पर्यावरण दिवस: आप ही बदलाव ला सकते हैं

हमारी पीढ़ी ने पृथ्वी का सबसे बड़ा नुकसान किया है। आज हम पर्यावरण के लिए जो कुछ भी कर रहे हैं, वह न तो सेवा है, न ही कोई बड़ी उपलब्धि, यह हमारे जीने-मरने का सवाल है।
 

हमारी पीढ़ी ने पृथ्वी का सबसे बड़ा नुकसान किया है। आज हम पर्यावरण के लिए जो कुछ भी कर रहे हैं, वह न तो सेवा है, न ही कोई बड़ी उपलब्धि, यह हमारे जीने-मरने का सवाल है। गौर से देखें तो आज खतरे में धरती नहीं, हम हैं। वैज्ञानिक इस नुक्सान का मुख्य कारण कार्बन डाई ऑक्साइड की बढ़ती मात्रा को बता रहे हैं, और इसका समाधान हर व्यक्ति के कार्बन फुटप्रिंट को कम करना बता रहे हैं। क्या है यह कार्बन फुटप्रिंट और इसे कैसे कम करें?

 

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। दुर्भाग्यवश, हम ऐसे युग में रह रहे हैं, जब मनुष्य की चेतना इतनी बंटी हुई है कि हम भूल गए हैं कि असल में ‘पर्यावरण जैसी कोई चीज ही नहीं है। अगर कोई व्यक्ति चाहे, तो वह खुद में पूरी दुनिया को महसूस कर सकता है। इस विकल्प को न आजमाने के कारण ही मानवता और पर्यावरण अलग-अलग चीजें लगती हैं।

पेड़ हमारे सबसे निकट संबंधी हैं। पेड़ जो सांस छोड़ते हैं, हम उसे अंदर लेते हैं, हम जो सांस छोड़ते हैं, उसे वे अंदर लेते हैं। वे हमारी आधी श्वसन प्रणाली हैं। आध्यात्मिकता ऊपर या नीचे देखने का नाम नहीं है, यह अपने अंदर झांकने का नाम है। अपने भीतर देखने पर आपको पहली बुनियादी सच्चाई यह पता चलती है कि आप अपने आस-पास की हर चीज का एक हिस्सा हैं। इस ज्ञान के बिना कोई आध्यात्मिक प्रक्रिया नहीं होती है।

पर्यावरण और मानव चेतना को अलग नहीं किया जा सकता। इंसान की असंवेदनशीलता के कारण ही आज हमें दुनिया को बचाने की बात करनी पड़ रही है, जो एक मूर्खतापूर्ण विचार है। क्योंकि धरती मां हमारी सुरक्षा करती हैं, हम उनकी नहीं। इन सब चीजों की कोई जरूरत ही नहीं होगी, अगर इंसान यह बात समझ जाए कि चाहे हम ये पसंद करें, या नहीं करें, हम इस अस्तित्व का एक हिस्सा हैं।

आज आधुनिक विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि यह पूरा अस्तित्व एक ऊर्जा है। आपके शरीर का हर कण लगातार ब्रह्मांड के संपर्क में है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है जो आपकी ज़िन्दगी को नहीं बदलता। लेकिन आध्यात्मिक प्रक्रिया इस बोध को बढ़ाते हुए इस तथ्य को आपके लिए एक जीवंत अनुभव बना देती है। योग का अर्थ है, संयोग। संयोग का मतलब है कि व्यक्ति के स्व की सीमाएं नष्‍ट हो जाती हैं और आप दुनिया को अपने साथ एकाकार महसूस करते हैं। यह बात अगर आपके लिए एक जीवंत अनुभव बन जाए, फिर आप स्वाभाविक रूप से अपने आस-पास की चीजों का उसी तरह ध्यान रखते हैं, जैसे अपना।

1998 में, विशेषज्ञों की एक टीम ने भविष्यवाणी की थी कि 2025 तक तमिलनाडु एक रेगिस्तान बन जाएगा। मुझे भविष्यवाणियां पसंद नहीं हैं। लोग आंकड़ों और संख्याओं के आधार पर भविष्यवाणियां करते हैं, वे इन बातों को ध्यान में नहीं रखते कि इंसान की आकांक्षा और इच्छा क्या है और उसके हृदय में क्या धड़कता है। मैंने तमिलनाडु का एक चक्‍कर लगाकर देखने का फैसला किया। मैंने पाया कि शायद हम 2025 तक भी न पहुंच पाएं! छोटी नदियां सूख चुकी थीं और नदियों के तट पर घर बन चुके थे। वहां की मिट्टी में खजूर के पेड़ों तक के लिए पर्याप्त नमी नहीं बची थी, जबकि खजूर के पेड़ रेगिस्तानी इलाकों में उगने वाले पेड़ हैं।

इसलिए, हमने 12 करोड़ 40 लाख पेड़ लगाने के लिए प्रोजेक्ट ग्रीन हैंड्स नामक एक परियोजना शुरू की। पहले सात साल हमने लोगों के दिमाग में पेड़ लगाए, जो सबसे मुश्किल इलाका होता है! ऐसा हो जाने पर, उन पेड़ों को जमीन पर लगाना अधिक आसान होता है। मेरा आंकड़ा सुन कर मेरे आस-पास हर कोई डर गया। मैंने उनसे पूछा: ‘तमिलनाडु की जनसंख्या क्या है?’ जवाब मिला, ‘6 करोड़ 20 लाख।’ मैं बोला, ‘अगर हम सब लोग आज एक पेड़ लगाएं, उसे कुछ सालों तक सींचें और फिर एक और पेड़ लगाएं, तो यह लक्ष्य पूरा हो जाएगा।

एक पेड़ अपने जीवन काल में एक टन कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बन और ऑक्सीजन में बदलता है।

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क्या है यह कार्बन फुटप्रिंट और इसे कैसे कम करें?

किसी एक व्यक्ति का हमारे पर्यावरण पर क्या असर होता है, इसे नापने के लिए वैज्ञानिकों ने कार्बन फुटप्रिंट नाम का सिद्धांत दिया है। करीब-करीब वे सारे काम जो हम रोजाना करते हैं, या हम जिन भी साधनों का इस्तेमाल करते हैं, उन सब से कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) निकलता है। औद्योगिक क्रांति से पहले मनुष्यों द्वारा पैदा किया गया जितना भी कार्बन डाई ऑक्साइड वातावरण में आता था, वह आसपास के जंगलों और पेड़ – पौधों द्वारा सोख लिया जाता था। जंगल व पेड़ – पौधे कार्बन डाई ऑक्साइड को सोख कर ऑक्सीजन को वापस हवा में छोड़ देते हैं। और वे कार्बन को अपने भीतर जमा कर लेते हैं।

औद्योगिक युग के शुरुआत के साथ ही ईधन का प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगा जिससे कार्बन डाई ऑक्साइड भारी मात्रा में निकलने लगी । साथ ही, बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए खेती के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए, जो कार्बन सोखने का काम करते थे। आज स्थिति यह है कि जितना कार्बन डाई ऑक्साइड वातावरण में पैदा होती है, उसे सोखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पेड़ ही नहीं बचे हैं।

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कार्बन डाइऑक्साइड क्या करती है?

कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में ’ग्रीन हाउस गैस’ के रूप में काम करती है। इस का मतलब है कि वह सूर्य की गर्मी को रोक लेती है। आज धरती के तापमान को बढ़ाने में ’ग्रीन हाउस गैस’ ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। इसकी वजह से मौसम में बदलाव आए हैं – गर्मी के मौसम में गरमी बढ़ी है, बेमौसम बरसात होने लगी है, सूखे और बाढ़ का प्रकोप भी बढ़ा है, सर्दी के मौसम में ठंड बढ़ी है। इन बदलावों का असर मनुष्य सहित पेड़ पौधों व पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवों पर भी हो रहा है।

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हम क्या कर सकते हैं?

जहां तक हो सके ज्यादा से ज्यादा पैदल चलें, स्थानीय और रिसाइकिल्ड उत्पादों का प्रयोग करें, स्थानीय चीजों का सेवन करें।

इंसान के पास अपने कार्बन फुटप्रिंट कम करने के कई तरीके हैं। एक तरीका तो यह है कि आपके द्वारा  कम से कम कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में बढ़े। इसका मतलब है कि आप सोच समझ कर चीजों का इस्तेमाल करें, रीसाइकिलिंग करें, सार्वजनिक यातायात का इस्तेमाल करें। जहां तक हो सके ज्यादा से ज्यादा पैदल चलें, स्थानीय और रिसाइकिल्ड उत्पादों का प्रयोग करें, स्थानीय चीजों का सेवन करें।

कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने का दूसरा तरीका इसको सोखना है। वृक्षारोपण इसका सबसे आसान और प्रभावशाली तरीका है। एक पेड़ अपने जीवन काल में एक टन कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बन और ऑक्सीजन में बदलता है।

 

आप ‘कार्बन-न्यूट्रल’ बन सकते हैं, इसका मतलब है कि आप अपने कार्बन फुटप्रिंट को पूरी तरह से मिटाने के लिए उतने पेड़ लगाइए, और उनकी देखभाल कीजिए, जो आप द्वारा उत्सर्जित होने वाले पूरे कार्बन डाइऑक्साइड को सोख ले।

 

तो चलें अभी से वृक्षरोपण में जुट जाएं !

 

पेड़ लगाने के लिए घर बैठे अपना योगदान दें