क्या तकनीक मानवता के विनाश का कारण बनेगी?

ईशा इंस्टीट्यूट ऑफ इनर साइंसेज में एक दर्शन के इस स्पॉट वीडियो में, सद्‌गुरु आभासी वास्तविकता(वर्चुअल रियलिटी) और मानवता पर उसके प्रभाव से संबंधित एक प्रश्न का जवाब दे रहे हैं। वह तीन तत्वों की पहचान करते हैं, जो हमें विनाश या खुशहाली की ओर ले जा सकते हैं: वाणिज्य(कॉमर्स) और बाध्यता(मजबूरी) बनाम चेतनता। वह कहते हैं, ‘अगर इंसान चेतनता में जीते, अगर दुनिया का नेतृत्व करने वाले लोग जागरूक होते, तो इंसानी खुशहाली या किसी भी चीज की खुशहाली के विरुद्ध तकनीक के इस्तेमाल का प्रश्न ही नहीं उठता।’
 
 
 
 

प्रश्नकर्ता: आभासी वास्तविकता(वर्चुअल रियलिटी) आधुनिक दुनिया की सबसे प्रमुख तकनीकों में एक बन गई है। बहुत से शोधकर्ता इंसानों में खुशहाली लाने के लिए इस तकनीक को खंगाल रहे हैं मगर फिलहाल यह तकनीक बहुत सी समस्याएं पैदा कर रही है जैसे बदली हुई शख्सियत, पलायनवाद, असामाजिक व्यवहार और खासकर खेलों का व्यसन(वीडियो गेम्स की लत)। तो आभासी वास्तविकता(वर्चुअल रियलिटी) को इंसानों के लाभ के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है और मानव चेतना पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है?

सद्‌गुरु: हम इसे बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। देखिए, अभी हम इसका इस्तेमाल कर रहे हैं – सद्‌गुरु अब भी भारत में हैं! कोई तकनीक हानिकारक नहीं होती। बस इतना है कि जब इंसानी दिमाग विनाश फैलाने के एक निश्चित स्तर पर होता है, तो हर तकनीक हानिकारक होती है – सब कुछ। आप अपना लैपटॉप लेकर किसी का सिर काट सकते हैं। क्या इसका मतलब है कि कंप्यूटर खतरनाक हैं? मान लीजिए, ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं, कई ऑफिसों में ऐसा हुआ है। मान लेते हैं, दस अलग-अलग ऑफिसों में ऐसा हुआ, किसी ने एक एप्पल एयर लेकर किसी का सिर काट डाला। क्या इसका मतलब है कि लैपटॉप खतरनाक हैं? नहीं।

हमें खुद को रोकना नहीं आता

इंसान मूर्ख हैं। उन्हें जो भी चीज़ मिलती है, वे जानते हैं कि उसे अपने खिलाफ कैसे करना है। जब उन्होंने अपने ही दिमाग को अपने खिलाफ कर लिया है, तो आप और क्या चाहते हैं? अब ‘तकनीक डि-एडिक्शन सेंटर’ भी आ गए हैं। आप जानते हैं? जैसे ड्रग्स और शराब छुड़ाने के लिए डि-एडिक्शन सेंटर होते हैं, अब तकनीक डि-एडिक्शन सेंटर हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि हम हर काम मजबूर होकर करने की हालत में हैं। अगर हम खाने लगते हैं, तो नहीं जानते कि खाना बंद कब करें। यह एक समस्या है, काफी बड़ी समस्या है। जब हम पीने लगते हैं तो नहीं जानते कि पीना बंद कब करना है। जब हम खरीददारी करने लगते हैं तो नहीं जानते कि खरीददारी बंद कब करें। जब हम फोन इस्तेमाल करने लगते हैं तो नहीं जानते कि फोन का इस्तेमाल कब बंद करना है।

मजबूर होकर कुछ करते जाना समस्या है

समस्या तकनीक की नहीं है। मजबूर होकर कोई काम करना ही समस्या है। मजबूर हो जाने का मतलब सिर्फ चेतनता की कमी है। अगर हम चेतन इंसान होते, तो हम हर चीज का इस्तेमाल अपनी और हर किसी की खुशहाली के लिए करते। हम मजबूर होकर काम करने लगते हैं, इसलिए हम कुछ करना शुरू करते हैं और नहीं जानते कि रुकना कब है। हम अंतहीन रूप से वही मूर्खतापूर्ण काम करते रहेंगे। तो चाहे वह आभासी वास्तविकता(वर्चुअल रियलिटी) हो या कृत्रिम बुद्धि(आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) या कुछ और, समस्या तकनीक की नहीं है, कभी नहीं। क्योंकि वे बस उपकरण हैं जो हमने ही बनाए हैं। हमें अपनी खुशहाली के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए, उनका मकसद यही है। मगर अधिकांश अत्याधुनिक तकनीकों को हमेशा दुनिया में सैन्य उपयोग में लाया जाता है। स्पष्ट है कि हम अपनी खुशहाली के लिए उनका इस्तेमाल करना नहीं जानते। हम हमेशा कुछ न कुछ नष्ट करने के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ अभी नहीं, हमेशा से यही चीज रही है।

क्योंकि हमने कभी मानव चेतना पर कोई काम नहीं किया है। अगर इंसान चेतन होते, अगर दुनिया का नेतृत्व एक चेतन नेतृत्व होता, तो मानव खुशहाली या किसी की खुशहाली के खिलाफ तकनीक के इस्तेमाल का प्रश्न ही नहीं उठता। तकनीक का मतलब है हमारी क्षमता को बढ़ाना। देखिए अभी मेरे पास माइक्रोफोन है। यह हमारी क्षमता का संवर्धन(बढ़ाना) है। अगर मैं माइक्रोफोन के बिना बोलता, तो सिर्फ इतने लोग सुन पाते। यह बस क्षमता में वृद्धि है। तो मान लीजिए, मेरे पास माइक्रोफोन है और मैं चिल्लाना शुरू कर देता हूं, अब समस्या माइक्रोफोन की नहीं है। आपको लगता है कि समस्या माइक्रोफोन की है? ‘अरे यह माइक्रोफोन बहुत तेज चिल्ला रहा है’ – क्या ऐसा है? हम इसी की बात कर रहे हैं।

फिलहाल व्यवसाय(कॉमर्स) भी एक मजबूरी बना हुआ है

कोई तकनीक समस्या नहीं है, चाहे वह कुछ भी हो। सवाल है कि हम उसे चेतनता में इस्तेमाल करेंगे या मजबूर होकर या फिर व्यावसायिक रूप में? व्यवसाय फ़िलहाल एक मजबूरी का काम बना हुआ है। हमने इस तरह व्यापार करना शुरू किया: मेरे पास थोड़े चावल हैं, तुम्हारे पास थोड़ा चिकन है, हम थोड़ा-थोड़ा अदला-बदली कर लेते हैं, ठीक है? क्योंकि मेरे पास कुछ अतिरिक्त था, मेरे पास आलू ज्यादा थे, तुम्हारे पास अंडे ज्यादा थे, हमने अदला-बदली कर ली, व्यवसाय इसी तरह शुरू हुआ। हमारे पास कुछ ज्यादा है, उसे हम आपको देते हैं, जो आपके पास ज्यादा है, आप मुझे देते हैं - ताकि आप अपना जीवन जी सकें, मैं अपना।

हाल में, मुझे नहीं पता कि आपने यह खबर देखी या नहीं, करीब बीस दिन पहले एक रूसी मालवाहक जहाज, एक विशाल जहाज, लगभग 40000 टन के जहाज ने आर्कटिक के बर्फ को काटते हुए एक नया मार्ग बनाया।

धीरे-धीरे हमारी बाध्यता के कारण, हमने व्यवसाय को इस हद तक बढ़ा दिया है कि वह हमारे जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करता है। सरकार आपसे कहती है, कृपया आप सभी ज्यादा लोन लीजिए, वरना अर्थव्यवस्था मंद हो जाएगी, हां या ना? वे आपको प्रेरित करते हैं क्योंकि किसी ने मुझसे कहा, ‘सद्‌गुरु आपके पास कोई क्रेडिट योग्यता नहीं है क्योंकि आपने कभी कोई लोन नहीं लिया।’ मुझे लगा था कि यह अच्छी चीज है! मैंने सोचा कि यह बहुत अच्छी चीज है कि मैंने कभी लोन नहीं लिया, मगर वे मुझे बता रहे हैं कि यह बुरी चीज है। ‘आपकी कोई क्रेडिट योग्यता नहीं है। आपको कोई लोन लेना चाहिए।’ मैं क्या करूं? ‘बस कहीं एक घर खरीद लीजिए। कहीं पर एक घर खरीदकर उसे किराये पर लगा दीजिए, सद्‌गुरु। आपके पास क्रेडिट योग्यता हो जाएगी।’

यह मजबूरी है जिसने खुद को व्यवसाय में बदल लिया है, है न? लोग घर बनाते हैं क्योंकि वे वहां रहना चाहते हैं। मगर अब हमने इसे इतना बाध्यकारी बना दिया है कि व्यवसाय धरती को नष्ट कर रहा है। हाल में, मुझे नहीं पता कि आपने यह खबर देखी या नहीं, करीब बीस दिन पहले एक रूसी मालवाहक जहाज, एक विशाल जहाज, लगभग 40000 टन के जहाज ने आर्कटिक के बर्फ को काटते हुए एक नया मार्ग बनाया। इस मार्ग ने यात्रा के मार्ग को आठ हजार किलोमीटर कम कर दिया और इससे उन्हें काफी बचत होगी। मगर वे आर्कटिक की बर्फ से होकर जा पा रहे हैं क्योंकि वह पतली हो रही है, इसलिए वे उसे पार कर पा रहे हैं। और अब व्यावसायिक शिपिंग आर्कटिक के मार्ग से होगी। यह बाध्यकारी(मजबूरी से भरा) व्यवसाय है – आप समझ नहीं रहे कि आप कर क्या रहे हैं। हां या ना?

लोग आलसी हैं – इसलिए धरती बची हुई है

यह सिर्फ बाध्यता(मजबूरी) है। इसे व्यवसाय मत कहिए, यह बस इंसान की मजबूरी है। वे चुप नहीं रह सकते, उन्हें कुछ न कुछ करना है। इसीलिए हमने सोचा कि कम से कम अगर हम सारी आबादी को इक्कीस मिनट तक बस मौन बिठा पाएं, तो पृथ्वी बच जाएगी। चाहे वे ध्यान करना नहीं जानते। कल्पना कीजिए कि ये 7.6 अरब लोग दिन के बीस मिनट कुछ न करें। इसलिए मैं कहता रहा हूं - धरती को इंसान की बुद्धिमत्ता नहीं बचा रही, इंसान का प्रेम या करुणा पृथ्वी को नहीं बचा रहे – यह का मनुष्य की निष्क्रियता(आलस) कर रही है। आधे लोग आलसी हैं – वही पृथ्वी को बचा रहे हैं। अगर हर कोई पूरी तरह मेहनती हो गया, हमारे पास मौजूद हर तकनीक का इस्तेमाल करने लगा, तो मेरे ख्याल से पंद्रह बीस सालों में धरती साफ हो जागी। हां या ना?

इसका तरीका तकनीक पर काबू करना नहीं है, इसका तरीका इंसानों को अपने कामों के बारे में अधिक चेतन बनाना है।

हम वहीं पहुंच रहे हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तकनीक क्या है, कभी किसी तकनीक या क्षमता में किसी वृद्धि को समस्या नहीं होना चाहिए। अगर मनुष्य की क्षमता बढ़ जाए, तो क्या उसे समस्या बन जाता चाहिए? वह हमेशा किसी न किसी चीज के लिए समाधान होता है। मगर हम उसे समस्या बना देते हैं क्योंकि हम उसे बाध्यकारी(मजबूरी से भरे) तरीके से इस्तेमाल करते हैं। इसका तरीका तकनीक पर काबू करना नहीं है, इसका तरीका इंसानों को अपने कामों के बारे में अधिक चेतन बनाना है।

 
 
 
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