मृत्यु से मुक्त होने के लिए है साधना

इस लेख में सद्गुरु बता रहे हैं कि आध्यात्मिक साधना मृत्यु से मुक्त होने के लिये नहीं है बल्कि उससे मुक्त होने के लिये है जो मृत्यु के मूल में है, जो वास्तव में है - जन्म।
मृत्यु से मुक्त होने के लिए है साधना
 

लेख : दिसंबर 28, 2019.

सद्‌गुरु: अधिकांश लोगों के लिये जीवन का सबसे गहन एवं रहस्यमय पहलू मृत्यु है, क्योंकि लोगों ने इसके बारे में चाहे कितनी ही बातें सुनी हों, वे फिर भी समझ नहीं पाते कि ये क्या है? न तो विज्ञान और न ही दर्शनशास्त्र इस बात का पता लगा सका है कि मृत्यु क्या है?

शरीर जीवन और मृत्यु है - आध्यात्मिक प्रक्रिया आप के बारे में है, जो न तो जीवन है, न ही मृत्यु।

आध्यात्मिक प्रक्रिया मृत्यु के बारे में नहीं है - आप कुछ ऐसा जानने का प्रयत्न कर रहे हैं जो मृत्यु से भी गहरा है। मृत्यु एक सामान्य चीज़ है, उसके बारे में कुछ भी गहन या रहस्यमय नहीं है। ये वो बात है जो लोगों के लिये बार-बार घटित होती रहती है। सिर्फ 'अल्पकालिक स्मृति के खो जाने' के कारण मृत्यु अत्यंत गहन एवं रहस्यमय लगती है। अगर आप की स्मृति कुछ ऐसी होती कि हर दिन, जब आप सुबह नींद से जागते तो आप को ये याद न रहता कि कोई पिछला दिन भी था, आप को ये याद न आता कि आप वाकई सो गये थे, आप बस इतना जानते कि आप जाग गये हैं तो हर दिन आप को लगता कि आप किसी जादुई संसार में हैं, तब ये सब बहुत ही रहस्यमय होता। कुछ घंटों की नींद का समय आप के जीवन का सबसे ज्यादा रहस्यमय और गहन पहलू होता - केवल इसलिये कि आप को याद ही नहीं होता कि आप वास्तव में केवल सो कर जागे हैं। मृत्यु की गहनता और उसका रहस्य भी बस कुछ ऐसे ही हैं।

जब हम कहते हैं कि “शिव संहारक हैं”, तो हम ये नहीं कहते कि वे मृत्युदाता हैं। उनको मृत्यु में कोई रुचि नहीं है। उनके लिये, जन्म लेना और मरना एकदम सामान्य बातें हैं, जीवन का बस एक ऊपरी पहलू। वे शमशान की भस्म अपने शरीर पर क्यों धारण किये रहते हैं? इसका एक कारण ये है कि वे मृत्यु की पूरी तरह उपेक्षा करते हैं, उसे कोई महत्व नहीं देते। वे इसे कोई रहस्यमयी या गहन पहलू भी नहीं मानते। आध्यात्मिक प्रक्रिया मृत्यु के बारे में नहीं है बल्कि उससे मुक्त होने के बारे में है, जो मृत्यु का मूल है, जो वास्तव में है - “जन्म”। जन्म से मुक्त होना ही वास्तव में मृत्यु से मुक्त होना है।

जन्म तथा मृत्यु, कुछ और नहीं, मिट्टी के बर्तन बनाने का काम है - मिट्टी का एक टुकड़ा उठाना, उसे मनुष्य रूप देना, और हाँ, बोलना-चालना भी देना! ये बर्तन बनाने की कला कुछ समय बाद कठपुतली नचाने की कला बन जाती है, और ये एक सरल कारीगरी ही है। दर्शकों की दृष्टि से नाटक को जानना एक बात होती है, नाटक को मंच के पीछे से जानना बिल्कुल अलग बात है। जब एक बार आप नाटक को मंच की पार्श्वभूमि से देखने लगते हैं, तब, कुछ समय बाद, आप को इसमें रस नहीं आता। आप सब कुछ जानते हैं। आप इसके प्रस्तुतिकरण के बारे में उत्साहित हो सकते हैं पर उसकी कहानी से अब आप रोमांचित नहीं होते क्योंकि आप जानते हैं कि ये सब कैसे किया गया है? सिर्फ वो ही, जिनकी स्मृति अल्पकालिक है - जो रोज आते हैं और वही नाटक देखने के लिये बैठते हैं - क्योंकि उन्हें पिछले दिन का कुछ भी याद नहीं है - उनके लिये यह सब बहुत ही रोमांच और चुनौती से भरा है।

अतः आध्यात्मिक प्रक्रिया जीवन या मृत्यु के बारे में नहीं है। शरीर जीवन और मृत्यु है - आध्यात्मिक प्रक्रिया तो “आप” के बारे में है, जो न तो जीवन है और न मृत्यु।

Editor’s Note : Sadhguru looks at the essential nature of life and death and explains how they are one and the same, in The Essence of Life and Death