योगासन : क्या लचीला शरीर मन को सुखी बनाता है?

योगासन शरीर को लचीला बनाते हैं। क्या योगासन के अभ्यास से मन भी लचीला बनता है? क्या शरीर के लचीलेपन को देख कर हम किसी के मन के बारे में अनुमान लगा सकते हैं?
योगासन : क्या लचीला शरीर मन को सुखी बनाता है?
 

Sadhguruयोगासन शरीर को लचीला बनाते हैं। क्या योगासन के अभ्यास से मन भी लचीला बनता है? क्या शरीर के लचीलेपन को देख कर हम किसी के मन के बारे में अनुमान लगा सकते हैं?

प्रश्‍न :

क्या किसी इंसान के शरीर में लचीलेपन के स्तर और उसके अंगों के लचीलेपन से उसकी मानसिक स्थिति, उसकी शख्सियत या उसके पिछले जन्म के कर्मों के बारे में कुछ बताया जा सकता है?

सद्‌गुरु :

यह जीवन को देखने का बहुत पक्षपात पूर्ण तरीका होगा। हमें अपने आस-पास के लोगों का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। किसी इंसान को झुकने या फर्श पर बैठने में बहुत सी वजहों से परेशानी हो सकती है। इस तरह लोगों के बारे में राय बनाना गलत और गैरजरूरी है। लेकिन लचीलेपन के सवाल को सामान्य तौर पर देखें तो एक मांसपेशी लचीली होने पर ही उपयोगी होती है। जहां भी शरीर को 100 फीसदी दृढ़ता की जरूरत है, वहां उसने हड्डियां बनाईं।

जो भी हो, हम व्यक्ति के लचीलेपन से उसके बारे में इस तरह राय नहीं बना सकते, “मुझे बताओ कि आप कौन सा योगासन नहीं कर सकते और मैं बता दूंगा कि आप किस तरह के इंसान हैं।”
जहां उसे 75 फीसदी दृढ़ता चाहिए, उसने नसें बनाईं। जहां उसे 50 फीसदी दृढ़ता चाहिए, उसने उपास्थि (कार्टिलेज) पैदा की। जहां उसे पूरा लचीलापन चाहिए, वहां मांसपेशियां बनाई। शरीर का ढांचा लचीलेपन के अलग-अलग स्तरों से बना है। अगर शरीर का हर हिस्सा लचीला होता, तो आप बीन बैग की तरह बैठे होते।

शरीर के कुछ अंग दृढ़ या कठोर होते हैं, कुछ थोड़े कम दृढ़ होते हैं और कुछ लचीले होते हैं - यह बहुत बुद्धिमानी से तय किया गया है। इन्हें उसी रूप में रखना चाहिए जिस रूप में सृष्टा ने उन्हें तैयार किया है। तीन साल के बच्चे में इतना लचीलापन होता है कि वह कोई भी योगासन कर सकता है। आपने अपने अंगों का इस्तेमाल न करके इस लचीलेपन को खो दिया है, क्योंकि आप अपने शरीर को कब्र के लिए संजो कर रखना चाहते हैं। आप मृत्यु के समय अच्छी स्थिति में होना चाहते हैं लेकिन दुनिया में मौजूद होते हुए आप अच्छी स्थिति में नहीं हैं।

अगर आपकी मांसपेशियों को किसी तरह की कोई चोट या नुकसान नहीं पहुंचा है और फिर भी वे सख्त हैं, तो शायद आप अपने शरीर में एसिड उत्पन्न कर रहे हैं। आप इस पर गौर कर सकते हैं - अगर किसी खास दिन आप मानसिक तनाव की स्थिति में हैं, तो अगले दिन आपको झुकने में ज्यादा परेशानी होगी। एसिड का स्तर बढऩे के साथ मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं।

सख्त मांसपेशियां और सख्त मस्तिष्क अच्छी चीज नहीं हैं। आपका मस्तिष्क और मांसपेशियां तभी उपयोगी होते हैं, जब वे लचीले होते हैं। अगर आप आनंदपूर्वक यहां बैठेंगे, तो शरीर में एसिड उत्पन्न नहीं होगा। लेकिन अगर आप पांच मिनट के लिए भी गुस्से में आते हैं, तो आपके खून में एसिड का स्तर काफी बढ़ जाएगा, वह इस हद तक बढ़ जाता है कि आपके शरीर में जहर बनने लगता है और यह जहर आपकी मांसपेशियों को सख्त बना देता है। इसके अलावा, लचीलेपन की कमी की वजह आपके रहन-सहन से जुड़ी भी हो सकती है क्योंकि आपको फर्श पर बैठने या अपने शरीर को ज्यादा इस्तेमाल करने की आदत नहीं है।

जो भी हो, हम व्यक्ति के लचीलेपन से उसके बारे में इस तरह राय नहीं बना सकते, “मुझे बताओ कि आप कौन सा योगासन नहीं कर सकते और मैं बता दूंगा कि आप किस तरह के इंसान हैं।”

अंगों को आराम देने के लिए

शरीर के अंगों के आराम में होने का खास महत्व है। इसके कई पहलू हैं। फिलहाल हम इसके सिर्फ एक पहलू पर विचार कर रहे हैं। शरीर के ज्यादातर महत्वपूर्ण अंग छाती और पेट के हिस्से में होते हैं। ये सारे अंग न तो सख्त या कड़े हैं और न ही ये नट या बोल्ट से किसी एक जगह पर स्थिर किए गए हैं। ये सारे अंग ढीले-ढाले और एक जाली के अंदर झूल रहे से होते हैं। इन अंगों को सबसे ज्यादा आराम तभी मिल सकता है, जब आप अपनी रीढ़ को सीधा रखकर बैठने की आदत डालें।

आधुनिक विचारों के मुताबिक, आराम का मतलब पीछे टेक लगाकर या झुककर बैठना होता है। लेकिन इस तरह बैठने से शरीर के अंगों को कभी आराम नहीं मिल पाता। इस स्थिति में, शारीरिक अंग उतने ठीक ढंग से काम नहीं कर पाते जितना उनको करना चाहिए - खासकर जब आप भरपेट खाना खाने के बाद आरामकुर्सी पर बैठ जाएं। आजकल काफी यात्राएं आराम कुर्सी में होती हैं।

अगर किसी खास दिन आप मानसिक तनाव की स्थिति में हैं, तो अगले दिन आपको झुकने में ज्यादा परेशानी होगी। एसिड का स्तर बढऩे के साथ मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं।”
मेरा कहना यह है कि अगर आप कार की आरामदायक सीट पर बैठकर एक हजार किलोमीटर की यात्रा करते हैं, तो आप अपने जीवन के कम-से-कम तीन से पांच साल खो देते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लगातार ऐसी मुद्रा में बैठे रहने की वजह से आपके अंगों पर इतना बुरा असर होता है कि उनके काम करने की शक्ति में नाटकीय ढंग से कमी आ जाती है या फिर वे बहुत कमजोर हो जाते हैं।

शरीर को सीधा रखने का मतलब यह कतई नहीं है कि हमें आराम पसंद नहीं है, बल्कि इसकी सीधी सी वजह यह है कि हम आराम को बिल्कुल अलग ढंग से समझते और महसूस करते हैं। आप अपनी रीढ़ को सीधा रखते हुए भी अपनी मांसपेशियों को आराम में रहने की आदत डाल सकते हैं। लेकिन इसके विपरीत, जब आपकी मांसपेशियां झुकीं हों, तो आप अपने अंगों को आराम में नहीं रख सकते। आराम देने का कोई और तरीका नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने शरीर को इस तरह तैयार करें कि रीढ़ को सीधा रखते हुए हमारे शरीर का ढांचा और स्नायुतंत्र आराम की स्थिति में बने रहें।

 
 
 
 
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