मृत्यु के लिये तैयारी कैसे करें?

अच्छी तरह से जीने की मनुष्य की इच्छा तो स्वाभाविक है, पर अच्छी तरह मरने के बारे में आप क्या कहेंगे? क्या शालीनता से मरने जैसा कुछ होता है? इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय को सद्‌गुरु यहाँ सुगमता पूर्वक समझा रहे हैं।
Wie bereitet man sich auf den Tod vor?
 

 

प्रश्नकर्ता: मेरा एक सवाल है। मेरा एक बहुत प्रिय मित्र कैंसर के आखरी चरण में है। क्या हम ऐसा कुछ कर सकते हैं जिससे वो इसमें से निकल जाये और ठीक हो जाये?

सद्‌गुरु: मैं आपके मित्र के बारे में किसी दुर्भावना के साथ ये नहीं कह रहा, पर मैं चाहता हूँ कि
आप ये समझें कि लोगों के लिये मरना भी ज़रूरी है। कब और कैसे, बस यही प्रश्न है! 
अगर मृत्यु आती है तो अपने आप को बचाने की हम हरसंभव कोशिश करेंगे, पर अगर बात उससे
आगे जाती है तो हमें सीख लेना चाहिये कि शालीनता के साथ कैसे मरें। जिस तरह से पश्चिमी देशों
में लोग मर रहे हैं - मृत्यु के साथ एक अंतहीन लड़ाई लड़ते-लड़ते - ये वास्तव में मरने का एक
बेहूदा तरीका है। 85 - 90 की उम्र होने पर भी वे अपने ऊपर सुइयाँ और पाईप्स डाले हुए,
अस्पताल में पड़े रहते हैं। इससे बेहतर तो ये होता कि आप दो साल पहले ही मर जाते। ये ज्यादा
महत्वपूर्ण है कि आप शांति से और शालीनता के साथ मरें। आप अपने जीवन में आखरी काम मरने
का ही करते हैं, तो क्या आपको इसे शालीनता के साथ नहीं करना चाहिये?

आप अपने जीवन में आखरी काम मरने का ही करते हैं, तो क्या आपको इसे शालीनता के साथ नहीं करना चाहिये?

हमें मृत्यु को अपने जीवन के एक भाग के रूप में स्वीकार करना चाहिये। हम मृत्यु की कामना नहीं
कर रहे, पर जब ये आये तो इसमें से शालीनता से गुजरना हमें सीख लेना चाहिये। अमेरिका के बड़े
बूढ़ों के लिये बने खास अस्पतालों में मैंने देखा है कि बहुत से लोग अपने मरने के बाद भी बस
मेडिकल सपोर्ट के सहारे ज़िंदा रहते हैं, जो उनके खुद के और दूसरों के लिये भी यातना है। जिस
तरह से ऐसे अस्पतालों में उनका इलाज होता है, वो अगर आप देखें - कुछ ही समय में वहाँ काम
करने वाले भी परेशान हो जाते हैं, चिढ़ने लगते हैं, क्योंकि ये बीमार बूढ़े कुछ भी नहीं समझते। वे

सबकुछ भूल चुके होते हैं और अपनी सुध- बुध खो बैठते हैं क्योंकि वे अपने समय से ज्यादा जी चुके
हैं। इतने सारे उपकरणों और दवाओं के बिना वे काफ़ी पहले ही मर चुके होते।

अगर किसी का शरीर इतना ज्यादा खराब हो चुका है कि वापस सही हालत में नहीं आ सकता तो
उन्हें शालीनता से मरना सीख लेना चाहिये। हमें उन्हें समझाना चाहिये कि यही ठीक होगा। हम
सभी कतार में ही हैं। मैं किसी की बीमारी का मजाक नहीं बनाना चाहता पर हमें ये समझना
चाहिये कि जहाँ एक चीज़ खत्म होती है, दूसरी शुरू होती है।

शालीनता से जीना और मरना

प्रश्न: पर सद्‌गुरु, उन लोगों को क्या करना चाहिये जिन्हें अपने प्रियजनों को मरते देखना पड़ता
है?

सद्‌गुरु: इस बात को गलत ढंग से लिया जा सकता है, क्योंकि जब किसी का कोई बहुत प्रिय मरता
है तब लोगों को लगता है जैसे उनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा ही छिन गया हो, और वे अपने दुख,
नुकसान और उनकी यादों से गुजरते हैं। ये सब अच्छी तरह से समझाया नहीं जा सकता। पर साथ
ही इस धरती पर पैदा होने वाले हम पहले लोग नहीं हैं, न ही हम यहाँ मरने वाले पहले लोग होंगे।
अपने जीवन में हमें ये पता नहीं होता कि क्या हम शिक्षा पायेंगे, विवाह करेंगे, बच्चे पैदा करेंगे या
और भी कई सारी चीजें करेंगे, पर एक बात जो हम अच्छी तरह से जानते हैं वो ये है कि हम ज़रूर
मरेंगे। हालांकि ये एक आसान, स्पष्ट बात है पर हम इसे स्वीकार नहीं कर पाते।

कोई मुझसे पूछ रहा था, “सद्‌गुरु, साँप कैसे मरते हैं क्योंकि हमें कभी मरे हुए साँप नहीं दिखते,
जब तक कि किसी ने उन्हें मारा न हो"? खास तौर पर कोबरा, जब वे जान जाते हैं कि अब उन्हें
मरना है तो वे चुपचाप अपने बसेरे में या किसी सुनसान, शांत जगह पर चले जाते हैं, और 18 - 20
दिनों तक कुछ नहीं खाते। वे वहाँ शांति से मर जाते हैं।

एक रेंगने वाला प्राणी भी ये जागरूकता रखता है कि ये शरीर कितने समय तक रहना चाहिये और
कब इसे जाना चाहिये? इसी तरह से आपके और हर किसी के जीवन को भी पता होता है कि कब
उसे शरीर छोड़ देना चाहिये? या तो हमारा शरीर खराब हो चुका है या उसमें अब जीवन को
टिकाने के लिये ज़रूरी तीव्रता नहीं रह गयी है। जब तक ये यहाँ है, हम इसे बचाने की हरसंभव
कोशिश करेंगे क्योंकि आसपास के हर जीवन को उस जीवन की चाहत भी है और कीमत भी पर

जब वो जाना चाहे तब हमें उसका सम्मान करना चाहिये क्योंकि अब उस जीवन ने जाने का निर्णय
कर लिया है।

जब मैं “जीवन” कहता हूँ तो किसी व्यक्ति की बात नहीं कर रहा न ही उन अलग अलग भावनाओं, विचारों, और गतिविधियों की जिनमें वो शामिल था। एक व्यक्ति कभी जाना नहीं चाहता, क्योंकि हर कोई एक अंतहीन मनोवैज्ञानिक नाटक बने रहना चाहता है। पर जीवन एक खास समय पर चले जाना चाहता है। आपको ये पसंद हो या न हो पर जीवन जाना चाहता है क्योंकि ये हमेशा के लिये आपके इकट्ठा किये हुए भौतिक आकार में फँसे रहना नहीं चाहता। ये एक खास भौतिक आकार या मन के साथ बस कुछ निश्चित समय तक ही रह सकता है। उसके बाद, चाहे सब कुछ अच्छा हो, बहुत से जीवन शरीर छोड़ देते हैं। आप ये देखेंगे, खास तौर पर भारत में, योगी ये तय करते हैं कि कब उन्हें शरीर छोड़ना है? जब वे बहुत स्वस्थ और अच्छे होते हैं, तो वे शांति से बैठ जाते हैं और शरीर छोड़ देते हैं। बाकी के लोग सोचते हैं, "क्यों? वह स्वस्थ था! उसे जाने की क्या ज़रूरत थी"? तो फिर, क्या आप बीमार पड़ कर मरना चाहते हैं? क्या आप अस्पताल में तीन साल तक पीड़ा झेल कर फिर मरना चाहते हैं? मरने का यही एक तरीका नहीं है।

जो जीवन अब शरीर छोड़ने वाला है, उस जीवन को दवाओं और हर तरह के उपकरणों के सहारे तीन और महीनों तक खींच कर बनाये रखने से कौन सा उद्देश्य पूरा होता है?

अपने जीवन में आखरी चीज़ जो आप करते हैं वो है - मरना। तो क्या ये महत्वपूर्ण नहीं है कि आप इसे शालीनता से करें? क्या ये भी महत्वपूर्ण नहीं है कि हमारे चारों ओर जो लोग हैं, जब उनका जाने का समय आये तो शालीनता से जाने में हम उनकी सहायता करें? जो जीवन अब शरीर छोड़ने वाला है, उस जीवन को दवाओं और हर तरह के उपकरणों के सहारे तीन और महीनों तक खींच कर बनाये रखने से कौन सा उद्देश्य पूरा होता है? इसका बस एक ही मतलब है कि आप जीवन के स्वभाव के बारे में कुछ नहीं जानते। आप उस चीज़ से चिपके रहना चाहते हैं जिसे आप जानते हैं और वो कुछ भी जानना नहीं चाहते जिसके बारे में आप कुछ नहीं जानते। आप उस व्यक्ति को जानते हैं, उस व्यक्तित्व के साथ आपने अच्छा समय बिताया है पर उसके जीवन के स्वभाव को नहीं समझा, क्योंकि जब तक आप अपने जीवन के स्वभाव को नहीं समझते तब तक दूसरों के जीवन के स्वभाव को भी नहीं समझ सकते।

तो, हमें मृत्यु के बारे में बात करने की या उसके लिये तैयारी करने की ज़रूरत नहीं है। हमें करना ये चाहिये कि हमनें अपने शरीर और मन के रूप में जो कुछ इकट्ठा किया है, उसके परे जो है, उसका अनुभव करें। आप, अगर, अभी यहाँ बैठें और अपनी इकट्ठा की हुई चीजों के परे जो है उसका अनुभव करें तो आपको जीवन के किसी भी पहलू के बारे में, जिसमें मृत्यु भी शामिल है, बिल्कुल भी कोई समस्या नहीं होगी। हमें ये समझना चाहिये कि हमारे शरीर की मरणशीलता हमारे अस्तित्व की एक मूल वास्तविकता है। अगर आप इसे स्वीकार नहीं करते तो आप जीवन के किसी भी दूसरे पहलू को भी वास्तव में नहीं जानते और सिर्फ उन नाटकों को ही जानते हैं, जो जीवन में होते रहते हैं। क्योंकि हमारे अस्तित्व का ये सबसे मूल स्वभाव है कि हम मरणशील हैं। जब हम जन्म लेते हैं तो ये बात तय होती है कि हम मरने वाले हैं। सवाल सिर्फ ये है कि कब? मैं आपको दीर्घायु होने का आशीर्वाद देता हूँ पर जब आपको मरना है तो शालीनता से मरें।

बुढापा एक वरदान हो सकता है - 'डेथ : एन इनसाइड स्टोरी' पुस्तक का एक अंश

मनुष्य के सिवा दुनिया का हर प्राणी शालीनता से मरना जानता है। अगर आप जंगल में जायें - उसमें भी, जहाँ बहुत सारे जंगली जानवर हों - तो किसी शिकारी जानवर के मारे हुए प्राणियों को छोड़ कर आपको किसी भी प्राणी की लाश ऐसे ही पड़ी हुई नहीं मिलेगी। जंगल क्यों, शहरों में भी, जहाँ आजकल पक्षियों के नाम पर बस कुछ कौवे ही नज़र आते हैं, आपको कोई मरा हुआ कौवा ऐसे ही पड़ा हुआ नहीं मिलेगा। वे सभी ये जानते हैं कि उनके मरने का समय कब है और उस समय पर वे किसी शांत, सुनसान क्षेत्र में चले जाते हैं और शांति से मरते हैं। सिर्फ मनुष्य ही है जो इससे अनजान रहता है और ज्यादातर भद्दे ढंग से, यातना सहते मरता है। जब मृत्यु आती है तो जिन लोगों को ये पता नहीं है कि जीते कैसे हैं, उनको मरने के बारे में निश्चित रूप से समस्या आती है।

कई तरह से, बुढ़ापा एक वरदान हो सकता है क्योंकि जीवन का पूरा अनुभव आपके साथ है। जब आप मृत्यु के नज़दीक जाते हैं तो ये एक अवसर है क्योंकि अब उर्जायें कमज़ोर पड़ गयी हैं और वे शरीर को छोड़ने की तरफ आगे बढ़ रहीं हैं तो अपने अस्तित्व के बारे में जागरूक होना ज्यादा आसान है। आप जब बच्चे थे तो सबकुछ बहुत सुंदर था पर आप तो बड़े होने के लिये उत्सुक थे क्योंकि आप जीवन का अनुभव लेना चाहते थे। जब आप युवा हो गये तो आपकी बुद्धिमत्ता आपके हार्मोन्स उड़ा ले गये। जाने- अनजाने आप जो भी करते थे वो आपको उसी दिशा में धक्का दे कर आगे बढ़ाता था। बहुत कम लोगों में ये योग्यता होती है कि वे अपने जीवन को हार्मोन्स द्वारा उड़ाये जाने से बचा पायें और जीवन को स्पष्टता के साथ देख सकें। बाकी सब इस जाल में फँस जाते हैं। जवानी में, जब शरीर जोशपूर्ण होता है तो अपने आपको जागरूक बनाना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि आप अपनी पहचान को अपने शरीर के साथ इस कदर जोड़े रखते हैं कि उसके परे आप कुछ भी नहीं देखते।

....आप जो भी कदम उठाते हैं, उस हर कदम पर आपकी उम्र आपको बताती है, "ये हमेशा के लिये नहीं है"।

लेकिन, जैसे जैसे उम्र बढ़ती है, ये कम होने लगता है। जैसे जैसे शरीर की गतिशीलता कम होती जाती है, आपकी जागरूकता बढ़ती जाती है क्योंकि अब आप अपनी पहचान उस शरीर के साथ नहीं जोड़ते जो कम हो रहा है। जब आप बुढ़ापे में आते हैं तो सब इच्छायें पूरी हो चुकी होती हैं और जीवन का अनुभव आपके पीछे होता है। तो, फिर से आप बच्चे जैसे होने लगते हैं पर आपके पास अब बुद्धिमानी और जीवन का अनुभव भी है। ये आपके जीवन का बहुत अद्भुत और उपयोगी समय हो सकता है। अगर आप अपनी कायाकल्प की प्रक्रिया को ठीक से संभालें तो बुढ़ापा आपके जीवन का एक चमत्कारिक भाग हो सकता है। दुर्भाग्य से, अधिकतर मनुष्य बुढ़ापे में पीड़ा सहन करते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी कायाकल्प की प्रक्रिया को ठीक से नहीं संभाला होता। अपने बुढ़ापे में बहुत कम लोग मुस्कुरा भी पाते हैं और ये इसलिये है क्योंकि अपने जीवन में उन्होंने जो कुछ भी जाना है वो बस भौतिक शरीर है। जब ये शरीर कमजोर पड़ने लगता है, घटने लगता है तो वे निराश होने लगते हैं। हो सकता है कि शरीर रोगी न हुआ हो, कोई भयानक कैंसर भी न हुआ हो पर आप जो भी कदम उठाते हैं उस हर कदम पर आपकी उम्र आपको बताती है "ये हमेशा के लिये नहीं है"। अगर आप अनुभव के दूसरे आयामों में अपने आपको स्थापित कर लें तो शरीर को आसानी से संभाला जा सकता है। बुढ़ापा और मृत्यु भी आनंदपूर्ण अनुभव बन सकते हैं। इसके लिये आपको जानना होगा कि कब जाना है, और शालीनता के साथ जाना होगा।