योग: अपने भीतर शांति का रसायन पैदा करने का विज्ञान

यहाँ, सद्‌गुरु ये समझा रहे हैं कि यदि शरीर के अंदर की रासायनिक व्यवस्था को सही तरीके से रखना है, तो शांतिपूर्ण होना आवश्यक है और योग ही इसके लिये एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
योग: अपने भीतर शांति का रसायन पैदा करने का विज्ञान
 

यहाँ, सद्‌गुरु ये समझा रहे हैं कि यदि शरीर के अंदर की रासायनिक व्यवस्था को सही तरीके से रखना है, तो शांतिपूर्ण होना आवश्यक है और योग ही इसके लिये एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

प्रश्नकर्ता: हमें बहुत बार कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जो हमारी मानसिक व्यवस्था को अशांत, अस्त व्यस्त कर देती हैं ! ऐसे समय में हम शांत कैसे रहें?

सद्‌गुरु: हम सभी को अपने जीवन में शांति चाहिये। आप शांति से रहना चाहते हैं पर मन अधिकतर उत्तेजित रहता है, अतः आप मानसिक रूप से शांत नहीं रह पाते। मान लीजिये, आप शांति खो देते हैं, तो स्वाभाविक है कि आप सबसे पहले अपनी पत्नी या अपने पति से झगड़ा करेंगे। जैसे जैसे ये आगे बढ़ेगा, आप पड़ोसी पर चिल्लायेंगे। यह और आगे बढ़ेगा और आप अपने उच्च अधिकारी पर चिल्लायेंगे। जिस दिन आप अपने उच्च अधिकारी पर चिल्लाते हैं, सब जान जाते हैं कि आप को चिकित्सकीय सहायता की ज़रूरत है। अपने पति, पत्नी या पड़ोसी पर चिल्लाना सामान्य माना जा सकता है क्योंकि हर कोई ऐसा कर रहा है, पर बॉस पर चिल्लाने का अर्थ है कि अब बात क़ाबू के बाहर हो गई है।

सही प्रकार की साधना से हम अपने आंतरिक रसायनों में परिवर्तन ला सकते हैं और इसे एक विशेष स्तर का बना सकते हैं जिससे, किसी भी परिस्थिति में हम शांत रह सकें। अभी तो स्थिति ये है कि आप की शांति बाहरी परिस्थितियों की गुलाम है। अगर परिस्थिति अनुकूल है तो आप शांत होते हैं। यदि ये अनुकूल नहीं है तो फिर समस्या हो जाती है।

अगर आप ऐसी परिस्थिति में हों जहाँ आप को डॉक्टर के पास जाना पड़े, तो वे आप को एक गोली देंगे। जब ये रासायनिक गोली आप की आंतरिक व्यवस्था में जाती है, तो आप कम से कम कुछ घंटों के लिये शांत हो जाते हैं। जब किसी विशेष रसायन की कुछ मात्रा शरीर और मन के स्तर पर आप की व्यवस्था में प्रवेश करती है तो आपकी उग्रता चली जाती है, और आप के अंदर कुछ शांति स्थापित हो जाती है। अतः शांति, शरीर के अंदर एक प्रकार का रसायन ही है। इसी तरह, हर भावना में एक खास तरह का रसायन होता है। जो भी भावना है, उससे संबंधित एक रासायनिक प्रणाली शरीर के भीतर होती है, जो इसके साथ समायोजित होती है। अगर हम शांत हैं तो हमारे अंदर के रसायन भी शांत होते हैं, अथवा, यदि हम अपने अंदर उस तरह की रासायनिक प्रणाली बना सकें तो भी शांति आ सकती है । योग में हम इसे दोनों तरीकों से देखते हैं।

सही प्रकार की साधना से हम अपने आंतरिक रसायनों में परिवर्तन ला सकते हैं, जिससे, किसी भी परिस्थिति में हम शांत रह सकें। अभी तो स्थिति ये है कि आप की शांति बाहरी परिस्थितियों की गुलाम है। अगर परिस्थिति अनुकूल है तो आप शांत होते हैं। यदि ये अनुकूल नहीं है तो फिर समस्या हो जाती है। लेकिन जब आप की शांति बाहरी परिस्थिति की गुलाम न हो, और बाहरी परिस्थिति कैसी भी हो पर आप अपने अंदर शांत रहें, तो हम इसे योग कहते हैं। दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि योग सही तरह का रसायन बनाने का विज्ञान है।

अगर आप के पास सही तरह का रसायन है तो आप शांतिपूर्ण और आनंदमय ही होंगे। यही एकमात्र तरीका है, अन्य किसी ढंग से ऐसा हो ही नहीं सकता। शांतिपूर्ण एवं आनंदित होना जीवन का अंत नहीं है, यह जीवन की शुरुआत है। अगर आप शांत नहीं हैं, अपनी मानसिक बकवास में फंसे हुए है, तो आप ने अभी तक जीना शुरू नहीं किया है। शांतिपूर्ण एवं आनंदित रहना जीवन की सबसे बुनियादी ज़रूरत है। यहाँ तक कि, अगर आप सुबह के नाश्ते या रात के खाने का आनंद लेना चाहते हैं तो भी आप को शांतिपूर्ण होना चाहिये। उत्तेजित अवस्था में क्या आप भोजन का आनंद ले सकेंगे? नहीं ! शांतिपूर्ण होना बहुत ही मूल, प्रारंभिक बात है ! लेकिन आज लोग ऐसा प्रचार कर रहे हैं कि हमारे जीवन का सर्वोच्च आयाम मानसिक शांति है।

दुर्भाग्यवश, चूँकि दुनिया में अधिकांश लोग इस मूल चीज़ को प्राप्त नहीं कर पाये हैं, वे इसे जीवन के अंतिम लक्ष्य के रूप में प्रचारित करते हैं। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग जो अपने आप को आध्यात्मिक बोलते हैं, वे भी लोगों को यही बताते हैं कि शांतिपूर्ण होना ही परम है। वास्तव में शांतिपूर्ण होना तो बुनियादी बात है। यह जीवन का 'अ' है, 'ज्ञ' नहीं। ये बिल्कुल प्रारंभिक बात है।

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