ज्ञान योग : अध्‍यात्‍म का एक अनूठा पहलू
योग के चार मुख्य मार्ग हैं - भक्ति, ज्ञान, क्रिया और कर्म। इनमें से ज्ञान को गहरे चिंतन के साथ जोड़कर देखा जाता है। क्या चिंतन करके आप ज्ञान योग के के पथ पर चल सकते हैं?
 
ज्ञान योग : अध्‍यात्‍म का एक अनूठा पहलू
 

योग या परम प्रकृति को जानने के चार मुख्य मार्ग हैं - भक्ति, ज्ञान, क्रिया और कर्म। इनमें से ज्ञान को गहरे चिंतन के साथ जोड़कर देखा जाता है। क्या तर्क करने की क्षमता और दर्शन शास्त्रों की व्याख्या करने से ज्ञान योग के पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है? मन और बुद्धि के स्तर पर कैसा होता है ज्ञान योगी?

सद्‌गुरुज्ञान का मतलब दार्शनिक चिंतन नहीं है, ज्ञान का मतलब ‘जानना’ है। दुर्भाग्य से, आजकल ज्यादातर दर्शन को ज्ञान योग के रूप में पेश किया जाता है। दरअसल आपको अगर ज्ञान हासिल करना है,

जो लोग ज्ञान के मार्ग पर चलते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जिनकी बुद्धि उन्हें किसी चीज पर विश्वास नहीं करने देती, न ही वे किसी चीज पर अविश्वास करते हैं।
तो आपको बहुत ही सजग और तीक्ष्ण बुद्धि की जरूरत होती है। आपको हर दिन और हर पल धीरे-धीरे अपनी बुद्धि को पैना करते हुए उस सीमा तक ले जाना चाहिए, जहां वह चाकू की धार की तरह पैनी हो जाए। उससे कोई चीज बच नहीं सके। वह किसी भी चीज से होकर गुजर सके, मगर कोई चीज उससे चिपके नहीं, वह आसपास होने वाली किसी भी चीज से प्रभावित नहीं हो। यही ज्ञान है।

ज्ञान योगा : कभी कोई निष्कर्ष नहीं बनाता

अगर आप अपनी बुद्धि को इसी तरह रख सकते हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से जीवन की प्रक्रिया को भेद सकती है और आपको सच और झूठ, असली और नकली का फर्क दिखा सकती है। मगर आजकल लोग कूदकर सीधे निष्कर्षों पर पहुंच जाते हैं। वे दर्शन बना लेते हैं। लोग खुले तौर पर कहते हैं, ‘सब कुछ माया है। यह सब भ्रम है। तो किस बात की चिंता?’ दरअसल वे सिर्फ खुद को तसल्ली देने की कोशिश करते हैं। मगर जब सचमुच माया उन पर हावी हो जाती है, तो उनका सारा दर्शन हवा हो जाता है।

ज्ञान योग : विश्वास और अविश्वास दोनों से परे

दुनिया की मायावी प्रकृति के बारे में बात करना, या सृष्टि और स्रष्टा के बारे में बात करना, या दुनिया को ऐसा या वैसा मान लेना ज्ञान नहीं है। ज्ञान योगी किसी चीज पर विश्वास नहीं करते, न ही किसी चीज से अपनी पहचान जोड़ते हैं। वे जैसे ही ऐसा करते हैं, बुद्धि का पैनापन और उसका प्रभाव खत्म हो जाता है। बदकिस्मती से आजकल ज्ञान के नाम पर लोग बहुत सारी चीजों पर विश्वास करने लगते हैं - ‘मैं आत्मा हूं, मैं परमात्मा हूं।’ उन्हें लगता है कि सब कुछ वे किताबों में पढ़ कर जान सकते हैं, जैसे ब्रह्मांड की सारी व्यवस्था कैसी है, आत्मा का रूप और आकार क्या है, उसके परे किस तरह जाना है? यह ज्ञान योग नहीं है, क्योंकि आप बस किसी चीज पर विश्वास कर रहे हैं। जो लोग ज्ञान के मार्ग पर चलते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जिनकी बुद्धि उन्हें किसी चीज पर विश्वास नहीं करने देती, न ही वे किसी चीज पर अविश्वास करते हैं। ‘जो मैं जानता हूं, वह जानता हूं। जो मैं नहीं जानता, वह नहीं जानता।’ यह ज्ञान है।

 
 
 
 
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