ईशा-यूए.स.ए. बेहद सक्रिय होने जा रहा है
इस हफ्ते के स्पॉट में सद्‌गुरु ह्यूस्टन कार्यक्रम के बारे में लिख रहे हैं जिसमें 964 लोगों ने हिस्सा लिया। और साथ ही अमेरिका में होने जा रहे हैं चुनावों पे विचार कर रहे हैं।
 
 
 
 

प्रिय अमेरिका एक बार फिर चुनावों की तरफ बढ़ रहा है। जब राष्ट्र को नियमित रूप से  देखभाल की जरूरत है, जब देश के लोगों को एक होकर काम करने की जरूरत है तो ऐसे में यह चुनाव प्रचार की वेदना से गुजर रहा है। लोकतंत्र की यही पीड़ा है। अमेरिका एक महान राष्ट्र बनने की एक बेहतरीन कहानी है, हालांकि इसका एक अंधियारा पक्ष भी हैं। लेकिन अंत में इंसान को हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलुओं को तोलना पड़ता है, सौभाग्य से इस महान राष्ट्र की सकारात्मकता इसकी नकारात्मकता पर भारी है। आज तक किसी ने बडे पैमाने पर कोई महान मूल्यों वाली चीज का निमार्ण बिना कठारेता और निर्दयता के नहीं किया। अफसोस की बात है कि मौजूदा चेतना के दौर में यही चीजें काम कर रही हैं। अगर कभी हमें प्रेम और खुशियों से देश का निमार्ण करना हो, तो इसके लिए बड़े स्तर पर मानव चेतना को जगाने का विशाल लक्ष्य पूरा करना होगा।

बतौर राष्ट्र भारत का निर्माण मुख्‍य रूप से शांतिपूर्ण ढंग से हुआ था, जिसका सारा श्रेय महात्मा गधी की राजनीतिक प्रवीनता को जाता है। लेकिन आजाद भारत के जन्म के तुरंत बाद ही देश में बड़े पैमाने पर हिंसा फैल गई, जो आगे चल कर शांति के इस दूत की हत्या की बायस बनी। बंटवारे के समय हुई हिंसा की परछाईं आज भी बीच-बीच में होने वाले युद्धों, आंतकी घटनाओं व दंगों में दिखाई देती हैं। मानव इतिहास के अब तक के चक्र को हमेशा रक्त से सींचा गया है। आज हमारे सामने जो बड़ा सवाल सिर उठाए खड़ा है, वह है कि क्या हम अपने भविष्य को इससे अलग हटकर कुछ बनाएंगे।

अमेरिका में आयोजित इनर इंजीनियरिंग कार्यक्रम के समापन के मौके पर शामिल होने के लिए हम ह्यूस्टन से टेनेसी की तकरीबन एक हजार मील की लंबी दूरी एक दिन में कार से तय करके अभी आश्रम में पहुंचे ही हैं। इस कार्यक्रम में 964 लोगों ने हिस्सा लिया; यह अब तक का अमेरिका में सबसे बड़ा कार्यक्रम रहा।  इसमें शानदार लोगों ने हिस्‍सा लिया और लोगों ने एक उत्कृष्ट संगठन का नमूना पेश किया, यहां के अपने शिक्षकों और स्वयंसेवकों को मैं सलाम करता हूं। इस कार्यक्रम के लिए वे लगभग पिछले दो महीनों से लगातार काम कर रहे थे। इस विशाल कार्यक्रम के आयोजन का प्रयास अपने आप में आत्मरूपांतरण की मौन क्रांति  की शुरुआत की एक गंभीर कोशिश है। मनुष्य का तकनीकी सशक्तिकरण जिस तरह से इंसान को अतिमानवीय शक्‍ति प्रदान कर  रहा है, ऐसे में अगर समग्र चेतना का ध्यान नहीं रखा गया तो यह एक खतरनाक स्थिति हो सकती है। आज एक अकेला मानव वो करने में सक्षम है, जो सौ साल पहले एक हजार आदमी नहीं कर सकते थे, इसलिय यह अतिआवश्‍यक है कि अब इंसान अपनी विवशताओं से बाध्‍य होकर कार्य ना करे। आज दुनिया में जिस सबसे महत्वपूर्ण काम की जरूरत है, वह है मानव चेतना की वृद्धि। इससे अभी करना होगा इससे पहले कि बहुत देर हो जाए ।

आने वाले साल में ईशा-यूए.स.ए. बेहद सक्रिय होने जा रहा है – इसके लिए हम तैयार रहें ।

Love & Grace

 
 
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