साधनापद : जब जलने लगती है साधना की आग

साधनापद कार्यक्रम लगभग आधा सफ़र तय कर चुका है, और साधना की तीव्रता बढ़ती जा रही है। यहाँ, प्रतिभागी अपने पिछले जीवन पर नज़र डाल रहे हैं, अपने अंदर देख रहे हैं और उन पर अब तक पड़े साधनापद के प्रभावों को साझा कर रहे हैं।
साधनापद : जब जलने लगती है साधना की आग
 

जहाँ आग है, वहाँ प्रकाश तो होगा ही। जैसे-जैसे आध्यात्मिक साधना तीव्र होती जाती है, अंदर का बढ़ता प्रकाश पुराने झंझटों को, गंदगी को, पुराने जालों को साफ करना शुरू कर देता है, जिससे जीवन में स्पष्टता और संतुलन बढ़ता जाता है। साधनापद के प्रतिभागी कई प्रकार की साधनायें कर रहे हैं जैसे हठ योग क्रियायें, शक्तिचलन क्रिया, शाम्भवी महामुद्रा, भक्ति साधना एवं आदियोगी प्रदक्षिणा। उनके लिये भावस्पंदन कार्यक्रम भी विशेष रूप से आयोजित किया गया था, जिसने उनके साधना के अनुभव को और भी गहरा कर दिया।

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साधनापद कार्यक्रम का आधा भाग अब लगभग पूर्ण हो चुका है और प्रतिभागी अब ये देख पा रहे हैं, कि एक प्राणप्रतिष्ठित स्थान पर पूरी तरह समर्पित होकर साधना करने से क्या फायदे होते हैं।

अंदर की ओर देखना

जैसे-जैसे कोई आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है, पीछे मुड़ के देखना और अपने अंदर हो रहे बदलावों को देखना अक्सर बहुत लाभदायक होता है। यहाँ कई प्रतिभागी अपने अनुभव साझा कर रहे हैं कि कैसे पिछले कुछ महीनों में तीव्र होती जा रही साधना ने उनके जीवन के अनुभवों को बदल दिया है।

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अंदर का संघर्ष कम हो गया है

"एक महत्वपूर्ण बदलाव ये आया है कि अब, अगर कुछ भी गड़बड़ हो जाती है, कुछ गलत हो जाता है तो इधर-उधर, अपने आसपास देखने की बजाय मैं अपने अंदर देखने को तैयार हूं। अपने स्वयं के बारे में, अपने शब्दों, अपने कार्यों पर विचार करने की मेरी योग्यता काफी बढ़ गयी है। इसके कारण मेरे अंदर और मेरे आस-पास का संघर्ष भी बहुत कम हो गया है"। - वैष्णवी, 26,आन्ध्रप्रदेश

तीव्र उर्जायें

"सारा दिन मैं अपनी ऊर्जाओं में एक महत्वपूर्ण बदलाव देख सकता हूँ। मुझे यह भी महसूस होता है कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, उसमें मैं अब ज़्यादा शामिल, ज़्यादा नतीजे देने वाला, अधिक ऊर्जावान और अधिक जीवंत होता हूँ। जब से साधनापद शुरू हुआ है, मैं ज्यादा संतुलित और ज्यादा स्पष्ट हो गया हूँ और सबसे अद्‌भुत परिवर्तन तो ऊर्जाओं की तीव्रता में हुआ है। मुझे ये सब अत्यंत जादुई और अविश्वसनीय लगता है। हम सिर्फ इसका अनुभव ही कर सकते हैं। साधनापद निश्चित रूप से जीवन में आगे बढ़ने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है"। – कपिल, 18, महाराष्ट्र

आदियोगी प्रदक्षिणा + एकादशी = विस्फोटक

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साधनापद का एक महत्वपूर्ण भाग है आदियोगी प्रदक्षिणा, जो ध्यानलिंग और 112 फ़ीट ऊंचे आदियोगी के चारों ओर की, 2 किमी लम्बी परिक्रमा है। एक विशेष मंत्र का जाप करते हुए और एक खास मुद्रा को धारण किये हुए परिक्रमा करना, यह ईशा योग सेंटर के विभिन्न प्राण-प्रतिष्ठित स्थलों की ऊर्जा को ग्रहण करने का एक विशेष तरीका है। माह में दो बार आने वाले एकादशी के उपवास के दिन आदियोगी प्रदक्षिणा से और भी ज्यादा तीव्र अनुभव मिलता है।

इस अनुभव ने तो मुझे बिलकुल उड़ा ही दिया

"जब भी एकादशी का दिन आता है, मैं बहुत उत्साहित रहता हूँ क्योंकि ये जबरदस्त ऊर्जा और अपने भीतर कुछ जानने की संभावना लाता है। एक बार हमें एकादशी के दिन उपवास रखना था और क्योंकि मैं इसके लिये मानसिक रूप से तैयार था, तो मुझे भूख भी नहीं लगी थी। मैं जैसे जैसे प्रदक्षिणा करता गया, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं नशे में था, पर मैं पूरे समय होश में था और मेरा खुद पर पूरा नियंत्रण था। जैसे जैसे मैं अत्यंत निष्ठा के साथ मंत्र जाप करता गया, मुझे ये महसूस हो रहा था कि मेरे अंदर कुछ बड़ा हो रहा था। अचानक मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं इतना हल्का हो गया हूँ कि मैं अपने शरीर का मुश्किल से अनुभव कर पा रहा था। एक खास मौके पर मुझे ऐसा भी लगा कि कुछ क्षणों के लिये जैसे मेरा शरीर मुझसे अलग हो गया था – कुछ ऐसा जैसे प्रदक्षिणा करने वाला व्यक्ति और ये जागरूक व्यक्ति अलग अलग हैं। इस अनुभव ने तो मुझे जैसे हवा में ही उड़ा दिया। कई प्रदक्षिणायें करने के बाद भी उस दिन मैं थका हुआ नहीं था। वास्तव में उनसे मैं और ज्यादा ऊर्जावान बन गया था। प्रत्येक एकादशी मुझे कुछ नया ही अनुभव देती है, और मुझे कभी भी आश्चर्यचकित करने में असफल नहीं होती। मैं इस बात के लिये अत्यंत कृतज्ञ हूँ कि मैं इस प्रक्रिया का हिस्सा हूँ"। - मुर्चन, 24, आसाम

भक्ति साधना

जब हमारा हृदय भक्ति से भरपूर होता है तब कोई भी बाधा चुनौती नहीं बनती। इस भाग (भक्तिमय होना) को विकसित करने के लिये ही सद्‌गुरु ने भक्ति साधना की रूपरेखा तैयार की है।

मैं अब अपने आप को ज्यादा जीवंत पाती हूँ

"भक्ति साधना हमें आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाती है। इससे, परिस्थितियों को देखने और समझने की मेरी समझ ही पूरी तरह बदल गयी है। पहले मैं चीज़ों को इस तरह से बाँट देती थी कि किसका सम्मान करना चाहिये और किसका नहीं, क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं ? भक्ति साधना करते हुए अब मैं इस स्थिति में आ गयी हूँ जहाँ, मैं जो कुछ भी देखती हूँ, हर वो चीज़ जिसके बारे में कुछ भी जानती हूँ, मुझे लगता है कि हर उस चीज़ का महत्व है और हर चीज़ का सम्मान किया जाना चाहिये। भक्ति साधना के कारण मेरा अहंकार एक तरफ रह जाता है और मैं ज्यादा जीवंत हो जाती हूँ। अब मैं जीवन को नमन करना सीख रही हूँ"।– मृदुला, 24, महाराष्ट्र

एक महत्वपूर्ण जाँच स्थल

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हर महीने, प्रतिभागियों का पूरा समूह एक दिन मिलता है, उस दिन सभी लोग साथ में सद्‌गुरु के वीडियो देखते हैं, अपनी क्रियाओं में सुधार करते हैं और अपने अनुभव साझा करते हैं। क्योंकि सभी साथ होते हैं और अपने पिछले महीने के अनुभवों पर विचार करते हैं, तो यह सभी के लिये एक अवसर होता है कि वे अपने उद्देश्य की लौ को, भावना को फिर से प्रज्वलित कर सकें और आने वाले महीने के लिये तैयारी कर सकें।

'मैं कहाँ होना चाहता हूँ' की तैयारी

"हम सब का यहाँ एक साथ होना, सारे समूह के साथ एक नाता जोड़ता है। अपने अनुभवों को साझा करना हमें फिर से याद दिलाता कि हम इस बारे में सोचें कि मैं यहाँ क्यों हूँ ? इस यात्रा पर यह (मासिक समूह बैठक) लगभग एक जाँच स्थल की तरह है जो मुझे अपनी व्यवस्था को ठीक करने में मदद करता है, और मैं अपने आप को जाँच पाता हूँ कि मैं एक महीने पहले कहाँ था और अब कहाँ हूँ ? आने वाले दिनों में मैं कहाँ होना चाहता हूँ, ये मुझे इसके लिये भी तैयार करता है"।– इन्द्रदीप, 35, टेक्सास, यूएसए।

छिला हुआ केला : एक ही सिक्के के दो पहलू

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ईशा योग केंद्र में हमें लगातार अपनी सीमाओं, कमियों की याद आती रहती है और हमें पता चलता है कि अपनी पसंद- नापसंद के आधार पर हम दूसरों पर कितनी अपेक्षायें लाद देते हैं।

"ये बहुत ज्यादा पका हुआ है'

- बारन, 35, ऑस्ट्रेलिया

"भिक्षा हॉल में प्रार्थना के बाद जब मैंने आँखें खोलीं तो अपनी थाली में एक पके हुए केले की सुनहरी चमक देखी और मुझे ऐसा लगा कि यह केला अपने आप को मुझे समर्पित कर रहा था। मुझे ये एक आशीर्वादस्वरूप लगा। उसके काले छिलके के ऊपरी हिस्से से रस टपक रहा था जैसे कि आँसू बह रहे हों। मुझे लगा कि ये या तो बहुत ज्यादा पका है और इसका समय बीत चुका है या फिर ये कोई आत्मज्ञानी केला है। तो मैंने उसे उठाया और उसका छिलका उतारा और देखा कि केले का पूरा हिस्सा पका हुआ, गहरे पीले रंग का था पर कहीं कहीं ये भूरा या सफेद था। मैंने बहुत आशा के साथ एक टुकड़ा तोड़ा और उसका स्वाद लिया तो वो मुझे थोड़ा खट्टा लगा।

फिर मेरे और परोसने वाले स्वयंसेवक के बीच जो बातचीत हुयी वो कुछ ऐसी थी.....

Peeling back its skin, I found a ripened yellow body, but brown and white in parts. I optimistically took a bite of the yellow flesh and it tasted slightly sour.

Then this exchange occurred between me and the volunteer serving:

मैं : ये केला खराब है, क्या मैं दूसरा ले सकता हूँ?

वो : ये केला तो खाने के लिये अच्छा है।

मैं : मुझे पके केले अच्छे लगते हैं, पर ये कुछ ज्यादा ही पका है, खराब हो गया है।

वो : (केले का अच्छी तरह परीक्षण करने के बाद) ये खाने के लिये बहुत अच्छा है। ये वैसा ही है जैसा मैं खाता हूं।

मैं : तो फिर तुम ही उसे खाओ।

फिर जब मैंने अपनी थाली में देखा तो मुझे लगा कि ये रोता हुआ सा पीला केला अपने आप को मुझे समर्पित करने के बाद, तिरस्कृत सा महसूस कर रहा है। मुझे अपराधी जैसा लगा और मेरे मन में मेरा ही जवाब गूंजने लगा, "तो तुम ही उसे खाओ", "तो तुम ही उसे खाओ".....।

फिर मैंने तय किया कि मैं इसी केले को खाऊँगा और बाद में उस स्वयंसेवक से मिल कर अपनी प्रतिक्रिया के लिये माफी माँगूँगा। तब उस केले को नज़दीक से देखते हुए मैं उसे बहुत सावधानी से, पीले, भूरे और सफेद भागों के बीच में से बहुत संभाल कर छोटे छोटे टुकड़े लेते हुए खाने लगा। ये प्रक्रिया ऐसी ही थी जैसे निश्चित मृत्यु को टालते हुए किसी नाजुक किनारे पर से निकलना।

हाँ, ये थोड़ा थोड़ा खट्टा था पर मुझे लगा कि खाने के लिये अच्छा था और मेरी पसंद - नापसंद मुझे केले के बंधन में बाँध रही थी।

फिर उसी दिन, बाद में, वही परोसने वाला स्वयंसेवक मेरे पास आया और हमारी दूसरी बातचीत कुछ ऐसे हुयी....

वो : मैं माफी चाहता हूँ...

मैं : नहीं, मैं माफी माँगता हूँ, मैंने केला खाया और वो बिल्कुल ठीक था। आप सही कह रहे थे।

वो : नहीं, मैं माफी माँगता हूँ।

मैं : आप को माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है, मैंने आप से उस तरह बात की, ये मुझे खराब लगा।

वो : नहीं, मैं माफी मांगता हूं क्योंकि मैंने उसी तरह का एक केला आज खाया और मेरा पेट खराब हो गया है। आप का केला भी खराब था और आप को उसे नहीं खाना चाहिये था!

मैं:.......

हम दोनों ही झुक गये थे और बहुत खुशी के साथ बहुत हँसे। ये एक बहुत मधुर क्षण था जिसने मुझे सिखाया कि यद्यपि मैं पूर्ण रूप से जागरूक नहीं हो पाया हूँ, लेकिन ये एक ऐसी बात है जिसके लिये मैं रोज़ प्रयत्न कर सकता हूँ।

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"ये कोई बहुत ज्यादा पका हुआ नहीं है"

-एदगार्दो, 22, प्यूएरतो रीको

"भिक्षा हॉल में खाना खाने के पहले, मुझे परोसने की सेवा करना अच्छा लगता है। तो किसी को मैंने एक केला दिया और वो बोला कि केला बहुत ज्यादा पका हुआ था और खराब हो गया था। मैंने उस केले को देखा। मुझे पके केले अच्छे लगते हैं तो मैंने उसे कहा, "ये केला अच्छा है"। तब वो बोला, "अच्छा, तो तुम इसे खा लो"। जब उसने ये कहा तो मुझे समझ में आया कि मैंने एक खास परिस्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी।

जब, बाद में, मैं खाने के लिये बैठा तो मैंने सबसे ज्यादा काले छिलके वाला केला लिया और सोचा, "अगर मैं ऐसा केला किसी को खाने के लिये दे सकता हूँ तो मुझे भी ऐसा ही केला खाने के लिए तैयार होना चाहिये"। तो मैंने सबसे ज्यादा पका हुआ केला लिया। जब मैंने उसे छीला तो उसमें अजीब सी गंध थी पर मैंने यह तय किया कि मैं इसे खाऊँगा क्योंकि मुझे यह लगा कि यह अच्छा था। जैसे ही मैंने उस केले को मुँह में रखा तो मेरा पेट चक्कर खाने लगा पर किसी तरह से मैं उस केले को पूरा खा गया। फिर जब मैं सेवा के लिये गया तो मैंने बारन को ढूँढा और उससे माफी माँगी। मैंने उससे कहा कि मैंने परिस्थिति को गलत ढंग से समझा था और बिना जागरूकता के प्रतिक्रिया दी थी। वो भी बात को समझ रहा था और उसका पक्ष बिल्कुल ही अलग था। तो हम बहुत हँसे और फिर हमारा समय बहुत अच्छा बीता। ये छोटे छोटे पल मुझे बताते हैं कि मेरी साधना कितने अच्छे से आगे बढ़ रही है !

कार्य प्रगति पर है

अभी बहुत काम बाकी है, पर हर प्रतिभागी समझ गया है कि वो सही रास्ते पर है।

सच्ची स्वतंत्रता

"मुझे हमेशा ही ऐसा लगता था कि अगर मैं जो चाहता हूँ वो करूँगा, सिर्फ तभी अपनी स्वतंत्रता का आनंद ले पाऊँगा। पर यहाँ आने के बाद मैं धीरे धीरे अपनी सच्ची स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा हूँ -- चुनावों से, विकल्पों से स्वतंत्रता। मुझे जो कुछ भी करना होता है उसे करते हुए मैं ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी का अनुभव कर रहा हूँ, और मैं ज्यादा खुश हूँ। मुझे लगता है कि वाकई स्वतंत्र होने का क्या अर्थ है, ये मुझे कुछ-कुछ पता चल गया है।-हिमांशु, 24, उत्तराखंड

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अब मैं ज्यादा गंभीर नहीं रहती

"मैं अपने आप में ही रहा करती थी। हमेशा गंभीर चेहरा लिये घूमती और मुझे मेरे ही बंधनों से बाहर लाने के लिये लोगों को प्रयत्न करने पड़ते थे। अब मुझे यह अनुभव होता है कि मैं बिना प्रयत्न के ही, ज्यादा आनंदित रहती हूँ और किसी के भी प्रति, हर किसी के प्रति अधिक प्रेमपूर्ण हूँ, जैसे मैं बचपन में थी। एक और महत्वपूर्ण बदलाव जो मुझमें आया है वो ये है कि चाहे जैसा व्यक्ति हो, चाहे जैसी परिस्थिति हो, या तो मैं जागरूकतापूर्वक जवाब देती हूँ अथवा यदि मेरा जवाब मजबूरी में या आदतवश हो जाये तो अगले ही क्षण समझ जाती हूँ कि मैंने ये बिना जागरूकता के किया है। मुझे कभी नहीं लगा था कि ऐसी बात सम्भव होगी, क्योंकि मैंने ये मान लिया था कि मेरी आदतवश होने वाली प्रतिक्रियायें ही मेरा स्वभाव हैं - पर ये बिल्कुल झूठ था"।– Vineeta, 30, Punjab

-विनीता, 30, पंजाब

मन और शरीर से परे

"मेरा मन और शरीर वैसे ही संघर्षों से गुजर रहा है जैसे पहले था, पर अब वे उस हद तक मेरे कामों और महसूस करने के तरीकों पर हुकुम नहीं चलाते, जैसे पहले चलाते थे। अब ये बातें पीछे चली गयी हैं, और अब ज्यादा सुखद बातों ने मुख्य स्थान ले लिया है"।

-अश्विनी, 27, ऑहियो, यूएस

साधनापद : जीवन के लिये बीमा/आश्वासन

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सद्‌गुरु(साधनापद के प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए): एक आध्यात्मिक साधक में और उन लोगों में जो भोगवादीजीवन में हैं, बस यही अंतर है कि भोगवादी लोगों को जब ज़िंदगी की मुश्किलें चोट पहुँचाती हैं तब वे घबरा कर इधर-उधर दौड़ते हैं। अगर कोई आर्थिक कठिनाई है या परिवार में कोई बीमार है या कोई विप्पत्ति आ पड़ी है तब वे विचलित हो उठेंगे, और तब भागने लगेंगे। पर एक आध्यात्मिक साधक वो है जो खुद को मुसीबत का सामना करने के लिये तैयार करता है। वो इसकी प्रतीक्षा नहीं करता कि अन्य लोग उसे तैयार करें। वो सब जो खुद के लिये करना जरूरी है, वो स्वयं करता है। तो फिर कोई उसे कुछ नहीं कर पाता। यही स्वतंत्रता है। क्योंकि मैंने कई सालों तक, अपने आप को सिर से पैर तक, हरसंभव तरीके से बुरा भला कहा है, स्वयं की आलोचना की है तो अब लोग मेरे बारे में कुछ भी कहें, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने स्वयं ही अपने लिये वो सब कहा हुआ है, तो ये सब ठीक है।

आप का शरीर, आप का मन, आप की उर्जायें, कभी भी आप के लिये बाधा नहीं होने चाहियें – ये एक काम आपको करना चाहिए। यही साधनापद है। आप के पास अब सीमित समय है - लगभग साढ़े तीन महीनें। मैं चाहता हूँ कि आप खुद को पूरी तरह से झोंक दें। अगर आप इस समय का ठीक से उपयोग करेंगे तो अपने बाकी जीवन में आप हमेशा इस समय को अपने जीवन के लिये एक बीमे के रूप में देखेंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीवन में आप के साथ क्या होता है ? अगर इस समय में आप अपने को सामर्थ्यवान बना लेंगे तो आप देखेंगे कि कुछ भी आप को परेशान नहीं कर सकेगा। जब आपको यह भरोसा होगा तो आप दुनिया में महान काम कर सकेंगे। हम चाहते हैं कि आप ऐसा ही करें।

अगले अंक में

ईशा योग केंद्र हर प्रकार के आध्यात्मिक जिज्ञासुओं का घर है और इसे इस तरह बनाया गया है कि हर प्रकार के आध्यात्मिक आकांक्षी में आध्यात्मिक प्रक्रिया का पोषण हो। ये कोई संयोग नहीं है कि यहाँ कई प्रकार की आध्यात्मिक प्रक्रियायें सभी व्यक्तियों को उनके विकास के लिये उपलब्ध करायी जाती हैं। "साधनापद में जीवन" के अगले अंक में हम सेवा के विभिन्न प्रकारों की झलक देखेंगे, जिनमें साधनापद के प्रतिभागी बहुत ही खुशी के साथ जुट जाते हैं।

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