बुराइयों का अंत कैसे होगा?

ऐसा कौन होगा जो सारी बुराइयों को खत्म करके एक शांतिमय दुनिया में रहना नहीं चाहेगा? लेकिन यह बुराई असल में है क्या, और इसे कैसे खत्म कर सकते हैं? इस आम समस्या के बारे में एक असामान्य दृष्टिकोण देते हुए सद्गुरु इस विषय पर प्रकाश डाल रहे हैं।
बुराइयों का अंत कैसे होगा?
 

सद्गुरुः बुराई न तो एक गुण है और न ही यह एक कार्य है, बल्कि यह तो अज्ञानता का परिणाम है। इसे कई तरह से समझाया गया है। आपने यह जरूर सुना होगा, ‘वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।’ जहां अज्ञानता होती है, वहां बुराई का होना स्वाभाविक है - चाहे उसे बुराई के रूप में पहचाना जाए या नहीं।

बुराई न तो एक गुण है और न ही यह एक कार्य है, बल्कि यह अज्ञानता का परिणाम है।

सबसे भयंकर चीजें इसलिए नहीं होतीं क्योंकि कोई व्यक्ति बुरा है, बल्कि इसलिए होती हैं क्योंकि वह अज्ञानी है। कोई व्यक्ति यदि कुछ भयंकर चीज कर रहा है तो उस पर बुराई का ठप्पा लगता है या नहीं, यह बस संख्याओं और ताकत का सवाल है। यह इस पर निर्भर करता है कि आपके साथ कितने लोग हैं। अगर किसी बुरे काम में आपके साथ पूरा शहर आ जाता है, तो वह एक सही चीज बन जाएगी। आज, हम उन ‘सही चीजों’ के साथ कोई लेना-देना नहीं रखना चाहते, जो अतीत में लोगों ने की हैं, क्योंकि वे बहुत भयंकर चीजें थीं। आज सबसे बुरा आदमी भी वह कार्य नहीं करता है जो पहले के ‘अच्छे लोगों’ ने किए हैं। और आज भी चीजों में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है।

बुराई कभी नहीं जाती। यह जा भी नहीं सकती क्योंकि यह न तो एक गुण है और न ही यह एक कार्य है, यह तो ‘जानने’ की गैरमौजूदगी है। अगर कोई चीज मौजूद है तो हम उसे नष्ट कर सकते हैं, लेकिन गैरमौजूदगी नहीं जा सकती - आप अंधकार को नष्ट नहीं कर सकते, आपको बस प्रकाश को लाना होगा। इसी तरह से, आप बुराई को नष्ट नहीं कर सकते, आपको बस ‘जानना’ और जागरूकता को लाना होगा। बुराई अपना रूप, चेहरा और दिशा बदल लेती है लेकिन सौभाग्य से, अज्ञानता का केवल एक ही रूप है, तो इससे आसानी से निपटा जा सकता है। अज्ञानता से निपटने के लिए हमें अस्तित्व को जानना होगा।

अस्तित्व को जानने के लिए, पहले हमें यह समझना होगा कि आपका मन और शरीर, इस दुनिया और इसके लोगों के द्वारा बनाया गया है। आपकी मूल प्रकृति आपके अनुभव में नहीं है क्योंकि वह मन के दूसरी तरफ है। एक तरह से, आपका मन एक आईने की तरह है। हो सकता है कि यह विकृत हो, लेकिन फिर भी यह एक आईना ही है। आप दुनिया को इसलिए देखते हैं क्योंकि यह आपके मन रूपी आईने में प्रतिबिंबित होती है। लेकिन मन कभी ‘स्वयं’ को इस आईने में नहीं दिखाता। मैं आपके शारीरिक और मनोवैज्ञानिक पहलू की बात नहीं कर रहा हूं। आप अपने विचारों और भावनाओं का चिंतन कर सकते हैं लेकिन आप ‘स्व’ का चिंतन नहीं कर सकते। आपके अस्तित्व का चिंतन नहीं किया जा सकता - इसका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। मन आपके आस-पास की दुनिया को प्रतिबिंबित कर रहा है, लेकिन एक ‘जीवन’ के रूप में आप का कोई अनुभव नहीं है।

तो अगर आप इस ‘आईने’ की प्रकृति को जानते हैं, तो आप सारे प्रतिबिंबों की प्रकृति को भी जान जाते हैं जो यह दिखाता है। तो अज्ञानता सिर्फ एक ही तरह की होती है - कि आप नहीं जानते कि यह आईना क्या है। अगर इस एक चीज के बारे में जान जायें, तो आपको ब्रह्माण्ड की हर चीज के बारे में ज्ञानी होना जरूरी नहीं है। अगर आप बस इतना जानते हैं कि यह क्या है, तो यह अज्ञानता का अंत है और बुराई का अंत भी है।