योगियों में उत्तम किसे माना गया है?

यहाँ सदगुरु तीन प्रकार के योगियों के बारे में बता रहे हैं, जो हैं - मंद, मध्यम और उत्तम।
योगियों में उत्तम किसे माना गया है?
 

सदगुरु : योग की कुछ खास परंपराओं के अनुसार योगी तीन श्रेणियों के होते हैं। उन्हें मंद, मध्यम, तथा उत्तम कहा जाता है।

मंद योगी - अनुभूति कभी होती है, कभी नहीं

मंद योगी वे हैं जिन्होंने चेतन होने का अनुभव किया है। उन्होंने सृष्टि के स्रोत को जाना है, एकत्व का भी अनुभव किया है, पर वे दिन भर इस अवस्था में नहीं रह पाते। उन्हें खुद को यह बार बार स्मरण कराना पड़ता है। जब वे जागरूक होते हैं, तब उस अवस्था में होते हैं। जब वह जागरूक नहीं होते, तब पूर्णता का अनुभव नहीं कर पाते। ये शांत या प्रसन्नचित्त होने के बारे में नहीं है, इसका अर्थ उस परम आनंद की अनाम अवस्था में होने से है। तो पहले प्रकार के योगियों ने उसे (परमानंद की अवस्था को) जाना तो है पर उन्हें स्वयं को बार-बार उसकी याद दिलानी पड़ती है, अथवा कोई अन्य उनको इस बात का स्मरण कराता है। दूसरे शब्दों में कहें तो मंद योगी की अनुभूति हर समय एक जैसी नहीं रहती।

जब आप जागरूक होते हैं, तो छोटी चीजों से ले कर बड़ी चीजों तक, सब कुछ वहाँ मौजूद होता है। जब आप पूर्ण रूप से जागरूक नहीं होते, तब आप की अनुभूति कम हो जाती है, तो चीज़ें मजूद नहीं होतीं। जब आप की अनुभूति वास्तव में कम हो जाती है - जैसे कि जब आप सो जाते हैं तो आपको बाहरी दुनिया का भी अहसास नहीं होता। आप के अनुभव से वह गायब हो जाता है। तो ऐसे ही, कोई पहलू जितना सूक्ष्म होता जाता है, उसकी अनुभूति के लिए आपको उतने ही ऊँचे स्तर की जागरूकता की आवश्यकता होती है। कोई भी चौबीसों घंटे प्रयत्नपूर्वक जागरूक नहीं रह सकता। यदि आप जागरूक होने के लिये प्रयत्न कर रहे हैं तो कुछ मिनट या कुछ सेकंड के लिये भी ऐसा हो सकना आप के लिये एक बड़ी बात हो जाती है। ज़्यादातर समय आप जागरूक नहीं होते। तो योगियों के पहले प्रकार या पहली अवस्था को मंद कहते हैं। मंद का अर्थ सुस्त होना ज़रूरी नहीं है, जैसा कि लोग सामान्य रूप से समझते हैं, बल्कि इसका मतलब है अनुभूति का मंद होना।

मध्यम योगी : नीम करौली बाबा

जिनकी चेतनावस्था में शारीरिक गतिविधि, सांसारिक कार्य पूरी तरह से अनुपस्थित थे

योगियों का दूसरा प्रकार, अगला स्तर है मध्यम। उनके लिये, अंदर का आयाम और वह, जो दुनिया से परे है, लगातार, हर समय, अनुभूति में रहता है, लेकिन वे उस भौतिक आयाम को संभाल नहीं पाते जो यहाँ है। ऐसे बहुत से योगी हुए हैं जिनकी लोग आज भी पूजा करते हैं, जिन्हें लोग आज भी मानते हैं, लेकिन वे अपने जीवन में कुछ भी कर सकने में असमर्थ थे। उनके जीवन की कुछ अवस्थाओं में, उन्हें यह भी याद दिलाना पड़ता था कि उन्हें भोजन करना है या टॉयलेट जाना है। अपने अंदर वे अत्यंत अदभुत अवस्था में होते थे लेकिन बाहरी चीजों के लिये वे एकदम असहाय शिशुओं की तरह होते थे। वे बाहरी वस्तुओं से बिल्कुल कटे हुए रहते थे।

एक उदाहरण है, नीम करौली बाबा का, जिन्हें यह भी मालूम नहीं पड़ता था कि उन्हें टॉयलेट जाना चाहिये। वे बस बैठे रहते थे। किसी को उन्हें याद दिलाना पड़ता था, "आप कई घंटों से नहीं गये हैं, आप को जाना चाहिये"। फिर वे जाते थे। उनकी चेतनावस्था में शारीरिक कार्य, सांसारिक बातें पूरी तरह से अनुपस्थित होते थे। वे अदभुत अवस्था में होते थे पर ये बात कितनी भी अदभुत हो, आप उसी अवस्था में नहीं रह सकते क्योंकि अगर आप भौतिक संसार से कटे हुए रहेंगे, तो आप भौतिक शरीर में रह नहीं पायेंगे।

उत्तम योगी : गुरु दत्तात्रेय की कथा

योगी की तीसरी अवस्था, योगियों का तीसरा प्रकार, वह है जहाँ योगी हर समय, लगातार, परम की अनुभूति करता रहता है लेकिन साथ ही बाहरी परिस्थिति, भौतिकता के साथ भी पूरी तरह लय में होता है, उस हद तक कि आप जान भी नहीं पाते कि वह वास्तव में एक योगी है भी या नहीं। इसका एक उदाहरण हैं, दत्तात्रेय। उनके आसपास के लोग कहते थे कि वे एक ही साथ - शिव, विष्णु और ब्रह्मा - इन तीनों के अवतार थे। ये लोगों का अपनी तरह से कहने का एक ढंग था क्योंकि वे देखते थे कि हलांकि दत्तात्रेय मनुष्य रूप में थे पर उनकी कोई भी बात मनुष्यों की तरह नहीं थी। इसका ये अर्थ नहीं है कि उनमें मानवता नहीं थी। नहीं, पर वे एक साधारण मनुष्य की तरह नहीं थे। लोगों ने उनके ऐसे खास गुण देखे थे कि उनकी तुलना वे बस ब्रह्मा, विष्णु, शिव के साथ ही कर सकते थे, तो उन्होंने कहना शुरू किया कि वे तीनों के अवतार थे।

तो आप दत्तात्रेय के जो चित्र, मूर्तियाँ देखते हैं, उनमें उन्हें तीन सिरों वाला दिखाया जाता है क्योंकि लोग उन्हें उन तीनों का अवतार मानते थे।

दत्तात्रेय का जीवन बहुत बड़ी पहेली की तरह था। आज सैंकड़ों पीढ़ियों के बाद भी, दत्तात्रेय के उपासक, उनके भक्त एक बहुत विशाल संख्या में हैं। आप लोगों ने कनफटों के बारे में सुना होगा। आज भी वे लोग काले कुत्तों के साथ घूमते हैं। दत्तात्रेय के आसपास हमेशा पूर्ण रूप से गहरे काले कुत्ते रहते थे। आप के घर में अगर आप कोई कुत्ता पालते हैं तो आप जानते होंगे कि वे आप से ज्यादा ग्रहणशील, ज्यादा अनुभूति वाले होते हैं। सूंघने में, सुनने में, देखने में, वे आप से थोड़े बेहतर, तीक्ष्ण होते हैं। तो दत्तात्रेय ने कुत्तों को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया था और वे सिर्फ पूर्ण रूप से गहरे काले कुत्तों को ही अपने साथ रखते थे। आज भी कनफटों के पास ऐसे ही बड़े कुत्ते होते हैं। वे अपने कुत्तों को चलने नहीं देते बल्कि उन्हें अपने कंधों पर बैठा कर चलते हैं, क्योंकि कुत्ते दत्तात्रेय के प्रिय जानवर थे। इसलिए वे उनके साथ विशेष बर्ताव करते हैं। दत्तात्रेय ने जो परंपरा स्थापित की थी, वो आज भी चल रही है और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं में इनका परिवार सबसे बड़े परिवारों में से है।

गुरु की खोज में परशुराम

महाभारत के समय में परशुराम एक महान योद्धा ऋषि थे। कई अर्थों में, बिना उस युद्ध में भाग लिये, परशुराम ने कुरुक्षेत्र के युद्ध का परिणाम निश्चित कर दिया था। बहुत पहले ही उन्होंने कर्ण के भाग्य का निर्णय कर दिया था। तो उनके पास असाधारण, प्रचंड योग्यतायें थीं, पर उनकी भावनात्मक अस्थिरता उन्हें जीवन के हर क्षण में दिव्यता की अनुभूति करने नहीं देतीं थीं। उन्हें परम तत्व की अनुभूति, कभी होती थी, कभी नहीं होती थी। और अधिकतर अनुभूति नहीं होती थी।

जब परशुराम मदिरा, स्त्री और नशे की हालत से परे, ये देख पाए कि दत्तात्रेय हर क्षण में दिव्यता की अनुभूति कर रहे हैं, तो उस क्षण परशुराम के लिये दिव्यता का मार्ग खुला।

वे बहुत सारे शिक्षकों, गुरुओं के पास गये। जब वे देखते कि उन्हें जो चाहिये था वो इन शिक्षकों, गुरुओं के पास नहीं था तो वे उन्हें परशु से काट डालते। अंत में वे दत्तात्रेय के पास आये। लोगों ने उनसे कहा था, कि दत्तात्रेय आपके प्रश्नों के उत्तर हैं। तो वे गए, और परशु तब भी उनके हाथों में था। वे जब दत्तात्रेय के आश्रम की ओर आ रहे थे तब वहाँ बहुत सारे आध्यात्मिक जिज्ञासु इकट्ठा थे। उनको आश्रम में आता देख, वे सब दूर भागने लगे।

जब परशुराम ने दत्तात्रेय के आश्रम में प्रवेश किया तो उन्होंने देखा कि वहाँ एक व्यक्ति अपनी गोद में एक तरफ मदिरा का घड़ा और दूसरी तरफ एक युवा स्त्री को ले कर बैठा था। उन्होंने बस देखा। दत्तात्रेय नशे की हालत में लग रहे थे। परशुराम ने उनकी ओर देखा और अपने परशु को ज़मीन पर रख कर, प्रणाम किया। बाकी सभी लोग वहाँ से चले गये थे। जैसे ही उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया, मदिरा का पात्र और स्त्री वहाँ से गायब हो गये। अब वहाँ सिर्फ दत्तात्रेय बैठे थे और उनके पैरों के समीप उनका कुत्ता था। परशुराम को दत्तात्रेय में अपनी मुक्ति मिल गयी।

दत्तात्रेय यह दर्शा रहे हैं कि वे इस जगत में कुछ भी कर सकते हैं, पर वे उसमें खो नहीं जाते। ये प्रदर्शन परशुराम के लिये एक पाठ था कि वे बहुत सारी योग्यता वाले व्यक्ति हैं पर उनकी योग्यतायें सदैव क्रोध के रूप में व्यक्त होती थीं। हर समय भावनात्मक अस्थिरता एक नकारात्मक रूप में व्यक्त होती थीं। तो दत्तात्रेय ने एक नाटक किया और जब परशुराम मदिरा, स्त्री और नशे की हालत से परे, ये देख पाए कि दत्तात्रेय हर क्षण में दिव्यता की अनुभूति कर रहे हैं, तो उस क्षण परशुराम के लिये दिव्यता का मार्ग खुला। अगर जीवन भर उनके पास ये अनुभूति होती तो बहुत सारे लोग उनके परशु की मार से बच जाते।

 
 
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