डर लगता है, आखिर क्‍यों ?
अध्यात्म के पथ पर चलते हुए कई तरह के भय और असुरक्षाएं हमारे सामने आ सकती हैं। क्या भय हमारी ही रचना है? क्या उपाय है इससे बचने का?
 
डर लगता है, आखिर क्‍यों ?
 

अध्यात्म के पथ पर चलते हुए कई तरह के भय और असुरक्षाएं हमारे सामने आ सकती हैं। क्या भय हमारी ही रचना है? क्या उपाय है इससे बचने का?

जिज्ञासु : सद्‌गुरु, जैसे- जैसे मैं इस मार्ग पर आगे बढ़ता हूं, वैसे -वैसे मुझे अपने भीतर भरा भय तथा असुरक्षा भाव नजर आता है। इन सब को पीछे छोड़ कर मैं आगे कैसे बढ़ूं?

सद्‌गुरुसद्‌गुरु:: तुम्हें अपने भय तथा असुरक्षा को छोड़ना नहीं है, क्योंकि वास्तव में उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। तुम तो उन्हें अचेतन में निर्मित किए जा रहे हो। अगर तुम उन्हें निर्मित नहीं करते हो, तो वास्तव में उनका कोई अस्तित्व नहीं है। तुम्हारा प्रश्न तो यह है कि तुम उनका सृजन क्यों करते हो, और उनका सृजन बंद कैसे किया जाए। पहले इस पर विचार करो कि तुम्हारे अंदर भय क्यों उठता है। कारण बहुत स्वाभाविक है। इस विराट सृष्टि में, जिसका न तो तुम आदि जानते हो ना ही अंत; तुम बस एक सूक्ष्म प्राणी हो। एक नन्हा सा जीव, जो कि तुम अभी हो — उसमें भय का होना स्वाभाविक है। यह भावना बहुत प्रबल है; इसलिए भय तो होगा कि पता नहीं मेरे साथ क्या घटित हो।

जब तक तुम अपने आप को सिर्फ एक भौतिक शरीर के रूप में पहचानते हो, जब तक तुम्हारे जीवन का अनुभव तुम्हारी अपनी शारीरिक तथा मानसिक क्षमताओं तक सीमित है, तब तक उस भय तथा असुरक्षा का होना निश्चित है। हां, यह जरूर है कि अलग- अलग लोगों में उस भय और असुरक्षा का परिमाण अलग-अलग हो सकता है, उनका स्तर अलग-अलग हो सकता है। आज अगर तुम्हारे साथ कुछ सुंदर घटित हो रहा है, तो हो सकता है कि तुम अपनी असुरक्षा को भूल जाओ। लेकिन कल अगर परिस्थितियां विषम हो जाएं, तो तुम्हें फिर से वह असुरक्षा सताने लगेगी, जो तुम्हारे भीतर भरी हुई है। इस भय से तुम केवल तभी मुक्त हो सकते हो, जब अपने भौतिक शरीर और मन की सीमाओं से बाहर निकल जाओ। तुम्हारे अनुभव इन अनुभवों से परे हों।

अपने आप को इस भौतिक अस्तित्व से परे अनुभव करने को ही हम आध्यात्मिकता कह रहे हैं। जब मैं आध्यात्मिक कहता हूं, तो ऐसा मत सोचो कि इसका संबंध मंदिर जाने से है। ऐसा मत सोचो कि इसका संबंध इसके या उसके लिए प्रार्थना करने से है। अगर तुम इन प्रार्थनाओं पर गौर करोगे, तो पाओगे कि संसार की पंचानवे प्रतिशत प्रार्थनाओं का संबंध हमारी याचनाओं से है। वह मूलत: अपनी सुरक्षा की मांग है या बस कुशल मंगल की कामना। आध्यात्मिक उसमें कुछ भी नहीं है। वह सीधे-सीधे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लगाई जाने वाली गुहार है।

ऐसी ज्यादातर प्रार्थनाओं का आधार मनुष्य के भीतर बैठा वही भय और असुरक्षा है। अगर वह प्रार्थना सिर्फ आदतन संपन्न की जाने वाली एक क्रिया मात्र है, तो वह फूहड़ है — जिसमें किसी एक के प्रति इतनी श्रद्धा व्यक्त की जा रही हो और शेष तमाम चीजों के प्रति अनादर का भाव हो।

अगर तुम स्वयं प्रार्थनामय हो सको, तो वह अद्भुत है। और अगर तुम्हारी प्रार्थना-कर्म उस अवस्था को प्राप्त करने के लिए है, तो वह भी अच्छा है। लेकिन अगर यह सोचते हो कि तुम्हारी वह प्रार्थना स्वर्ग तक पहुंचेगी और इससे तुम्हारा यहां का जीवन सुखद और सुरक्षित हो जाएगा, तो यह मूर्खतापूर्ण है। यहां तो छोटे छोटे कीड़े - मकोडे भी अपने जीवन की हिफाजत खुद करते हैं। इसलिए, जब मैं अध्यात्म कहता हूं, तो मेरा आशय तुम्हारे भीतर शुरू हो रहे उस अनुभव से है, जो भौतिक नहीं है। एक बार जो यह आध्यात्मिक प्रक्रिया जग उठे, एक बार जो तुम अपने आप को शारीरिक और मानसिक सीमाओं के परे अनुभव करने लगो, तो भय जैसी कोई चीज बचेगी ही नहीं। भय सिर्फ एक जरूरत से ज्यादा सक्रिय दिमाग और अनियंत्रित मन की उपज है।

 
 
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