प्रश्न: आपकी किताब 'इनर इंजीनियरिंग - ए योगीज़ गाईड टू जॉय' में आपने कहा है कि हमें साफ तस्वीर, स्पष्ट विचार पाने के लिये अपने एंटीना को सही दिशा में लाने की ज़रूरत है, जिससे हमें आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। क्या आप इसे विस्तार से समझा सकते हैं?

सद्‌गुरु: अगर मैं सिर्फ किसी के बैठने का तरीका देखूँ तो बता सकता हूँ कि अगले 10 से 15 सालों में उसे किस तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ेगा। आपके आकार की ज्यामिति कुछ खास चीजों की वजह बन जाती है - जिसमें आप कुछ नहीं कर पाते। इस संस्कृति में, हमनें 'कैसे बैठें', 'कैसे साँस लें, 'अपने शरीर को कैसे रखें', 'अपने मन को कैसे रखें' जैसी बातों के लिये एक बहुत ही गहन विज्ञान बनाया। अगर आप उस ज्यामिति को सही कर लें तो आपकी समझ बढ़ जायेगी। सिर्फ अपनी समझ को बढ़ा कर ही आप अपने जीवन को उन्नत कर सकते हैं - बाकी सब कल्पनायें हैं। मैं जानता हूँ कि कल्पनाओं को बहुत महत्व दिया जाता है पर हमें ये समझना चाहिये कि कल्पना और कुछ नहीं, सिर्फ हमारी याददाश्त का ही एक दूसरा रूप है। केवल अपनी समझ की सीमाओं को बढ़ा कर ही हम अपने जीवन को उन्नत कर सकते हैं।

आपकी अद्भुत प्रतिभा और समझ को बढ़ाने के लिये वैज्ञानिक रूप से जाँचे-परखे तरीके हैं। मैं जब मनुष्य की अद्भुत प्रतिभा की बात करता हूँ तो वह कविता लिखने या चित्र बनाने के बारे में नहीं है। आपके अंदर एक मूल प्रज्ञा है जो इस मानवीय प्रणाली को काम करने देती है।

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जब आप किसी भावनात्मक मोह के बिना इस मनुष्य की ओर देखते हैं, जो आप हैं - एक तंत्र की तरह, एक व्यवस्था की तरह - तब आप देखेंगे कि ये पृथ्वी की सबसे अच्छी बनावट की मशीन है। और आप इसे किससे बना रहे हैं? मान लीजिये, आप एक फल खा रहे हैं, जैसे केला, तो ये आपके अंदर जाता है और डेढ़ से दो घंटों में ये केला एक मनुष्य बन जाता है। तो यहाँ एक ऐसी प्रज्ञा है जो किसी फल, सब्जी या जो भी चीज़ हम खाते हैं, उसे एक जटिल मशीन में बदल देती है। जब तक कोई प्रज्ञा इसके लिये काम न कर रही हो, तब तक ये कैसे हो सकता है? पर अभी इस प्रज्ञा के बारे में आप अनजान हैं।

अगर आप अपनी प्रणाली को आराम की अवस्था में ले आते हैं, तो आप देखेंगे कि आपके पास एक प्रज्ञा है जो आपकी बुद्धि से परे, हर समय काम करती रहती है। आप अपनी बुद्धि की वजह से जीवित नहीं है।

योग की पूरी प्रणाली आपको आराम के एक खास स्तर पर लाने के लिये ही है, जिससे आपमें जड़ता न आ जाये। “जड़ता” से मेरा मतलब है कि विकास के पैमाने पर मनुष्य का मन एक नयी घटना है, चूंकि आप नहीं जानते कि इसका प्रभावी उपयोग कैसे करें, तो ये कुछ मात्रा में जड़ता ला देता है। ये वैसे ही है जैसे कोई बच्चा रेडियो के साथ खेल रहा हो - आपको सभी तरह के बेमतलब के शोर सुनाई पड़ेंगे।

अगर आप अपनी प्रणाली को आराम की अवस्था में ले आते हैं, तो आप देखेंगे कि आपके पास एक प्रज्ञा है जो आपकी बुद्धि से परे, हर समय काम करती रहती है। आप अपनी बुद्धि की वजह से जीवित नहीं हैं। अगर आप हमारी परिस्थिति को देखें - हम एक गोल ग्रह पर हैं जो स्थिर नहीं है - ये तेजी से अपनी धुरी पर घूम रहा है - और इस ब्रह्मांड में, जिसे कोई नहीं जानता कि ये कहाँ शुरू होता है और कहाँ खत्म, फिर भी हम इन सब बातों की चिंता किये बिना, अपना जीवन चला सकते हैं। आपके अंदर, आपके चारों ओर, हर तरफ, एक ज्यादा गहरी प्रज्ञा काम कर रही है। तो मनुष्य की कोशिश और उसका संघर्ष इस आयाम तक अपनी पहुँच बनाने के लिये ही होने चाहियें।

धरती पर चलने तक के लिये भी आपको शेष ब्रह्मांड के साथ एक खास संतुलन में होना पड़ता है। आपने देखा होगा कि जो लोग थोड़ी ज्यादा पी लेते हैं, उन्हें चलने के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है। चलना भी आसान चीज़ नहीं है। ये सब आपकी बुद्धिमत्ता से नहीं हो रहा है - ये आपके अंदर की प्रज्ञा के एक ज्यादा गहरे आयाम की वजह से हो रहा है। अगर आप प्रज्ञा के इस आयाम को छू पाते हैं तो आप सतही तर्क से जीवन के जादू की ओर बढ़ेंगे।

संपादकीय टिप्पणी: 'इनर इंजीनियरिंग - ए योगीज़ गाईड टू जॉय' अब अमेरिका, यूके और भारत में बिक्री के लिये उपलब्ध है। अपनी कॉपी के लिये आज ही ऑर्डर दें।