क्या भगवान में विश्वास रखना ही अध्यात्म है?

टी.वी. चैनल ‘टाइम्स नाउ’ ने योगी व रहस्यदर्शी सद्‌गुरु के साथ एक बातचीत की जिसमें वे जानना चाहते हैं कि आध्यात्मिकता क्या है?
क्या भगवान में विश्वास रखना ही अध्यात्म है?
 

सद्‌गुरु: आध्यात्मिकता का मतलब किसी खास तरह का अभ्यास करना नहीं है। यह आपके अस्तित्व के होने का एक निश्चित तरीका है। उस स्थिति तक पहुंचने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। यह आपके घर के बगीचे की तरह है। अगर मिट्टी, सूर्य का प्रकाश और पौधे का तना एक निश्चित स्थिति में हैं, तो यह फूल नहीं देगा, आपको इसके लिए कुछ करना होगा। आपको कुछ खास बातों पर ध्यान देना होगा। अगर आप अपने शरीर, मन, भावों तथा ऊर्जा को परिपक्वता के एक निश्चित स्तर तक ले जाएंगे, तो आपके भीतर कुछ और खिल उठेगा - यही आध्यात्मिकता है। जब आपकी तार्किकता अपरिपक्व होती है, तो यह हर वस्तु पर संदेह करती है। जब आपकी तर्कबुद्धि परिपक्व हो जाती है, तो यह हर चीज़ को एक अलग ही प्रकाश में देखती है।

‘भगवान’ को लेकर सारी सोच यही है कि कुछ भी जो आपसे बड़ा हो। यह कोई इंसान या फिर प्रकृति का कोई आयाम भी हो सकता है। परंतु क्या यही आध्यात्मिकता है?

 

भगवान कहाँ हैं?

जब भी कोई आदमी कुछ ऐसा अनुभव कर पाता है, जो उसे खुद से बड़ा लगे, तो वह उसे भगवान समझने लगता है। ‘भगवान’ को लेकर सारी सोच यही है कि कुछ भी जो आपसे बड़ा हो। यह कोई इंसान या फिर प्रकृति का कोई आयाम भी हो सकता है। परंतु क्या यही आध्यात्मिकता है? नहीं, यह केवल जीवन है। जब मैं कहता हूं, ‘केवल जीवन’, तो मैं इसे छोटी बात कह कर, टालने का प्रयास नहीं कर रहा। यह सबसे बड़ी चीज है। जब जीवन आपके लिए अभिभूत कर देने वाला, एक शक्तिशाली और आनंददायी अनुभव हो जाता है, तब आप जानना चाहते हैं कि इसे किसने रचा होगा। अगर आप सृष्टि के स्त्रोत या प्रक्रिया को जानना चाहते हैं, तो आपके लिए सृष्टि का सबसे अंतरंग हिस्सा तो आपका अपना शरीर है। इसमें फंसी हुआ एक सृष्टि है। आपको उसे भूलना नहीं चाहिए। अगर आप जानते हैं कि सृष्टि का वह स्त्रोत आपके भीतर छिपा है, तो आप आध्यात्मिक हैं।

 

 

एक आध्यात्मिक जिज्ञासु न तो आस्तिक होता है और न ही नास्तिक। उसे एहसास हो चुका होता है कि वह कुछ नहीं जानता, इसलिए वह खोज कर रहा है।

 

क्या इश्वर में विश्वास रखना आध्यात्मिकता है?

प्रश्नः क्या ईश्वर में विश्वास रखने से आप आध्यात्मिक हो जाते हैं?

एक नास्तिक आध्यात्मिक नहीं हो सकता। परंतु आपको यह समझना चाहिए कि एक आस्तिक भी आध्यात्मिक नहीं हो सकता है। क्योंकि नास्तिक और आस्तिक में कोई अंतर नहीं है। एक मानता है कि ईश्वर है और एक का मानना है कि ईश्वर नहीं है। दोनों ही किसी ऐसी बात के बारे में विश्वास रखते हैं, जिसके बारे में वे नहीं जानते। आप गंभीरतापूर्वक इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं कि आपको नहीं पता - और यही आपकी समस्या है। इसलिए नास्तिक और आस्तिक में कोई भेद नहीं है। ये एक जैसे लोग हैं जो अलग होने का दिखावा कर रहे हैं। एक आध्यात्मिक जिज्ञासु न तो आस्तिक होता है और न ही नास्तिक। उसे एहसास हो चुका होता है कि वह कुछ नहीं जानता, इसलिए वह खोज कर रहा है।

जिस क्षण आप किसी बात पर विश्वास करने लगते हैं, आप बाकी सब बातों की ओर से आँखें मूँद लेते हैं। इस धरती पर सारा संघर्श अच्छाई और बुराई का नहीं है, यह हमेशा एक इंसान का विश्वास बनाम दूसरे इंसान के विश्वास का संघर्श होता है। विश्वास की जरूरत आध्यात्मिक नहीं, मानसिक है। आप किसी चीज़ से चिपकना चाहते हैं, आप स्वयं को सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं, आप महसूस करना चाहते हैं कि आप सब जानते हैं। यह बहुत ही अपरिपक्व दिमाग की देन है। अगर आप इस अस्तित्व के बारे में कुछ नहीं जानते तो इसमें समस्या क्या है। आप वास्तव में कुछ नहीं जानते। यह बहुत सुंदर बात है! अब आप देखें कि आप स्वयं को भीतर से सुंदर व आनंदित कैसे बना सकते हैं, जो कि आपके अपने हाथ में है।

 

आध्यात्मिक अनुभव क्या है?

प्रश्नः आध्यात्मिक अनुभव क्या है?

किसी सागर या पर्वत पर जाना एक खूबसूरत अनुभव हो सकता है, आपको इस संसार का आनंद लेना भी चाहिए, पर इसके साथ ही यह भी समझना ज़रूरी है कि सागर में रहने वाली मछली इसे एक आध्यात्मिक अनुभव नहीं मानती। उसी तरह पहाड़ों पर घूमती हुई एक बकरी उसे आध्यात्मिक अनुभव नहीं मानती, क्योंकि वह सदा उसमें ही रहती है। अगर आप उसे शहर में ले आएँ तो शायद उसके लिए यह एक आध्यात्मिक अनुभव हो जाए। दरअसल आपको अपने अंदर की सीमाओं को तोड़ना होगा - आपके भीतर कुछ टूटना चाहिए। आप एक खोल में थे, वह टूटा और आप उससे भी बड़े खोल में आ गए। मैं कह रहा हूं कि अगर आप बड़े खोल के भी आदी हो गए हैं तो आपको वैसा ही महसूस होगा जैसा पहले हुआ करता था।

जब भी कोई आदमी कुछ ऐसा अनुभव कर पाता है, जो उसे खुद से बड़ा लगे, तो वह उसे भगवान समझने लगता है। परंतु क्या यही आध्यात्मिकता है?

अगर आप असीम होना चाहते हैं और आप इसे अपनी भौतिकता के माध्यम से पाना चाहते हैं, तो आप इस असीमता की ओर किश्तों में जाने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्या आप 1, 2, 3, 4, गिनती करते हुए किसी दिन अनंत तक की गिनती कर सकते हैं? आप अंतहीन गिनती बन कर रह जाएंगे। यह कोई तरीका नहीं है। आप भौतिक साधनों से असीम प्रकृति तक नहीं जा सकते। हर इंसान असीम होना चाहता है। अगर आप उसे वह दे दें, जो वह पाना चाहता है, तो वह तीन दिन तक ठीक रहेगा पर चौथे दिन वह कुछ और खोजने लगेगा। कुछ लोग इसे लालच का नाम दे सकते हैं, मैं इसे जीवन-प्रक्रिया कहूंगा जो गलत दिशा में चल रही है। अगर आप उस असीम प्रकृति को जानना चाहते हैं, तो आपके पास अनुभव होना चाहिए, आपके पास कोई ऐसा बोध होना चाहिए, जो उस भौतिक प्रकृति से कहीं परे हो। कुछ ऐसा, जिसे आपने सागर में छलांग भरते हुए, जो आपने किसी पर्वत को देखते हुए, कोई गीत गाते हुए, नाचते हुए, अपनी आँखें बंद करते हुए या फिर किसी अनूठे ही तरीके से आपने छू लिया हो। आपने उसे छू तो लिया पर उसे हमेशा के लिए बरकरार कैसे रखा जाए।

 

 

एक बात, हम आपको एक सरल बात से जोड़ सकते हैं, जो कि व्यक्ति विशेष पर निर्भर करेगा। आपको ऐसी कोई भी व्यक्तिपरक तकनीक किसी संकल्पहीन माहौल में नहीं सिखाई जा सकती। अगर आप अपने लिए थोड़ा सा समय अलग निकाल सकते हैं, और आप पूरी तरह से समर्पित व फाकेस्ड हों, तो हम आपको एक सरल अभ्यास से जोड़ सकते हैं, जिसके लिए हर दिन आपको केवल इक्कीस मिनट का समय निकालना होगा। उस अभ्यास से (इनर इंजीनियरिंग), आप अपने दिन की शुरुआत एक आध्यात्मिक अनुभव के साथ कर सकते हैं, जो आपके भीतर से पैदा होगा। एक ऐसा शक्तिशाली अनुभव, जो आपको सारा दिन शांत व आनंदित बनाए रखेगा। इसके अलावा, इसे बनाए रखने के लिए, आपको एक और अभ्यास करना होगा - आपको अपनी सहभागिता की भावना को भेदभाव रहित बनाना होगा। अगर आप किसी व्यक्ति, पेड़ या बादल को देखें तो आप सबके साथ समान रूप से जुड़ाव महसूस करें। आप अपनी शरीर और श्वास के साथ समान रूप से शामिल हों। अगर किसी भी चीज़ की परख़ किए बिना, जीवन के हर पहलू के साथ समान भाव से शामिल होने की कला सीख लेते हैं, तो आप निरंतर आध्यात्मिक भाव में बने रहेंगे। किसी को भी आपको सिखाने की आवश्यकता नहीं रहेगी कि आध्यात्मिकता किसे कहते हैं?

 

 
 
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