ध्यान करते समय विचारों को कैसे रोकें?

ध्यान करते समय विचारों को कैसे रोकें

अध्यात्म की राह पर चलने वाले खास कर इस बात से परेशान रहते हैं कि उनका मन बहुत भटकता है। मन में उठने वाले तरह-तरह के विचार उन्हें परेशान करते हैं। तो सवाल है कि उन विचारों को या फिर अपने मन को कैसे करें काबू?

प्रश्‍न:

क्रिया का अभ्यास करते वक्त मेरे मन में कई तरह के विचार आते रहते हैं। मैं इन विचारों को दूर भगाने और अपना ध्यान क्रिया पर लगाने की बहुत कोशिश करता हूं लेकिन कोई फायदा नहीं होता। ध्यान या क्रिया करते समय अपने विचारों पर काबू कैसे किया जाए?

सद्‌गुरु:

आप क्रिया पर ध्यान लगा रहे हैं और विचारों को दूर रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन विचार दूर नहीं जाते। यह हमारे मन का स्वभाव है, पर ऐसा लगता है कि आप अपने मन के साथ ज्यादती कर रहे हैं।

अपने विचारों को लेकर या उन्हें काबू करने को लेकर चिंता मत कीजिए। आज आपके भीतर क्या है, उसके आधार पर विचार तो उमड़ेंगे ही। इसका न कोई महत्व है और न ही कोई परिणाम है।
जब आप क्रिया कर रहे होते हैं तो आप इस बात की परवाह नहीं करते कि आपकी किडनी काम कर रही है या नहीं, आपका दिल धडक़ रहा है या नहीं। शरीर के भीतर होने वाली बाकी दूसरी क्रियाओं की भी आपको कोई परवाह नहीं होती। लेकिन आप यह जरुर चाहते हैं कि आपका मन काम न करे। कई लोगों की यह धारणा होती है कि अगर आप कुछ आध्यात्मिक काम कर रहे हैं तो आपके मन को काम करना बंद कर देना चाहिए। यह धारणा बिल्कुल गलत है।

क्या है विचारों और आत्म-ज्ञान की प्रकृति?

आपके विचार गंध की तरह हैं – वे या तो खुशबूदार हैं या उनमें से बदबू आती है – यह उस पर निर्भर करता है कि आपके भीतर क्या बसा है। कुछ भी नया नहीं उगता। अगर आप अपने भीतर जमा उस चीज़ को अपने दिमाग में नहीं जाने देते, तो दिमाग अद्भुत रूप में काम करेगा। यह ऐसे काम भी कर सकता है, जिनकी आपने कभी कल्पना तक नहीं की थी। पर अभी तो यह आपके ही अपने कचरे से भरा है – यही तो संघर्ष है; तभी तो आप इसे रोकना चाहते हैं। यह दिमाग आपके जीवन का ताज बनने की बजाए, आपके जीवन में कचरे का डिब्बा बन गया है। जबकि भौतिक रूप से, यह आपका ताज है। योग के प्रतीक के रूप में, सहस्रार को एक हज़ार पंखुड़ियों वाले कमल के समान माना जाता है – ‘एक हज़ार’ को शाब्दिक अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए, पर यह कुछ ऐसा है जो असंख्य है। अगर आपका मस्तिष्क किसी तरह अस्तित्वपरक प्रक्रिया से जुड़ जाता, तो असंख्य संभावनाएँ आपके सामने आ जातीं।

आप असल में यह चाहते हैं, कि आपके विचार आत्म-ज्ञान की आपकी मायावी या झूठी परिभाषा को खतरे में न डालें। ये मायावी इसलिए है क्योंकि आप आत्म ज्ञान का कारण नहीं हैं।
परंतु अभी, आपका मस्तिष्क केवल मानसिक प्रक्रियाओं में खोया है। अब आप कह सकते हैं, ”सद्गुरु, मैं भी यही कह रहा हूँ – विचारों को वश में कैसे करें?“ नहीं, आप यह नहीं कह रहे। आप असल में यह चाहते हैं, कि आपके विचार आत्म-ज्ञान की आपकी मायावी या झूठी परिभाषा को खतरे में न डालें। ये मायावी इसलिए है क्योंकि आप आत्म ज्ञान का कारण नहीं हैं। आप प्रकाश को देख सकते हैं, परंतु आप प्रकाश का कारण नहीं हैं। जब सुबह आकाश में सूर्य उगता है तो आप प्रकाश पैदा करने का कारण नहीं होते, पर अगर आप आँखें खुली रखें तो उसे देख सकते हैं। अगर आप टॉर्च या किसी दूसरे माध्यम से प्रकाश पैदा कर लेते हैं, तो आपको इसे जलाए रखना होगा वरना हमेशा इसके बंद होने का भय बना रहेगा।

शिक्षा और आत्म-ज्ञान के बीच भी केवल यही अंतर है – आप स्वयं को एक, दस या सौ पुस्तकों के साथ शिक्षित कर सकते हैं, पर कहीं न कहीं यह पुस्तकें समाप्त होंगी। आत्म ज्ञान पाने का अर्थ है कि आपने स्वयं को पुस्तकों के माध्यम से शिक्षित नहीं किया – आप केवल वहाँ उपस्थित रहे और यह एक अंतहीन प्रक्रिया है। क्या कुछ ऐसा है जो एक आत्म ज्ञानी व्यक्ति जानता है और आप नहीं जानते? नहीं। क्या कुछ ऐसा खास है, जो एक आत्म ज्ञानी व्यक्ति नहीं जानता? नहीं, मैं शब्दों से नहीं खेल रहा। अस्तित्व की यही प्रकृति है।

हमने अपनी पहचान मन से जोड़ ली है

आपके लिवर और किडनी में जो हो रहा है, वह आपके मन में पैदा होने वाले विचारों से कहीं ज्यादा जटिल है। अगर आपके इन अंगों की गतिविधियां आपके काम में बाधा नहीं डाल रही हैं तो आपके विचार आपको परेशान क्यों करते हैं? क्योंकि आपको लगता है कि आप खुद विचार हैं। जब आप सोचते हैं तो आप इसे ‘मेरे विचार’ के रूप में नहीं देखते। आप कहते हैं, ‘मैं ऐसा सोचता हूं।’ चूंकि आपने अपने विचारों की प्रक्रिया के रूप में अपनी गहन पहचान स्थापित कर ली है, इसलिए ये आपको परेशान कर रहे हैं।

एक बार अगर आप ऐसी किसी चीज के साथ अपनी पहचान स्थापित कर लेते हैं जो आप हैं ही नहीं, तो आप मानसिक प्रक्रिया को नहीं रोक सकते। यह अंतहीन तरीके से जारी रहेगी।
आप अपनी किडनी के रूप में खुद की पहचान स्थापित नहीं करते, जब तक कि आपको उससे जुड़ी कोई समस्या नहीं हो। अगर किडनी ठीक से काम कर रही है, तो आपको यह महसूस भी नहीं होता कि आपके भीतर किडनी भी है। जो कुछ भी ठीक से काम नहीं कर रहा है, उसके प्रति आप हमेशा जागरूक रहते हैं। मेरा मतलब आपके मन से है, मैं उसी के बारे में कह रहा हूं। अगर यह ठीक तरह से काम करता तो आप इस पर ध्यान ही नहीं देते। ठीक वैसे ही जैसे आप अपनी किडनी या लिवर पर ध्यान नहीं देते। अगर आप अपने मन के रूप में अपनी पहचान स्थापित नहीं करते तो आप उसकी ओर ध्यान ही नहीं देते।

आप कुछ ऐसी चीजों के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर रहे हैं, जो आप हैं ही नहीं। एक बार अगर आप ऐसी किसी चीज के साथ अपनी पहचान स्थापित कर लेते हैं जो आप हैं ही नहीं, तो आप मानसिक प्रक्रिया को नहीं रोक सकते। यह अंतहीन तरीके से जारी रहेगी। यह ऐसे ही है, जैसे अगर आपने कोई गलत चीज खा ली तो पेट में गैस बन जाएगी। इसे आप नहीं रोक सकते। उसके लिए आपको गलत भोजन खाना ही बंद करना पड़ेगा।

मनुष्य के मस्तिष्क की ख़ास संभावनाएं

अभी आपके लिए गलत भोजन क्या है? आप खुद को वो मान बैठे हैं, जो आप नहीं है। जब आप अपने शरीर, अपने विचारों और अपने भावों के साथ, अपने आसपास की चीजों के रूप में, अपनी पहचान स्थापित कर लेंगे तो आपके विचारों का सिलसिला कभी नहीं थमेगा। लोगों को लगता है कि मन ऐसा ही है। मन ऐसा नहीं है। अगर आपके पेट में हरदम दर्द रहे तो आप सोचेंगे कि पेट ऐसा ही होता है। हमारा मस्तिष्क दूसरे अंगों से कहीं अधिक संवेदनशील है।

यह एक संभावना है कि आप यहाँ बैठ कर, यहाँ से सैंकड़ों या हज़ारों मील दूर या पुरानी चीज़ों के बारे में सोच सकते हैं। यह कई लोगों के लिए समस्या बन गई है, क्योंकि उन्होंने कभी इसके (मन के) निर्देशों को नहीं समझा है।
बाकी सभी अंगों के निश्चित कार्य हैं, परंतु मस्तिष्क के कुछ खास कार्य हैं, और इसका बाकी सब मुक्त है। इंसान होने की यही समस्या है। किसी भी दूसरे जीव के पास निश्चित लक्ष्य होते हैं, बस इससे अधिक कुछ नहीं। उन्हें अच्छी तरह खाना है, फलना-फूलना है, संतान उत्पन्न करनी है, और एक दिन मर जाना है – सब कुछ पहले से तय है। केवल एक इंसान ही सोच रहा है, ”मैं यहाँ क्यों हूँ? मेरे जीवन की प्रकृति क्या है? मैं कहाँ से आया हूँ? मुझे कहाँ जाना है?“ ये सारे प्रश्न तभी उपजते हैं, जब आप एक मनुष्य हों। एक इंसान और जानवर के बीच केवल यही अंतर है कि मनुष्यों का दिमाग दूसरे जीवों से कहीं अधिक होता है, मस्तिष्क के दूसरे अंग तथा सेरीब्रल कोर्टेक्स अधिक उन्न्त होता है।

आप अपने भीतर पैदा हुई नई संभावना के बारे में शिकायत करते हैं, एक ऐसी संभावना जो किसी वनमानुष, बंदर या किसी दूसरे जीव के भीतर नहीं होती। एक संभावना को समस्या के तौर पर न लें। यह एक संभावना है कि आप यहाँ बैठ कर, यहाँ से सैंकड़ों या हज़ारों मील दूर या पुरानी चीज़ों के बारे में सोच सकते हैं। यह कई लोगों के लिए समस्या बन गई है, क्योंकि उन्होंने कभी इसके (मन के) निर्देशों को नहीं समझा है।

सत्य और असत्य में क्या अंतर है?

सबसे पहले, मस्तिष्क को खराब भोजन देना बंद करें – इसे असत्य नहीं सत्य की खुराक दें। हम सत्य के हाथों में हैं। सत्य हमारे हाथों में नहीं है। हमारे हाथों में, झूठों का उलझा हुआ ढेर है।

आपकी जो भी मान्यताएं हैं, आपने जो भी चीजें अपने मन में इकट्ठी कर रखी हैं, अगर आप उन सभी को छोड़ दें, तो आप पाएंगे कि जब आप बैठते हैं तब आपका मन बिल्कुल खाली होता है। अगर यह खाली है तो इसका क्या फायदा?फायदा यह है कि तब यह पूरे जगत को प्रतिबिंबित कर सकता है। नहीं तो यह बिल्कुल हास्यास्पद होगा।

असत्य की अनुपस्थिति ही सत्य है। केवल मूर्ख ही सत्य के बारे में बात कर सकता है। जो इसे जानता है, वह सत्य के आसपास की बात करेगा, क्योंकि आप इसके बारे में बात नहीं कर सकते।
बस यही दो विकल्प हैं- आप अपने मन को हास्यास्पद स्थान बनाना चाहते हैं या ब्रह्मांडीय। इसके ब्रह्मांडीय स्थान बनने के लिए आपको सभी झूठों को छोडऩा होगा। तभी सत्य अपने वास्तविक रूप में सुशोभित होगा।

असत्य की अनुपस्थिति ही सत्य है। केवल मूर्ख ही सत्य के बारे में बात कर सकता है। जो इसे जानता है, वह सत्य के आसपास की बात करेगा, क्योंकि आप इसके बारे में बात नहीं कर सकते। आप किसी ऐसी चीज़ को ही वर्णित या परिभाषित कर सकते हैं जिसमें कोई विषय हो, जिसे मापा जा सके या जिसकी कोई सीमाएँ हों। अगर किसी चीज़ की कोई सीमा या मापदंड नहीं तो आप इसके बारे में बात नहीं कर सकते। यह सब कुछ साधना इसलिए ही है कि आप अपने हाथों रची अस्त-व्यस्तता को सुधारें, यह सत्य को स्थापित करने के बारे में नहीं है। आपको सत्य को स्थापित करने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस सत्य की गोद में ही हम सबका अस्तित्व है।

विचारों को रोकने की कोशिश न करें

मैं आपसे यह नहीं कहता कि आप यह बताएँ कि क्रिया करते समय आपके मन में कैसे भाव आते हैं। अपने विचारों की चिंता न करें। सबसे महत्वपूर्ण ये है कि, इन्हें रोकने की कोशिश न करें। इन्हें उसी तरह घटने दें जैसे आपके गुर्दे काम कर रहे हैं। आपके गुर्दों में सब कुछ साफ नहीं है। आपके मस्तिष्क में भी सब कुछ साफ नहीं है – आपकी समस्या क्या है?

अच्छे और बुरे विचारों में भेद न करें। कोई भी अच्छे या बुरे विचार नहीं होते – ये केवल विचार भर हैं। आपके विचार इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपके भीतर किस तरह का कचरा मौजूद है – उनसे उसी तरह की गंध फूटेगी। आज की गंध, पिछले दिन के कचरे पर निर्भर करती है। यह इस बात पर निर्भर करती है कि कल आपने कचरे के डिब्बे में क्या फेंका।

आज आपके भीतर क्या है, उसके आधार पर विचार तो उमड़ेंगे ही। इसका न कोई महत्व है और न ही कोई परिणाम है। आपको बस अपनी क्रिया करनी है। विचारों पर काम मत कीजिए।
अगर आपने कल कोई मूवी देखी या कोई और काम किया तो वह आज आपके पास लौट कर आएगा। अपने विचारों की परख़ न करें, यह तो कूड़ा मात्र है। सबसे पहले, ये वास्तविक भी नहीं है। एक विचार यानी जो वास्तविक नहीं है। इस समय आपका अधिकतर हिस्सा अचेत है। आप हमेशा कुछ न कुछ कल्पना कर रहे हैं। अगर आप इस रचना और रचनाकार की प्रकृति के बारे में जानना चाहते हैं, तो बेहतर होगा कि आप अपने मन से कुछ न बनाएँ, आप इस समय यही करने की कोशिश कर रहे हैं। यह उपाय आपके किसी काम नहीं आने वाला।

अगर आप क्रिया करते हुए, विचारों को हमेशा बनाए रखने का प्रयास करते हैं, तो वे नहीं आएँगे। अचानक, आपके मस्तिष्क जाम हो जाएगा। अपने विचारों को लेकर या उन्हें काबू करने को लेकर चिंता मत कीजिए। आज आपके भीतर क्या है, उसके आधार पर विचार तो उमड़ेंगे ही। इसका न कोई महत्व है और न ही कोई परिणाम है। आपको बस अपनी क्रिया करनी है। विचारों पर काम मत कीजिए। चाहे आप उन्हें हटाने की कोशिश कर रहे हों या यह कोशिश करें कि ध्यान के दौरान केवल 108 पवित्र विचार आएं, आप काम तो विचारों पर ही कर रहे हैं। किडनी अपना काम करेगी, लिवर अपना काम करेगा, मन अपना काम करता रहेगा, आप क्रिया कीजिए, बस क्रिया।


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