विषय सूची
1. आदि शंकराचार्य : एक अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति
2.आदि शंकराचार्य के असामान्य गुरु
3. आदि शंकराचार्य और बद्रीनाथ मंदिर
4. आदि शंकराचार्य की माँ की मृत्यु
5. आदि शंकराचार्य ने एक मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया
6.आदि शंकराचार्य ने शिष्यों को व्यावहारिक पाठ पढ़ाया
7. आदि शंकराचार्य की मृत्यु
8. आदि शंकराचार्य क्यों इतने महान थे?
9. आदि शंकराचार्य के माया पर उपदेश - सदगुरु का स्पष्टीकरण
10.आदि शंकराचार्य के उपदेश : सृष्टि- सृष्टिकर्ता का एकत्व
11.आदि शंकराचार्य की आज की दुनिया में सार्थकता
12.आदि शंकराचार्य के मंत्र और दूसरी रचनाएं

#1. आदि शंकराचार्य : एक अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति

सदगुरु: आदि शंकराचार्य बुद्धिमत्ता की दृष्टि से अत्यंत महान थे, भाषाओं में उनकी प्रतिभा विलक्षण थी। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि वे एक आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ थे और भारत के गौरव भी। बहुत ही छोटी उम्र में बुद्धिमानी और ज्ञान का जो स्तर उनमें था, उसने उन्हें मानवता के लिये एक चमचमाता सितारा, प्रकाश स्रोत बना दिया था। वे जब बालक ही थे, तभी बहुत ही प्रतिभासंपन्न और असामान्य विद्वान थे। उनकी योग्यतायें अतिमानवीय थीं, किसी मनुष्य के लिये असंभव जैसीं। दो वर्ष की उम्र में वे धाराप्रवाह संस्कृत बोल और लिख सकते थे। चार साल का होते होते वे सभी वेदों का पाठ कर सकते थे और 12 की उम्र में उन्होंने संन्यास ले कर घर छोड़ दिया था। इतनी छोटी उम्र में भी उन्होंने शिष्य इकट्ठा कर लिये थे, जिनके साथ उन्होंने आध्यात्मिक विज्ञान को फिर से स्थापित करने के लिये देश भर में घूमना शुरू कर दिया था।

32 वर्ष के होते होते, आदि शंकराचार्य ने शरीर छोड़ दिया था पर 12 से 32 की उम्र के उन 20 सालों में उन्होंने भारत के चारों कोनों की कई यात्रायें कीं - उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम! केरल से बद्रीनाथ जा कर वे वापस आये, और सभी दिशाओं में हर जगह गये। इतनी छोटी उम्र में इतना चलने वाले, वे बहुत तेज चलते होंगे और इसी दौरान, हज़ारों पृष्ठों के साहित्य की रचना भी उन्होंने की।

#2. आदि शंकराचार्य के असामान्य गुरु

आदि शंकराचार्य को गुरु गौड़पाद से मार्गदर्शन मिला। उनके मार्गदर्शन में ही यह सब अतुलनीय काम आदि शंकराचार्य ने किया। गौड़पाद भी हमारी परंपराओं के भाग रहे हैं। वे एक असामान्य गुरु थे पर उनके उपदेश कभी लिख कर नहीं रखे गये और उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि उन्हें लिखा न जाये। उन्होंने हज़ारों लोगों को सिखाया, पढ़ाया होगा पर 15 से 20 ऐसे अच्छे लोग तैयार किये, जिन्होंने इस देश में एकदम शांति से, चुपचाप, बिना शोर मचाये, आध्यात्मिक विज्ञान को फिर से स्थापित किया, जीवित किया, उपयोगी बनाया। उन्होंने कोई नया धर्म या पंथ नहीं चलाया। कई तरह से यही ईशा का भी इरादा रहा है - कोई नया धर्म या शास्त्र न बनाते हुए, आध्यात्मिक विज्ञान को बस, जीवन के एक तरीके के रूप में, मनुष्य के अंदर शिक्षा के रूप में स्थापित करना, जिस पर वो अमल करे।

#3. आदि शंकराचार्य और बद्रीनाथ मंदिर

बद्रीनाथ का ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि यहाँ के मंदिर को आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। उन्होंने वहाँ अपने लोगों को ही नियुक्त किया। जिन लोगों को उन्होंने नियुक्त किया था, वे पारंपरिक रूप से नंबूदिरी (ब्राम्हण) थे और उनके ही वंशज आज भी मंदिर के पुजारी हैं। कलाड़ी से बद्रीनाथ की, चल कर जाने की, दूरी 3000 किमी से भी ज्यादा है। आदि शंकराचार्य उन दिनों इतनी दूर चलकर गये थे, और फिर वापस आये थे।

#4.आदि शंकराचार्य की माँ की मृत्यु

एक बार जब आदि शंकराचार्य उत्तर भारत में थे तो अपने सहज बोध से उन्हें पता चला कि उनकी माँ का आखिरी वक्त आ गया था। 12 साल की उम्र में उन्हें संन्यास लेने की आज्ञा माँ ने इसी शर्त पर दी थी कि माँ की म्रत्यु के समय वे उनके पास ही होंगे। तो जब उन्हें ये महसूस हुआ कि उनकी माँ बीमार थी, तब वे वापस केरल की ओर चल पड़े और माँ के पास उनकी मृत्यु से पहले ही पहुँच गये। माँ मृत्यु शैय्या पर ही थीं और शंकराचार्य ने कुछ दिन उनके साथ बिताये। माँ की मृत्यु के बाद सब काम निपटा कर वे वापस उत्तर की ओर जाने के लिये निकल पड़े। हिमालय की यात्रा आज भी करने में कठिन लगती है, तो आप समझ सकते हैं कि उस समय में ये कितनी कठिन होगी, और आपको ये सोच कर आश्चर्य होगा कि वे इतना सब कैसे चले होंगे। कल्पना कीजिये, उनका प्रयास कितना बड़ा होगा!

#5.आदि शंकराचार्य ने एक मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया

आदि शंकर ने मुर्दा राजा के शरीर में कैसे प्रवेश किया था?

आदि शंकराचार्य एक बार एक व्यक्ति के साथ शास्त्रार्थ में उतरे और जीत गये। फिर उस व्यक्ति की पत्नी ने आदि शंकराचार्य के साथ शास्त्रार्थ शुरू किया। तर्क के मामले में आदि शंकराचार्य का स्तर बहुत ऊँचा था और ऐसे विद्वान के साथ आप आसानी से तर्क नहीं कर सकते, तो उसने ऐसे बात की, "आप ने मेरे पति को हराया है, पर वे पूर्ण नहीं हैं। हम दोनों एक पूर्ण भाग के दो आधे आधे भाग हैं। इसलिये, आपको मेरे साथ भी शास्त्रार्थ करना होगा। इस तरह के तर्क को आप यूँ ही अनसुना नहीं कर सकते, तो आदि शंकराचार्य का उस स्त्री के साथ शास्त्रार्थ शुरू हुआ। जब उसने देखा कि वो हार रही है तो उसने उनसे यौन संबंधों के विषय पर प्रश्न करना शुरू किया। शंकराचार्य जो कुछ कह सकते थे, वो उन्होंने कहा पर वो ज्यादा गहरे विवरणों में उतर गयी और पूछा, "आप अनुभव से क्या जानते हैं"? आदि शंकराचार्य ब्रह्मचारी थे। वे समझ गये कि ये उन्हें हराने की चाल थी। तब वे बोले, "ठीक है, हम एक महीने के लिये रुक जाते हैं। हम एक महीने बाद यहीं से शुरू करेंगे, जहाँ पर हम रुक रहे हैं"।

फिर वे एक गुफा में गये और अपने शिष्यों से बोले, "चाहे जो हो जाये, किसी को इस गुफा में आने मत देना क्योंकि मैं कुछ समय के लिये अपना शरीर यहाँ छोड़ रहा हूँ और कोई दूसरी संभावना देखता हूँ"। जीवन ऊर्जा (प्राण शक्ति) अपने आपको पाँच आयामों में अभिव्यक्त करती है - प्राण वायु, समान, अपान, उदान और व्यान! प्राण शक्ति के इन पाँच आयामों के अलग अलग काम हैं। प्राण श्वसन क्रिया, विचार प्रक्रिया और स्पर्श के अनुभव को संभालता है। आप कैसे पता लगाते हैं कि कोई ज़िंदा है या मर गया है? साँस रुक जाने पर उसे मरा हुआ माना जाता है। साँस तभी रुकती है जब प्राण वायु बाहर निकलने लगती है। लगभग डेढ़ घंटे में प्राण वायु पूरी तरह से बाहर निकल जाती है।

इसीलिये, ये हमारी परंपरा है कि साँस रुक जाने और मृत घोषित होने के बाद भी मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार तुरंत नहीं करते, डेढ़ घंटे रुकते हैं क्योंकि उस समय तक उसकी विचार प्रक्रिया और स्पर्श अनुभव पूरी तरह से बंद नहीं होते। कई प्रकार से वो व्यक्ति अभी भी जीवित है क्योंकि और इतने समय में उसे चिता की आग का अहसास हो सकता है, क्योंकि प्राण वायु के बाकी आयाम तो अभी भी शरीर में हैं। अंतिम आयाम व्यान 12 से 14 दिनों तक वहीं रह सकता है। शरीर का टिके रहना और एक रूप में रहना व्यान की वजह से ही होता है। जब आदि शंकराचार्य अपने शरीर में से बाहर निकले तो उन्होंने अपने व्यान को प्रणाली में ही रहने दिया क्योंकि शरीर को उसके सही रूप में रखना ज़रूरी था।

उसी समय ऐसा हुआ कि एक राजा को किसी कोबरा ने डस लिया था और वो मर गया था। जब कोबरा का ज़हर किसी के शरीर में घुसता है तो खून जमने लगता है और साँस लेना कठिन हो जाता है। जब खून का बहना मुश्किल होता है तो साँस लेना भी कठिन हो जाता है और प्राण वायु के निकल जाने के पहले ही साँस रुक जाती है। कई तरह से, अगर किसी को इस शरीर में प्रवेश करना हो तो ये एक अच्छी स्थिति होती है। सामान्य रूप से आपके पास इसके लिये डेढ़ घंटे का समय होता है पर अगर मृत्यु कोबरा के ज़हर से हुई है तो साढ़े चार घंटे का समय मिलता है।

तो आदि शंकराचार्य को ये मौका मिला और वे आसानी से राजा के शरीर में प्रवेश पा गये। उसके बाद उन्होंने वो सब कर लिया जिससे वे अनुभव से उन सवालों का जवाब दे सकें जो उन्हें शास्त्रार्थ में पूछे गये थे। राजा के कुछ नज़दीकी बुद्धिमान लोग थे जिनके ध्यान में ये बात आ गयी कि जिस आदमी को उन्होंने मृत घोषित किया था, वो अचानक ही बहुत सारी ऊर्जा के साथ उठ बैठा था पर उसका व्यवहार पहले जैसा नहीं था और ऐसा लगता था कि उस शरीर में कोई और आ गया था। तो उन्होंने सारे शहर में सैनिकों को भेजा कि अगर कहीं भी, कोई भी मृत शरीर दिखे तो उसे तुरंत जला दें जिससे अगर उस जीव ने, जिसका वो शरीर था, राजा के शरीर में प्रवेश किया हो तो वो राजा के शरीर को छोड़ कर वापस न जा सके क्योंकि अब राजा तो जीवित हो ही गया है, भले ही वो कोई दूसरा आदमी है, तो क्या हुआ, लगता तो वो ही है। पर, उन्हें सफलता नहीं मिली और शंकराचार्य अपने शरीर में वापस पहुँच गये। 

#6.आदि शंकराचार्य ने शिष्यों को व्यावहारिक पाठ पढ़ाया

एक बार, तेज चलते हुए, आदि शंकराचार्य जब एक गाँव पहुँचे तो उनके पीछे चल रहे उनके शिष्य कुछ पीछे रह गये थे। गाँव के बाहर उन्होंने कुछ लोगों को शराब पीते हुए देखा। ये शायद घर पर बनी शराब थी जिसे ताड़ी या अरक कहते हैं। भारत में, उन दिनों, और शायद आज से पच्चीस-तीस साल पहले तक भी, शराब की दुकानें गाँव के बाहर ही हुआ करतीं थीं। उन्हें गाँव के अंदर नहीं रखा जाता था। आजकल तो गाँवों में शराब आपके घरों के आसपास, बच्चों के स्कूल के सामने ही बिकती है, पर उन दिनों ये बाहर ही होती थी । शंकराचार्य ने कहा, "रास्ते से हटो"। वो आदमी बस वहीं खड़ा रहा और बोला, "किसे हटना है, मुझे या मेरे शरीर को"? उसने बस यही पूछा! आदि शंकराचार्य ने उन लोगों को नशे की हालत में देखा।

आप जानते ही होंगे कि शराबी हमेशा यही सोचते हैं कि वे जीवन का मजा ले रहे हैं और बाकी के लोगों को ये नहीं मिल रहा है। तो, उन्होंने शंकराचार्य पर कुछ ताने कसे। बिना एक शब्द बोले, शंकराचार्य दुकान में घुसे, एक घड़ा उठाया और उसे एक साँस में पी कर वे आगे चलने लगे। तब तक, उनके पीछे, उनके शिष्य वहाँ आ गये थे और उन्हें पीता देख कर चर्चा करने लगे, "जब अपने गुरु पी सकते हैं, तो हम क्यों नहीं"? शंकराचार्य समझ गये कि उनके पीछे क्या चल रहा था? जब वे अगले गाँव पहुँचे तो उन्होंने एक लुहार को उसकी दुकान पर काम करते देखा। आदि शंकराचार्य दुकान के अंदर गये और पिघले हुए लोहे से भरा एक घड़ा उठा कर उसे पी गये और फिर आगे चल पड़े। अब, उन शिष्यों की हिम्मत नहीं थी कि वे गुरु की नकल करने की सोच भी सकें।

#7.आदि शंकराचार्य की मृत्यु

अपने जीवन के आखरी समय में आदि शंकराचार्य अपनी संस्कृति में, परंपराओं में - उनका ब्राह्मण के रूप में जीवन, उनका वैदिक जीवन आदि - इतने डूब गये थे कि जीवन के मूल तत्वों को वे सही ढंग से नहीं देख पा रहे थे। एक दिन, वे एक मंदिर में प्रवेश कर रहे थे और उसी समय, एक दूसरा आदमी बाहर आ रहा था। वो आदमी छोटी जाति का था और आदि शंकराचार्य ब्राह्मण थे, शुद्ध लोगों में सबसे ज्यादा शुद्ध। तो उन्हें ये अपशकुन जैसा लगा कि जब वे अपने भगवान की पूजा करने जा रहे थे तो ये छोटी जाति वाला आदमी बीच में आ गया था। शंकराचार्य ने कहा, "रास्ते से हटो"। वो आदमी बस वहीं खड़ा रहा और बोला, "किसे हटना है? मुझे या मेरे शरीर को"? उसने बस यही पूछा। ये शब्द शंकराचार्य के हृदय में एकदम जबर्दस्त रूप से चुभ गये और ये आखरी बार ही था कि उन्होंने ऐसा कुछ कहा। उसके बाद उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिये। वे सीधे हिमालय चले गये। उनको फिर कभी किसी ने नहीं देखा।

#8.आदि शंकराचार्य क्यों इतने महान थे?

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ऐसे व्यक्ति को कैसे बनाया जा सकता है? अपने छोटे से जीवन में वे इस देश की लंबाई चौड़ाई कई बार नाप चुके थे और हज़ारों पृष्ठों का अद्भुत साहित्य रच चुके थे। इतनी ऊर्जा, इतना उत्साह, इतनी बुद्धिमत्ता उनमें कहाँ से आयी? एक पहलू जो बहुत महत्वपूर्ण भी है और प्रतीकात्मक भी, वो ये है कि उनका जन्म कलाड़ी के पास के एक गाँव में हुआ था। कलाड़ी आज एक छोटा शहर है। कलाड़ी का मतलब है, "पाँवों के नीचे"! दक्षिण में, हम भारत माता के चरणों के पास में हैं और इसकी वजह से हमें कई तरह से बहुत फायदा हुआ है। चाहे कोई भगवान हो, आदमी, स्त्री, बच्चा, जानवर, पेड़ या चट्टान, पत्थर हो, हमने सब के सामने झुकना सीखा है।

महाभारत की एक सुंदर कहानी है।युद्ध में सहायता माँगने के लिये जब दुर्योधन और अर्जुन, एक ही समय पर, कृष्ण के पास पहुँचे एक उनके सिर के पास खड़ा हुआ और एक उनके पैरों के पास - और बस, इसी से सब फैसले हो गये। उस दोपहर में, जब अर्जुन कृष्ण के पैरों के पास खड़े हुए तो मूल रूप से उसी समय उन्होंने युद्ध जीत लिया। हमारे देश का, हमारी संस्कृति का यही मूल स्वभाव है। हम ऊपर इसीलिये उठते हैं क्योंकि हम हर चीज़ के सामने झुकते हैं। दूसरों को हटा कर, धक्का दे कर हम अपना रास्ता नहीं पाते, हम झुकते हैं इसीलिये ऊपर की ओर उठते हैं। भारत का अर्थ यही है कि हमनें हमेशा से सीखा है कि हम दिव्यता के पैरों की तरफ कैसे रहें? ये अपना बड़प्पन दिखाने की, दिखावे की संस्कृति नहीं है, स्वाभाविक नम्रता की संस्कृति है।

चाहे कोई भगवान हो, आदमी, स्त्री, बच्चा, जानवर, पेड़ या चट्टान, पत्थर हो, हमने सब के सामने झुकना सीखा है। बस इसी एक पहलू की वजह से हमारे यहाँ महान लोग हुए हैं। दिव्यता के पैरों के पास होने से, हम सीखे हैं, विकसित हुए हैं, खिले हैं और एक लंबे समय तक बाकी की दुनिया के लिये मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ बने हैं। हज़ारों साल पहले, आदि शंकराचार्य से बहुत पहले, आदियोगी के समय से, बहुत सारे योगियों, दिव्यदर्शियों, ऋषियों और संतों ने ये बात कई तरह से कही है।

जिस बुद्धिमत्ता और स्पष्टता से उन्होंने अपनी बात कही, और जिस उत्साह और ऊर्जा से सारे देश में इसका प्रचार, प्रसार किया, उसकी वजह से आदि शंकराचार्य को एक अलग, महान स्थान प्राप्त है। आज की दुनिया के लिये ये एक बात समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सब ज्ञान, ये सारी बुद्धिमानी किसी विश्वास या श्रद्धा के कारण नहीं आई, बल्कि आत्मज्ञान की वजह से आई है। अगर आध्यात्मिक प्रक्रिया मूल मानवीय तर्क और आज की वैज्ञानिक शोध के साथ एक लय में न हो तो लोग उसे स्वीकार नहीं करते। आने वाली पीढ़ियाँ वो सब ठुकरा देंगीं, जो उनके लिये तर्क की कसौटी पर ठीक न लगे और वैज्ञानिक रूप से सही न हो। इस संदर्भ में आदि शंकराचार्य आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, सार्थक हैं।

#9.आदि शंकराचार्य की माया के बारे में शिक्षा ; सद्गुरु से समझें

आदि शंकराचार्य ने जो कहा, उसके बारे में काफी गलतफहमी है। मुझे लगता है कि उनके लिये मेरा ये फ़र्ज़ बनता है कि मैं कम से कम एक पहलू को स्पष्ट करूँ। बहुत सारे लोगों का कुछ इस प्रकार का कहना है, " माया का मतलब है वो, जो नहीं है, ऐसा वे कहते हैं, ये क्या बकवास है"? वास्तव में माया का मतलब "वो जो नहीं है", ऐसा नहीं है। माया का मतलब भ्रम है, इस अर्थ में कि आप उसे उस रूप में नहीं देखते, जैसी वो है।

आप इस ठोस शरीर में हैं पर आप जो खाना खा रहे हैं, जो पानी पी रहे हैं और जिस हवा में साँस ले रहे हैं, उनसे आपके शरीर की कोशिकायें रोज ही बदल रही हैं। जिस तरह की  खास कोशिका है, उसका दो दिन से कुछ साल तक के समय में पूरी तरह से कायाकल्प हो जाता है और इससे आपके शरीर के हर अंग, हर कण का भी कायाकल्प हो जाता है। इसका मतलब है कि कुछ समय बाद आपका शरीर एकदम नया हो जाता है। अगर आपके अनुभव में ऐसा लगता है कि ये वही पुराना शरीर है तो यही माया है। ऐसे ही, आप अस्तित्व को जिस तरह से समझते हैं, जिस तरह से आप इस दुनिया को अपनी पाँच ज्ञानेंद्रियों से जानते हैं - वो पूरी तरह से अलग है। जैसा आप समझते हैं, वैसा नहीं है - ये भ्रम है। ये मृग मरीचिका की तरह है।

अगर आप शहरों, गाँवों को जोड़ने वाले बड़े रास्तों पर, राजमार्गों पर, दोपहर में, गाड़ी चला रहे हों तो कभी, कभी, दूरी पर, ऐसा लगता है कि पानी है। जब आप वहाँ पहुँचते हैं तो, निश्चित ही, कोई पानी नहीं होता। इसका मतलब ये नहीं है कि वहाँ कुछ भी नहीं है! वहाँ, प्रकाश का अपवर्तन है जो ये भ्रम पैदा करता है। कोई चीज़ 'कुछ' है पर 'कुछ और' लगती है। आप जिसे 'मैं' समझते हैं, वो वास्तव में 'सब कुछ' है -यही माया है! आप जिसे 'कोई अन्य' समझते हैं, वो वास्तव में 'आप स्वयं' है। आप जिसे 'सब कुछ' समझते हैं, वो 'कुछ भी नहीं' है। यही वो माया है जिसके बारे में आदि शंकराचार्य कह रहे हैं।

#10.आदि शंकराचार्य के उपदेश : सृष्टि- सृष्टिकर्ता का एकत्व

उन्होंने ये भी कहा कि मनुष्य की प्रणाली को जानने से हम सारे ब्रह्मांड को जान सकते हैं। आधुनिक भौतिक शास्त्र हमें बताता है कि सारा ब्रह्मांड मूल रूप से एक ऊर्जा है। इसी तरह से, आज से सैकड़ों साल पहले, आदि शंकराचार्य ने कहा था कि सृष्टि और सृष्टिकर्ता एक ही हैं। अब, बहुत लंबी शोध के बाद, विज्ञान इस बात के समांतर आया है जो आदि शंकराचार्य ने और हमारे बहुत से ऋषियों ने हजारों साल पहले कही थी।

#11.आदि शंकराचार्य की आज की दुनिया में सार्थकता

ये आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता पहाड़ों पर से (जहाँ योगी साधना करते हैं) शहरों, कस्बों, गाँवों में और उससे भी ज्यादा, लोगों के दिलों में, मन में आनी चाहिये। अब समय आ गया है कि हम इस संस्कृति को, धर्मनिष्ठा को और नम्रता की भावना को वापस लायें, क्योंकि इन्होंने हमें बहुत कुछ दिया है। हमें झुकना सीखना है। ये हमारी ताकत रही है, यही हमारा रास्ता, तरीका रहा है। ये हमारे लिये सबसे बड़ी संपत्ति होगी - ये हमारे राष्ट्र का भविष्य होगा। अगर हम ये एक चीज़ कर लेते हैं तो सारी दुनिया हमारा मार्गदर्शन माँगेगी। हमें, अपने देश में, और सारी दुनिया में, आदि शंकराचार्य के बोध को, उनकी शिक्षा को और उनके भाव को फिर से स्थापित करना चाहिये, उनके ज्ञान की ज्योत को प्रज्वलित करना चाहिये।

#12.आदि शंकराचार्य के मंत्र और दूसरी रचनाएं

आदि शंकराचार्य ने गहरे स्तोत्र लिखे, जिनसे उनकी भक्ति और प्रतिभा की झलक मिलती है। आज एक हज़ार से ज़्यादा सालों के बाद भी, यह मन्त्र लोगों के दिलों में जीवित हैं। इससे हमें पता चलता है कि वे कितने बडी ग्यानी और प्रतिभावान थे। 

नीचे आदि शंकराचार्य के चार सबसे ज़्यादा प्रसिद्द स्तोत्र दिए गए हैं:

1.निर्वाण षट्कम 

निर्वाण षट्कम बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है, जो सैकड़ों सालों से हमारे वैराग्य मार्ग का एक और नाम बन गया है। पहली बार लिखे जाने के समय इसका जितना असर था, उतना ही आज भी है। शब्द संयोजन बहुत ही सोच समझ कर किया गया है। ये शब्द और उनकी ध्वनियाँ, यौगिक मार्ग में प्रचलित आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिये आधार शिला जैसी हैं। इस लेख में आपको निर्वाण षट्कम के शब्द, उनके अर्थ और सदगुरु के स्पष्टीकरण मिलेंगे कि इन श्लोकों के द्वारा आदि शंकराचार्य क्या कहना चाह रहे हैं। 

इस लेख में आपको निर्वाण षट्कम के शब्द, उनके अर्थ और सदगुरु के स्पष्टीकरण मिलेंगे कि इन श्लोकों के द्वारा आदि शंकराचार्य क्या कहना चाह रहे हैं

2. भज गोविंदम

सदगुरु जिन स्तोत्रों का सबसे ज्यादा पाठ करते, कराते हैं, उनमें आदि शंकराचार्य की ये रचना, भज गोविंदम, भी है। ये स्तोत्र इस बात में अनोखा है कि ये जिज्ञासु को प्रेरित करता है कि वो जीवन सागर के पार जाने का काम किसी भी तरह से करे। आदि शंकराचार्य कहते हैं कि चाहे जिस तरह से भी हो, भोग से या अनुशासन से, ये काम करना महत्वपूर्ण है। इस स्तोत्र के शब्दों और सदगुरु के स्पष्टीकरण के लिये यहाँ क्लिक करें। 

3. सौंदर्य लहरी

आदि शंकराचार्य का यह सुंदर काव्य सृष्टि की सुंदरता और अद्भुत शक्ति की स्तुति करता है, प्रशंसा करता है। साउंड्स ऑफ ईशा की इस कर्णप्रिय (सुरमयी) प्रस्तुति में काव्य का सार भी मिलता है और आदि शंकराचार्य की अद्भुत शब्द रचना के लिये ये एक सम्मान भी है।

4.  प्रातः स्तुवे पराशिवम भैरवी

यह गीत देवी के उस रूप की स्तुति करता है, जिसमें देवी कमल पर विराजमान हैं और वे ज्ञान और भाषा की देवी हैं। आदि शंकराचार्य रचित यह गीत साउंड्स ऑफ ईशा द्वारा देवी के नौ दिनों का उत्सव मनाने के लिये नवरात्रि में गाया जाता है। स्त्रीत्व के दिव्य स्वरूप की कृपा पाने के लिये यह एक सुंदर प्रार्थना है।