बचपन एक ऐसा दौर है जिसको हम बड़े प्यार से पीछे मुड़ कर देखा करते हैं। वो ऐसा वक्त होता है जब जिंदगी छोटी-छोटी खुशियों से भरी और जिम्मेदारियों से खाली होती है। मगर जरा गहराई से सोच कर देखिए कि क्या बच्चे सचमुच आजाद हैं? या वो अपने परिवार के बड़े-बूढ़ों की थोपी हुई आशाओं और उम्मीदों के बोझ से लदे हुए हैं? क्या हमारे पास बच्चों को सिखाने के लिए वाकई में कुछ है या हमें ही उनसे बहुत-कुछ सीखना है? आइए देखते हैं मां-बाप और बच्चों के रिश्तों पर सद्गुरु का क्‍या कहना है।

अगर मां-बाप को सचमुच अपने बच्चों की चिंता है तो उन्हें बच्चों को इस तरह पालना-पोसना चाहिए कि उनको कभी मां-बाप की जरूरत ना पड़े। प्रेम की प्रक्रिया हमेशा आजाद करने वाली होनी चाहिए, बंधनो मे उलझाने वाली नहीं। इसलिए जब आपको बच्चे हों तो उनको आसपास की चीजों पर गौर करने दीजिए, प्रकृति और अपने-आप के साथ वक्त बिताने दीजिए। प्यार और प्रोत्साहन का माहौल बनाइए। उनके शरीर और बुद्धि का विकास होने दीजिए। उनको एक मनुष्य के तौर पर जिंदगी को अपने ढंग से देखने दीजिए। परिवार, धन-दौलत या किसी और चीज के साथ अपनी  पहचान बनाए बिना वे सिर्फ एक इंसान के तौर पर चीजों को देखें। उनकी अपनी खुशहाली और दुनिया की भलाई के लिए जरूरी है कि जिंदगी को एक मनुष्य के रूप में देखने-समझने में आप उनकी मदद करें। आपका घर एक ऐसा स्थान नहीं होना चाहिए जहां आप अपनी संस्कृति, अपने विचार और अपने मूल्य अपने बच्चों पर थोपें। इसके बजाय माहौल को प्रोत्साहन-पूर्ण बनाइए।

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आपका घर एक ऐसा स्थान नहीं होना चाहिए जहां आप अपनी संस्कृति, अपने विचार और अपने मूल्य अपने बच्चों पर थोपें। इसके बजाय माहौल को प्रोत्साहन-पूर्ण बनाइए। अगर बच्चों को किसी और स्थान की अपेक्षा अपने घर में ज्यादा चैन महसूस होगा तो जाहिर है वे यहां-वहां भटकने की बजाय घर में ज्यादा वक्त बिताने की कोशिश करेंगे। फिलहाल उनको घर की बजाय गली के नुक्कड़ पर वक्त बिताना ज्यादा अच्छा लगता है जिसकी वजह है घर में उन पर लादा जा रहा बोझ। इसलिए अगर घर में इस तरह का कष्ट न उठाना पड़े तो वे गली के नुक्कड़ की शरण नहीं लेंगे। इसका यह मतलब नहीं कि आगे चल कर दुनिया की कड़वी सच्चाइयों से उनका सामना नहीं होगा। जरूर होगा और ये सच्चाइयां किसी-न-किसी तरह से आपके बच्चों को अवश्य प्रभावित करेंगी। लेकिन हमेशा ऐसे मां-बाप ही बच्चों की बेहतर परवरिश सुनिश्चित कर सकते हैं जो बच्चों को अपने बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उन्हे अपनी बुद्धि का उपयोग कर के यह देखने में मदद करते हैं कि उनके लिए क्या उत्तम है।जब एक बच्चा आपके घर, आपके संसार में आता है तो आपके लिए यह वक्त उसका शिक्षक बनने का नहीं है; यह समय आपके सीखने का है।

ज्यादातर युवक मानते हैं कि बच्चे के पैदा होते ही उन्हें उसका शिक्षक बन जाना चाहिए। जब एक बच्चा आपके घर, आपके संसार में आता है तो आपके लिए यह वक्त उसका शिक्षक बनने का नहीं है; यह समय आपके सीखने का है। अगर आप अपने बच्चे को और फिर खुद को देखें तो पायेंगे कि आपका बच्चा आपसे ज्यादा खुश और आनंदमय है। है न? आपकी जिंदगी में खुशी के इस खजाने के आने से पहले आप एक मशीनी जिंदगी जी रहे थे। अब अनजाने ही आप हंसने-गाने लगे हैं, बच्चे के साथ सोफा के नीचे घुटनों के बल चलने लगे हैं। आपकी जिंदगी मे ये जो जान आ गई है उसका कारण है – वो बच्चा, आप नहीं। आपको अपने बच्चे को बस एक ही चीज सिखानी है, और वह भी सिर्फ एक हद तक, कि गुजर बसर कैसे करना है? लेकिन जिंदगी को बच्चा अपने अनुभव से खुद ही जान लेता है। एक वयस्क व्यक्ति हर प्रकार का कष्ट झेलता है, जो अकसर काल्पनिक ही होते हैं। जबकि बच्चा अभी कल्पना के उस मुकाम तक नही पहुंचा होता है। इसलिए यह अवसर बच्चों से सीखने का है उन्हें सिखाने का नहीं।

यह लेख 'ईशा लहर' मासिक पत्रिका से लिया गया है।