प्रश्‍न: सद्‌गुरु, पिछले तीन दिन का हमारा अनुभव बहुत शानदार रहा है, यह कार्यक्रम पूरी तरह से त्रुटिहीन रहा। मुझे लगता है बहुत से संगठन ऐसी सेवा देना चाहते होंगे। ईशा अपने काम को किस तरह से अंजाम देता है? आपने इस संगठन को कैसे खड़ा किया और इस स्तर तक किस तरह से ले आए?

अपनी युवावस्था के शुरुआत से ही मैं सभी तरह की संगठनों से दूर ही रहा हूं। मैं काफी समय तक कोई संगठन बनाने से भी कतराता रहा। लेकिन जब बहुत ज्यादा लोग इकट्ठे हो गए और बिल्कुल जरूरी लगने लगा, तब हमें इसे बनाना पड़ा। वरना देश के एक कोने से दूसरे कोने में घूमते रहने की आजादी मुझे सचमुच बहुत अच्छी लगती थी। कहीं भी जा कर वहां के लोगों के अंदर एक आग पैदा कर देना और वहां से कहीं और चले जाना बहुत अच्छा लगता था। किसी को पता भी नहीं होता था कि मैं कहाँ हूं, जब तक कि मैं खुद दोबारा वहां नहीं पहुंचता था। मैंने एक लंबे अरसे तक ऐसी जिंदगी जी थी, शायद दस साल से भी ज्यादा। ईशा को एक संगठन कहना गलत होगा, क्योंकि आपको पता है कि हमारी परंपरा में कुछ योगियों का वर्णन ‘हजार भुजाओं वाले इंसान’ के रूप में किया जाता है। ईशा एक बहुत बड़ा प्राणी है, शुरू में इसके कई हाथ थे, धीरे-धीरे हम इसके कई सिर भी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और हम निश्चित रूप से उस दिशा में बड़े कारगर तरीके से आगे बढ़ रहे हैं। 

जो कुछ मेरे अंदर घटित हुआ था वो सब मैं लोगों तक पहुंचाना चाहता था। मेरे भीतर एक ऐसे आयाम ने मुझे स्पर्श किया जिसने मेरा सबकुछ बदल कर रख दिया और यह सब महज कुछ घंटो में ही घटित हुआ था। मैं अपने वही अनुभव लोगों तक पहुंचाना चाहता था और यही मैं आज भी कर रहा हूं। इससे मेरी व्यस्तता बढ़ती चली गई। कुछ थोड़े-से लोगों के साथ ऐसा करने में मुझे बड़ी कामयाबी मिली। लेकिन जब मैंने इसे चाहने वाले लोगों  की संख्या देखी, तो महसूस हुआ कि ये दो हाथ इस काम के लिए काफी नहीं हैं, इसलिए मैंने अपने हाथों की संख्या बढ़ाने का फैसला किया। ईशा और कुछ नहीं, ये मेरे हाथ हैं जो मैंने बढ़ाए हैं, जिनकी संख्या कुछ लाखों में होगी।

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यह एक ऑर्गेनाइजेशन (संगठन) नहीं बल्कि एक ऑर्गेनिज्म (जीव) है। यही वजह है कि यह अपनी खुद की बुद्धि से काम करता है, लेकिन खुद के तंत्र के खिलाफ काम नहीं करता। आपके हाथ ने कभी आपको घूंसा नहीं मारा होगा, ऐसा कभी नहीं होता। हो सकता है कभी यूं ही अचानक आप अपने पैरों के लड़खड़ाने से गिर गए होंगे, पर ऐसा भी विरले ही होता है। जो लाखों-करोड़ों कदम आपने उठाए हैं, उनमें से शायद दो-चार बार ही ऐसा हुआ होगा कि आप अपने ही पैरों पर लड़खड़ा कर गिर पड़े हों। इतना तो संभाला और बरदाश्त किया जा सकता है, क्योंकि इससे आपकी जान नहीं जाएगी! ईशा एक बहुत बड़ा प्राणी है, शुरू में इसके कई हाथ थे, धीरे-धीरे हम इसके कई सिर भी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और हम निश्चित रूप से उस दिशा में बड़े कारगर तरीके से आगे बढ़ रहे हैं।

लोगों को किसी भी तरह से इस अनुभव के करीब लाना, चाहे थोड़ा ही सही, ईशा के होने का आधार है। यहां हर किसी में एक आग है जो किसी मकसद को लेकर नहीं है, बल्कि अनुभव को लेकर है।बहुत से हाथ बनाने से ज्यादा चुनौती भरा काम है बहुत से सिर बनाना। पहले सारे-के-सारे हाथ एक ही सिर से निर्देश लेते थे; अब जब हम इसको बहुत-से सिरों वाला बना रहे हैं, तो हम थोड़ी सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं, और हमें बड़ी कामयाबी भी मिल रही है। अब अगर मैं छह महीने तक यहां न रहूं, तो भी योग सेंटर में या यहां होने वाली हमारी किसी भी बड़ी गतिविधि के स्तर में कोई गिरावट नहीं आती। मेरी जरूरत तभी पड़ती है जब कोई नया काम शुरू करना होता है। जो गतिविधियां चल रही हैं उनके लिए मेरी कोई जरूरत नहीं होती। एक दिन बीस-पच्चीस साल की उम्र के कुछ लोग हमारे शिक्षकों के साथ किसी कार्यक्रम में भाग लेने के बाद, आ कर मुझसे बोले, “सद्‌गुरु, जिसने मुझे सिखाया वो बहुत अच्छे हैं यहां तक कि वे आपसे भी बेहतर हैं।” ऐसा होना ही चाहिए ! वे मुझसे इसलिए बेहतर होंगे क्योंकि उनको मैंने ट्रेनिंग दी है, पर मुझे तो किसी से ट्रेनिंग नहीं मिली! तो यह एक प्राणी के रूप में काम कर रहा है। अगर सैकड़ों-हजारों लोगों को एक इकाई के रूप में काम करना हो, तो उन सबको ऐसे शामिल करना होगा कि वे एक इकाई की तरह हो जाएं, वरना एैसा नहीं होगा। यह कोई कारोबारी नुस्खा नहीं है। इसके पीछे लोगों को निचोड़ने का मकसद भी नहीं है। मैं टैलेंट(प्रतिभा) और मार्केट जैसे भद्दे शब्दों का बस यहीं(आश्रम में आयोजित इनसाईट प्रोग्राम के दौरान) इस्तेमाल कर रहा हूं, वरना अपनी जिंदगी में मैं कभी भी ऐसे शब्द इस्तेमाल नहीं करता। क्योंकि इंसानों को एक मार्केट या बाजार की तरह समझना मेरी नजर में अभद्रता और अशिष्टता है। किसी बिजनेस-मीटिंग में बैठ कर मार्केट जैसे शब्द बोल लेना ठीक है, वरना अपनी जिंदगी में मैं कभी भी यह शब्द नहीं बोलता। मैं तो किसी साग-सब्जी को भी एक प्रॉडक्ट(उत्पाद) के रूप में नहीं देखता। जो पानी मैं पीता हूं, जो खाना मैं खाता हूं या जिस जमीन पर मैं चलता हूं, उसको मैं किसी पदार्थ की तरह नहीं देखता। मैं अपने विचारों में नहीं, बल्कि अपने अनुभव में, इन सबको जीवन रचनेवाले तत्‍व के रूप में देखता हूं। जिस जमीन पर आप चलते हैं, जो खाना आप खाते हैं, जो पानी आप पीते हैं, जो हवा आप अपनी सांसों में लेते हैं, वे सब भौतिक पदार्थ नहीं हैं, वे जीवन रचने वाले तत्‍व हैं, जिनके बिना आप एक पल भी जिंदा नहीं रह सकते।

तो लोगों को किसी भी तरह से इस अनुभव के करीब लाना, चाहे थोड़ा ही सही, ईशा के होने का आधार है। यहां हर किसी में एक आग है, वो किसी मकसद को लेकर नहीं है, बल्कि अनुभव को लेकर है। अगर हम सारे प्रोजेक्ट्स और हाथ में लिए हुए सारे काम छोड़ कर यूं ही बैठे रहें, तो भी ये लोग ऐसे ही रहेंगे। क्योंकि ये किसी मकसद से ऐसा नहीं कर रहे। किसी मकसद को लेकर काम करना कारोबार के लिए बहुत अच्छी चीज है, जैसा कि हम पिछले कुछ दिनों से कहते आ रहे हैं। लेकिन इन लोगों में एक भीतरी अनुभव की आग है, जिसकी किसी से बराबरी नहीं की जा सकती।

मैं जो भी करता हूं, जो कुछ हाथ में लेता हूं, मेरे लिए वह मेरी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है, क्योंकि मैं प्रेम का दिखावा नहीं करता हूं, मैं जिस किसी चीज के भी संपर्क में आता हूं, उसके साथ मेरा प्रेम जीवन भर के लिए हो जाता है।