सद्‌गुरु ब्रह्मांड के पीछे की ज्यामिति और उसके साथ हमारे ताल-मेल के महत्व को समझा रहे हैं। साथ ही इस संदर्भ में योग का अर्थ बता रहे हैं...

सद्‌गुरु: 

कुदरती तौर पर जीवन कभी बिल्कुल सही या संपूर्ण नहीं हो सकता, उसमें हमेशा सुधार की गुंजाइश होती है। लेकिन सृष्टि की ज्यामिति एक तरह से संपूर्ण होती है। इस सटीक ज्यामितीय संतुलन के कारण ही जीवन इस तरह फलता-फूलता है। मानव जीवन जितना क्षणभंगुर है साथ ही साथ उतना ही जोरदार भी है। एक मनुष्य कितना कुछ कर सकता है। इसकी वजह यह है कि रचना की प्रक्रिया के पीछे जो ज्यामितिय बनावट है, वह संपूर्ण है।

लगभग 15,000 साल पहले, आदियोगी शिव संपूर्णता की इस स्थिति तक पहुंचे थे। वह इतने स्थिर हो गए थे कि उन्हें देखने वाले यह तय नहीं कर पाते थे कि वह जीवित हैं या नहीं।आज एक पूरा विज्ञान यह पता लगाने में लगा है कि एक कीड़े से लेकर एक हाथी तक, एक पेड़ से लेकर नदी और सागर तक, ग्रहों से लेकर पूरे ब्रह्मांड तक हर रूप में अणु और परमाणु संबंधी संरचना की ज्यामिति कैसी है। अणु से लेकर ब्रह्मांड तक, सभी रूपों की ज्यामिति अपने मूल गुण में बिल्कुल एक जैसी है। यह बनावट इतना संपूर्ण है कि जीवन इतना नाजुक, इतना भंगुर होने के बावजूद इतना मजबूत और इतना खूबसूरत है।

ज्यामिति की इस संपूर्णता को अपने जीवन में उतारने की कोशिश से ही योग की इस जटिल और परिष्कृत प्रणाली का जन्म हुआ। अपने पूरे सिस्टम को जिसमें- शरीर, मन, भावनाओं, पिछले जन्म के कर्म और मूलभूत ऊर्जा शामिल है, ब्रह्मांड के साथ एक ज्यामितिय संतुलन में लाना के बारे में ही योग बताता है ।

लगभग 15,000 साल पहले, आदियोगी शिव संपूर्णता की इस स्थिति तक पहुंचे थे। वह इतने स्थिर हो गए थे कि उन्हें देखने वाले यह तय नहीं कर पाते थे कि वह जीवित हैं या नहीं। उनके भीतर जीवन की एकमात्र निशानी थी – उनके गालों पर लुढकते परमानंद के आंसू । आदियोगी संपूर्ण स्थिरता की इस स्थिति से निकलकर अचानक उन्माद में नृत्य करने लगे। यह तांडव दर्शाता था कि उनके भीतर की संपूर्ण ज्यामिति उनके लिए कोई बाधा नहीं थी, उन्हें एक जगह बैठने की जरूरत नहीं थी। वह पूरी उन्मुक्तता से बावलों की तरह नृत्य करते हुए भी अपने और विशाल ब्रह्मांडीय प्रकृति के साथ संपूर्ण संतुलन को खोते नहीं थे।

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यह तांडव एक आनंदमय अभिव्यक्ति है - भाव, राग, ताल और ब्रह्मांडीय प्रकृति के बीच संतुलन और संपूर्णता की। भाव आतंरिक अनुभव है, राग सृष्टि द्वारा निर्धारित सुर हैं और हर व्यक्ति को जिस रिद्म को हासिल करना होता है, उसे ताल कहते हैं। भाव कई तत्वों का एक नतीजा है। राग स्रृष्टा ने उत्पन्न किए हैं। लेकिन अगर आपको सही ताल मिल जाए, तो पागलों की तरह नाचने के बावजूद आप बाकी ब्रह्मांड के साथ संपूर्ण संतुलन में होते हैं। बहुत से योगियों, साधु-संतों और शिव के सभी भक्तों ने इस संभावना का प्रदर्शन भी किया है।

योग का अर्थ होता है मेल। जब अपने शरीर और भावनाओं की सीमाओं में कैद कोई व्यक्ति अपने भीतर एक तरह की संपूर्णता को प्राप्त कर लेता है, जहां अपने अनुभव में वह हर चीज के साथ एक हो जाता है, तो वह योग की स्थिति में होता है। यह संभावना हर मनुष्य के भीतर एक बीज के रूप में होती है। अगर आप कोशिश करें तो आप अपने भीतर पूरे ब्रह्मांड को महसूस कर सकते हैं। योग की इस अवस्था को लेकर बहुत सारी कहानियां प्रचलित रही हैं। जैसे, यशोदा का कृष्ण के मुंह में ब्रह्मांड को देखना या पूरे ब्रह्मांड को शिव के शरीर के रूप में देखना। योग की अवस्था का मतलब सिर के बल या एक पांव पर खड़ा होना नहीं है। योग का मतलब मेल की स्थिति में होना है।

अगर मेल की यह चाह शारीरिक होती है, तो वह कामुकता कहलाती है। अगर हम उसे भावनाओं में व्यक्त करते हैं, तो उसे प्रेम या करुणा कहते हैं। अगर संपूर्णाता को बढ़ाने की वही चाह मानसिक रूप से व्यक्त हो तो उसे कामयाबी, विजय, या इन दिनों शॉपिंग कहा जाता है।ज्यामिति की यह पूर्णता बहुत तरीकों से पाई जा सकती है। बुद्धि से, भावना से, ऊर्जा से, कार्य की शुद्धता से और सबसे बढ़कर भक्ति से – ये सब बेफिक्री या उन्मुक्तता की स्थिति तक आने के टूल्स हैं। जब आप अपने व्यक्तित्व को छोड़ देते हैं तो आप बाकी ब्रह्मांड के साथ मेल की स्थिति में होते हैं। वैसे भी आपका व्यक्तित्व तो बस कर्मों का एक ढेर होता है।

इंसान की संपूर्णता की भावना थोड़ी सी बढ़ जाती है, जब वह मेल महसूस करता है। अगर मेल की यह चाह शारीरिक होती है, तो वह कामुकता कहलाती है। अगर हम उसे भावनाओं में व्यक्त करते हैं, तो उसे प्रेम या करुणा कहते हैं। अगर संपूर्णाता को बढ़ाने की वही चाह मानसिक रूप से व्यक्त हो तो उसे कामयाबी, विजय, या इन दिनों शॉपिंग कहा जाता है। लेकिन अगर वह अपने अस्तित्व की एक स्थायी अभिव्यक्ति हो तो उसे हम योग कहते हैं।

मेल की चाह हमेशा होती है। चाहे कोई धन-दौलत, कामयाबी, आनंद या नशा, किसी भी चीज के पीछे भाग रहा हो, वह बस मेल की चाह के कारण भाग रहा होता है। लेकिन ये सब मेल के बेअसर तरीके होते हैं। योग किसी चीज के खिलाफ नहीं होता है, सिवाय अयोग्यता या प्रभावहीनता के। हम इंसान पृथ्वी पर विकास के शिखर पर रहे हैं, इसलिए हमसे थोड़ी बुद्धि और निपुणता से काम करने की उम्मीद की जाती है। सदियों से लोगों ने उन तरीकों से मेल की स्थिति तक पहुंचने की कोशिश की है, जिनसे वो कभी कामयाब नहीं हुए। मैं चाहता हूं कि आप सब अपने मन में यह शपथ लें कि हमारी पीढ़ी एक स्थायी तरीके से काम करेगी। अगर हम मेल हासिल करें तो वह स्थायी हो। आप सब को अपने हृदय और मन की गहराई तक इस बात को उतारना होगा।