क्‍या करूं: शादी करूं या ना करूं ?
पिछले हफ्ते सद्‌गुरु ने इंसान की उन कई जरूरतों की ओर इशारा किया था जो हमें रिश्तों की तरफ धकेलती हैं – शारीरिक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक। इस लेख में आज वे हमें यह बता रहे हैं कि हम अपने अंदर की इन जरूरतों को कैसे पहचानें और किस तरह एक व्‍यक्ति के रूप में शादी करने या न करने के बारे में फैसला करें।
 
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पिछले हफ्ते सद्‌गुरु ने इंसान की उन कई जरूरतों की ओर इशारा किया था जो हमें रिश्तों की तरफ धकेलती हैं – शारीरिक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक। इस लेख में आज वे हमें यह बता रहे हैं कि हम अपने अंदर की इन जरूरतों को कैसे पहचानें और किस तरह एक व्‍यक्ति के रूप में शादी करने या न करने के बारे में फैसला करें।

सद्‌गुरु:

सबसे पहले आपको इस बात पर गौर करना होगा कि एक व्‍यक्ति के रूप में आपको जीवन-सा‍थी की वाकई जरूरत है या यह बस यूं ही टाइम पास करने के लिए है। मुझे तो लगता है कि 25% से 30% लोगों के लिए यह एक सिर्फ टाइम पास है और उनको इस दिशा में जाने की जरूरत नहीं है। 30% से 40% लोगों को शायद इसकी जरूरत थोड़ी ज्यादा होती है और वे इस रिश्ते में जुड़ना चाहते हैं।10-12 साल तक उनको यह सब बहुत अच्छा लगता है, पर उसके बाद यह उनको एक बोझ लगने लगता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी यह एक सख्‍त जरूरत होती है। 25% से 30% लोगों की जीवन-साथी की जरूरत बहुत लंबे समय के लिए होती है; ऐसे लोगों को निश्चित रूप से रिश्ता बनाना चाहिए। 

ध्यान लगा कर अपने मन को एकाग्र कीजिए और अपने को ऐसी अवस्था में लाएं जहां आपके लिए चीजें स्‍पष्‍ट हों जाएं कि करना क्‍या है। उस स्‍पष्‍टता में अपनी जरूरतों पर गौर कीजिए और देखिए कि क्‍या वे वाकई आपके लिए जरूरी हैं।

फिलहाल लोगों ने अलग तरह के हल ढूंढ़ लिये हैं, खास तौर से पश्चिम में। वैसे अब ऐसा हिंदुस्तान में भी होने लगा है। “ओके, मैं शादी नहीं करूंगा, मैं बस लिव-इन रिश्‍ता बनाउंगा।'' लिव-इन रिश्‍ता बनाने का अर्थ है: किसी को पार्टनर बनाकर उसके साथ रहना। ठीक है लिव-इन रिश्‍ता बनाइए, पर अगर आप एक ही इंसान के साथ रहते हैं तो यह शादी ही तो है, भले ही आपके पास इसका प्रमाणपत्र हो या न हो। लेकिन अगर आप हर हफ्ते एक नया साथी चुनने की सोच रहे हैं तो खुद को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं, क्योंकि जिस तरह आपके दिमाग के पास एक याददाश्त है उसी तरह आपके शरीर के पास उससे भी तेज याददाश्त है। शरीर अनुभूतियों को अपने में समा कर संजो लेता है। हिमालय हो कर आने के बाद आप शायद उसको भूल भी जायें, पर आपका शरीर उसको नहीं भूलेगा। वह उसे हमेशा याद रखेगा। मानसिक रूप से आप अपनी पूरी याददाश्त खो सकते हैं लेकिन शरीर में यह बना रहता है।

इसलिए शारीरिक संबंध को भारतीय परंपरा में ऋणानुबंध कहा गया है।  ऋणानुबंध का संबंध शरीर की भौतिक याददाश्त से है। शारीरिक संबंधों के बारे में शरीर की याददाश्त गहरी होती है। इसी याददाश्त के आधार पर वह भविष्‍य में कई प्रकार से वर्ताव और प्रतिक्रिया करता है। अगर इसमें ढेरों यादें छप जाती हैं  तो शरीर में कई उलझनें पैदा हो सकती हैं। इस तरह के बहुत-सी यादें जमा हो जाने पर पशोपेश बढ़ जाता है और दुख-दर्द घेर लेते हैं। आप यह साफ-साफ देख सकते हैं। जो लोग अपनी जिंदगी और अपने जिस्म पर काबू नहीं रखते उनको कभी असली खुशी का अहसास नहीं हो पाता। अपने चारों ओर गौर से देखिए। ऐसे लोग कभी खुल कर पूरी तरह हंस नहीं सकते और कभी फूट-फूट कर रो भी नहीं सकते। वे ऐसे इसलिए हो जाते हैं क्योंकि एक ही जिंदगी में भौतिक शरीर में पशोपेश पैदा करनेवाली ढेरों यादें जाने कितने निशान छोड़ जाती हैं। इसलिए ‘लिव-इन’ रिश्ते से आपकी जरूरतें पूरी नहीं होनेवाली।

अगर आप हर हफ्ते एक नया साथी चुनने की सोच रहे हैं तो खुद को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं, क्योंकि मानसिक रूप से आप अपनी पूरी याददाश्त खो सकते हैं लेकिन शरीर में यह बना रहेगा।

या तो आप शादी कर लें या फिर ऐसी जरूरतों से उपर उठ जायें। लेकिन यह ऐसी बात है जिस पर आपको खुद एक व्‍यक्ति के तौर पर गौर करना होगा – आपकी जरूरत कितनी सख्‍त है? अगर आप इस पर पूरी बारीकी से गौर करना चाहें, बिना समाज से प्रभावित हुए, तो बेहतर होगा कि आप महीने भर का वक्त निकाल कर इस पर गौर करें। यह फैसला करते वक्त आपको अपना दिलो-दिमाग साफ रखना होगा और एक खास तरह की स्‍पष्‍टता की अवस्‍था में यह फैसला लें। किसी और का दबाव आप पर नहीं होना चाहिए। न किसी गुरु का, न समाज का, न ही किसी और आदमी का। ध्यान लगा कर अपने मन को एकाग्र कीजिए और अपने को ऐसी अवस्था में लाएं जहां आपके लिए चीजें स्‍पष्‍ट हों जाएं कि करना क्‍या है। उस स्‍पष्‍टता में अपनी जरूरतों पर गौर कीजिए और देखिए कि क्‍या वे वाकई आपके लिए जरूरी हैं।

अगर आपको लगता है कि शादी जरूरी नहीं है, तो यह फैसला कर लेने के बाद दोबारा उस तरफ मुड़ कर मत देखिए। अगर आप शादी करने का फैसला कर लेते हैं तो फिर दूसरी तरफ मत देखिए। इनमें से कोई एक चीज आप जरूर करें।  अगर आप इन दोनों के बीच त्रिशंकु की तरह लटके रहेंगे तो हमेशा पशोपेश की हालत में ही रहेंगे। “इन दोनों में क्या बेहतरीन है?” कोई बेहतरीन नहीं है। अपनी जिंदगी बस उसी तरह जियें – आप जो कुछ कर रहे हैं, बस वही है जो आप करेंगे। पूर्ण रूप से शामिल होकर उसे करें। अगर आपमें यह गुण है तो आप जो भी करेंगे ठीक होगा। लेकिन डावांडोल फैसला ठीक नहीं है। कुछ लोग पंद्रह साल की शादीशुदा जिंदगी के बाद अब सोच रहे हैं, “मुझे ब्रह्मचारी होना चाहिए था।” और कुछ लोग दस साल तक ब्रह्मचारी रहने के बाद अब सोच रहे हैं, “शायद मुझे शादी कर लेनी चाहिए थी।” यह पेशोपेश निरंतर जारी रहती है, इस तरह से जीने से बस जीवन बर्बाद होगा।

 
 
 
 
 
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5 वर्ष 4 महिना पूर्व

This is one of the first pieces I read from Sadhguru (In English) when I had completed Inner Enginneering.. I then started reading more, ordered Mystic's Musings and since then no looking back

5 वर्ष 4 महिना पूर्व

सध्गुरु ने इस लेख में "ऋणानुबंध" के कांसेप्ट को स्पष्ठ करके बहुत से शारीरिक प्रश्नों पर खुलासा किया है| 'लिव-इन रिलेशनशिप' से जो नुक्सान हो सकता है, उसे स्पष्ठ करके सध्गुरु ने हमें और आने वाली पीढ़ी को एक बहुत ही अमूल्य मार्गदर्शन दिया है|