स्वाधिष्ठान व मणिपूरक दो ऐसे आयाम हैं, जहां इंसान बहुत अलग-अलग तरह की चीज़ें कर सकता है। जैसे-जैसे हम ऊपर के चक्रों की ओर बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे ये कम काबिल, लेकिन ज्यादा से ज्यादा गहराई पकड़ता जाता है। एक तरीके से मणिपूरक, स्वाधिष्ठान व मूलाधार का परिणाम है। 

सारे चक्र अपनी जगह से हिल सकते हैं, लेकिन खासतौर पर मणिपूरक के साथ गतिशीलता(हिलना डुलना) बहुत ज्यादा होती है 
यह हमारे भरण-पोषण का केंद्र होता है। जो चीज इस शरीर के लिए बुनियाद होती है, और जो चीज कुछ फिर से पैदा करने के काबिल होती है, ये दोनों चीजें मिलकर जीवन की रचना करते हैं। मणिपूरक बस उसे संभालता है। यह महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि आप जो भी चीज बनाते हैं, अगर आप उसे संभालेंगे नहीं तो वह चीज खत्म हो जाएगी। एक बगीचा देखने में भले ही कितना भी सुंदर क्यों न हो, लेकिन अगर उसकी एक महीने तक देखभाल न हो तो वह बगीचा लगेगा ही नहीं, वह बगीचा खत्म हो जाएगा। उस वजह से मणिपूरक बहुत महत्वपूर्ण होता है। सारे चक्र अपनी जगह से हिल सकते हैं, लेकिन खासतौर पर मणिपूरक के साथ गतिशीलता(हिलना डुलना) बहुत ज्यादा होती है, क्योंकि यही वो जगह है, जहां हमारे शरीर में मौजूद 72,000 नाडिय़ां आपस में मिलती हैं और फिर से बंट जाती हैं। इसी वजह से इंसान अपने मणिपूरक को कई अलग-अलग तरीके से गति दे सकता है।

 

मूलाधार शरीर का सबसे बुनियादी चक्र है। मूलाधार साधना पीनियल ग्लैंड से जुड़ी है, और इस साधना से तीन बुनियादी गुण सामने आ सकते हैं। जानते हैं इन गुणों के बारे में।  मूलाधार चक्र की साधना करने के तीन प्रमुख फायदे

 

मार्शल आर्ट में मणिपूरक का महत्व

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आप में से जो लोग मार्शल आर्ट का अभ्यास करते हैं, वे जानते हैं कि मणिपूरक को गति देना महत्वपूर्ण होता है। अगर आपको अपने मणिपूरक को गतिशील बनाना हो तो इसके लिए आपको अपने मार्शल आर्ट को इस स्थिति में लाना होता है, जहां वह गतिशीलता से स्थिरता में तब्दील हो जाता है। मार्शल आर्ट की जितनी भी हिंसात्मक और कठिन गतिविधियां हैं, उनका मकसद ऐसे बिंदु पर पहुंचना है, जहां आप बिना कोई गति या हरकत किए भी रह सकते हैं। जब आपमें स्थिरता आती है तो आपके मणिपूरक को गतिशील बनाने की क्षमता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। आपने सुदूर पूर्वी फिल्मों (चीनी और जापानी इत्यादी फिल्मों) में यह देखा होगा कि एक बूढ़ा आदमी होता है, जो बस ”हू” कहता है और सामने मौजूद तमाम लोग यूं ही गिर पड़ते हैं। क्योंकि अपने मणिपूरक को हिलाने डुलाने की क्षमता आपको एक तरह की शक्ति देती है।

सुदूर पूर्वी मार्शल आर्ट स्टाइल में एक अहम चीज होती है कि इसमें लगातार अलग-अलग तरीकों से मणिपूरक पर प्रहार किया जाता है। रोज कम से कम सौ मुक्के पेट में मारे जाते है, ताकि इस स्थान को इस तरह से मजबूत किया जा सके, जिससे यह स्थिर हो सके। चूंकि यह काफी मजबूत होता है, इसलिए आप इसे जहां चाहें ले जा सकते हैं। अगर आप अपना भरण-पोषण केंद्र अपनी नाभि से दूर ले जाते हैं तो आप में कुछ खास तरह की क्षमताएं आ जाती हैं जैसे – आपकी आयु बढ़ जाती है, शरीर पर चोटों को सहने की क्षमता जबर्दस्त रूप से बढ़ जाती है और यह आपको अपनी ऊर्जा को चलायमान करने की अद्भुत क्षमता देता है।

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सद्‌गुरु हमें बता रहे हैं कि स्वाधिष्ठान वो केंद्र है जिसका इस्तेमाल बच्च पैदा करने के लिए या फिर देवी देवताओं को रचने के लिए किया जाता है। जानते हैं इस चक्र के अनेक पहलूओं के बारे में।…  स्वाधिष्ठान चक्र : देवी-देवताओं को रचने की महारत देता है

 

मणिपूरक साधना में शरीर को स्थिर रखना जरुरी है

लेकिन एक बार अगर आप अपने मणिपूरक को अपने स्थान से हटा देते हैं, तो यह बेहद जरूरी है कि आप अपने शरीर को स्थिर रखें, वर्ना आपका शरीर लंबे समय तक टिकेगा नहीं। ऐसे लोग पैंतीस या छत्तीस साल की आयु भी पार नहीं कर पाते। अगर उस समय पर कोई गतिविधि की गई तो सारे केंद्र में उथल पुथल हो जाएगी। एक बार अगर यह अव्यवस्थित हो गया तो आप की अजीबोगरीब तरीके से मृत्यु होगी। कोई जान भी नहीं पाएगा कि आपके साथ क्या हो रहा है। आप किसी अजीब सी चीज की वजह से यूं ही मर जाएंगे।

अजपा जप साधना में मणिपूरक की भूमिका

मणिपूरक साधना करने वाले लोग एक चीज करते हैं, वे मणिपूरक में ध्वनि का उपयोग करते हैं। हालांकि मार्शल आर्ट का अभ्यास करने वाले ऐसा नहीं करते, क्योंकि वे लोग शारीरिक कौशल के लिए मणिपूरक पर काम करते हैं, लेकिन आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले लोग ध्वनि का प्रयोग करते हैं।

 आपने चीनी और जापानी इत्यादी फिल्मों में यह देखा होगा कि एक बूढ़ा आदमी होता है, जो बस ”हू” कहता है और सामने मौजूद तमाम लोग यूं ही गिर पड़ते हैं। क्योंकि अपने मणिपूरक को हिलाने डुलाने की क्षमता आपको एक तरह की शक्ति देती है। 
 अगर आप मणिपूरक के स्तर पर कोई ध्वनि लाते हैं तो यह ध्वनि यहां से पूरे शरीर में फैल जाती है और शरीर इस ध्वनि से गूंजने लगता है। मान लीजिए आप चाहते हैं कि शिव या शंभो की ध्वनि आपके सिस्टम का हिस्सा बन जाए तो आप इन ध्वनियों के साथ मणिपूरक साधना करने लगते हैं, जिससे ये ध्वनियां आपके शरीर के हर हिस्से में फैल जाएं और आपका सारा शरीर इस ध्वनि से गूंजने लगे।

अगर आप इस ध्वनि का मुंह से उच्चारण(बोलते) करते हैं तो यह जप कहलाता है। अगर आप अपने दिल से इस ध्वनि का उच्चारण करते हैं तो यह तप कहलाता है। अगर आप इसे अपने मणिपूरक में उतार लाते हैं तो यह अजप कहलाती है। इसका मतलब है कि बिना जप किए ही यह ध्वनि आपके भीतर से निकल रही है। आप बिना अपना मुंह खोले, बिना अपने ‘वोकल कॉर्ड’ (स्वर रज्जु) का इस्तेमाल किए, बिना उस वायु मार्ग का इस्तेमाल किए, जो किसी भी आवाज या ध्वनि को निकालने के लिए जरूरी है, आपका शरीर ध्वनि से गूंज रहा है।

ये तीन चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान व मणिपूरक कई रूपों में शरीर के भौतिक आयाम का निर्माण करते हैं। जबकि अन्य चार चक्रों की प्रकृति थोड़ी अलग है। ये तीनों सबसे ज्यादा जरूरी व महत्वपूर्ण होते हैं। अगर कोई व्यक्ति चाहे अपनी भौतिक कुशलता चाहता हो या फिर मानसिक कुशलता, भावनात्मक या फिर ऊर्जा के स्तर पर कुशलता चाहता हो अथवा इस धरती पर रहने की अपनी क्षमता बढ़ाना चाहता हो तो इसके लिए ये तीनों सबसे महत्वूपर्ण आयाम हैं। योग के बहत सारे स्कूल(विधाएं) इन्हीं तीनों के अलग-अलग मिश्रण हैं।

 

इस ब्लॉग में सद्‌गुरु सहस्रार चक्र के बारे में बता रहे हैं, जिसमें भरपूर नशा और परमानंद हैं।   सहस्रार चक्र – परमानंद व भरपूर नशे का केंद्र