तलाक़ हो जाए, तो कैसे उभरें? क्या दूसरी शादी करना ठीक है?

क्या तलाक़ हो जाना बुरी बात है? कैसे तलाक़ से गरिमामय तरीके से गुज़रें? तलाक़ के बाद दोबारा शादी करना, क्या ठीक है? दूसरी शादी का बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ता है? सद्गुरू इस रोचक लेख में तलाक़ से जुड़े तमाम प्रश्नों के उत्तर देते हुए इससे जुड़े सभी पहलुओं पर बात कर रहे हैं।
Sadhguru Wisdom Article | How to Deal with a Divorce? Is Remarriage Okay?
 
विषय की सूची
तलाक़ के कारण
प्रेम आपके बारे में है।
तलाक़ क्या है?
तलाक़ क्या है?
जब तलाक़ ही एक रास्ता बच जाय....
बच्चे पर दूसरी शादी के प्रभाव
तलाक़ के बाद सिंगल मदर होना
क्या दूसरी शादी करना ठीक है?

तलाक़ के कारण

प्रश्न: जब शादी एक थकाऊ झगड़ा बन जाए, क्या तलाक़ ले लेना बेहतर नहीं है?

सद्गुरु: अगर हम दूसरे व्यक्ति से झगड़े बिना रह पाते तो तलाक़ का प्रश्न नहीं उठता। आप सड़क पर किसी से नहीं झगड़ रहे, आप एक ऐसे व्यक्ति से झगड़ रहे हैं जिसे आपने एक समय पर सबसे अद्भुत व्यक्ति समझा था। झगडा इसलिए नहीं है कि वह व्यक्ति अचानक घटिया बन गया। झगडा इसलिए है, क्यूंकि जैसे जैसे हम बड़े होते हैं, कुछ बदलाव आते हैं, और अब हम उन बदलावों को स्वीकार नहीं करना चाहते। दो लोगों में बदलाव अलग- अलग किस्मों के होते हैं, और यह ठीक है। हमें साथ रहने के लिए एक जैसा होना ज़रूरी नहीं है। ये ज़रूरी नहीं कि दो लोगों को एक जैसी चीज़ें पसंद हो, कि वे एक जैसी ही चीज़ें करें या एक जैसा महसूस करें। लोग बिलकुल अलग तरह के होकर भी, एक साथ रह सकते हैं। ये सोचना कि दूसरे व्यक्ति को बिल्कुल आप जैसा होना चाहिए, कुछ हद तक बचकाना है। दुनिया के किसी भी कोने में दो व्यक्ति बिलकुल एक जैसे नहीं हो सकते। दो व्यक्तियों में जीवन के किसी एक पहलू में कोई न कोई फ़र्क होगा। सड़क चलते आदमी कि बात छोडिये, क्या अपने सबसे नजदीकी व्यक्ति के साथ ही, आपके अनेक स्तरों पर, कुछ न कुछ विरोध नहीं होते?

सड़क चलते आदमी कि बात छोडिये, क्या अपने सबसे नजदीकी व्यक्ति के साथ ही, आपके अनेक स्तरों पर, कुछ न कुछ विरोध नहीं होते?

एक अमरीकी लेखक रोबर्ट ओवन ने कहा है, “दुनिया में सिवाय तुम्हारे और मेरे हर एक व्यक्ति अजीब है, लेकिन तुम भी थोड़े अजीब ही लगते हो”। कृपया अपने मन को देखें और उसे समझें, अगर आप अपने तर्क के हिसाब से चलेंगे, तो दुनिया में कोई भी सही नहीं दिखेगा। ज़रा अपने जीवन में अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को ध्यान से जांचें, और देखें, उस व्यक्ति के प्रति भी आपका कितने स्तरों पर विरोध हैं। सड़क चलते आदमी की बात छोडिये, क्या अपने सबसे नजदीकी व्यक्ति के साथ ही आपके अनेक स्तरों पर, कुछ न कुछ विरोध नहीं होते? तो इसका मतलब आपके लिए दुनिया में कोई भी सही नहीं है। अगर कोई भी सही नहीं है, तो प्रश्न सही और ग़लत का नहीं, बात बस इतनी है कि आप मानसिक तौर पर बीमार होते जा रहे हैं। मानसिक तौर पर बीमार होने का सबसे पहला लक्षण ये है, कि आपको लगने लगता है कि कोई भी ठीक नहीं है। मालूम पड़ता है, आपने पहला कदम पहले ही उठा लिया है, अगर आप इस पर आगे बढ़ेंगे, परेशानियां सिर्फ़ बढेंगी ही।

अगर अगल-अलग चीज़ों को लेकर, दो व्यक्तियों की समझ अलग है या किसी काम को करने के तरीक़े में फ़र्क है, तो इसमें कोई परेशानी नहीं है। बुनियादी एहसास या भावनाएं ही हैं जो लोगों को साथ रखती हैं। आखिर आप दोनों एक दूसरे की ख़ुशहाली को तलाशते हुए ही एक साथ जुड़े थे। आइये, एक बात समझ लें, जिसे आजकल प्यार कह दिया जाता है वो आमतौर पर बस एक आपसी फ़ायदे की स्कीम है। आपकी कुछ ज़रूरतें हैं, कुछ ज़रूरतें दूसरे व्यक्ति की हैं और लोग इन्हीं ज़रूरतों को पूरा करने के लिए साथ जुड़ते हैं। ज़रूरतें कई तरह की हो सकती हैं, शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक, या आर्थिक। जैसे ही आपकी ज़रुरत पूरी नहीं होती, ये (रिश्ता) ख़त्म हो जाता है। आप ऐसे ही चल रहे हैं। रिश्ते में कुछ और है ही नहीं। आप दूसरे व्यक्ति का सबसे अच्छा स्वरुप पाना चाहते हैं, दूसरा व्यक्ति आपमें से आपका बेहतरीन स्वरुप निचोड़ लेना चाहता है। ये तो युद्ध है, प्रेम-सम्बन्ध नहीं।

प्रेम आपके बारे में है।

जिसे आप प्यार कहते हैं, वो किसी और के बारे में नहीं है, ये आपके बारे में है, आप ख़ुद अपने भीतर कैसे हैं। अगर आपका शरीर ख़ुशनुमा हो जाता है, हम इसे स्वास्थ्य या सुख कहते हैं। अगर आपका मन ख़ुशनुमा हो जाता है, हम इसे प्रसन्नता या हर्ष कहते हैं। अगर आपकी भावनाएं बहुत ख़ुशनुमा हो जाती हैं, हम इसे प्यार कहते हैं। अगर आपकी ऊर्जाएं, बहुत ख़ुशनुमा हो जायें, हम इसे परमानन्द कहते हैं। ख़ुद के भीतर कैसे रहे इसके ख़ास तरीके हैं। इसका किसी और से कुछ लेना-देना नहीं है, पर आप इसे किसी दूसरे से जोड़ रहे हैं। अगर आपके मन, आपकी भावनाओं और शरीर को खुश करने कि ज़िम्मेदारी किसी और की है, तो ये ज्यादा समय तक नहीं चलेगा। कोई भी इंसान ये हमेशा के लिए नहीं कर सकता। शायद शुरू में जब आप बस मिले ही थे, उन्होंने 3३ दिनों तक आपके मन, भावनाओं और शरीर को खुश रखने के लिए सब कुछ किया, पर कोई भी ये हमेशा के लिए नहीं कर सकता, किसी भी इंसान के लिये ऐसा करना संभव नहीं है।

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तो, आपको अपने मन, भावनाओं और शरीर को खुश रखना सीखना होगा। अगर आपकी भावनाएं ख़ुश हैं, तो आप स्वयं अपने भीतर प्रेम महसूस करेंगे और चाहे जो भी मन-मुटाव हों, सब ठीक रहेगा। जब ऐसा नहीं होता, तब एक छोटा सा मतभेद भी बहुत बड़ी समस्या बन जाता है। लोग आपके नज़दीक तभी आते हैं जब आप में एक तरह की उमंग होती है।

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तलाक़ क्या है?

प्रश्न: मैं पहले से ही तलाक़ कि प्रक्रिया से गुज़र रही/ रहा हूँ और ऐसा लगता है कि मेरा एक हिस्सा मरता जा रहा है। मैं इससे गरीमामय तरीके से कैसे गुज़रूँ?

सद्गुरू: जिसे अभी आप “मैं” कहते हैं ये यादाश्त का एक बहुत बड़ा ढेर है। जैसा आपका शरीर है, ये ऐसा इसलिए हैं क्यूंकि इसमें आपके वंश से जुड़ी याददाश्त है। आपकी नाक आपकी माँ जैसी है और रंग पिता जैसा क्यूंकि जिसे आप अपना शरीर कहते हैं, ये याददाश्तों का एक जटिल मिश्रण है? आपके शरीर में एक बहुत प्राचीन याददाश्त का वास है। जिसे आप “मेरा मन” कहते हैं, वो १०० प्रतिशत याददाश्त है। आप कई तरह से यादों का एक बहुत बड़ा ढेर हैं और ये याददाश्त आपमें कई अलग-अलग तरीकों से समा चुकी है। आप जो देखते, सुनते, सूंघते, चखते और छूते है, उनसे अपनी यादें बनाते हैं। यादें सहेजने के इन ५ अलग अलग तरीकों में से, जो आप देखते हैं और स्पर्श करते हैं, उनसे सबसे गहरी यादें बनती हैं। ख़ासतौर पर आप जो छूते हैं, वो सिस्टम में याददाश्त का एक विशेष स्तर बनाती है।

तलाक़ एक ख़ुद चुनी हुई मौत है। आपने उसे मार डालने का फैसला ले लिया है, जो एक तरह से आपका अपना हिस्सा है।

जीवनसाथी का मतलब है उन्होंने आपको स्पर्श किया है, और एक ख़ास स्तर की याद है। तलाक़ का मतलब है कि किसी तरह से आप उस याद को फाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे हैं और यह कई कारणों से आसान नहीं होगा। साथ ही साथ, तलाक़ का यही मतलब है, कि आप उस यादाश्त के साथ किसी तरह ख़त्म हो जाना चाहते हैं। शायद, आप उस याद को न भी मिटाना चाहें, पर किसी न किसी कारण, आपने ये महसूस करना शुरू कर दिया है, कि कभी जो कई मायनों में आप ही के जीवन का एक हिस्सा था - वह एक बोझ है, जिसे आप अब और ढोना नहीं चाहते। आप वो बोझ उतार देना चाहते हैं, पर आपको पता चलता है कि ये (याद) ऐसा बोझ नहीं है जिसे आप अपनी मर्ज़ी से उठाते हैं, ये कुछ ऐसा है जो आपसे ज़बरदस्ती चिपका रहता है। जो आपसे मजबूरीवश चिपकता है, अगर उसे आप उखाड़ फेंकने की कोशिश करेंगे, तो दर्द होगा ही।

आपके जीवनसाथी की याद का निर्माण हो चुका है, आप ऐसी ही इससे छुटकारा नहीं पा सकते। अगर आप भावनात्मक और मानसिक रूप से संतुलित भी हैं, कि आप इसे झेल जाएँ, पर आप देखेंगे, कि फिर भी आपका पूरा सिस्टम एक ख़ास स्तर की तक़लीफ से गुज़रेगा। ख़ास तौर पर, जब मृत्यु होती है, आप देखेंगे कि आपके शरीर की हर कोशिका में आपके जीवनसाथी की याद बसती है। अगर आप अधिक समय एक-दूसरे के साथ जी चुके हैं, तो ये सिर्फ़, भावनात्मक और मानसिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक बहुत ही शारीरिक प्रक्रिया है। 

तलाक़ एक ख़ुद चुनी हुई मौत है। आपने उस चीज़ को मार डालने का फैसला ले लिया है, जो एक तरह से आपका अपना हिस्सा है। अस्तित्व और मानव सिस्टम की यही वह समझ हैं, जिसके कारण वे कहते हैं, “जब तक मौत ना जुदा कर दे, आप अलग नहीं होगे”, क्यूंकि यहाँ एक शारीरिक याद है, और शरीर के पास मन के जैसा संतुलन नहीं होता। मन फैसला लेकर अपना रास्ता बदल सकता है, लेकिन शरीर वापस नहीं मुड सकता है। जितनी यादें आप इसमें बनाते हैं, ये उतना ही भ्रमित होता चला जाता है। 

तलाक़ और दूसरी शादी

अधिकतर लोग सोचते हैं कि तलाक़ से उभरने का सबसे बढ़िया तरीक़ा, तुरंत वैसे ही दूसरे रिश्ते में कूद पड़ना है। ऐसा करके आप और अधिक संघर्ष में पड़ जायेंगे और अपने सिस्टम में उथल-पुथल का कारक बनेंगे। ये बहुत ज्यादा ज़रूरी है कि आप अपने शरीर को उस याद से निबटने का पर्याप्त समय दें, उस याद से एक ख़ास दूरी बना पाएं। नहीं तो, आप स्वयं को ऐसी स्थिति में पाएंगे, जहाँ जीवन में ख़ुद को शांतिमय और ख़ुशहाल बना पाना आपके लिए अत्यधिक कठिन काम बन जायेगा।

जब तलाक़ ही एक रास्ता बच जाय....

सबसे अच्छा होगा कि तलाक़ से बचा जाए पर अगर किसी कारणवश आप ऐसी स्थिति में आ पहुंचे हैं जहाँ आपने तलाक़ लेने का फैसला कर लिया है, तो आपको ये समझने कि ज़रुरत है कि तलाक़ का यही मतलब है कि आपने अपने किसी हिस्से को मार डालने का चुनाव कर लिया है। 

एक-दूसरे के प्रति हमारी निर्भरता सिर्फ हमारी बाहरी ज़रूरतों के हिसाब से होती है, लेकिन हमारा भीतरी अस्तित्व अपने आप में सम्पूर्ण है।

दो लोग जिन्होंने अपनी भावनाएं, अपने शरीर, अपनी संवेदनाएं, और रहने की जगह एक दूसरे के साथ बांटी है, उनका इसे फाड़ फेंकना लगभग ख़ुद को फाड़ फेंकने जैसा है क्यूंकि दो याद्दाश्तें एक दुसरे में कई तरह से घुल-मिल जाती हैं। इसके बावजूद कि शायद आप लगभग ऐसी जगह आ पहुंचे हैं जहाँ अब आप दूसरे व्यक्ति का सामना भी नहीं कर सकते – ये फिर भी दुःख देता है, सिर्फ़ इसलिए कि आप एक याद को फाड़ फेंकना चाहते हैं, ऐसी याद जो आप स्वयं हैं, क्यूंकि आप यहाँ याददाश्त के एक बण्डल की तरह जीते हैं। 

आप सिर्फ अपने जीवनसाथी को तलाक़ दे रहे हैं, आपको ख़ुद को तलाक़ देने की ज़रुरत नहीं है। पर आपको समझना ही होगा कि आपने ख़ुद को ही तलाक़ दे दिया है। अपने आपको किसी तरह सम्पूर्ण महसूस करवाने के लिए, आप एक रिश्ते में जुडे और आपके वजूद का पोषण हुआ, चाहे वो एक भागीदारी थी या एक बंधन – ये इस पर निर्भर करता है कि आपने इसे कैसे निभाया। अधिकतर ऐसी तमाम भागीदारियां इसलिए बनती हैं क्यूंकि इसके बिना आप ख़ुद को अपर्याप्त और अधूरे महसूस करते हैं। पर जीवन ऐसा नहीं है, आप एक सम्पूर्ण जीवन प्रक्रिया हैं, इसे किसी बाहरी सहारे की ज़रुरत नहीं है।

अगर आप तलाक़ जैसी स्थिति में आ पहुँचे हैं, तो ये भीतर की ओर मुड़ने का समय है. ये जीवन की सम्पूर्णता को जानने का समय है। ये वो समय है कि आप जानें कि ये प्राणी एक सम्पूर्ण प्राणी है इसे ऐसा होने के लिए किसी बाहरी सहारे की ज़रुरत नहीं है। समाज में जीवित रहने के लिए आपसी निर्भरताएं होती हैं पर इस प्राणी का बुनियादी अस्तित्व, संतुलन, और इसके होने कि संभावना, अपने आप में एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है। अगर आप अपने जीवनसाथी को तलाक़ दे रहे हैं, तो ये अपने आप में ही काफ़ी बुरा है, ख़ुद को ख़ुद से तलाक़ मत दीजिये। 

बच्चे पर दूसरी शादी के प्रभाव

प्रश्न: सद्गुरु, मेरा तलाक़ हो चुका है मेरा एक 8 साल का एक बेटा है। कई बार मुझे प्रेम का अभाव और दूसरी शादी की ज़रुरत महसूस होती है। मेरा बेटा मुझसे पूछता रहता है कि घर में उसके पिता क्यूँ नहीं हैं? मैं वाक़ई उलझी हुई हूं, कृपया मेरी मदद कीजिये।

सद्गुरू: आज की दुनिया में, शादी के बाद एक बच्चा अपने आप नहीं आ टपकता। एक समय था, कि कोई और रास्ता ही नहीं था। अगर आपकी शादी हो गई, तो बच्चे होते रहते थे। पर आज की दुनिया में, एक बच्चा अपने आप नहीं होता – इसे आम तौर पर प्लान किया जाता है। आपको समझना होगा, कि एक बार जब आपका बच्चा पैदा हो गया, तो ये आपका 20 साल का प्रोजेक्ट है। अगर आपका बच्चा बहुत सक्षम है, तो ये 15-16 साल का प्रोजेक्ट है। अगर आपकी प्रतिबद्धता इतनी नहीं है, तो आपको इसमें नहीं पड़ना चाहिए। ये इसलिए ज़रूरी नहीं है, क्यूँकि कोई बच्चा आकर आपकी कोख पर दस्तक देते हुए ये नहीं कहता कि, “मुझे पैदा कर दो”। अगर आप इस बात के लिए निश्चित नहीं हैं कि आप इस तरह का आधार दे पायेंगे, तो आपको बच्चे पैदा करने की ऐसी विपदा में नहीं पड़ना चाहिए।

तलाक़ के बाद सिंगल मदर होना

ये सोचना कि एक और शादी बच्चे को संभाल लेगी – ये एक बहुत बुरा विचार है। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि ये नहीं संभालेगी, हो सकता है कि ये संभाल ले। पर ये सोचना कि, “बच्चे के जैविक पिता तो काम नहीं आये, अगर मैं एक और आदमी ले आऊं, तो सब ठीक हो जायेगा”, ये बहुत ख़तरनाक विचार है। मैं कहूँगा कि ऐसी चीज़ें सिर्फ़ दस प्रतिशत मामलों में ही काम करती हैं। नब्बे प्रतिशत ये समाधान करने की बजाय समस्या को बढ़ा देती हैं। मैं नहीं पूछूंगा कि आपने अपनी शादी क्यूँ तोड़ दी, ये आपके ऊपर है। अगर आपने इसे तोड़ने का चुनाव किया है तो आप कम से कम ख़ुद को हर संभव तरीक़े से बच्चे का एक सम्पूर्ण अभिभावक बनाने के योग्य बनें। पर क्यूंकि आप स्वयं किसी और चीज़ के लिए तड़प रही हैं, इसलिए बच्चा भी आपके साथ तड़पता है।

कृपया बच्चे को ऐसी असहाय स्थिति में लेकर न आयें जहाँ वो किसी ऐसे के लिए तड़पे जो मौजूद नहीं है। आपका आठ साल का बेटा आपके साथ कितना समय बिताना चाहता है? मुश्किल से थोडा सा। वो अपनी चीज़ों में व्यस्त है, अगर आपने उसे ऐसा असहाय प्राणी न बना दिया हो कि उसे बस हमेशा आपसे चिपका रहना पड़े, नहीं तो उसके पास करने के लिए अपनी अलग चीज़ें हैं। यही जीवन की प्रकृति है, बच्चों के पास करने के लिए अपनी चीज़ें होती हैं। आपको बस एक आँख से ये देखते रहना होता है कि वे ख़ुद के लिए कोई गलत चीज़ें न करने लग जाएँ। उनको आपसे कोई मतलब नहीं है। 

क्या दूसरी शादी करना ठीक है?

तो, अगर आप दोबारा शादी करना चाहते हैं – ये आपके ऊपर है। ये चुनाव आपको ख़ुद करना है। इसे बच्चे पर मत थोपिए। बच्चे को ऐसा बनाइये कि उसे न आपकी ज़रुरत हो न अपने पिता की। वो अपने-आप के साथ ठीक हो। उसे बस पोषण और परवाह की ज़रुरत है, और कुछ भी नहीं। आप कुछ भी करेंगी, उसका एक परिणाम होगा। अगर आप शादी नहीं करतीं, तो उसका एक तरह का परिणाम होगा। अगर आप शादी करती हैं, तो उसका दूसरी तरह का परिणाम होगा - आपने पहले ही एक अनुभव ले लिया है, तो शायद आप इसे बेहतर संभाल पाएं – हम कह नहीं सकते। पर दोनों चीज़ों के अपने परिणाम होंगे। और, ज़रूरी नहीं कि परिणाम मधुर या अप्रिय हों। ये बस इस पर निर्भर करता है कि आप उन्हें कैसे लेती हैं। अगर आप परिणामों को ख़ुशी-ख़ुशी लेती हैं, तो ये एक प्यार भरी मेहनत होगी, नहीं तो बस मेहनत।