शिव और सप्‍तऋषि : योग का उदय काल
आज जिस भी चीज़ को हम योग के नाम से जानते हैं, उसकी शुरुआत कई सालों पहले भगवान शिव द्वारा की गयी थी। वैज्ञानिक तथ्य भी यह बताते हैं कि करीब पचास हज़ार साल पहले मानव चेतना में एक जबरदस्त उछाल आया था...
 
शिव और सप्‍तऋषि: योग का उदय काल
 

सद्गुरुआज जिस भी चीज़ को हम योग के नाम से जानते हैं, उसकी शुरुआत कई सालों पहले भगवान शिव द्वारा की गयी थी। वैज्ञानिक तथ्य भी यह बताते हैं कि करीब पचास हज़ार साल पहले मानव चेतना में एक जबरदस्त उछाल आया था...


आधुनिक मानवशास्त्र और विज्ञान के मुताबिक आज से करीब पचास हजार साल और सत्तर हजार साल पहले के बीच कहीं कुछ घटित हुआ। इन बीस हजार सालों के दौरान कुछ ऐसा हुआ, जिसने अचानक मानव जाति में बुद्धि को एक अलग स्तर तक पहुंचा दिया। इंसानों में बुद्धि और चेतना का अचानक विस्फोट सा हुआ, जो सामान्य विकास के क्रम में नहीं है। उस समय कुछ ऐसी प्रेरक घटनाएं हुईं जिसने उस समय के मानव की बुद्धि और चेतनता के विकास को एकदम से तीव्र कर दिया। योगिक परंपरा के मुताबिक यही वो समय था जब हिमालय क्षेत्र में योगिक प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी।

आदियोगी ने अपने सात शिष्यों यानी सप्तऋषियों के साथ दक्षिण का रुख किया। उन्होंने जीवन-तंत्र की खोज करनी शुरू कर दी, जिसे आज हम योग कहते हैं। मानवता के इतिहास में पहली बार किसी ने इस संभावना को खोला कि अगर आप इसके लिए कोशिश करने को इच्छुक हैं, तो आप अपनी पूरी चेतना में अपनी वर्तमान अवस्था से दूसरी अवस्था में विकसित हो सकते हैं। आदियोगी ने बताया कि आपका जो वर्तमान ढांचा है, यही आपकी सीमा नहीं है। आप इस ढांचे को पार कर सकते हैं और जीवन के एक पूरी तरह से अलग पहलू की ओर बढ़ सकते हैं।

ज्ञान की इस आग को आदियोगी के सात शिष्य दुनिया के अलग अलग हिस्सों में ले गए। इनमें से एक ऋषि को भारत के दक्षिण में भेजा गया, दूसरे को मध्य एशिया भेजा गया, तीसरे को उत्तरी अफ्रीका में मध्य पूर्व भेजा गया।

आदियोगी ने बताया कि आपका जो वर्तमान ढांचा है, यही आपकी सीमा नहीं है। आप इस ढांचे को पार कर सकते हैं और जीवन के एक पूरी तरह से अलग पहलू की ओर बढ़ सकते हैं।
एक ऋषि दक्षिण अमेरिका तो एक दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में चले गए। एक शिष्य ने कभी अपना मुंह नहीं खोला और न ही कोई उपदेश दिया, लेकिन उनकी मौजूदगी ने बड़े-बड़े काम किए।

उस ज्ञान के प्रसार के लिए इन सात लोगों को भेजा गया। योगिक कथाओं में कई तरह से इसका वर्णन है, लेकिन आप यह कह कर आसानी से इसका मजाक उड़ा सकते हैं कि क्या आप यह साबित कर सकते हैं? नहीं हम इसे साबित नहीं कर सकते, लेकिन क्या आप इसे गलत साबित कर सकते हैं? नहीं कर सकते। इसलिए यह बस ऐसा ही चला आ रहा है।

आखिर इसका कहीं न कहीं से कुछ न कुछ प्रभाव तो रहा है, न केवल मानवीय चेतना को आकार देने में, बल्कि मैं तो कहूंगा कि इंसानी शरीर के मामले में भी। यह कोई दूसरे ग्रह के प्राणी से संबंधित घटना नहीं है। कुछ न कुछ ऐसा हुआ, जो विकास की सामान्य प्रक्रिया से परे था। वह क्या है, यह बहस का विषय हो सकता है। लोग इसके बारे में लंबी बहस कर सकते हैं, क्योंकि इसे न तो आप सही साबित कर सकते हैं और न ही गलत।

इस श्रृंखला के अगले भाग में पढ़ें  प्राचीन काल के योग पुरुषों के बारे में...

संपादक की टिप्पणी: जानें शिव के अन्य आयामों के बारे में, पढ़ें यह ब्लॉग

 
 
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