मणिकर्णिकाः शिव की शरारत और विष्णु के पसीने के बारे में

सद्गुरुः  काशी में होने का क्या महत्व है? ‘काशी’ का शाब्दिक अर्थ है प्रकाशवान होना, या विशेष रूप से, एक प्रकाश-स्तंभ। आप वह कहानी जानते हैं कि जुगाड़ू शिव ने कैसे पार्वती को अपने कान के बुंदे गिरा देने को कहा। उन्होंने गिरा दिए; वो गिरे और धरती में धंस गए। विष्णु को, स्त्रियों के चहेते होने के कारण, अपनी बहादुरी दिखानी थी। वो बुंदे उठाने गए। उन्हें पाने के लिए वो जैसे-जैसे जमीन में गहरा, और गहरा खोदते गए, उन्हें इतना पसीना आने लगा कि उनका पसीना इकट्ठा होकर एक तालाब बन गया, जिसे मणिकर्णिका कहा गया। मणिकर्णिका असल में एक तालाब या कुंड था। इसके किनारे लोग दाहसंस्कार भी करते थे।

यह प्रकाशपुंज काशी का प्रतीक है, क्योंकि काशी एक मशीन, एक यंत्र, और आपके पास ब्रह्माण्ड को लाने के लिए एक ब्रह्माण्डीय प्रभाव है।

जब उन्होंने ऊपर देखा, तो शिव एक प्रकाश-स्तंभ जैसे दिखे। क्या आपने कभी एक शक्तिशाली टार्च को आकाश की ओर चमकाया है? अगर आप रात में इसकी कोशिश करते हैं, तो आप एक प्रकाशपुंज को ऊपर जाते देखेंगे। आपको पता नहीं होता कि इसका अंत कहां है। असल में कोई नहीं जानता कि इसका अंत कहां होता है। ऐसा लगता है कि यह प्रकाशपुंज, किसी भी चीज से रुके बिना, चला जा रहा है। यह प्रकाशपुंज काशी का प्रतीक है, क्योंकि काशी एक मशीन, एक यंत्र, और आपके पास ब्रह्माण्ड को लाने के लिए एक ब्रह्माण्डीय प्रभाव है।

ब्रह्माण्ड की यात्रा

चूंकि, सौभाग्य से, इस ब्रह्माण्ड का हर छोटे से छोटा अंश - एक परमाणु से लेकर, एक अमीबा तक, एक-कोशिकीय जीव तक, संसार में हर दूसरी चीज तक, और अधिक विराट ब्रह्माण्ड तक, सभी एक ही संरचना के बने हैं। काशी एक प्रभाव है जो सूक्ष्म-ब्रह्माण्ड और विराट-ब्रह्माण्ड का, सीमित और असीमित का, भौतिक अभिव्यक्तियों और अस्तित्व के सीमाहीन आयाम का मिलन कराता है। ऐसा नहीं है कि हमको मिलन कराना है, ब्रह्माण्ड पहले से ही मिलन में है। अपने जीवन-संरक्षण के तरीकों से ऊपर उठकर हमें अपने रुख को बदलना होगा और अस्तित्व को देखना होगा। इसके लिए, हमें साधन और विधियां चाहिए।

अगर आपको ब्रह्माण्ड की प्रकृति का बोध हो जाता है तो अचानक जिस तरह से आप काम करते हैं, आप जिस अस्तित्व में रहते हैं उससे आप जिस तरह से संबंध जोड़ते हैं, वह बिलकुल अलग होगा। इसे करने के लिए क्या आपको काशी में होना होगा? नहीं, जरूरी नहीं है। यह ऐसे है कि आप कहीं भी अच्छा स्वास्थ्य हासिल कर सकते हैं, लेकिन बहुत से लोग बीमार होने पर अस्पताल चले जाते हैं, क्योंकि वह एक आम जगह है जहां विशेष उपकरण, सुविधाएं, दवाएं, और विशेषज्ञ उपलब्ध होते हैं। काशी उस तरह की जगह है जहा संपूर्ण पद्धतियां - ज्ञान, प्रणालियां, विधियां, क्षमताएं - और एक समय पर हर किस्म के विशेषज्ञ रहते थे।

गुप्त ऊर्जा संरचना

...कथाएं बताती है कि काशी शिव के त्रिशूल पर बसी है, जमीन पर नहीं।

मानव जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज है अपने शरीर की सीमाओं को जानना। कल आप पैदा हुए; कल आप दफना दिए जाएंगे - जीने के लिए सिर्फ आज है। अस्तित्व की यही प्रकृति है। और मृत्यु आने से पहले, जीवन को खिलने की जरूरत है। तो देशभर में, हमने हर संभव प्रणालियां स्थापित कीं, जिन्हें हम इस उद्देश्य के लिए उपयोग कर सकते हैं। इस तरह की कई प्रणालियां हैं - उनमें से अधिकतर दुर्भाग्य से टूट चुकी हैं, उसमें यह भी शामिल है, जो काफी अस्तव्यस्त हो गई है, लेकिन इसका ऊर्जा वाला हिस्सा अब भी काफी जीवंत है। क्योंकि हमेशा, जब हम ऐसी प्रकृति वाले स्थान को प्रतिष्ठित करते हैं, ध्यानलिंग को भी, तो वहां भौतिक संरचना सिर्फ एक आधार की तरह होती है। आम तौर पर, कथाएं बताती है कि काशी शिव के त्रिशूल पर बसी है, जमीन पर नहीं।

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मैं अपने अनुभव में यह देखता हूं कि काशी की असली संरचना जमीन से लगभग 33 फुट ऊपर है। अगर हममें कोई समझ होती, तो हमें 33 फुट से ज्यादा ऊंची कोई चीज नहीं बनानी चाहिए थी। लेकिन हमने बनाई हैं, क्योंकि दुनिया में समझ हमेशा से बहुत दुर्लभ चीज रही है। और, ज्यामितीय गणनाओं के अनुसार, ऊर्जा संरचना 7200 फुट तक हो सकती है। इसीलिए इसे ‘प्रकाश-स्तंभ’ कहा जाता है। क्योंकि जिनके पास देखने की दृष्टि थी, उन्होंने देखा कि यह एक बहुत ऊंची संरचना है। और यह यहीं नहीं रुका - इसने आपको परे तक की पहुंच प्रदान की। मकसद एक ऐसी चीज को हासिल करना है जो कोई व्यक्ति अपने अंदर हासिल कर सकता है, एक ऐसी संगठित प्रणाली के जरिए जो अनेकों लोगों के हजारों सालों के ज्ञान के सार से आती है। अगर आपको अपने आप चीजों का बोध करना है, तो यह पहिए का पुनः अविष्कार करने जैसा है - अनावश्यक रूप से एक संपूर्ण कष्टपूर्ण प्रक्रियाओं से गुजरना है। लेकिन, अगर आपको दूसरों के ज्ञान से बोध प्राप्त करना है, तब आपमें विनम्रता होनी चाहिए।

अनेकों लोगों के ज्ञान को और समृद्ध करना

शिव यहां इसलिए आना चाहते थे क्योंकि यह बहुत सुंदर नगरी थी। उनके आने से पहले ही यह एक अद्भुत नगरी थी।

यह व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि बहुत से लोग लाए जा सकें। लोगों ने आकर हर तरह विधियां और प्रणालियां स्थापित कीं। एक समय में, 26,000 से ज्यादा पवित्र-स्थल थे - उनमें से प्रत्येक का अपनी ही तरीका था कि एक व्यक्ति कैसे मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इन 26,000 स्थलों में छोटे स्थल भी बन गए; मंदिर के कई हिस्से अपने आप में छोटे मंदिर बन गए, तो मंदिरों की संख्या 72,000 तक पहुंच गई। इस समय काशी नाम की प्रणाली अपनी पूरी गरिमा में थी। और, यह रातों-रात नहीं हुआ। कोई नहीं जानता कि मौलिक संरचना किस समय के दौरान हुई थी। कहा जाता है कि सुनिरा भी, जिनका समय 40,000 साल पहले का माना जाता है, किसी चीज को खोजते हुए यहां आए। सुनिरा को 40,000 साल पहले का माना जाता है। उस समय भी यह एक फलती-फूलती नगरी थी।

मार्क ट्वेन ने इसे सही संदर्भ में रखकर कहा है, ‘यह दंतकथाओं से भी पुरानी है।’ प्राचीनता के मामले में कोई नहीं जानता कि यह कितनी पुरानी है। शिव यहां इसलिए आना चाहते थे क्योंकि यह बहुत सुंदर नगरी थी। उनके आने से पहले ही यह एक अद्भुत नगरी थी। बस लगभग दो साल पहले लोगों ने मंदिरों की तीन परतों को खोजा है, जो सभी एक लंबे समय के लिए बंद हो गए थे। इसका मतलब है कि यह नगरी समय के साथ धंसती गई, और बार-बार इसे उसी के ऊपर पुनः बनाया गया। इस नगरी की तीन से पांच परत हैं क्योंकि समय के साथ, धरती स्वयं का पुनर्चक्रण करती है।

समय के साथ विध्वंस

जब तक वे मुक्ति खोज रहे थे, और इसके प्रति ईमानदार थे, तो वे जो चाहे कर सकते थे। मुक्ति को इतना ही महत्वपूर्ण माना गया था - आपको इसी जीवनकाल में प्राप्त कर लेनी चाहिए।

काशी का छह, सात सदियों तक लगातार विध्वंस किया गया; उसके बावजूद, अगर आप थोड़े संवेदनशील हैं, तो यह अब भी एक अद्भुत स्थान है। क्या हम इसे अपनी पूरी गरिमा में वापस ला सकते हैं? मुझे नहीं लगता। एक चीज यह है कि बहुत अधिक अस्तव्यस्तता हो गई है; दूसरी चीज है - ऐसी चीज को फिर से बनाना एक मूर्ख का प्रयास होगा। इसे अनेकों-अनेकों बार विध्वंस किया गया है, लेकिन काशी का ऊर्जा-शरीर जमीन से 33 फुट ऊपर है, तो यह अब भी जीवंत है। नुकसान काफी हुआ है, लेकिन फिर भी यह एक जबरदस्त स्थान है। इसे देखने का एक तरीका है कि यह 72,000 कमरों वाला घर है। 3000 से अधिक ऊर्जा रूप में जीवंत हैं।

जीवन के हर आयाम के लिए, मनुष्य के हर गुण के लिए, उन्होंने एक लिंग बनाया। इसी तरह ये मंदिर अस्तित्व में आए; हर पहलू के लिए एक लिंग मौजूद है। कुछ चरम सीमा के हैं, कुछ सामाजिक रूप से काफी स्वीकार्य हैं, और कुछ सामाजिक स्वीकार्यता से पूरी तरह से परे हैं - हर तरह की चीजें साथ-साथ मौजूद थीं। किसी ने किसी चीज के साथ कोई दोष नहीं निकाला। हर कोई वो कर सकता था जो वे चाहते थे, जब तक कि वे मुक्ति को चाह रहे हों। जब तक वे मुक्ति खोज रहे थे, और इसके प्रति ईमानदार थे, तो वे जो चाहे कर सकते थे। मुक्ति को इतना ही महत्वपूर्ण माना गया था - आपको इसी जीवनकाल में प्राप्त कर लेनी चाहिए। .

सभी का एक ही लक्ष्यः मुक्ति

मुक्ति का अर्थ है आजादी; आजादी का मतलब है, असल में, स्वयं से आजाद हो जाना - क्योंकि अपने जीवन में सिर्फ आप खुद सिरदर्द हैं।

मुक्ति खोजने की पूरी प्रक्रिया इस विचार से आती हैः आप उसे हटाना चाहते हैं जिसे कर्म कहते हैं - याद्दाश्त और कल्पना का एक बादल, जो जारी है और आपको तमामों चीजों पर विश्वास करने लेने का धोखा दे रहा है, जो सच नहीं हैं। जब आप यहां बैठते हैं, तो आपके पास सिर्फ एक ही चीज है जीवन; बाकी सब आपकी कल्पना है। मुक्ति का मतलब बस यही हैः इस भ्रम को हट जाना होगा। आप भ्रम से नहीं लड़ सकते - आपको भ्रम के स्रोत को ढूंढ़ निकालना होगा। मुक्ति का अर्थ है आजादी; आजादी का मतलब है, असल में, स्वयं से आजाद हो जाना - क्योंकि अपने जीवन में सिर्फ आप खुद ही सिरदर्द हैं।