आज शांति पूरे विश्व की जरूरत है, मानव मात्र की जरूरत है। लेकिन कैसे आएगी ये शांति? क्या कुछ कड़े नियम-कानून बना देने से आ जाएगी दुनिया में शांति? तो फिर कैसे आएगी शांति?

इंसान को जितनी क्षमताएं और योग्यताएं प्राप्त हैं, उससे आपको लगता होगा कि इंसान पृथ्वी पर सबसे सुव्यवस्थित और शांतिपूर्ण जीव है। मगर यदि आप इतिहास देखें तो दुनिया कभी भी शांतिपूर्ण नहीं रही है। लोग भोजन, संपत्ति, धर्म और विश्वास तथा सीमाओं को लेकर लड़ते रहे हैं। नारों और बातों से दुनिया में शांति नहीं आएगी, बल्कि शांतिपूर्ण इंसानों को पैदा करने की जीवनपर्यंत कोशिश करनी होगी। हमें हमेशा लड़ने का कोई न कोई बहाना मिल ही जाता है। अभी भी मानव जाति जिस तरीके से है, अगर आप दुनिया से एक समस्या खत्म कर दें, तो दूसरी अपने आप उठ खड़ी होगी।

दुनिया का मतलब ग्लोब नहीं है। दुनिया लोगों से बनती है। अगर हम व्यक्ति के रूपांतरण के लिए काम नहीं करते हैं, अगर हम व्यक्ति को शांतिपूर्ण बनाने के तरीके नहीं खोजते हैं, तो विश्व शांति के बारे में बात करना महज एक किस्म का मनोरंजन है। एक व्यक्ति के तौर पर इंसान पर ध्यान दिए बिना, दुनिया में किसी तरह का बदलाव लाने की कोशिश करना हमेशा और अधिक समस्याओं को न्यौता देता है।

अगर हम देखें कि फिलहाल हम दुनिया में कैसी स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं, तो हमने जो नींव रखी है, उसी से यह पक्का हो जाता है कि इस पृथ्वी पर बिल्कुल भी शांति नहीं होगी। इस बुनियाद के तमाम पहलू हैं। एक अहम पहलू यह है कि हम आर्थिक पहलू को मानव जीवन का सबसे अहम हिस्सा बना रहे हैं।

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आज की दुनिया में, आपका प्रेम, आपकी खुशी, आपकी आजादी, आपका संगीत और नृत्य, कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। सबसे महत्वपूर्ण चीज हो गई है अर्थव्यवस्था। एक बार जब आप अर्थ को सबसे अहम चीज बना देते हैं, तो लड़ाई को टालना असंभव हो जाता है। चूंकि पृथ्वी पर संसाधन सीमित मात्रा में हैं, इसलिए जब हमारा जीवन अर्थशास्त्र से संचालित होगा तो हम युद्ध से बच नहीं सकते, यहां शांति असंभव है।

आर्थिक खुशहाली की तलाश में आज के समाज में हिंसा भरी पड़ी है। हमारा अस्तित्व ही हिंसा पर टिका है। हमारा संगीत, नृत्य और संस्कृति हिंसक बनते जा रहे हैं। हम जिस तरह से चलते-फिरते हैं, जिस तरह अपने जीवन में कुछ करते हैं, वह सब हिंसक बनता जा रहा है। अगर हम व्यक्ति के रूपांतरण के लिए काम नहीं करते हैं, अगर हम व्यक्ति को शांतिपूर्ण बनाने के तरीके नहीं खोजते हैं, तो विश्व शांति के बारे में बात करना महज एक किस्म का मनोरंजन है।आपको इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि यह हिंसा हमारे जीवन में इतनी भर गई है कि अब यह सड़कों पर तक फैलती जा रही है।

खुद को एक व्यक्ति के रूप में देखें और ध्यान दें कि दिन में कितनी बार ऐसा होता है कि आप अपने बगल में बैठे इंसान को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। खुद पर नियंत्रण करना एक समय तक ही कारगर होगा। कभी न कभी विस्फोट होगा ही।

फिलहाल पूरी दुनिया के लोग एक विनाशकारी नींव पर बैठे हैं। शांति एक ऐसी चीज है जिसका स्वाद लोगों ने अभी अपने भीतर नहीं लिया है। फिर हम सामाजिक और विश्व व्यापी स्थितियों में उसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं? जब तक कि हम उस नींव को बदलने के लिए मेहनत नहीं करते, जिस पर विश्व समुदाय खड़ा है, तब तक शांति की कोई संभावना नहीं है।

नारों और बातों से दुनिया में शांति नहीं आएगी, बल्कि शांतिपूर्ण इंसानों को पैदा करने की जीवनपर्यंत कोशिश करनी होगी। अगर हम समाज के सभी स्तरों पर, खास तौर पर नेतृत्व में, गतिविधि के तमाम क्षेत्रों में चाहे वह कारोबार हो, राजनीति, उद्योग या नौकरशाही, उनमें जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों में शांतिपूर्ण इंसान पैदा करने के लिए मेहनत करेंगे, अगर हम ऐसे लोग उत्पन्न कर सकते हैं जो वाकई शांतिपूर्ण हैं और उनके भीतर संपूर्णता की कुछ भावना है, तो वे निश्चित रूप से शांति को समाज के बड़े हिस्सों तक पहुंचाएंगे। यहां शांति से मतलब सिर्फ युद्ध को टालना नहीं है, बल्कि दुनिया में शांतिपूर्ण तरह से रहने की एक सक्रिय संस्कृति स्थापित करना है।