भारतीय युवा योग विज्ञान का विरोध क्‍यों करते हैं?

विज्ञान की पढ़ाई कर रहे यूनिवर्सिटी के एक विद्यार्थी ने सद्‌गुरु से पूछा कि भारतीय युवा योगिक विज्ञान के खिलाफ क्‍यों हैं, जबकि इसकी शुरुआत यहीं हुई थी। सद्‌गुरु बता रहे हैं कि योग की वास्‍तविक परिभाषा क्‍या है और यह विज्ञान किस तरह हर इंसान पर लागू होता है।
अपनी काबिलियत पर शक हो, तो क्या करें?
 

प्रश्न: नमस्‍कारम सद्‌गुरु। मैं विज्ञान की पढ़ाई कर रहा हूं। जब मैं अपने कॉलेज में योग और शांभवी की बात करता हूं, तो लोग एक तरह से मुझे नीची नजर से देखते हैं और कहते हैं, ‘तुम विज्ञान के छात्र हो, तुम इन चीजों की बात कैसे कर सकते हो?’

कॉलेज के पहले साल मुझे यह सुनकर बहुत बुरा लगता था, मगर फिर मैंने ध्‍यान देना बंद कर दिया। अब मेरा एक सवाल है कि हमारे अपने विज्ञान को लेकर युवाओं में इतना विरोध क्‍यों है। मेरा मतलब है, भारतीय विज्ञान की स्‍थापना हर चीज की गहरी समझ से की गई है। फिर उसका विरोध क्‍यों है? और क्‍या यह महत्वपूर्ण है कि हम इस विरोध को स्‍वीकृति में बदलें या कम से कम उनसे कहें कि इसे संपूर्ण रूप में जाने बिना इसका अनादर न करें? अगर हां, तो आंतरिक विज्ञान को मौजूदा शिक्षा प्रणाली में कैसे शामिल किया जाए।

किस चीज़ को विज्ञान कहा जाता है?

सद्‌गुरु: दुर्भाग्‍य से, आज विज्ञान को लेकर हमारे मन में बहुत संकुचित(सीमित या सिकुड़ी हुई) धारणा है। मुख्‍य रूप से किसी चीज को तभी विज्ञान माना जाता है, जब उसके प्रति एक व्‍यवस्थित दृष्टिकोण हो और उसे दोहराया जा सके। विज्ञान मूल रूप से भौतिकी है, मगर उससे निकलने वाले दूसरे विज्ञान भी हैं जैसे जैविक अध्‍ययन, मनोवैज्ञानिक अध्‍ययन और सामाजिक विज्ञान। तो जिस चीज के प्रति एक व्‍यवस्थित नजरिया होता है और वह सिर्फ एक व्‍यक्ति पर लागू नहीं होती बल्कि बड़ी संख्‍या में लोगों पर लागू होती है, वह विज्ञान या वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो जाती है।

उस रूप में, कोई दूसरा विज्ञान नहीं है, जो इतने बड़े पैमाने पर लागू हो सकने के काबिल हो, जितना योगिक विज्ञान। बात बस यह है कि जिस योग के बारे में आज लोगों ने सुना है, वह अमेरिकी तट से लौट कर आया है। उन्‍हें लगता है कि योग का मतलब कुछ खास तरह के पैंट पहनकर चारों ओर घूमना है। यह एक तरह का फैशन है। नहीं। योग का अर्थ है ‘मेल’। मेल का मतलब क्‍या है? जो शरीर अभी आपके पास है, एक दिन कोई आपको दफना या जला देगा। धुएं के साथ या बिना धुएं के, क्‍या आप धरती का हिस्‍सा बन जाएंगे?

प्रतिभागी: हां।

हर पल जीवन एक विस्फोट के रूप में घटित होना चाहिए

सद्‌गुरु: अभी भी, आप बस इस धरती से निकली हुई छोटी सी चीज़ हैं। आपने अपनी समझ खो दी क्‍योंकि आपको गतिशील होने(चलने फिरने) की क्षमता मिली। आपने सोचा कि आप अपने आप में एक दुनिया हैं। अगर आप किसी पेड़ की तरह एक जगह जमे होते, तो मुझे यकीन है कि आप समझते कि आप धरती का एक हिस्‍सा हैं। सिर्फ इसलिए कि धरती ने आपको चलने-फिरने की आजादी दी, आप कितने मूर्ख बन गए! यह सिर्फ भौतिक शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड और आपके हर पहलू के लिए सत्‍य है।

अगर आप एक उल्‍लासमय जीवन जीना चाहते हैं, तो कुछ हद तक वैयक्तिकता(अपने आप में अलग होना) की सीमाओं को नष्‍ट होना चाहिए।

तो योग का अर्थ है मेल और ‘मेल’ का अर्थ है कि यह आपकी वैयक्तिकता(अपने आप में अलग होना) की सीमाओं को मिटाने का विज्ञान है ताकि आप अभी जो हैं, उससे कहीं बड़ा जीवन बन सकें। आप यहां एक कब्ज़ पीड़ित जीव की तरह जी सकते हैं या एक उल्‍लासमय जीव की तरह। कब्ज़ पीड़ित का मतलब है थोड़ा-थोड़ा करके होना। फिलहाल अधिकांश लोगों के लिए जीवन थोड़ा-थोड़ा करके घटित हो रहा है। अगर आप उनसे पूछें कि उनके जीवन के सबसे बढ़िया पल क्‍या थे, तो वे कहते हैं, ‘जब मैंने अपनी परीक्षा पास की, तो मुझे बहुत अच्‍छा लगा’, फिर ‘मैं बहुत दुखी था, फिर मुझे एक नौकरी मिल गई, मुझे बहुत अच्‍छा महसूस हुआ, मगर फिर सारे लोगों ने मुझे दुखी कर दिया। फिर मेरी शादी हुई, वह वाकई अद्भुत था, पर फिर मेरी सास आ गई और सब फुस्‍स।’ इस तरह चलता रहता है। वे अपने जीवन के पांच अच्‍छे पल गिनाते हैं। अगर आपके जीवन का हर पल जीवन का एक उल्‍लासमय विस्‍फोट नहीं है, तो यह जीवन कब्ज़ पीड़ित है।

आनंद का अनुभव कैसे कर सकते हैं?

अगर आप एक उल्‍लासमय जीवन जीना चाहते हैं, तो कुछ हद तक वैयक्तिकता(अपने आप में अलग होना) की सीमाओं को नष्‍ट होना चाहिए। तभी आप जीवन को अधिक मात्रा में ग्रहण कर सकते हैं और जीवन का आपका अनुभव और बड़ा होगा। आप आम तौर पर अपने आस-पास जो देखते हैं, उसके मुकाबले अधिक उल्‍लास का अनुभव कर पाएंगे। क्‍या आपने बचपन में साबुन के बुलबुले उड़ाए हैं?

प्रतिभागी: अब भी, हम युवा हैं...

सद्‌गुरु: ओह, क्‍या जब आप छोटे बच्चे थे, तो साबुन के बुलबुले उड़ाए थे?

प्रतिभागी: हां।

सद्‌गुरु: मान लीजिए, आप सिर्फ इतना बड़ा बुलबुला बना पाए। मगर किसी और ने उससे बड़ा बुलबुला बना लिया। क्‍यों? आपके पास भी हवा से भरा फेफड़ा है, आपके पास भी साबुन है, मगर एक व्‍यक्ति ने इतना बड़ा बुलबुला बना लिया। क्‍योंकि अगर आप सीमाएं बढ़ाना चाहते हैं तो इसके लिए इच्‍छा नहीं बल्कि उस सीमित संभावना में उतनी हवा भरना जरूरी है। तब जाकर वह इतना बड़ा होता है।

 

लोगों के शरीर और मन अलग होते हैं, पर जीवन एक होता है

इसी तरह, मेरा शरीर और आपका शरीर अलग-अलग हैं। जब तक हम दफनाए नहीं जाते, हम नहीं समझते कि यह एक ही धरती से बना है। मगर फिलहाल, यह सौ फीसदी स्‍पष्‍ट है कि यह मेरा शरीर है और वह आपका शरीर है, यह मेरा दिमाग है और वह आपका दिमाग है। यह वह नहीं हो सकता और वह यह नहीं हो सकता। मगर मेरा जीवन और आपका जीवन जैसी कोई चीज नहीं है। बस जीवन होता है। आप कितना जीवन ग्रहण कर पाते हैं, इससे आपके जीवन का दायरा और पैमाना तय होता है। जीवन का दायरा और पैमाना इससे तय नहीं होता कि आप कितनी जानकारी प्राप्‍त कर पाते हैं।

जब कोई व्‍यक्ति ऐसा विसर्जन अनुभव करता है, तो हम उस व्‍यक्ति को योगी कहते हैं।

अगर ऐसा करना है तो आपको अपनी वैयक्तिकता(अपने आप में अलग होना) की ठोस सीमाओं को आगे धकेलना होगा, और इन्हें तोड़ डालना होगा। जब सीमाएं नष्‍ट हो जाती हैं, तो हम कहते हैं कि आप योग में हैं। जब कोई व्‍यक्ति ऐसा विसर्जन अनुभव करता है, तो हम उस व्‍यक्ति को योगी कहते हैं। हर व्‍यक्ति कितनी दूर तक जाएगा, यह विभिन्‍न वास्‍तविकताओं पर निर्भर करता है मगर कम से कम हमें एक वैज्ञानिक और केंद्रित प्रयास करना होगा कि हम वैयक्तिकता(अपने आप में अलग होना) की इन सीमाओं को पार कैसे करें, जिन्‍हें हमने खुद बनाया है।

अपनी बनाई हुई सीमाएं तोड़नी होंगी

आपकी सभी सीमाएं आपने ही बनाई हैं, है न? आप सीमाएं बनाते हैं और फिर उन सीमाओं से दुखी होते हैं – यह कैसा जीवन है? अगर प्रकृति सीमाएं बनाती और आप उससे दुखी होते तो यह समझा जा सकता था। मगर आप खुद को सुरक्षित करने के लिए दीवारें बनाते हैं और खुद अपनी सीमाएं बनाते हैं। आत्‍मरक्षा की ये दीवारें कैद की दीवारें बन जाएंगी। अगर आप ऐसा नहीं चाहते, तो आपको योग की जरूरत है। ‘क्‍या मुझे शरीर को मोड़ना-मरोड़ना चाहिए, सिर के बल खड़ा होना चाहिए?’ नहीं, योग का मतलब मोड़ना-मरोड़ना नहीं है। आप किसी भी रूप में योग कर सकते हैं – आप सांस लेते हुए, चलते, बोलते, पढ़ते, सोते, खड़े होते हुए योग कर सकते हैं। यह कोई खास क्रिया नहीं है। यह एक खास आयाम है।

मैं योग को जीता हूं, क्‍योंकि मेरे पूरे जीवन का मकसद लगातार अपने अंदर और हर किसी के अंदर की सीमाओं को नष्‍ट करना है।

लोग मुझसे पूछते रहते हैं, ‘सद्‌गुरु, आप कितने घंटे योगासन करते हैं?’ मैं कहता हूं, ‘बीस सेकेंड।’ असल में यह सच है। मैं सिर्फ बीस सेकेंड साधना करता हूं। मैं सुबह उठता हूं, सिर्फ बीस सेकेंड योग करता हूं और बस। दिन के बाकी समय क्या मैं योग नहीं करता? नहीं। मैं योग को जीता हूं, क्‍योंकि मेरे पूरे जीवन का मकसद लगातार अपने अंदर और हर किसी के अंदर की सीमाओं को नष्‍ट करना है। यह योग है। अभी यहां हम जो कर रहे हैं, वह योग है।

संपादक का नोट : चाहे आप एक विवादास्पद प्रश्न से जूझ रहे हों, एक गलत माने जाने वाले विषय के बारे में परेशान महसूस कर रहे हों, या आपके भीतर ऐसा प्रश्न हो जिसका कोई भी जवाब देने को तैयार न हो, उस प्रश्न को पूछने का यही मौक़ा है! - unplugwithsadhguru.org
 

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