आकाश के प्रति जागरूक कैसे हों ?

एक जिज्ञासु ने सदगुरु से जानना चाहा है कि जिस मूल तत्व आकाश पर अन्य चार तत्व आधारित हैं, उस आकाश का अनुभव हम कैसे करें ?
आकाश के प्रति जागरूक कैसे हों ?
 

प्रश्न: मेरा प्रश्न आकाश तत्व से संबंधित है। अगर हम मैदान जैसे खुले स्थान में बैठें, क्षितिज के बिंदुओं को देखते रहें, या समुद्र पर एकटक नज़र रखें, या बस आकाश की तरफ देखते रहें, या फिर ऐसे ही खुले स्थानों में समय बितायें तो क्या हम आकाश के प्रति ज्यादा जागरूक हो सकते हैं? क्या इससे हमें अपने अंदर या अपने चारों ओर, इस तत्व के प्रति ज्यादा जागरूक होने में मदद मिल सकती है?

सद्‌गुरु: हाँ, ये मदद कर सकता है, पर अधिकतर लोग क्या करते हैं? वे खुले स्थानों में अपने आप को हर तरह से सुरक्षित कर लेना चाहते हैं और अच्छी तरह से ढक लेते हैं क्योंकि अलग-अलग स्थान पर तापमान आदि में बहुत अंतर मालूम होता है। लेकिन हाँ, ये एक संभावना है पर आवश्यक नहीं कि ऐसा हो ही। अगर आप बाहर बैठे हैं तो उसका उपयोग कर सकते हैं। लेकिन इसका सरल तरीका ये है कि आप पहले उन खास गतिविधियों पर अच्छी तरह से ध्यान दें जो ज़्यादा स्पष्ट हैं जैसे साँस लेना - छोड़ना, भोजन करना, पानी पीना, शरीर का अंदरूनी और बाहरी तापमान।

सरल तरीका ये है कि आप पहले उन खास गतिविधियों पर अच्छी तरह से ध्यान दें जो ज़्यादा स्पष्ट हैं जैसे साँस लेना - छोड़ना, भोजन करना, पानी पीना, शरीर का अंदरूनी और बाहरी तापमान।

इन ज्यादा स्पष्ट बातों की तरफ थोड़ा और ध्यान दीजिये। मुझे इस बात का बहुत आश्चर्य होता है कि कैसे, साँस -- जो इतनी स्पष्ट गतिविधि है, जो चुपचाप भी नहीं होती, सारे शरीर को हिलाती है, उसके बारे में अधिकतर लोगों को कोई खबर ही नहीं होती, उनको कुछ पता ही नहीं चलता। अगर आप को अपनी साँस का पता नहीं चलता तो उससे ज्यादा सूक्ष्म बात का कैसे पता चलेगा? हाँ, प्रकृति के साथ होना, प्राकृतिक वातावरण में होना अच्छा है पर ये ज्यादा महत्वपूर्ण है कि अधिक स्पष्ट बातों जैसे साँस लेना, खाना, पीना, चलना, किसी चीज़ को छूना, महसूस करना आदि पर अच्छी तरह से ध्यान दें। बाहर जाकर बैठने की अपेक्षा, अगर आप इन बातों के प्रति ज्यादा जागरूक होंगे तो ये बेहतर होगा और आप देखेंगे कि आपके जीवन का अनुभव एक दूसरे ही स्तर पर, कहीं ऊँचे स्तर पर पहुँच जायेगा।

अधिकतर मनुष्य इन सरल, सामान्य बातों की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। वे जो खाते या पीते हैं, उसे बस निगल जाते हैं, वे बिल्कुल बेहोशी में साँस लेते हैं। वे हर किसी चीज़ को बस ऐसे ही छूते हैं, बिना यह जाने कि वे किसे छू रहे हैं, महसूस कर रहे हैं? ये अधिकाँश लोगों के साथ ऐसा ही होता है। लेकिन, आप अपने काम में कटौती किये बिना भी इन बातों के प्रति काफी ज्यादा जागरूक हो सकते हैं, और ये चीज़ महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोगों को लगता है कि अगर आप को अपनी साँस के प्रति जागरूक होना है, उस पर ज्यादा ध्यान देना है तो आप उस समय कुछ और नहीं कर सकते, बस स्थिर बैठ कर साँस लेनी होगी। पर ऐसा नहीं है।

मानव जीवन की सुंदरता ये है कि हमारे मस्तिष्क के पास ये योग्यता है कि हम अपने अंदर जटिल गतिविधियाँ करते हुए भी दूसरी तरफ ध्यान दे सकते हैं जैसे कि ड्राइविंग करते समय आप किसी के साथ बातचीत कर सकते हैं - एक ही समय पर आप दो बातों पर ध्यान दे रहे हैं तो आप जो कुछ भी कर रहे हैं वो करते समय, साथ ही साथ, अपनी साँस पर भी ध्यान दे सकते हैं। साँस की प्रक्रिया ऐसी है जो हर समय हो ही रही है, इसलिए आप उस पर ध्यान दे सकते हैं। आप जो खाना खा रहे हैं उस पर भी आप ध्यान दे सकते हैं और जो पानी पी रहे हैं, उस पर भी। बाहर जा कर मैदान में बैठने की बजाय, शुरू करने के लिये ये एक बेहतर तरीक़ा है।

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