सालों पहले जब मैं खेती करता था, मैंने अपनी मदद के लिए वहां के एक ग्रामीण को रखा था। उसका नाम था चिक्केगौडा। उसे कम सुनाई देता था, इसलिए बाकी के गांववाले उसका मजाक उड़ाते थे। मुझे उसका साथ पसंद था क्योंकि मुझे बात करने में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।

एक दिन मैंने सुबह चार बजे उसे हल तैयार करते देखा। मैंने पूछा, ‘क्या कर रहे हो?’

‘आज बारिश होगी,’ वह बोला।

मैंने आसमान की ओर देखा। आसमान बिल्कुल साफ था। मैंने पूछा, ‘क्या बकवास है। कहां है बारिश?’

वह बोला, ‘नहीं स्वामी, बारिश जरूर होगी।’

और वाकई बारिश हुई।

Subscribe

Get weekly updates on the latest blogs via newsletters right in your mailbox.
No Spam. Cancel Anytime.

इसके बाद मैं दिन-रात बैठकर सोचता रहा। जो चीज इस आदमी ने महसूस कर ली, वह मैं क्यों नहीं कर पाया? मैंने अलग-अलग तरह से अपने हाथ को रखकर वातावरण की नमी, तापमान को महसूस करने की कोशिश की, आसमान को पढ़ने का प्रयास किया। मैंने मौसम विज्ञान की किताबें पढ़ीं मगर उसका कोई फायदा नहीं हुआ। और फिर आखिरकार अपने ही शरीर और अपने वातावरण को ध्यानपूर्वक देखने से मुझे उस मूलभूत भूल का पता चला जो हममें से अधिकतर लोग करते हैं। हम अपने शरीर को बनाने वाले तत्वों जैसे धरती, जल, वायु और भोजन को वस्तुओं के रूप में देखते हैं, जीवन प्रक्रिया के एक जैविक हिस्से की तरह नहीं।

यह एक छोटी सी बात लग सकती है, लेकिन यही इंसानी जीवन का दुर्भाग्य है। दुनिया में पर्यावरण का संकट, आज हमारे देश के सामने उपस्थित गंभीर जल संकट और सूखे की स्थिति, चीजों को अलग-अलग करके और वस्तु की तरह देखने की इसी प्रक्रिया के कारण हैं। हम पारंपरिक ज्ञान को नष्ट होने दे रहे हैं और यह भूल गए हैं कि यह शरीर इस विशाल पृथ्वी का एक हिस्सा है। यह पृथ्वी इससे भी बड़े सौर मंडल का हिस्सा है, जो ब्रह्मांड से जुड़ा है। अगर हम इन्हें अलग करके देखेंगे तो हम अस्तित्व की मूलभूत एकता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। नतीजा यह कि हम किस्तों में आत्महत्या कर रहे हैं।

अगले दशक में देश में पर्यावरण की तबाही की जो भविष्यवाणी की जा रही है, वह अब सिर्फ डर फैलाने वाली कयामत की कोरी भविष्यवाणी नहीं है। सब कुछ साफ-साफ दिख रहा है: अगर हम कोई ठोस कदम नहीं उठाएंगे, तो बारहमासी नदियां मौसमी हो जाएंगी और बहुत सी नदियां पूरी तरह सूख जाएंगी (जैसा कि हो भी चुका है)। इस देश में जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता सत्तर सालों में पहले ही लगभग साठ फीसदी तक कम हो चुकी है।

तमिलनाडु में एक पुरानी कहावत है: अगर खजूर के पेड़ सूख जाएं, तो आप संकट की तरफ बढ़ रहे हैं। इस इलाके में पिछले दस सालों में पर्यावरण को जितना नुकसान हुआ है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। भूमिगत जल स्तर कम हुआ है। मानसून अनियमित हो रहा है। जब पेड़-पौधे और कम हो जाएंगे, तो उसकी हालत और खराब होगी। देश के दूसरे इलाकों में भी स्थिति इतनी ही गंभीर है।

बहुत कुछ अभी किया जाना बाकी है: वर्षा के जल का संग्रहण, वनरोपण, नर्सरियां लगाना, आबादी पर तत्काल नियंत्रण। मगर इनमें से कोई भी हल पूरी तरह सरकारी पहल से नहीं हो सकता। पर्यावरण की सुरक्षा को जन आंदोलन बनाना पड़ेगा। एक जन अभियान, जिसमें जागरूक और प्रेरित नागरिक भाग लेकर इस धरती पर अपने निजी और सामूहिक जीवन को बेहतर बनाएंगे।

मगर इसके लिए नागरिक शास्त्र की पढ़ाई जरूरी नहीं है। आज के युग में आध्यात्मिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि यह व्यक्ति को गहनतम संभव रूप में याद दिलाती है कि इंसान कोई द्वीप नहीं है। यह कोई सैद्धांतिक चेतावनी नहीं है। योग एक सच्चाई का आह्वान है, जिसे हम बार-बार भूल जाते हैं। हम जिस दुनिया में रहते हैं, उससे अलग नहीं हैं। हम अपनी नदियों और जंगलों के साथ जो करते हैं, वह हम अपने आप के साथ करते हैं।

Love & Grace