्स खर्च करते हैं। इस देश में मेडिकल बिलों की कुल रकम ज्यादातर देशों की जीडीपी से ज्यादा है। जीवित रहने का ये बहुत ही हिंसक तरीका है और आपकी प्रणाली के लिये ये बहुत सी मुश्किलें लाता है। हिंसा का पहला स्तर है बीमारी। जब आप बीमार हैं तब शांत नहीं हो सकते क्योंकि आपका शरीर लगातार एक संघर्ष की स्थिति में होता है। बाहर से आने वाले किसी वायरस, बेक्टेरिया या किसी और चीज़ की बात अलग है पर कोई पुराना रोग तो एक गृह युद्ध जैसा ही है।

बिना किसी बाहरी दुश्मन के, आप अपनी ही प्रणाली के अंदर एक युद्ध की स्थिति खड़ी कर देते हैं। बहुत सारे लोग पुराने रोगों की वजह से मर जाते हैं, और उनसे भी ज्यादा लोग, ज़िंदा होते हुए, अच्छी तरह से नहीं जीते। दुर्भाग्य की बात ये है कि इनमें सबसे ज्यादा लोग दुनिया के सबसे अमीर देश में रहते हैं। और, पूरी दुनिया में, ये किसी समय तो होगा ही! भारत के शहरों में भी हमें ऐसी ही हालत दिखती है। हाँ, अमेरिका इस दिशा में सबसे आगे है। इससे यही संदेश जाता है कि जब अमीरी आती है तो हम अपनी समझ खो बैठते हैं। अमेरिका अपनी हालत सुधारे ये बहुत ज़रूरी है क्योंकि वे जो कुछ करते हैं, बाकी दुनिया, किसी न किसी वजह से, वैसा ही करती है।

#3.2 ज़रूरत से ज्यादा खाना

गलत ढंग से खाना और गलत चीजें खाना दो बड़े पहलू हैं। हम जिस तरह से खाना खाते हैं वो हिंसक है और अगर हम इस शरीर की जरूरत से बहुत ज्यादा खाते हैं तो ये एक तरह से खेतों की मिट्टी के बह जाने जैसा है। आप अपना वजन जितना भी कम करेंगे, वो आकाश में नहीं जायेगा, वो मिट्टी में जायेगा तो इससे मिट्टी का कटाव रुकेगा। हम जितना वजन चाहते हैं, उतना अपने शरीर पर लेकर घूम सकते हैं पर हमारे लिये जितना आरामदायक हो, उससे ज्यादा नहीं। ज्यादा वजन की स्थिति में रहने का दर्द ऐसा है कि उस स्थिति में रहने वाले लोग ये भूल ही गये हैं कि हल्के, सजग, सतर्क और वास्तव में जीवंत होने का क्या मतलब है? ये बस मेडिकल पहलुओं और मरने वालों की संख्या की बात नहीं है। सबसे बड़ी समस्या तो वो लोग हैं जो जिंदा तो हैं पर एक पूरा जीवन जी नहीं पाते।

#3.3 ताजा खाईये : 

हर कुछ सालों में कोई नयी बात सामने आती है कि हमें किस तरह की चीजें खानी चाहियें और इन बातों को पूरी निष्ठा से मानने वाले लोग गिनती में बहुत हैं। हमें खाने को धर्म नहीं बनाना चाहिये। ये महत्वपूर्ण नहीं है कि आप या कोई और क्या मानता है। बात तो समझदारीपूर्वक खाने की है। याद रखने वाली पहली बात ये है कि मूल रूप से खाना हमारे शरीर का ईंधन है। अगर आपकी कार को ईंधन की ज़रूरत है तो आप पेट्रोल पंप पर जा कर अपनी उस खास गाड़ी के लिये जो सबसे ज्यादा सही ईंधन है, वही लेते हैं, जिससे कार सबसे अच्छी तरह से चले।

आप कार में मिट्टी का तेल (केरोसिन ऑइल) भी डलवा सकते हैं और उससे भी ये चलेगी पर बहुत ज्यादा धुँआ फेंकेगी, आवाज़ करेगी और गति तो उतनी नहीं ही पकड़ेगी जितनी आप चाहते हैं। यही हालत ज्यादातर लोगों की खाने के बारे में पसंदगी की है। सही ईंधन चुनने के लिये आपको पता होना चाहिये कि आपका शरीर किस तरह का है । अगर आप अपनी और अपने बच्चों की खुशहाली चाहते हैं तो ताजा खाना ही खाईये।

यौगिक संस्कृति में तैयार भोजन आग पर से उतरने के डेढ़ घंटे के अंदर खा लिया जाता है। इससे ज्यादा देर होने से जड़ता आती है। अगर आप ऐसा खाना खाते हैं जो आपकी प्रणाली में जड़ता बनाता है तो आप अपनी गतिशीलता खो देते हैं। आप जिस तरह का खाना खाते हैं, उससे आपकी नींद तय होती है। सामान्य रूप से डॉक्टर्स आपको 8 घंटे सोने की सलाह देते हैं। अगर आप रात में इतना सोते हैं तो आपके जीवन का एक तिहाई हिस्सा तो नींद में ही बीत जायेगा।

लोग तो इस पर ही किताबें लिख रहे हैं कि हर किसी को 8 घंटे सोना चाहिये और वे ये चेतावनी भी देते हैं कि ऐसा न करने के गंभीर परिणाम आपको भुगतने होंगे। आजकल मैं थोड़ा आलसी हो गया हूँ तो चार घंटे सोता हूँ। पर, पहले, 25 साल तक, मैं 3 घंटे से भी कम सोता था और मैं हमेशा ही स्वस्थ रहा हूँ। शरीर को ज़रूरत आराम की होती है, नींद की नहीं। आपको कितनी नींद चाहिये इसका महत्वपूर्ण आधार है वो ईंधन जो आप अपनी प्रणाली में डालते हैं। जिस गाड़ी में गलत किस्म का ईंधन पड़ता है, उसे ज्यादा सेवा की ज़रूरत होती है, बार बार गाड़ी गैरेज जायेगी। इसी तरह से, अगर आप अपनी प्रणाली में गलत ईंधन डालेंगे तो आप ज्यादा नींद लेंगे।

#3.4 वो खाईये जो आपसे दूर हो

आप जो खाते हैं उसका रूपांतरण और एकत्रीकरण होने के बाद जो इकट्ठा होता जाता है, वही आपका शरीर है। इस शरीर में एक खास बुद्धि है, याददाश्त है और धरती पर प्राणियों के विकास से जुड़े नियम हैं जो ये तय करते हैं कि आपने जो खाया है वो किस चीज़ में बदलता है? उदाहरण के लिये, एक सेब किसी स्त्री, पुरुष या गाय के शरीर में बदल जाता है और उसका आधार ये होता है कि ये किसने खाया है? जैसे जैसे जीवन विकसित होता जाता है, जीव जो भी यादें और जानकारी ले कर चलता है, उनकी जटिलता बढ़ती ही जाती है।

यौगिक परंपरा में हमेशा से ये कहा गया है कि धरती पर प्राणियों के विकास के अर्थों में, आपसे जो सबसे ज्यादा दूर है, आपको वही खाना चाहिये। उस अर्थ में वनस्पतियों का जीवन हमसे सबसे ज्यादा दूर है। अगर आपके लिये माँसाहारी भोजन बहुत ज्यादा ज़रूरी है तो भी सलाह ये है कि मछली खायें क्योंकि अगर आप इसे क्रमिक विकास के नज़रिये से देखें तो जानवरों में मछली मनुष्य से सबसे ज्यादा दूर है। धरती पर पहला जानवर पानी में ही विकसित हुआ और इसीलिये, दशावतार में पहला अवतार मछली का माना गया है। 100 सालों से पश्चिम में ये कहा जाता रहा है कि खाने के लिये सबसे अच्छी चीज माँस है पर अब वहाँ के डॉक्टर्स एक अलग नज़रिये की ओर बढ़ रहे हैं।

कुछ समय से वे ये कह रहे हैं कि अमेरिका में ज्यादातर हृदय रोगों का मुख्य कारण गाय का माँस है। पिछले कुछ वर्षों से वे ये भी कह रहे हैं कि माँस खाने से कैंसर हो सकता है। यौगिक संस्कृति पिछले 10, 000 वर्षों से ये कह रही है कि अगर आप जटिल अनुवांशिक (प्राणियों के विकास से जुड़े) गुणों वाली चीजें (माँस आदि) खायेंगे तो आपकी प्रणाली एक या दूसरी तरह से बिगड़ जायेगी। हम इस निष्कर्ष पर लाखों डॉलर के खर्च वाली कोई रिसर्च कर के नहीं पहुँचे थे - बल्कि बस अपनी प्रणाली में जो कुछ हो रहा था उस पर पर्याप्त ध्यान देकर यह समझे थे।

तो, खाने को किसी तरह का धर्म मत बनाईये, आपके टिके रहने (जीवन चलाने) का सवाल है। जो उपलब्ध हो वो खाईये। पर ये याद रखिये कि जब टिके रहने का सवाल हो तो हमारे पास चुनने के लिये विकल्प भी हैं। जब हमारे पास चुनने की सुविधा हो तो हमें समझदारीपूर्वक वो खाना चाहिये जो हमारी प्रणाली के लिये सबसे अच्छा हो। आपके शरीर के लिये सबसे अच्छा ईंधन वो है जो आपको सतर्क, सजग और सक्रिय रखे। आप प्रयोग कर के देख सकते हैं। एक दिन सिर्फ फल खाईये, एक दिन कच्ची सब्जियाँ खा कर देखिये, एक दिन सब्जी पका कर खाईये और कभी माँस खा कर भी देखिये। सब चीजें देखिये, जिस खाने से आपको सजगता और ऊर्जा के सबसे ज्यादा स्तर मिलें, कृपया वो ही खाईये तो आप स्वस्थ रहेंगे।

#3.5 इसको पचाईये

अगर आप फल खाते हैं तो ये डेढ़ घंटे में पूरी तरह पच जायेगा। जब आप पकायी हुई सब्जियाँ खाते हैं तो ये 12 से 15 घंटे में पच जाती हैं। पके हुके अनाज और दूसरी पकी हुई चीजों को पचने में 24 से 30 घंटे लगते हैं। पका हुआ माँस 48 से 52 घंटे में और कच्चा माँस 72 घंटे में पचता है। जब आपकी प्रणाली में खाना इतनी देर तक रहता है तो ये सड़ता है और गैर जरूरी बैक्टेरिया इकट्ठा हो जाते हैं।

इस तरह का खाना खा कर आप अपनी प्रणाली को नुकसान ही पहुंचाते हैं और फिर आप दवाईयों की ज़रूरत महसूस करते हैं। आप अपने अंदर ज़हर पैदा कर लेते हैं और इसीलिये दवाइयों की ज़रूरत आपको होती है। अपनी प्रणाली में आप जो कुछ डालते हैं, वो एक बड़ा फर्क ला सकता है। उदाहरण के लिये लगभग 12 साल पहले एथेनॉल गैसोलीन बाज़ार में आया तो मैंने कहा, " मैं अपनी कार में एथेनॉल नहीं डालना चाहता क्योंकि इससे इंजिन में जंग लग जायेगी"।

ये पता लगाने के लिये आपको कोई बहुत होशियार वैज्ञानिक होने की ज़रूरत नहीं है - ये आम बुद्धिमानी की बात है। 12 साल तक, जब लोगों ने इसका उपयोग कर लिया है तो अब इसे बनाने वालों ने ये माना है कि ये इंजिन को बिगाड़ सकता है। आपको बस इस तरफ ध्यान देने की ज़रूरत है कि चीजें कैसे काम करती हैं? ज्यादातर लोग किसी चीज़ की ओर ध्यान नहीं देते। हर बात के लिये उन्हें किसी की सलाह चाहिये, किसी का कोई नुस्खा चाहिये।

अगर आप बहुत समय से गलत किस्म का खाना खा रहे हैं तो आपका शरीर इतना ज्यादा आलसी और सघन हो गया होगा कि आपको कुछ दिख ही नहीं सकता (मतलब कोई सूक्ष्म बात समझ में आ नहीं सकती, किसी बात पर आप ध्यान नहीं दे सकते, संवेदनशील नहीं हो सकते)। उपवास से ऐसी स्थिति में आपको थोड़ा आराम मिलेगा। अब समय आ गया है कि हम लोगों को, उनकी प्रणाली में जो कुछ हो रहा है, उसकी ओर ध्यान देना सिखायें। अपने आप से पूछिये कि क्या ये आपके लिये सही ढंग से काम कर रहा है, या नहीं कर रहा? जानने का ये आसान तरीका है।

#3.6 स्थानीय चीजें खाईये

प्रश्न : नमस्कारम सदगुरु। जहाँ हम रहते हैं, क्या उस स्थान का हमारे साथ कोई संबंध है? क्या वो जगह, जहाँ हम बड़े होते हैं, हम पर असर डालती है? क्या इसी वजह से हमें बताया जाता है कि हम स्थानीय खाना खायें?

सदगुरु : मनुष्य की प्रणाली कितनी गहराई में काम कर रही है, इस पर निश्चित ही स्थान का असर होता है। ये बाकी सारे जीवन के लिये भी सच है। दक्षिणी भारत में जो वनस्पतियाँ और जानवर बहुत आराम से रहते हैं, वे न्यूयॉर्क या संसार के किसी भी दूसरे भाग में रह नहीं पायेंगे,खत्म हो जायेंगे क्योंकि उनके अपने क्षेत्र में जीवन एक अलग ढंग से विकसित हुआ है।

ये सिर्फ मौसम की वजह से या सूरज की रोशनी की तीव्रता की वजह से नहीं है पर इसलिये है कि जिस खास जगह में कोई जीवन विकसित होता है, वो उस स्थान से संबंधित होता है। योग में खाना खाने का नुस्खा उस दूरी से तय होता है, जो कोई व्यक्ति एक दिन में चल सकता है। एक दिन में आप जो दूरी चल सकते हैं वो उस क्षेत्र की त्रिज्या (रेडियस) के बराबर है जहां का भोजन आपको खाना चाहिए। आपको वो खाना नहीं लेना चाहिये जो बहुत दूर उगता या बढ़ता हो क्योंकि आपका शरीर धरती के उस टुकड़े से जुड़ा है जहाँ आप रह रहे हैं और अगर आप इसी क्षेत्र से अपना खाना ले रहे हैं तो हमारे शरीर और जमीन के बीच लगातार एक बातचीत होती रहती है।

आज भी, जब आप यहाँ बैठे हैं तो आपका शरीर और जमीन का वो टुकड़ा जिस पर आप बैठे हैं, दोनों ही लगातार गहन बातचीत की अवस्था में हैं। इसीलिये, जमीन के साथ संपर्क में रहना हमारे स्वास्थ्य, हमारी खुशहाली का बहुत महत्वपूर्ण भाग है। योग सेंटर में उन लोगों को, जो स्वस्थ नहीं हैं, बगीचे में काम करने को दिया जाता है, जिससे वे जमीन, मिट्टी के साथ संपर्क में रहें। आजकल, आधुनिक प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों(स्पा) में जमीन के साथ संपर्क में रहने की इस विधि को मिट्टी स्नान का रूप दे दिया गया है। आप चाहे मड बाथ(मिट्टी स्नान) लें या जमीन/मिट्टी में काम करें या जमीन पर सोयें या कुछ भी ऐसा करें कि आप मूल रूप से जमीन के साथ संपर्क में रहें तो ये आपके स्वास्थ्य के लिये बेहतर होगा।

#3.7 खुशहाली के लिये खायें :

भोजन एक सौदा है, लेन देन का मामला है। जो जमीन में था, उसे आप शरीर में डाल रहे हैं। अगर आप वही भोजन लेते हैं जो उसी स्थान से आता हो जहाँ आप रह रहे हैं तो आपका शरीर सबसे अच्छी तरह से काम करेगा। जमीन के जिस टुकड़े पर आप रह रहे हैं, अगर वहीं अपना खाना उगाते और खाते हैं तो एक महीने के अंदर आप अपने शरीर के स्वास्थ्य में स्पष्ट फर्क महसूस करेंगे।

मुझे लगता है कि पृथ्वी पर कैंसर की समस्या कम से कम 50% घट सकती है, अगर हम जमीन के साथ संपर्क में रहें, और हमारा खाना उसी क्षेत्र से आता हो जहाँ हम रहते हैं, और कहीं से नहीं। अभी तो ऐसा हो रहा है कि अगर आप नाश्ता कर रहे हैं तो ये न्यूज़ीलैंड, वियतनाम या पता नहीं, कहाँ से आया हुआ हो सकता है! हम सारी दुनिया में सबकुछ इधर से उधर भेज सकते हैं और बड़े बड़े बाज़ार हमें सारी दुनिया की चीजें बेच सकते हैं पर इससे हमें बस, थोड़ी खुशी मिल सकती है, खुशहाली नहीं।

#3.8 मौसमी चीजें खायें :

भारत में, गर्मियों में, खाना एक तरह से पकता है, बरसात में दूसरी तरह से और सर्दियों में अलग तरह से, जो उस समय मिलने वाली सब्जियों के हिसाब से होता है और जो हमारे शरीर के लिये सही होता है। ये अच्छा होगा अगर हम इस बुद्धिमानी के साथ, अपने शरीर की ज़रूरतों के हिसाब से और साथ ही, मौसम या ऋतु को ध्यान में रख कर खायें।

उदाहरण के लिये दिसंबर के महीने में, खाने की कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जो शरीर में गर्मी पैदा करें, जैसे गेहुँ और तिल। जब ठंडे मौसम में चमड़ी फटती है और हमारे पारंपरिक लोग कोई क्रीम, मॉश्चराइजर वगैरे इस्तेमाल नहीं करते तो वे रोज तिल खाते हैं। ये शरीर को गर्म और चमड़ी को साफ रखते हैं, फटने नहीं देते। शरीर में काफी गर्मी होने से चमड़ी नहीं फटती। ऐसे ही, गर्मी के मौसम में शरीर गर्म हो जाता है तो ऐसी चीजें खायी जाती हैं जो शरीर को ठण्डक दें, जैसे तमिलनाडु में लोग काम्बू(पर्ल मिलेट) खाते हैं। ये चीजें इसलिये तय की गईं थी, जिससे शरीर अपना तालमेल मौसम के साथ बैठा सके।

#3.9 वनस्पति आधारित आहार :

शरीर में जीवन को बनाये रखने के लिये एक जीवित कोशिका सबकुछ है। जब आप जीवित कोशिका खाते हैं तो आपकी प्रणाली का स्वास्थ्य एकदम अलग होता है जैसा आपने पहले कभी महसूस नहीं किया होगा। भोजन पकाने से उसमें रहने वाला जीवन नष्ट हो जाता है और उसके बाद ये भोजन हमारी प्रणाली को उतनी ऊर्जा नहीं देता जितना जीवित अन्न देता है।

#3.10 फलों का आहार :

क्यों अच्छा है फलाहार : आप के और धरती के लिये भी ?

पाचन क्रिया का मतलब है जठराग्नि - यानी खाये हुए को पचाने वाली अग्नियाँ। इन अग्नियों को बहुत ही असरदार ढंग से जलाने के लिये फल सबसे अच्छा ईंधन हैं। दुर्भाग्य से अधिकांश लोगों को आलस और जड़ता ही पसंद है। उन्हें जीवन का स्पर्श ही नहीं होता और वे मरी हुई अवस्था का ही मजा लेते हैं। जीवित, सक्रिय और गतिशील रहने की बजाय उनको सोना, नशा करना, बहुत ज्यादा खाना और बस पड़े रहना ही बेहतर लगता है। सिर्फ ऐसे ही लोगों के लिये फल एक समस्या हो सकते हैं क्योंकि ये आपको सतर्क और सजग रखते हैं। ऐसे लोग जानते ही नहीं कि जागरूकता के ऊँचे स्तर से भी एक अलग तरह का आनंद, नशा और गहन सुख मिलता है।

#3.11 कई अनाजों का आहार :

आज डॉक्टर्स ये कह रहे हैं कि लगभग 8 करोड़ भारतीय डायाबिटीज़ की ओर बढ़ रहे हैं। इसकी एक वजह ये है कि ज्यादातर भारतीय एक ही किस्म का अनाज खाते हैं। लोग या तो सिर्फ चावल खाते हैं या सिर्फ गेहूँ। इससे निश्चित तौर पर स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें खड़ी होती हैं। इसीलिये ये बहुत ही ज़रूरी है कि हम अपने आहार में कई अनाजों को शामिल करें। पारंपरिक रूप से लोग हमेशा से अपने भोजन में कई किस्म के अनाज, दालें, चना और फलियां लेते थे पर धीरे धीरे ये बात खत्म हो गयी है।

किसी दक्षिण भारतीय की थाली देखें तो आपको बहुत सारा चावल दिखेगा और थोड़ी सी ही सब्जियाँ मिलेंगीं। ये एक गंभीर समस्या है। पिछले 25- 30 सालों में लोग पूरी तरह कार्बोहाइड्रेट आहार की तरफ चले गये हैं जिसे बदलने की ज़रूरत है क्योंकि लंबे समय तक बहुत सारा कार्बोहाइड्रेट और बहुत थोड़ी दूसरी चीजों वाला आहार लेने से स्वास्थ्य बिगड़ता है। लोगों के दिमाग में ऐसे आहार के बारे में बदलाव लाने की ज़रूरत है। भोजन का ज्यादा हिस्सा चावल नहीं बल्कि बाकी चीजें होनी चाहियें। चावल आपके लिये एक विकल्प है - आप खाना चाहते हैं या नहीं पर उसकी मात्रा आपकी भूख के हिसाब से होनी चाहिये।

#3.12 यात्रा में सही खायें

हम हर समय आदर्श खाना नहीं खा सकते, खास तौर पर वे लोग जो बहुत सारी यात्रायें या कई तरह की गतिविधियाँ करते हैं। अगर आप अपनी प्रणाली में होने वाली बातों के बारे में संवेदनशील हैं तो समझ लेंगे कि गलत चीज़ खा लेने से आपका शरीर ढीला, मंद पड़ जाता है और ऐसा होने पर आपको अपना अगला खाना आधा कर देना चाहिये या फिर नहीं ही लेना चाहिये। शरीर को वापस सही स्थिति में लाने के लिये बस इतना ही करना है। यात्राओं का काफी असर होता है, खास कर थकान के रूप में। इसे एकदम कम करने के लिये, यात्रा के दौरान, जितना हो सके उतना खाना कम खायें।

अगर कुछ खाना ही पड़े तो बस फल खाईये या बहुत सारा पानी पीजिये। भूख की प्रक्रिया में आपके शरीर में कई सारे एसिड्स काम करते हैं, जिससे खाने की इच्छा होती है। एक गिलास पानी पीने या एक फल खा लेने से ये एसिड्स हल्के पड़ जाते हैं और भूख कम हो जाती है। संपादकीय टिप्पणी : ईशा डाउनलोड्स और ऐमज़ॉन पर उपलब्ध किताब 'ए टेस्ट ऑफ वेलबीइंग' में कई सारे स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ बनाने की विधियाँ दी हुई हैं जिनसे आप खाने की यौगिक विधि सीख सकते हैं।