सद्‌गुरु: कुछ साल पहले, जब मैं विश्व आर्थिक मंच में गया था, उस समय आर्थिक मंदी के कारण लोग गहरे डिप्रेशन में थे। उन्होंने मुझे बोलने के लिये विषय दिया :"मंदी और डिप्रेशन"। मैंने कहा, "मंदी ही अपने आप में बहुत खराब बात है, उसके ऊपर आपको डिप्रेस होने का काम तो करना ही नहीं चाहिये"। बात ये है कि हमने अपनी आर्थिक व्यवस्था का ढाँचा कुछ ऐसा बना रखा है और अपने आर्थिक इंजिन को हम कुछ इस तरह चला रहे हैं कि अगर हम सफल नहीं होते तो डिप्रेस हो जाते हैं और अगर सफल हो जाते हैं तो भी परेशान ही रहते हैं। तो मैंने कहा, "मैं चाहूँगा कि आप डिप्रेस ही रहें"।

...’कारोबार हमेशा चलते रहना चाहिये' वाले स्टाइल में ही अगर हम हमेशा चलते रहे तो अगले 20 से 30 सालों में एक भारी संकट आने वाला है।

'लिविंग प्लेनेट’ रिपोर्ट कहती है, "अगर धरती के सभी 700 करोड़ लोग, एक औसत अमेरिकन व्यक्ति की तरह जीने लगते हैं तो हमें 4.5 धरतियों की ज़रूरत पड़ेगी"। पर हमारे पास सिर्फ एक ही है। हमने दुनिया को ठीक करने की कोशिशों में बहुत सारा समय गँवा दिया है। सामान्यता किसी चीज़ को ठीक करने का मतलब है उसे सुधारना। पर हमने इसे इस हद तक विनाशकारी ढंग से किया है कि ’कारोबार हमेशा चलते रहना चाहिये' वाले स्टाइल में ही अगर हम हमेशा चलते रहे तो अगले 20 से 30 सालों में एक भारी संकट आने वाला है।

कम से कम ये तो हुआ है कि इस वायरस ने हमें थोड़ा ठहरा दिया है। तो अपने आर्थिक इंजिन को ठीक करने का यह एक मौका है। जब आर्थिक इंजिन चल रहा हो, काम कर रहा हो तब हम उसे ठीक नहीं कर सकते। पर ये एक अच्छा समय है कि हम इसे ठीक करें और ये सोचना शुरू करें कि हम इस दुनिया को कैसे किसी दूसरे ढंग से चला सकते हैं? 

जागरूकता के साथ उपभोग करना

अभी तो वस्तुएँ बनाने का काम लगातार बढ़ता जा रहा है। पर ये किस हद तक बढ़ रहा है? निश्चित रूप से हमें इस बात पर गौर करना चाहिये कि विकास और समृद्धि क्या है? समृद्धि का मतलब बस ये नहीं है कि हमारे पास सब कुछ ज्यादा, और ज्यादा हो। हमारे पास रहने के लिये सिर्फ एक धरती है। हम, बिना रुके, बस ज्यादा, और ज्यादा हासिल करने के पीछे नहीं पड़ सकते। हमारे समाजों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि हमारे पास जो है, जितना है, बस उसी में हम सब के लिये खुशहाली कैसे लायें?

उदाहरण के लिये, भारत जैसे देश में जितने लोग स्मार्टफोन खरीदते हैं, उनमें से 40% उसका उपयोग बस एक साल ही करते हैं। भारत में 50 करोड़ से भी ज्यादा ऐसे स्मार्टफोन हैं, जिनका उपयोग हो ही नहीं रहा। लोगों के घरों में ये कहीं पर भी पड़े रहते हैं क्योंकि लोग नये-नये मॉडल खरीदते रहते हैं।

जब मौसमों में बदलाव का मामला बेकाबू हो जायेगा तो हमारी हालत ऐसी होगी जो इस वायरस से आये खतरे से कहीं ज्यादा भयानक होगी।

हमने ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया कि अगर आप एक फोन खरीदते हैं तो आपको इसे एक निश्चित समय तक इस्तेमाल करना ही होगा, या अगर ये खराब हो जाये तो उसे वापस करना होगा। ऐसे ही, अगर आप एक कार खरीदते हैं तो आपको इसे अमुक किमी तक चलाना होगा। हमें ऐसे ही नियंत्रण स्टील या एल्युमिनियम जैसे कच्चे माल के उत्पादन पर भी लागू करने होंगे, जिससे राष्ट्र इसके उत्पादन को अगले 25 साल तक बढ़ा न सकें। विकासशील देशों को थोड़ी छूट दी जा सकती है पर वे भी जब एक खास स्तर तक पहुँच जायें तो उन्हें भी वहीं रुकना चाहिये। अगर ऐसा नहीं होता तो हम गैर जिम्मेदाराना ढंग से चीजों का उपभोग करते रहेंगे।

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एक समय था जब हरेक के 6 से 8 बच्चे होते थे। अब हर कोई 1 या 2 पर आ गया है। बहुत से लोग तो एक भी नहीं चाहते। हम जब बच्चों के मामले में ऐसा कर सकते हैं तो फिर फोन या कार या बाकी चीज़ों के लिये ऐसा क्यों नहीं कर सकते? अगर ये काम हम अभी नहीं करते तो हम बस 25-30 साल और चल पायेंगे और फिर ऐसी खराब हालत में होंगे जो इस वायरस से आये खतरे से भी ज्यादा भयानक होगी। जब मौसमों में बदलाव का मामला बेकाबू हो जायेगा तो हमारी हालत ऐसी होगी जो इस वायरस से आये खतरे से कहीं ज्यादा भयानक होगी।

यह सुन कर ज़रूर ही लोग कहेंगे, "सद्गुरु, आप ज़ख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं, हमारा अपमान कर रहे हैं। हम यह पता नहीं लगा पा रहे कि हमारे उद्योगों को कैसे संभालें? हम ये भी नहीं जान पा रहे कि लोगों को रोज़गार कैसे दें? और आप कह रहे हैं कि हम उत्पादन को कम कर दें"! मगर, आपको ये मैं नहीं बता रहा, प्रकृति समझा रही है। बेहतर तो यही होगा कि आप ये संदेश सुन लें और उसके हिसाब से चलें। 

शिक्षा का क्रमिक विकास

मानव समाज के लिये आज के स्कूल और शिक्षा पद्धति अपने आप में गंभीर दोष हैं। इन दोषों के कारण बहुत सारी समस्यायें खड़ी हो गयीं हैं। अभी किंडरगार्टन की कक्षा से ही बच्चों को बस एक बात सिखायी जाती है, "तुम्हें पहले नम्बर पर रहना है"! ये एक विनाशकारी प्रक्रिया है क्योंकि पहले नम्बर पर बस एक ही हो सकता है - आप। इसका मतलब ये है कि आप जबर्दस्त ढंग से महत्वाकांक्षी हो जाते हैं, सिर्फ नम्बर एक पर रहने की धुन में ही रहते हैं। दुर्भाग्य से ये विनाशकारी प्रक्रिया हर जगह चल रही है। मूल रूप से ये स्कूल में बनायी जाती है और फिर दुनिया भर में, बहुत बड़े स्तर पर यही चीज़ देखने को मिलती है।  

सभी को शिक्षा देने का ये कार्यक्रम लगभग दो सौ साल पहले पश्चिम में शुरू हुआ जिससे तब चल रहे औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिल सके। उन्होंने शिक्षा का ऐसा सिस्टम बनाया जो सब के लिये एक समान था। हर व्यक्ति की अलग अलग तरह की समझ और प्रतिभा की बात को उन्होंने कोई महत्व नहीं दिया, और शिक्षा को एक ऐसी मशीन की तरह बनाया जो सभी को एक ऐसे उत्पाद की तरह बाहर निकाले जो बस आर्थिक प्रक्रिया में या आर्थिक इंजिन में सही बैठे। 

 

जब मैं स्कूल में था तो मुझे ये समझ में नहीं आता था कि क्यों सभी एक कमरे में आ कर बैठते हैं और एक आदमी को सुनते हैं जो किसी किताब से कुछ पढ़ रहा होता है। इसीलिये, मैं शायद ही कभी वहाँ जाता था। मुझे ये कभी भी अच्छा नहीं लगा और न ही समझ में आया। तो मैं बाहर बगीचे में बैठा रहता। हमने लोगों को शिक्षित करने के लिये कितने ही लाखों वर्गफीट की इमारतें बना रखीं हैं! एक समय हमको लगता था कि ये ज़रूरी है क्योंकि हम हर किसी चीज़ का बड़ी मात्रा में उत्पादन करने में लगे थे, फिर चाहे वो उद्योगों में हो या शिक्षा में। पर आज ज्ञान और जानकारी हर जगह मिल रहे हैं। अब, जिस चीज़ की आपको जरूरत है वो ये है कि कोई मनुष्यों को इस बात के लिये प्रेरित करे कि वे उस चीज़ को हासिल करने के लिये कोशिश करें जो उनके जीवन के लिये महत्वपूर्ण है।

शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी पा लेना नहीं है बल्कि मनुष्य को उन्नत बनाना है।

शिक्षा का मतलब हमारे दिमागों में बस ढेर सारी जानकारियाँ डाल देना नहीं होना चाहिये पर ये होना चाहिये कि मनुष्य का पूरा विकास हो। अभी न तो मनुष्य का विकास हो रहा है न ही उसके नज़रिये या उसकी समझ को बड़ा किया जा रहा है। ज्यादातर शिक्षा बस जानकारी इकट्ठा करने, परीक्षा पास करने और कोई नौकरी पा लेने के लिये ही है। कुछ दशक पहले बहुत से देशों का आर्थिक स्तर ऐसा था कि शिक्षा का मूल उद्देश्य नौकरी पाना ही था, पर अब तो आर्थिक समृद्धि आ गयी है तो ये नज़रिया बदलना चाहिये। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी पा लेना नहीं है बल्कि मनुष्य को उन्नत बनाना है।  

एक 10% ज्यादा जागरूक दुनिया

आजकल हम लोग जिस तरह से जी रहे हैं, उसको ज़रा समझिये : हर दिन, लगभग 8000 बच्चे कुपोषण की वजह से मर रहे हैं। दुनिया भर में जो 80 करोड़ लोग हर रोज़ भूखे पेट सोते हैं, उनको खिलाने के लिये हमें हर महीने 97 से 98 करोड़ डॉलर की ज़रूरत होगी। और, ये वो रकम है जो एक महीने में सारी दुनिया सिर्फ वीडियो गेम खेलने में खर्च कर देती है। सारी दुनिया जितना पैसा भोजन पर खर्च करती है लगभग उतना ही शराब, तमाखू और नशीले पदार्थों का खर्चा है। दुनिया में लोग भोजन की कमी से भूखे नहीं है वे इस वजह से भूखे हैं क्योंकि हमारे दिमाग विकृत हो गये हैं और हम गैर जरूरी चीजें कर रहे हैं। 

हम अभी जितनी जागरूकता के साथ काम कर रहे हैं, अगर उससे केवल 10% भी ज्यादा जागरूक हो कर काम करें तो कोविड-19 के बाद ये एक अद्भुत दुनिया होगी।

आज संसाधनों के मामले में हम जितने समृद्ध हैं, उतने पहले कभी नहीं थे। आज हमारे पास इतनी तकनीक है जितनी पहले कभी नहीं थी। काबिलियत, विज्ञान और ज्ञान के मामले में भी हम पहले के मुक़ाबले ज्यादा समृद्ध हैं। धरती पर किसी भी समस्या का निदान पाने के लिये आज हमारे पास ज़रूरी तकनीकें, संसाधन और काबिलियत है। मानवता के इतिहास में हम आज जितने काबिल हैं, उतने पहले कभी नहीं थे। सिर्फ एक ही बात की कमी है और वो है मानवीय चेतना। ज़रूरी ये है कि हम जागरूक मानवता को निर्मित करें। हम जितनी जागरूकता के साथ अभी काम कर रहे हैं, अगर उससे केवल 10% भी ज्यादा जागरूक हो कर काम करें तो कोविड-19 के बाद ये एक अद्भुत दुनिया होगी। और आज हमारी पीढ़ी के पास ये सम्भावना है-क्या हम ऐसा नहीं करेंगे?