प्रश्न: सद्‌गुरु, क्या आप हमें सहस्रार के मार्ग के बारे में बता सकते हैं? उसकी प्रकृति क्या है? क्या किसी का कोई उदाहरण है जो उस परंपरा से संबंध रखता हो? सद्‌गुरु: सहस्रार कोई मार्ग नहीं है। जब हम मार्ग शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका मतलब होता है - एक सीमाओँ में बँधा, स्थापित रास्ता। सीमा में बाँधने के लिए आपको एक भौतिक स्थान की जरूरत होती है। सहस्रार कोई भौतिक स्थान नहीं है। शरीर के भूगोल में उसकी मौजूदगी है, मगर वह किसी भौतिक स्थान का प्रतीक नहीं है। इसलिए, उससे जुड़ा कोई मार्ग नहीं है।

रामकृष्ण परमहंस काफी समय सहस्रार अवस्था में थे

इसे लेकर कई कहानियां हैं मगर एक प्रभावशाली उदाहरण होगा, तोतापुरी और रामकृष्ण परमहंस का। रामकृष्ण सहस्रार में बहुत अधिक रमे हुए थे इसलिए उनका लंबे समय तक जीवित रहना मुश्किल था। क्योंकि यह ऐसा स्थान नहीं है, जहां आप भौतिक शरीर में बने रह कर धरती पर मौजूद रह सकते हैं। वह आनंदपूर्ण और शानदार अवस्था है, मगर वह शरीर में बने रहने लायक स्थान नहीं है, वह ‘जाने वाला’ स्थान है। आप बीच-बीच में उसे छूकर वापस आ सकते हैं। जब कोई व्यक्ति वहां लंबे समय तक रहता है, तो उसका शरीर साथ छोड़ देता है।

सभी देवताओं में शिव सबसे बलवान और ऊर्जावान हैं। इसका मतलब है कि वह सक्रीयता(एक्शन) के प्रतीक हैं, मगर वह भी कई बार सहस्रार में होने के कारण उन्मत्त(नशे से भरे) रहते हैं। 
आपने सुना होगा कि तोतापुरी ने शीशे का एक टुकड़ा लेकर रामकृष्ण के आज्ञा चक्र पर वार कर दिया ताकि सिर्फ परमानंद में तैरते रामकृष्ण को स्पष्टता और बोध तक नीचे लाया जाए। क्या परमानंद में तैरना अच्छी बात नहीं है? यह बहुत बढ़िया है मगर उस स्थिति में आप न तो काम कर सकते हैं और न ही कुछ प्रकट कर सकते है। यह स्थिति नशे जैसी होती है। यह अवस्था बहुत बढ़िया और अस्तित्व संबंधी रूप में शानदार होती है, मगर आप उन अवस्थाओं में काम नहीं कर सकते। चाहे आप काम कर भी लें, तो आप बहुत प्रभावशाली नहीं होंगे। यह भौतिक और अभौतिक के बीच एक धुंधली दुनिया है।
मूलाधार शरीर का सबसे बुनियादी चक्र है। मूलाधार साधना पीनियल ग्लैंड से जुड़ी है, और इस साधना से तीन बुनियादी गुण सामने आ सकते हैं। जानते हैं इन गुणों के बारे में।  मूलाधार चक्र की साधना करने के तीन प्रमुख फायदे

सहस्रार अवस्था में दुनिया में कुछ करना मुश्किल होता है

इसलिए हम सहस्रार के बारे में जितना कम कहें, उतना बेहतर होगा क्योंकि अभी हमारा एक मिशन है। इसलिए हम धुंधले होने का खतरा नहीं उठा सकते। हम यहां-वहां, थोड़ी बहुत पार्टी करते रहते हैं, भाव स्पंदन और सत्संग करते हैं, मगर फिर हम अपना ध्यान उस पर केंद्रित रखना चाहते हैं, जो हमें करने की जरूरत है। अगर हर कोई सहस्रार में होगा, तो यह सब कुछ संभव नहीं होगा। और अगर हर कोई वहां रहना शुरू कर देगा, तो वे लंबे समय तक दुनिया में नहीं रह पाएंगे, वे दुनिया से चले जाएंगे। आपने उस परंपरा से उदाहरण की बात पूछी है - ऐसी कोई चीज नहीं है। आपने शिव की परमानंद अवस्था के बारे में सुना होगा, जिसमें कोई उन तक पहुंच नहीं सकता। इतना केंद्रित और तीव्रता वाला देव अचानक से उन्मत्त(नशे से भरा) और अनुपलब्ध हो जाता है। इसकी वजह यह है कि उन दिनों वे सहस्रार में होते थे। इतनी तीव्रता और फोकस वाले देव भी इतने नशे में होते थे कि उनके लिए कुछ करना मुश्किल था। सभी देवताओं में शिव सबसे बलवान और ऊर्जावान हैं। इसका मतलब है कि वह सक्रीयता(एक्शन) के प्रतीक हैं, मगर वह भी कई बार सहस्रार में होने के कारण उन्मत्त(नशे से भरे) रहते हैं। तो यह कोई मार्ग नहीं है। आप सहस्रार में इसलिए जाते हैं क्योंकि आप खुद को खोना चाहते हैं, इसलिए नहीं कि आप खुद को पाना चाहते हैं। जब आपको खोने का मन करे तो आपके लिए सहस्रार है। जब आपको खुद को पाने का मन करे तो आपको किसी मार्ग पर चलने की जरूरत है। क्या खोने की भी कोई परंपरा है? हां है, मगर आप उसे कोई रूप या आकार नहीं दे सकते।

मानव शरीर में 112 चक्र होते हैं, लेकिन आदियोगी शिव ने इन्हें सात वर्गों में बांटा था और सप्त ऋषियों को दीक्षित किया था। इसी वजह से ये आम तौर पर सात चक्रों के रूप में जानें जाते हैं। जानते हैं... शरीर के 112 चक्रों को 7 चक्रों के रूप में क्यों जाना जाता है?

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