ईशा फाउंडेशन की एक स्वयंसेवी गीता तिरुज्ञानम ने हाल ही में गाजियाबाद जेल के कैदियों के लिए एक योग सत्र का आयोजन किया। इस सत्र में सद्‌गुरु द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए खास तौर पर तैयार किए गए अभ्यास शामिल थे। उन्होंने अपने सामने जो रूपांतरण देखा, वह उसका अनुभव बता रही हैं।

 

"मैं पहले कभी किसी जेल में नहीं गई थी। जेल को लेकर मेरा अनुभव फिल्मों तक ही सीमित था। मुझे अब भी एक सीन याद है जिसमें अमिताभ बच्चन अपने मुंह में टूथपिक दबाए एक जेल से बाहर निकलते हैं। इसलिए जब उस दिन मैं जेल में गई, तो मेरे दिमाग में बॉलीवुड था और मैं काफी रोमांचित थी। मगर जैसे ही मैंने अंदर कदम रखा और अपने रोजमर्रा के कामों में लगे कैदियों को देखा, तो मेरा अनुभव बिल्कुल बदल गया।

 

महिलाओं के वार्ड में जाने पर हमने ऐसे बच्चों को देखा जो जेल में ही पैदा हुए थे और वहीं रहते हैं। बच्चे काफी खुश और उस माहौल से बेअसर नजर आ रहे थे।

हमने सोचा, ठीक है, हम बैरकों में जाकर वीडियो चालू करते हैं। बैरकों में भी कोई हम पर ध्यान नहीं देना चाहता था। बल्कि वे खीझ रहे थे कि हम आए ही क्यों।
वे नए लोगों को देखकर बहुत उत्साहित थे। मगर महिलाएं हमें घूर रही थीं। पहले भी बहुत से एनजीओ जेल आ चुके थे और कैदियों के चेहरों के भाव साफ-साफ कह रहे थे – उफ़, एक और ग्रुप।

 

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हमारा सत्र उनके दैनिक कामकाज के समय ही आयोजित होना था। ज्यादातर में योग करने का कोई उत्साह नहीं था। बल्कि एक महिला ने यह कहते हुए हमें डान्टा कि हम उनके कष्ट का मजाक उड़ाने आए हैं।

 

कुछ महिलाएं नहा रही थीं और कुछ चाय के लिए कतार में थीं। इसका इंतजार उन्हें सबसे ज्यादा रहता है, जिसे छोडऩे के लिए वे तैयार नहीं थीं। फिर भी, अपने गुरु की पेशकश का महत्व जानते हुए, मैंने एक स्वयंसेवी के साथ उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की। हमने फ्रिस्बी और थ्रो बॉल खेलना शुरू किया। कुछ महिलाएं उत्साहित होकर शामिल हुईं मगर जल्दी ही चली गईं। यह तरीका कारगर नहीं हो रहा था।

 

अब क्या करें? हम परेशान थे। हमने सोचा, ठीक है, हम बैरकों में जाकर वीडियो चालू करते हैं। बैरकों में भी कोई हम पर ध्यान नहीं देना चाहता था। बल्कि वे खीझ रहे थे कि हम आए ही क्यों।

 

कुछ और स्वयंसेवियों ने सत्र की शुरुआत की। हम सब यह सोच कर परेशान थे कि कार्यक्रम को कामयाब कैसे बनाएं। हमें कम से कम 30-40 लोगों की जरूरत थी। हमने तालियां बजाकर, आवाज देकर उन्हें प्रेरित करने की कोशिश की मगर कोई असर नहीं पड़ा। निराशा में हमने पुकारा, सद्‌गुरु ! मदद कीजिए!

 

तब अचानक हमारे दिमाग में आया - संगीत! संगीत जरूर काम करेगा। हमने साउंड्स ऑफ ईशा के कुछ गीत बजाए और चमत्कार हो गया।

मुझे अब भी एक सीन याद है जिसमें अमिताभ बच्चन अपने मुंह में टूथपिक दबाए एक जेल से बाहर निकलते हैं। इसलिए जब उस दिन मैं जेल में गई, तो मेरे दिमाग में बॉलीवुड था और मैं काफी रोमांचित थी।
60 महिलाएं यह पता करने बैरकों में पहुंचीं कि वहां क्या हो रहा है। फिर हमने मुड़ कर नहीं देखा। हम सब ने नाचना शुरू कर दिया। उनकी आंखों में खुशी थी और तनावपूर्ण चेहरों पर मुस्कुराहट आ गई थी। वे जिस तरह नाच रही थीं, वह देखने लायक था। अचानक हमारे खिलाफ उनके मन में जो दीवार थी, वह ढह गई।

 

हमने खेल खेलना शुरू किया। सभी उम्र की महिलाएं उत्साह से चीख रही थीं और एक-दूसरे को गले लगा रही थीं। उनमें से कई अपने जीवन में कभी दौड़ी नहीं थीं। खेलों ने सारे भेद मिटा दिए। फिर वे सत्र के लिए बैठीं और मेरे गुरु का जादू चलने लगा। 90 मिनट बाद, वे पवित्र आत्माएं बंद आंखों के साथ शांतिपूर्वक बैठी थीं।

 

40 भागीदारों ने उन शक्तिशाली प्रक्रियाओं को सीखा और आखिरी लम्हे बहुत आनंद से भरे थे। वे बंद आंखों के साथ नमस्कार की मुद्रा में बैठे थे और उनके गालों पर सच्चे आनंद और कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे।"

 

"सद्‌गुरु, मैं कितनी खुशकिस्मत हूं कि आपकी शरण में आई। अगर आप न होते, तो मैं दुनिया में यूं ही जीती और मर जाती। इस जीवन और इसके परे होने का आनंद कभी जान न पाती। आपको और जिन लोगों ने आपकी कृपा की शक्ति का अनुभव करने दिया, सभी को मेरा प्रणाम।"