धर्म और तकनीक : एक ख़तरनाक मेल

न्यूज़ीलैंड तथा श्रीलंका में हुए आतंकवादी हमलों के बारे में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए सद्गुरु यहाँ समझा रहे हैं कि हमारी धरती पर स्थायी शांति लाने के लिये हम क्या कर सकते हैं?
Religion and Technology – A Deadly Combination
 

भगवान के बारे में कोई समझौता नहीं 

सद्गुरु : इस धरती पर, मूल रूप से, हम केवल एक जीवन के रूप में जन्म लेते हैं। बाकी की सारी चीजें हमें सिखाई जाती हैं। हम सब बहुत सारी ऐसी चीजें बन गये हैं जो हम नहीं हैं। अभी हमें दुनिया में जिस बात को सही करने की ज़रूरत है वह है - 'हम कौन हैं' ? हमें वह सब सिखाना बंद कर देना चाहिये जो हमें मनुष्य के अतिरिक्त कुछ और बनाता है। हमें यह समझ लेना चाहिये कि किसी भी व्यक्ति के साथ बुरा, या ग़लत चीज़ें सिर्फ कोई दूसरा व्यक्ति ही करता है, कोई बाहरी शक्तियाँ नहीं।

मानवता के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि आकाश में से कोई हाथ कूद कर बाहर आया हो और उसने किसी मनुष्य के साथ कुछ ग़लत किया हो। हमेशा एक मनुष्य ने ही दूसरे के साथ कुछ बुरा किया है। ये किन्हीं आर्थिक कारणों से हो सकता है, अहंकार के कारण हो सकता है, धन-संपत्ति के लिये या किसी और कारण से। पर जब लोगों को ऐसा लगता है कि वे अपने भगवान के लिये लड़ रहे हैं तो फिर कोई समझौता नहीं होता। यही हमें समझना है।

जब आप कुछ मान लेते हैं और ऐसे हज़ार लोग इकट्ठा कर लेते हैं जो वही मानते हैं तथा मैं कुछ और मानता हूँ और ऐसे अन्य 10,000 लोग इकट्ठा कर लेता हूँ जो वही मानते हैं तो फिर संघर्ष तो हो कर ही रहेगा।

जब आप अपने भगवान के लिये लड़ रहे हैं तो आप कोई समझौता नहीं करेंगे। ये अगर ज़मीन या संपत्ति का मामला हो तो समझौता हो सकता है। लेकिन हम उस चीज़ के लिये लड़ रहे हैं जिसमें समझौता करने का कोई सवाल ही नहीं है। हमें यह समझ लेना चाहिये कि जब आप किसी एक चीज़ में पूरी तरह से विश्वास रखते हैं, तथा मैं किसी और चीज़ में विश्वास रखता हूँ तो बस ये कुछ देर की ही बात है कि हम एक-दूसरे को मारने के लिये आमने-सामने आ जाएँगे।

हो सकता है, हम ऐसा करें या फिर हमारे बच्चे या उनके बच्चे, लेकिन ये होगा ज़रूर। जब आप किसी चीज़ में विश्वास रखते हैं तो उसका मतलब सिर्फ यह है - आप जिस  चीज़ के बारे में कुछ नहीं जानते, आप उसे मान लेते हैं. और उसे अपने मन में एक सख्त मान्यता बना लेते हैं, और फिर लोगों को इकठ्ठा करते हैं। 
आप अपने जैसे 1000 लोगों को इकट्ठा कर लेते हैं जो उसी बात को मानते हैं। ऐसे ही मैं किसी और चीज़ को मन लेता हूँ, जिसके बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम और ऐसे 10,000 लोगों को इकट्ठा कर लेता हूँ जो वही मानते हैं। तो फिर, हम दोनों के बीच संघर्ष तो होना ही है।

धर्म एक व्यक्तिगत उद्देश्य

जब ऐसी कोई भीषण घटना (धर्म-प्रेरित आतंकवादी हमला) हो जाती है तो कुछ दिनों तक हर कोई उसके बारे में काफी ज्यादा सोचता है,  लेकिन फिर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उलझ जाते हैं। इधर-उधर थोड़ी बहुत शांति स्थापित करने के प्रयास करना कोई स्थायी समाधान नहीं है। अगर हम सही में इस दुनिया के भविष्य के बारे में चिंतित हैं, तो अगले बीस-पच्चीस वर्षों में एक मूल बात जो हमें करनी चाहिये वह यह है कि हम इस बात को स्थापित करें कि आप का धर्म आपका व्यक्तिगत मामला है। आप जो चाहे करें पर ये राष्ट्रीय या वैश्विक उद्देश्य नहीं हो सकता। 

ये बात शत-प्रतिशत लागू होनी चाहिये। अगर हम ये नहीं करते तो फिर ये सिर्फ कुछ चर्चों में बम धमाके होने या कुछ मस्जिदों में गोलीबारी होने की ही बात नहीं रहेगी, या फिर इस तरह की सिर्फ दो-चार घटनाओं की बात नहीं रहेगी। आप देखेंगे कि कई देश इन विस्फोटक धमाकों से तहस-नहस हो जाएँगे। क्योंकि अब तलवार का ज़माना नहीं है, आज का समय खतरनाक बटन का ज़माना है जिससे ऐसी चीजें हो सकती हैं जिनकी आप ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। मानव समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट हो सकता है क्योंकि अब तकनीकों के कारण उस प्रकार की शक्ति हमारे पास है। अब वो बात नहीं है कि आप तलवार ले कर सौ लोगों को काट डालेंगे। अब तो आप लाखों लोगों को एक साथ समाप्त कर सकते हैं।

दुनिया को बदलने के लिये तकनीक का उपयोग

इसी तकनीकी प्रगति ने हमारे लिये यह भी संभव कर दिया है कि हम यहाँ बैठे-बैठे सारी दुनिया से बात कर सकें - आज  57%  दुनिया की इंटरनेट पर पहुंच हो गयी है। लगभग 12 साल पहले, मैं अमेरिका में एक व्यक्ति से बात कर रहा था जिसे आंतरिक मामलों के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है। मैंने उससे पूछा, "आजकल लोग क्या देख रहे हैं? वे घंटों तक इंटरनेट पर रहते हैं"। उसने बड़े आराम से कहा, " सद्गुरु, 70% बस अश्लील साहित्य है। मुझे उस पर विश्वास करने का मन नहीं हुआ। मैंने कहा, "ये नहीं हो सकता, ये 70% नहीं हो सकता"। लेकिन फिर मैंने कुछ अन्य लोगों से पता किया और हरेक ने यही कहा कि लगभग 70% चीजें अश्लील साहित्य की ही हैं।

और फिर मुझे पता चला कि हर वर्ष, 15 साल से कम उम्र के लगभग 12 लाख बच्चे इंटरनेट पर बेचे जा रहे हैं। ये हमें क्या हो रहा है? जब हमारे पास तकनीक का इतना जबर्दस्त साधन उपलब्ध है तो हम उसका इस्तेमाल अपने बच्चों को बेचने के लिये कर रहे हैं? क्या यह तकनीक का उपयोग है? हमें यह बदलना है! इसीलिये मैं पिछले दस साल से इंटरनेट पर सक्रिय हूँ और इस मामले पर इतना ज़ोर दे रहा हूँ। हमें इस तरह की बातों का विरोध करना है और इनकी जगह कुछ अन्य, अच्छे विकल्प देने हैं।

कुछ वर्ष पहले मैं बैंगलोर शहर में घूम रहा था। कुछ 12 -13 साल के बच्चे दौड़ते हुए आये और बोले, "हे, सद्गुरु, सद्गुरु"! मैंने कहा, "अरे, तुम लोग कैसे जानते हो, मैं कौन हूँ" ? वे बोले, "सद्गुरु, हम आप के वीडियो देखते हैं"। मैंने बोला, "क्या? तुम्हारी माँ मेरे वीडियो देखने को मजबूर करती होंगी"। उन्होंने जवाब दिया, "नहीं, हमारी कक्षा में हम सभी आप के वीडियो देखते हैं"। फिर जब मैंने पूछताछ की तो पता चला कि मैं जिस भी स्कूल में गया, वहाँ कम से कम 20 से 30% बच्चे मेरे वीडियो देखते थे। मैं आप को बताना चाहता हूँ कि मैं जब 15 साल का था तो कोई भी मुझे आध्यात्मिक वीडियो देखने को नहीं कह सकता था। सवाल ही नहीं उठता। तकनीकी उपलब्धियों के कारण आज हम लोगों के मन पर प्रभाव डाल सकते हैं और दुनिया को बदल सकते हैं। बात सिर्फ इतनी है कि क्या हम ऐसा करने के लिये प्रतिबद्ध हैं?

आज इस धरती पर ये हमारा समय है। आईये, हम इसे मानवता के लिये सबसे अच्छा समय बनायें। हम वो पीढ़ी हैं जो हर तरह से सशक्त है। अब समय आ गया है कि हम इसका उपयोग सब की खुशहाली के लिये करें। आईये, इसे एक सच्चाई बनाएं।

Editor’s Note: A version of this article was originally published on Swarajya.