कोविड -19 का रहस्य - एक दिव्यदर्शी की नज़र से

'हेलो!' पत्रिका के मई 2020 अंक के मुख्य लेख में सद्‌गुरु का एक इंटरव्यू छपा है जो हाल में चल रही कोरोना महामारी के बारे में उनके नज़रिये को समझाता है, और हमसे आग्रह करता है कि हम सोचें कि लगातार आ रही चुनौतियों का सामना करने के लिये हमें अपने जीवन और समाज को कैसे तैयार करना चाहिए।
कोविड -19  का रहस्य  -  एक दिव्यदर्शी की नज़र से
 

1. गुरुजी, आध्यात्मिक नज़रिये से, क्या आपको ऐसा लगता है कि इस महामारी ने मनुष्यों और उनके इकोसिस्टम को, अकेले रहने और दूसरों के साथ रहने के नये तरीकों को खोजना सिखाया है?

सद्‌गुरु: अभी तो जानवर एक दूसरे से ये कह रहे हैं, "आओ, हम सब इस धरती को फिर से बढ़िया बनायें"। मुंबई के रास्तों पर मोर नाच रहे हैं। पंजाब से, पिछले 20 सालों में, पहली बार हिमालय की बर्फीली चोटियाँ दिख रहीं हैं क्योंकि धुंए वाला कोहरा छट गया है। बहुत लंबे समय से हम इस धरती को दूषित करते चले आ रहे हैं, और धीरे-धीरे हमने इसमें से जीवन को निकाल बाहर किया है। धरती का हर जीव इस मनुष्य रूपी वायरस से घबराया हुआ है।

मनुष्यों को हर साल, तीन सप्ताह के लिये, सब कुछ बंद कर के बैठना चाहिये - दूषित करने वाली तकनीकों से छुट्टी लेनी चाहिये - सब मशीनें बंद कर देनी चाहियें। इस छुट्टी का उपयोग उन्हें अपने अंदर की ओर मुड़ने के लिये करना चाहिये। अगर हर कोई इस समय का उपयोग अपने आपको शारीरिक और मानसिक रूप से और ऊर्जा के हिसाब से भी उन्नत करने में लगाये, तो हम सब एक अद्भुत दुनिया में रह पायेंगे।

इस विषाणु ने लोगों के दिलो - दिमाग में यह बात धीरे धीरे साफ कर दी है कि हम अमर नहीं हैं। जब आप ये समझ लेते हैं कि आप भी कभी मरेंगे, तो आप सहज रूप से ही अपने जीवन को सही कर लेंगे। मैं लोगों की जीवन शैली पर कोई टिप्पणी करना नहीं चाहता पर कई बार ये मुझे आश्चर्यचकित कर देती है। मैं एक बार अमेरिका में एक मॉल में था और मैंने वहाँ नाक के बालों को छोटा करने वाले बीस तरह के औजार देखे। तो, अब समय है, जब हम अपने जीवन को ठीक करें और देखें कि क्या हम थोड़े कम के साथ जी सकते हैं? अगर आप कानून बनाते हैं तो तो ये बदसूरत हो सकता है पर अगर लोग इसे जागरूकता के साथ, खुद ही कर लें तो ये अद्भुत होगा।

 2. अगर आपको कुछ लाईनें लिखनी हों कि कैसे ये वायरस हमें स्वयं को फिर से खोजने के लिये कह रहा है- हमारी मानसिकता से ले कर हमारी वास्तविकता को फिर से नये ढंग से बनाने तक- तो ये वायरस किस तरह से अपनी बात कहेगा ?

सद्गुरु:वास्तव में, वायरस तो यही चाहेगा कि आप कुछ भी नया न सीखें। वो नहीं चाहेगा कि आप उसे मारने वाली कोई दवाई बनायें। शायद यह वायरस अब तक दूसरे जानवरों में रह रहा था पर उसकी रिहाईश कम हो गयी (क्योंकि हमने जानवरों को मार मार कर कम कर दिया)। तो उसने हमारी तरफ आने का तय किया क्योंकि हम लोग बहुत ज़्यादा हैं। उसका उद्देश्य आपको मारना नहीं है पर रहने के लिये एक नया घर खोजना है। बात बस ये है कि वो इतने ज़हरीले ढंग से रहता है कि हम उसे सहन नहीं कर पाते और ढेर हो जाते हैं। पर, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि कुछ ही दिनों में यह वायरस अपने आपको एक नये, कमज़ोर रूप में बदल लेगा जिससे ये हमारे शरीरों में आराम से रह सके।

तो इस वायरस को आपको कुछ भी सिखाने में कोई रुचि नहीं है पर ये परिस्थिति लोगों को इस बारे में जागरूक कर रही है कि वे यहाँ थोड़े समय के लिये ही हैं। जिस मिट्टी पर आप चलते हैं, वो भी आपके लिये एक कीमती शरीर है। अगर अपने जीवन के हर पल में हम इस बात को समझ लें तो हम इस धरती पर ज्यादा कोमलता के साथ चलेंगे।

3. हमारे भारतीय समाज में,  संकट के समय में, हम, कैसे भी हो, पर एकजुट हो जाते हैं - युवा पीढ़ी के लोग बाहर जा कर किराने का सामान लाने के लिये लाईन में लग जाते हैं और अपने बढ़े हुए परिवारों के दूसरे लोगों का भी खयाल रखते हैं। पश्चिम में, जहाँ अकेलापन ज्यादा है, यह देखा गया है कि बुजुर्गों का ध्यान रखने वाली व्यवस्थायें ज्यादा नहीं हैं। मेरे एक डिप्लोमैट मित्र ने बताया कि वहाँ पर बूढ़े लोग, जो अकेले रहते हैं, इस तरह की महामारी के लिये अपने आप को तैयार नहीं कर सके। तो क्या आप को लगता है कि अब पश्चिम को यह समझ में आयेगा कि  लोगों की अकेले रहने की आदत कुछ स्तरों पर और कुछ परिस्थितियों में सही नहीं बैठती ?

सदगुरु : अब आप ये कल्पना मत कीजिये कि सभी युवा भारतीय लड़के या लड़कियाँ आपके लिये किराना आदि चीजें लाने के लिये तैयार हो जायेंगे। जो यह कर रहे हैं वो इसलिये क्योंकि उनकी आर्थिक मजबूरियाँ हैं। दो या तीन पीढ़ी पहले, एक परिवार का मतलब था पति -पत्नी, बच्चे, भाई -भाभी, उनके बच्चे, बहनें, चाचा - चाची, माता -पिता, दादा -दादी, और भी लोग - एक परिवार में तीन -चार सौ लोग हो सकते थे। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू था - परिवार की आर्थिक एकता। परिवार का मुखिया पूरी आर्थिक व्यवस्था पर नियंत्रण रखता था, तो सब लोग साथ साथ रहते थे, नहीं तो वे बेसहारा, असहाय हो जाते।

आजकल हर कोई बाहर जा सकता है, घर पर बैठे बैठे भी काम कर सकता है और पैसे कमा सकता है। अब कोई पैसे के लिये एक दूसरे पर निर्भर नहीं है। अब ये बात सिर्फ पश्चिम में ही नहीं है। भारत में भी, जैसे जैसे ज्यादा आर्थिक खुशहाली आ रही है, लोग अकेले रहना ज्यादा पसंद करेंगे क्योंकि वे किसी को सहन नहीं कर सकते। अब परिवार का मतलब है बस पति, पत्नी और बच्चे। अगर माता पिता बहुत बीमार हैं तो वे कभी कभी आप के साथ रह सकते हैं। पश्चिम में तो शायद ये बात और आगे चली गयी है - वहाँ अब परिवार का मतलब है, बस एक व्यक्ति - पुरुष या स्त्री और एक बच्चा। एक खास उम्र के बाद, लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। सामुदायिक घरों में रहने वाले लोगों को भी मेडिकल देखभाल मिल सकती है पर समावेशी वातावरण कहीं नहीं है।

अब हमें गंभीरता से स्वीकार कर लेना चाहिये कि मनुष्यों के परिवार और समाज अभी भी ज़रूरत के हिसाब से ही चलते हैं। अगर कोई ज़रूरत नहीं है तो ये बिखर जायेंगे। इसीलिये, एक जागरूक समाज बनाना बहुत ज़रूरी है, जहाँ हर कोई अपनी इच्छा और समावेशी भावना के कारण साथ साथ हो। बहुत से परिवारों में ऐसा है पर दुर्भाग्यवश, कई सारे परिवारों में, अब ऐसी बात नहीं रह गयी है।

4. इस महामारी के बारे में आपको कौन सी सबसे ज्यादा शक्तिशाली बात पता चली है ? चूंकि आपकी जीवन कथा वाली एक किताब कहती है कि आप महादेव के साथ सीधे संपर्क में हैं, तो उन्होंने इस घटना के बारे में और हमारे इतिहास में इसके असर के बारे में क्या बताया है ?

सदगुरु: वह किताब एक जीवन कथा है, कोई आत्मकथा नहीं है। तो, दोष मुझे मत दीजिये ! आप जिन्हें शिव कहते हैं, उनके लिये, उनकी प्रकृति के हिसाब से विषाणु सही है। उन्हें विषाणु के साथ कोई समस्या नहीं है। जब तक विषाणु ताकत के साथ नाच रहा है(अपना काम कर रहा है), वे कहेंगे, "मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है" ! आपको ये समझना होगा कि ये विषाणु भी जीवन है और अभी इसने अपने आप को बहुत होशियारी के साथ काम में लगाया हुआ है। उसने, पहले ही, अपने आपको, दस अलग अलग रूपों में बाँट लिया है। आप अगर कोई टीका बना भी लेंगे, तो भी, ये उनमें से एक को ही मार पायेगा। तो जब ये इतना होशियार है तो मुझे लगता है कि शिव उसे आशिर्वाद ही देंगे। वे पशुपति हैं -  हर प्रकार के जीवन के मालिक ! सिर्फ इसलिये कि विषाणु छोटा है और आप बड़े हैं, वे आप में और विषाणु में कोई भेद नहीं करेंगे। यह ठीक नहीं होगा। तो बेहतर ये होगा कि आप अपने दिमाग को सही करें, अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभायें और विषाणु को हरायें। इस समय में आपको सामाजिक दूरी बनाये रखनी चाहिये, जैसे शिव रखते हैं। अगर हर कोई अकेला बैठे और 15 दिन तक ध्यान करे तो ये विषाणु चला जायेगा। हमें किसी सरकार द्वारा लगाये हुए लॉकडाउन की ज़रूरत नहीं है। बस, जिम्मेदार एकांत की ज़रूरत है।

Editor’s Note:सद्‌गुरु के कुछ हेल्थ टिप्स, इस चुनौती भरे समय का सामना करने के लिये https://isha.sadhguru.org/in/hi/wisdom/article/sadhguru-ke-health-tips

 
 
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