आप का शरीर : आप इसे शव बनाएंगे या शिव ?

मानव शरीर को एक चमत्कारिक साधन बताते हुए, सद्‌गुरु उसकी एवं भौतिकता की संभावनाओं के बारे में यहाँ बात कर रहे हैं।
आप का शरीर : आप इसे शव बनाएंगे या शिव ?
 

यहाँ सद्‌गुरु हमें भौतिकता की संभावनाओं की खोज पर ले जा रहे हैं -- क्या हमारे शरीर बस 'शव' की तरह हैं या फिर हम इस चमत्कारिक साधन की अपार योग्यताओं का विकास करते हुए, अंतिम लक्ष्य 'शिव' तक पहुँच सकते हैं?

सद्‌गुरु: आप के अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आप का शरीर है। जब हम शरीर को एक साधन के रूप में देखते हैं तो हमें याद रखना चाहिये कि अलग अलग साधनों को अलग अलग प्रकार की गतिविधियों के लिये बनाया जाता है, तथा उन्हें जाँच परख कर अलग-अलग प्रकार के कार्यों के लिये तैयार किया जाता है। जब भौतिक कौशल की बात आती है तो मानव शरीर की तुलना किसी भी पशु या अन्य जीवों से नहीं हो सकती। आप अगर एक कीड़े को भी देखें - उदाहरण के लिये टिड्डे को, तो उसके शरीर की जो भी लंबाई है, वो उससे 50 से 100 गुना लंबाई की छलाँग लगा सकता है। आप की लंबाई यदि 5 से 6 फुट की है तो इस दृष्टि से आप को 500 से 600 फ़ीट की छलाँग लगानी होगी। क्या ये संभव है ? आप अगर ओलम्पिक खेलों को एक कीड़े, दीमक, टिड्डे, हिरण, बाघ या हाथी या धरती के किसी भी जीव की दृष्टि से देखें तो आप उन प्राणियों के कहीं भी निकट नहीं आ सकते।

एक समय था जब जीवित रहने या जीवन चलाने का अर्थ बस दिन में दो समय का खाना होता था। आज इसका अर्थ बीएमडब्ल्यू है!

शारीरिक कौशल की दृष्टि से धरती के किसी भी प्राणी के साथ हम अपनी तुलना नहीं कर सकते। लेकिन हम मनुष्यों को एक विशेष योग्यता प्रदान की गयी है। बस जीवित रहने या जीवन चलाने के हमारे सहज ज्ञान से कहीं अधिक कुछ करने की विशेष योग्यता के साथ हमें बनाया गया है और ये सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात है। एक मनुष्य के रूप में आप जीवन को चलाने की मूल आवश्यकता से कहीं अधिक ऊंचे स्तर पर देख और संभाल सकते हैं। दुर्भाग्यवश, जीवित रहने की मूल आवश्यकता से परे देखने की बजाय, अधिकतर लोगों ने बस ये किया है कि अपने जीवित रहने की मूल आवश्यकता के स्तर को ही बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। एक समय था जब जीवित रहने या जीवन चलाने का अर्थ बस दिन में दो समय का खाना होता था। आज इसका अर्थ बीएमडब्ल्यू है! मानवीय तंत्र का उपयोग करने का यह तरीका नितांत मूर्खतापूर्ण है, क्योंकि मानवीय तंत्र के पास एक अलग ही संभावना है।

भौतिकता : पेंटिंग ब्रश का लंबा हाथ

यौगिक विज्ञान में हम मनुष्य की रीढ़ की हड्डी को मेरुदंड कहते हैं, जिसका अर्थ है ब्रह्मांड की धुरी। किसी की रीढ़ की हड्डी ब्रह्मांड की धुरी कैसे हो सकती है? आज आधुनिक विज्ञान सारे अस्तित्व को एक कंपन के रूप में देखता है, या अगर आप और गहरे में जायें तो वही ऊर्जा कितने ही अलग अलग प्रकार से कंपित हो रही है। आज हम ये भी जानते हैं कि ये जो सारी सृष्टि है, वह शून्य की गोद में मौजूद है - एकदम खाली स्थान में - जिसका नाम वैज्ञानिक ढूंढने का प्रयत्न कर रहे हैं, जैसे काली ऊर्जा ! लेकिन, इससे भी आगे, हम जानते हैं कि वहाँ और भी बिलकुल खाली स्थान मौजूद हैं। एकदम जड़, भौतिक अस्तित्व से लेकर वो जिसे हम दिव्य या दैवी कहते हैं, सभी का आधार बस एक ही है। ये बस वैसा ही है जैसे ब्रश द्वारा पेंट करते समय लगाया हुआ रंग हो - शुरुआत में रंग खूब गहरा, मोटा होता है और फिर, धीरे धीरे ये हल्का होता चला जाता है और अंत में एकदम शून्यवत होता है - कुछ नहीं रहता। तो सृष्टि की रचना की प्रक्रिया में, एक मनुष्य के रूप में, हम इस खालीपन, इस शून्य के अधिक निकट हैं।

मनुष्य में मूल कंपन रीढ़ की हड्डी में से ही उत्पन्न होता है, लेकिन वह जितना सूक्ष्म होता जाता है, उतना ही आगे जाता है।

मनुष्य में, मूल कंपन रीढ़ की हड्डी में से ही उत्पन्न होता है, लेकिन वह जितना सूक्ष्म होता जाता है, उतना ही आगे जाता है। अगर ये ज्यादा जड़ है, स्थूल है तो ये कुछ दूरी तक ही बना रहता है। अगर ये बहुत ज्यादा सूक्ष्म हो जाये तो आप इसे हर जगह पहुँचा सकते हैं। जब आप के कंपन हर जगह फैल जाते हैं तो आप की बोध पाने की क्षमता भी हर जगह फ़ैल जाती है। अभी आप अपने सीमित अस्तित्व की दृष्टि से जिसे स्वयं कहते हैं, वो हर वो चीज़ है, जो आप की अनुभूतियों की सीमाओं के अंदर है। आप के अनुभव की सीमाओं के अंदर जो भी है, वो आप हैं। जो कुछ भी या जो कोई भी आप के अनुभवों की सीमाओं के बाहर है वह सब अन्य कुछ या कोई है। अपने कम्पनों को शुद्ध करते हुए, आप अपने अनुभवों की सीमाओं को अंतहीन रुप से फैला सकते हैं। जब हम कहते हैं, "शिव ने अपनी तीसरी आँख खोली", तो इसका अर्थ ये है कि उन्होंने अपने अनुभवों की सीमाओं को असीमित कर दिया। फिर, सारा अस्तित्व बस उनका ही एक हिस्सा बन जाता है और स्वाभाविक रूप से, वे ही इसके केंद्र होते हैं। लेकिन, आप कैसे जानते हैं कि वे ही इसके केंद्र हैं?

समय और स्थान का भ्रम

आज, आधुनिक विज्ञान बिना किसी संदेह के ये सिद्ध कर रहा है कि समय और स्थान के बारे में हमारे सारे विचार अवास्तविक हैं। समय और स्थान - ये दोनों ही फैल सकते हैं, बढ़ सकते हैं। आप जैसा चाहें, उन्हें बढ़ा सकते हैं। जो यहाँ से 1000 प्रकाश वर्ष दूर है, वो आप यहीं पर बना सकते हैं। अभी, इस समय आप वो भी बना सकते हैं जो 10,000 वर्ष पहले था, या जो 10,000 वर्षों के बाद होगा, क्योंकि जो भी है, वो सब अभी है और यहाँ पर ही है। मैं कोई गूढ़, रहस्यवादी बात नहीं कह रहा हूँ। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, समय और स्थान एक बड़े भ्रम की तरह हैं। आप, इनसे जो चाहें बना सकते हैं। सच तो ये है कि आज वैज्ञानिकों का एक बड़ा समूह स्पष्ट रूप से कह रहा है कि समय और स्थान जैसा कुछ है ही नहीं। वे सही कह रहे हैं। इसी समझ के साथ हम कहते आ रहे हैं कि आप की रीढ़ की हड्डी मेरुदंड है, ब्रह्मांड की धुरी है। कम से कम, अगर आप एक खास तरह से कंपित हों तो ये अवश्य ही ब्रह्मांड की धुरी हो सकती है।

आप अच्छी तरह से जानते हैं कि आप ने अपने इस शरीर को यहीं इकट्ठा किया है - ये बस आपके द्वारा खाए भोजन का ढेर ही है। तो, जो आपने इकट्ठा किया है, उसे आप 'मैं खुद' कैसे कह सकते हैं ?

ये शरीर एक साधन है। क्या आप इसका उपयोग सिर्फ अपने लिये खाना और वस्तुएँ इकट्ठा करने में ही करेंगे ? क्या आप बस शारीरिक उपलब्धियों के लिये ही इसका उपयोग करेंगे ? या फिर, आप इसका उपयोग सबसे ऊँची संभावना के रूप में करेंगे? यदि आप इसका उपयोग एक साधन के रूप में करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपनी पहचान इस शरीर के साथ जोड़ना बंद कीजिये। आप अच्छी तरह से जानते हैं कि आप ने इस शरीर को यहीं इकट्ठा किया है - ये बस आपके द्वारा खाए भोजन का ढेर ही है। तो, जो आप ने इकट्ठा किया है उसे आप 'मैं खुद' कैसे कह सकते हैं ? आप ने जो कुछ भी इकट्ठा किया है, वह कुछ समय के लिये आप का हो सकता है, पर ये आप नहीं बन सकता।

एक चमत्कारिक साधन

मानव शरीर एक गज़ब का चमत्कारिक साधन है। आप अगर एक जीवन में इसके बारे में जानना चाहते हैं तो आप को बहुत कुछ करना होगा। लेकिन किसी न किसी रूप में, लोगों का अपने शरीर के साथ लगाव इतना गहरा होता है कि वे अपने शरीर को एक साधन के रूप में देख ही नहीं पाते। अपने शरीर के साथ अपनी पहचान और अपना लगाव अति गहरा होने के कारण वे इसे 'मैं स्वयं' ही समझते रहते हैं। जब आप इस शरीर को 'मैं स्वयं' की तरह देखते हैं तो उसके साथ बहुत सारी भावनायें जुड़ जाती हैं। फिर हम इसका उपयोग एक साधन की तरह नहीं कर पाते।

आप इस शरीर को शव बना सकते हैं या शिव बना सकते हैं। शव का अर्थ है, मृत शरीर या लाश। शिव का अर्थ है, अंतिम सत्य। ये इसी पर निर्भर करता है कि शरीर के साथ आप क्या करते हैं।

योग में भूत शुद्धि की सम्पूर्ण प्रक्रिया बस इसीलिये है -- पाँचों तत्वों से मुक्त होना। अगर आप अपने और पाँचों तत्वों के बीच, प्रभावशाली ढंग से दूरी बना सकते हों तो आप और आप के शरीर के बीच एक स्पष्ट स्थान रहेगा।

एक बार जब आप अपने और अपने शरीर के बीच दूरी बना लेते हैं तो आप को यह देख कर बहुत खुशी होगी कि इस तरह की अद्‌भुत मशीन आप को मिली है। बंधन और मुक्ति की समस्त सामग्रियां, इसमें अंदर ही हैं। आप इसे दिव्य बना सकते हैं। आप अपनी ऊर्जा व्यवस्था को इस तरह गतिमान कर सकते हैं कि आप का शरीर एक देवता बन जाये। या फिर आप एक मृत शरीर की तरह भी हो सकते हैं। हम कह रहे हैं कि आप इस शरीर को शव बना सकते हैं या शिव बना सकते हैं। शव का अर्थ है, मृत शरीर या लाश। शिव का अर्थ है अंतिम सत्य। ये इसी पर निर्भर करता है कि शरीर के साथ आप क्या करते हैं। यह उन तरीकों से काम कर सकता है, जिनके बारे में आप ने कभी विश्वास नहीं किया होगा कि मानव शरीर ऐसे भी काम कर सकता है।

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