सद्‌गुरुमन हमेशा भूत की बातों या भविष्य के कल्पनाओं में भटक जाता है। मन को भटकने से बचाने के लिए वर्तमान में जीवन जीने की कला सीखनी होगी। जानते हैं ऐसा करने के दो मूल तरीके

क्या है वे दो तरीके?

वर्तमान में जीने के कुछ तरीके हैं। एक तो यह है कि बहुत तीव्रता के साथ क्रियाशील रहें और बिना सोचे बस अपने काम को करते जाएं। कोई इच्छा नहीं, कोई खास लक्ष्य नहीं, कोई महत्वाकांक्षा नहीं, बस काम करते जाना है।

धर्म और अध्यात्म आपको बचाने के लिए नहीं हैं, यह तो खुद को तपाने के लिए, तैयार करने के लिए है, वह भी पूरी जागरूकता के साथ। कोई और मुझे नहीं तपा रहा है, खुद मैं अपने आपको तपा रहा हूं।
दूसरा तरीका है कि अगर कोई स्थिर हो जाए, अकर्मण्यता की स्थिति में आ जाए तो भी ऐसा हो सकता है। या तो तीव्र क्रियाशीलता हो या फिर निष्क्रियता। या तो जबर्दस्त जुनून हो या बिल्कुल उदासीन। दोनों ही तरीके आपको उस ओर ले जाएंगे, लेकिन समस्या यह है कि लोग कोई भी काम पूरी तरह से नहीं करते, क्योंकि उन्हें डर लगा रहता है कि पता नहीं क्या हो जाए। वे अपने काम में पूरे जुनून के साथ शामिल नहीं होते, ढीले पड़ जाते हैं। न तो वे पूरी तरह जुनूनी ही हो पाते हैं और न ही पूरी तरह उदासीन। हर स्थिति में वे खुद को रोकने लगते हैं। रोकने की यही आदत हर चीज को भविष्य में ले जाकर खड़ा कर देती है। ज्ञान प्राप्ति भी इसीलिए भविष्य में है, क्योंकि चीजों को रोकने की हमारी आदत हो गई है।

हमारे भीतर जीवन को सुरक्षित रखने की जो सहज प्रवृत्ति होती है, उसकी वजह से ही यह रोकने की आदत है। जीवित रहने की यह प्रवृत्ति हमारे भीतर बड़े गहरे बैठी हुई है। हम जहां भी जाते हैं, यही सोचते हैं कि खुद को कैसे बचाकर रखा जाए। यहां तक कि धर्म और अध्यात्म को भी खुद को बचाए रखने का साधन बना दिया गया है। धर्म और अध्यात्म आपको बचाने के लिए नहीं हैं, यह तो खुद को तपाने के लिए, तैयार करने के लिए है, वह भी पूरी जागरूकता के साथ। कोई और मुझे नहीं तपा रहा है, खुद मैं अपने आपको तपा रहा हूं।

खुद को बचाने की कोशिश

अब अगर आप खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं, या इस उम्मीद में हैं कि ईश्वर आपको बचा लेगा, तो आप बस खुद को बचाए रखने की प्रवृत्ति को और मजबूत बना रहे हैं।

जो लोग डर की वजह से प्रार्थना करते हैं, वे प्रार्थना के बारे में कुछ भी नहीं जानते। प्रार्थना तभी होती है जब आप पागलपन की हद तक किसी चीज के प्यार में होते हैं।
इसका कोई दूसरा मतलब नहीं है। हमें कम-से-कम अपने जीवन-यापन की प्रक्रिया को अपने दिमाग और हाथ-पैर का इस्तेमाल करके सहज और सरल तरीके से संभालना चाहिए। अपनी जीवन-रक्षा के लिए हमें किसी ईश्वरीय शक्ति को बीच में लाने की जरूरत नहीं है, लेकिन आजकल इसी का पूरा खेल है। लोग ध्यान इसलिए करते हैं कि जीवन सुरक्षित रह सके। प्रार्थना इसलिए करते हैं कि सुरक्षित रह सकें। इस दुनिया में निन्यानबे प्रतिशत प्रार्थनाओं में ईश्वर से कुछ न कुछ मांगा जाता है या सुरक्षा की गुहार लगाई जाती है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि निन्यानबे प्रतिशत लोग प्रार्थना इसीलिए करते हैं, क्योंकि उनके भीतर कहीं न कहीं कोई डर है। अगर उनके भीतर कोई डर न होता तो वे प्रार्थना नहीं करते। जो लोग डर की वजह से प्रार्थना करते हैं, वे प्रार्थना के बारे में कुछ भी नहीं जानते। प्रार्थना तभी होती है जब आप पागलपन की हद तक किसी चीज के प्यार में होते हैं। लेकिन आप खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, आप कहीं पहुंचना चाहते हैं और इसके लिए आप प्रार्थना करते हैं। लोगों के लिए प्रार्थना बस एक करेंसी की तरह है, और ज्यादातर लोगों के लिए एक बेकार करेंसी की तरह।

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बहुत सारे लोग धनी बनने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, सफल होने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, तो कोई परीक्षा पास करने के लिए प्रार्थना कर रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि ये वे लोग हैं, जो ज्यादातर फेल हो जाते हैं। इसकी वजह यही है कि अपना काम सही तरीके से करने के बजाय वे लोग हर वक्त किसी ईश्वरीय शक्ति के हस्तक्षेप की बात सोचते रहते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं होता। मुझे पता है कि सदियों से कई तरह की अनैतिकता में डूबे साधु-संत, बुद्धिहीन लोग जो खुद को ईश्वर का दूत होने का दावा करते हैं, लोगों के दिमाग में यह बात भर रहे हैं कि आप कुछ नहीं करते, बस ईश्वर की ओर देखिए और हर काम सफल हो जाएगा। उन्होंने लोगों के दिलों में ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें कुछ इस कदर डाल दी हैं कि उन्हें उखाड़ फेंकना बेहद मुश्किल है।

सिर्फ शून्यता असीम हो सकती है

मुझे लगता है कि दुनिया भर के संगठित धर्मों की वजह से ही आज धरती पर इतने कम लोगों को ज्ञान की प्राप्ति हुई है। लोगों के दिमागों में वे गलत चीजें भरते हैं।

आप हमेशा कुछ चाहते हैं। आप शिक्षित होना चाहते हैं, आप प्यार चाहते हैं, आप जीवित रहना चाहते हैं, और भी न जाने क्या-क्या चाहते हैं। क्यों? क्योंकि इन सब चीजों के दम पर ही आपको यह लगता है कि आप कुछ हैं।
अगर आप लोगों के दिमागों में गलत चीजें नहीं भरते, तो आप उन्हें संगठित नहीं कर पाते। अगर आप लोगों के दिमाग में सही चीजें डालेंगे, तो वे अपने आप सक्षम हो जाएंगे। तब आप बेकार की चीजों को करने के लिए उन्हें संगठित नहीं कर सकते।

बिना मन के आप खुद को बोर महसूस करते हैं। इसलिए पूरे जीवन आप यही कोशिश करते रहे हैं कि मन की सक्रियता को कैसे बढ़ाया जाए। आत्म-ज्ञान की चाहत रखने का मतलब है कि आप अपने अनुभव में असीम होना चाहते हैं। आपके अनुभव में सिर्फ एक ही चीज है, जो असीम हो सकती है और वह है ‘शून्यता।’ और इसे ही आप हमेशा रोकने की कोशिश में लगे रहते हैं। आप ‘शून्यता’ जैसा महसूस नहीं करना चाहते। आप हमेशा कुछ चाहते हैं। आप शिक्षित होना चाहते हैं, आप प्यार चाहते हैं, आप जीवित रहना चाहते हैं, और भी न जाने क्या-क्या चाहते हैं। क्यों? क्योंकि इन सब चीजों के दम पर ही आपको यह लगता है कि आप कुछ हैं। इसी वजह से असफलता और सफलता जैसे शब्द बने हैं क्योंकि ‘शून्यता’ जैसा महसूस ही नहीं करना चाहते। आप तो कुछ बनना चाहते हैं। लोग इस दुनिया में प्रेम के लिए बेतहाशा भटक रहे हैं, क्योंकि यही चीज है जो उन्हें कुछ होने का अहसास कराती है। कोई दूसरा उन्हें इस बात का यकीन दिलाता है कि वे वाकई कुछ हैं। यह बड़ा दुखद है। सुंदर है, लेकिन दुखद है कि आपको अच्छा महसूस करने के लिए किसी दूसरे इंसान की हरी झंडी की जरूरत पड़ती है।

सही काम नहीं, काम को करने का तरीका होना चाहिए

तो सही चीज क्या है, जो करनी चाहिए? करने के लिए सही चीज क्या है, मसला यह नहीं है। बात यह है कि वह हर चीज जो हम करते हैं उसको करने का सही तरीका क्या है?

ऐसे में आपको या तो पूरी तरह स्थिर और शांत होकर बैठना सीखना चाहिए या फिर बेहद क्रियाशील होना चाहिए। आप दोनों भी करने की कोशिश कर सकते हैं।
लोग हमेशा यह ढूंढते हैं कि उनके लिए सही काम क्या है? कोई सही काम नहीं है। अभी हम जो भी कर रहे हैं, उसे करने का सही तरीका क्या है - अगर हम यह जान लें, तो मन सुलझ जाता है। हमने जिस काम को भी करने के लिए चुना है, बस उसे करते जाएं, न इधर देखें, न उधर देखें, बस उस काम को करें। इससे हमें मन और समय से परे जाने का रास्ता मिलता है।

समय के मुखौटे ने लोगों को फंसा लिया है, क्योंकि वे बिना इच्छा के अपने जीवन को आगे बढ़ाना ही नहीं चाहते। इच्छा समय पैदा करती है। अगर आप बिना किसी इच्छा के, बिना किसी विचार के यहां बैठ सकें तो आपके लिए समय जैसी कोई चीज नहीं होगी। आपके लिए समय का अस्तित्व ही नहीं होगा। तो कह सकते हैं कि समय इच्छाओं का बाईप्रोडक्ट है। चूंकि आपकी इच्छाएं हैं, इसलिए भविष्य है। भविष्य है तो भूत भी है, और चूंकि भूत है इसलिए आप वर्तमान को खो देते हैं। ऐसे में आपको या तो पूरी तरह स्थिर और शांत होकर बैठना सीखना चाहिए या फिर बेहद क्रियाशील होना चाहिए। आप दोनों भी करने की कोशिश कर सकते हैं। कभी बेहद क्रियाशील और कभी बिल्कुल शांत और स्थिर। इसी तरीके से यह मार्ग भी बनाया गया है कि आप चाहे इस तरह से करें या उस तरह से, दोनों तरीकों से आप एक ही लक्ष्य तक पहुंचेंगे।