मन की हलचल रोकने का एक सरल तरीका
पतंजलि ने योग की बहुत ही सरल परिभाषा दी थी – योग चित्त वृत्ति निरोधः। इसका अर्थ है मन में आने वाले सभी बदलाव रुक जाने पर योग की स्थिति प्राप्त होती है। जानते हैं ऐसी स्थिति तक पहुँचने का सरल उपाय
 
 

अगर आप हर चीज को उसी तरह समझते और महसूस करते हैं, जैसी वो है, तो लोग आपको दिव्यदर्शी या मिस्टिक कहते हैं। अगर आप जीवन को वैसे नहीं देखते, जैसा वह है तो इसका मतलब है कि आप मिस्टिक नहीं मिस्टेक हैं (गलती कर रहे हैं)।

अगर आप हर चीज को उसी रूप में देखें, जैसी वह है, तो आपको इस सृष्टि के साथ भी एकात्मकता दिखाई देगी।  
अब हम सब मिलकर उस गलती को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। आपके साथ जो कुछ भी घटित होता है, वह उस तरह से इसलिए घटित होता है, क्योंकि वह आपके मन के पर्दे पर उसी तरह से प्रतिबिंबित होता है। हम आइने के उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करते हैं। आपके घर पर जो आइना है, वह अगर रोज अपना आकार बदल ले, तो आपको कभी समझ ही नहीं आएगा कि आप कैसा दिखते हैं। इसीलिए पतंजलि ने योग की बहुत ही आसान और टेक्निकल परिभाषा दी। जब लोगों ने पूछा, ‘योग क्या है?’ तो उन्होंने जवाब दिया, ‘चित्त वृत्ति निरोध:’। जिसका मतलब है कि जब मन के भीतर के सारे बदलाव खत्म हो जाएं तो वही योग है। तभी आप हर चीज को ठीक वैसा ही देखेंगे, जैसी वह है। अगर आप हर चीज को उसी रूप में देखें, जैसी वह है, तो आपको इस सृष्टि के साथ भी एकात्मकता दिखाई देगी।

मन में हलचल और अतीत का प्रभाव नहीं होना चाहिए

एक और समस्या हो सकती है, अगर आपके पास ऐसा कोई आइना है, जो चीजों को याद रखता हो - फिर तो आप मुसीबत में पड़ जाएंगे।

आपको अपने जीवन में यह एक चीज लानी होगी कि कभी भी किसी चीज को बहुत ऊंची और किसी चीज को नीची नजर से न देखें।
मान लीजिए कि आपका आइना हर देखी हुई चीज का दस फीसदी अपने भीतर ले लेता है, तब तो वह किसी काम का नहीं रह जाएगा। है न? एक अच्छे आइने के बारे में पहली चीज यह है कि इसे पूरी तरह से सपाट होना चाहिए। दूसरी चीज इसे अपने भीतर कुछ नहीं रखना चाहिए। केवल तभी यह आपको चीजें वैसी दिखाएगा, जैसी वास्तव में वो हैं। तो हम सब लोगों को भी यही करना होगा। अपने मन को सपाट व समतल करने के लिए थोड़ी कोशिश करनी होगी और देखना होगा कि इसमें अतीत का कुछ भी संजोया हुआ बाकी न रहे। जब यह किसी चीज को देखे तो यह बिलकुल वैसा ही देखे, जैसी वह है। फिलहाल होता यह है कि आप जब किसी वस्तु या व्यक्ति को देखते हैं तो आपके मन में अतीत की हजार चीजें चलने लगती हैं। अगर आप चीजों को सहज रूप से देखना सीख लें, बिना यह पहचाने या भेद किए कि वह स्त्री है या पुरुष, कोई पेड़ है या जानवर है या फिर कोई पत्थर तो आप पाएंगे कि आप हर चीज को बिलकुल वैसा ही देखेंगे, जैसी वह है। इसके लिए किसी कोशिश की जरूरत नहीं है। किसी को किसी खास रूप में याद रखने या पहचानने के लिए काफी कोशिश करनी पड़ती है। लेकिन जो जैसा है, उसे वैसा ही देखने के लिए किसी कोशिश या मेहनत की जरूरत नहीं होती। चूंकि आप रसायनिक तौर पर दूषित हो चुके हैं, इसलिए जब आप किसी महिला को देखते हैं तो आपके मन में कई चीजें आती हैं, इसी तरह से किसी पुरुष को देखते हैं तो कई और चीजें आती हैं, क्योंकि कई चीजें बिगड़ गई हैं।

भेदभाव की स्थिति में सत्य को जानना संभव नहीं

आप किसी चीज को काफी श्रेष्ठ मानते हैं और वहीं दूसरी चीज आपको बेकार लगती है। आपको अपने जीवन में यह एक चीज लानी होगी कि कभी भी किसी चीज को बहुत ऊंची और किसी चीज को नीची नजर से न देखें। अगर यह संभव नहीं है, तो हर चीज को सम्मान के साथ देखना शुरू कीजिए। अगर आप किसी चींटी को भी देखते हैं, तो उसे भी सम्मान के साथ देखिए। यह तरीका भी काम करेगा। असली समस्या भेदभाव की है कि यह बेहतर है और वह कमतर है, यह अच्छा है और वह बुरा है। इस स्थिति में तो आप कभी अस्तित्व की असलियत को जान ही नहीं पाएंगे। भेदभाव के चलते खुद आपका मन भी बंट जाएगा। एक बार अगर आपका मन विभेदकारी हो गया तो यह स्थिति एक टूटे हुए आइने सी होगी, जिसमें अगर आप किसी चीज को देखें, तो आपको उसके हजारों-लाखों रूप नजर आएंगे। उस स्थिति में आप असलियत को कभी नहीं देख पाएंगे।

जब तक मन की हलचल थम न जाए – सभी को सम्मान से देखें

हालांकि यह एक आसान सी चीज है, लेकिन यह जटिल बन गई है, क्योंकि आप अपने विचार, सोच, राय व पहचान से बंधे हुए हैं। कुछ समय के लिए इन चीजों को एक तरफ रख दीजिए, ताकि आपका मन ‘चित्त वृत्ति निरोध:’ की स्थिति में आ सके। इसका मतलब है कि आपके मन में कोई बदलाव नहीं चल रहा। आपका मन विभेदकारी नहीं है, जिसमें किसी चीज को देखते ही एक पल में हजारों चीजें आने लगती हैं। यह आपको बिना किसी पूर्वाग्रह, बिना किसी पिछली याद से प्रभावित हुए, बिना कार्मिक व अनुवांशिक प्रभावों के, बिना किसी चीज को पहचाने- चीजों को जैसे का तैसा दिखाता है। जब तक आप इस स्थिति में नहीं पहुंच जाते, तब तक बेहतर होगा कि आप हर चीज को सम्मान के साथ देखें। इसीलिए इस संस्कृति में हम आपको सिखाते हैं कि अगर आप एक पेड़ को भी देखें तो उसे नमस्कार करें, अगर आप किसी गाय को देखें तो उसे नमस्कार करें, अगर किसी हाथी को देखें तो नमस्कार करें, आप किसी भी चीज को देखें तो उसे नमस्कार करें, यहां तक कि अगर आप किसी पत्थर को भी देखें तो उसे नमस्कार करें। हर चीज को सम्मान के साथ देखें। अगर आप उन लोगों में से हैं जो हर वक्त बड़े अभिमान में चलते हैं और मुझे देखकर नमस्कार कर लेते हैं तो यह अच्छी बात नहीं है।

 
 
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