सद्गुरु कहते हैं कि व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि खुद को एक स्वर्ग कैसे बनाएं। वरना, अगर आप
स्वर्ग में रह भी रहे हों, आप सिर्फ दुखी ही रहेंगे।


 

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सद्गुरु: इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कैसी परिस्थिति में डाले गए हैं, आप या तो उसे अपना वरदान बना सकते हैं या आप उसे अपना अभिशाप बना सकते हैं। सबसे भयानक परिस्थितियां भी एक इंसान का निर्माण कर सकती हैं। आप उसे शालीनता से संभाल सकते हैं। लोग फांसी के तख्ते पर भी शालीनता से चलकर गए हैं। दूसरे विश्वयुद्ध की एक खास घटना है। 13 साल की एक लड़की थी। यह घटना ऑस्ट्रिया में हुई थी, जब हिटलर यहूदी लोगों को खोज-खोजकर उन्हें यातना शिविर में भेज रहा था। एक दिन सुबह, सिपाही उनके घर में घुस गए। यह एक समृद्ध यहूदी परिवार था जिसमें लगभग 17 लोग थे, जो एक बड़े घर में रहते थे। सिपाही आए, घर पर कब्जा कर लिया और बड़ों और बच्चों को अलग-अलग करके कहीं ले गए।

13 साल की लड़की और उसके 8 साल के भाई को रेलवे स्टेशन ले जाया गया। यह सर्दी की शुरुआत थी। ऑस्ट्रिया में बहुत ठंड पड़ती है। अब उस समृद्ध परिवार के बच्चे रेलवे स्टेशन पर तीन दिन तक थे, उनके माता-पिता कहां ले जाए गए थे, उन्हें नहीं पता था, और सिपाही उन पर बंदूक ताने खड़े थे। यह काफी बुरी हालत थी।

लेकिन बच्चे सिर्फ थोड़ी देर के लिए ही दुखी होते हैं। उसके बाद, उन्हें कोई चीज ठोकर मारने को मिल जाएगी और वो खेलने लगेंगे। तो लड़का एक पत्थर से थोड़ा फुटबॉल खेलने लगा। तीन दिन बाद, एक ट्रेन आई - एक माल गाड़ी, सवारी गाड़ी नहीं। हर किसी को एक डिब्बे में धकेल दिया गया, और तब लड़की ने गौर किया कि उसका भाई अपने जूते स्टेशन पर भूल गया था। वह उस पर आग-बबूला हो गई और उसे नोचा, उसके कान मरोड़े, क्योंकि बिना जूतों के, इस ठंड में, बहुत मुश्किल होने वाली थी। अगले स्टेशन पर, लड़के और लड़कियों को अलग करके कहीं और ले जाया गया। साढ़े पांच साल बाद, 1945 में, लड़की यातना शिविर से बाहर आई तो उसे पता चला कि उसके परिवार के सभी सदस्य, उसका छोटा भाई भी, मर चुके थे। उस पल में, उसे सिर्फ एक चीज महसूस हुई थी, वह आखिरी पल जो उसने अपने भाई के साथ बिताए थे, कि उसने भाई के साथ कितना बुरा बर्ताव किया था। उसने उसके कान मरोड़े थे, चेहरे पर मुक्का मारा था, और भद्दी बातें कही थीं, क्योंकि उसने अपने जूते खो दिए थे। और इस बात की वजह से उसने संकल्प लिया, ‘आज से, इससे फर्क नहीं पड़ता कि मैं किससे मिलती हूं, कोई भी चेहरा जो मैं देखूं, मैं उससे उस तरह बोलूंगी, जैसे अगर मैं उससे आखिरी बार बात कर रही होती, तब मैं उससे बोलती, ताकि मुझे उसका कोई पछतावा नहीं होगा।’

अगर आप जागरूक हैं और उसके संपर्क में हैं जो हर मनुष्य के भीतर है, तो अगर आप नर्क में भी रखे गए हैं, वहां भी आप अपने जीवन का निर्माण कर सकते हैं। वरना, अगर आप स्वर्ग में भी रखे गए हों, आप उससे सिर्फ झमेला ही पैदा करेंगे।

आपको किसने बताया कि आप पहले से ही स्वर्ग में नहीं हैं? क्या इसकी कोई पुष्टि है कि आप पहले ही स्वर्ग में नहीं हैं? नहीं। तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि एक और दूसरी जगह है जो इससे बेहतर है?

यह भयानक सोच कि यहां से बेहतर एक और दूसरी जगह है, उन लोगों के द्वारा पैदा की गई है जिन्होंने खुद को नर्क बना डाला है। अगर आप खुद को एक स्वर्ग बना लेते हैं, अगर आप परमानंद में हैं, तो आप कहीं और क्यों जाना चाहेंगे? व्यक्ति को हमेशा यह देखना चाहिए कि वह खुद को स्वर्ग कैसे बनाए। वरना, अगर आप स्वर्ग में भी रह रहे हों, आप सिर्फ दुखी ही रहेंगे।

मान लीजिए कि यही स्वर्ग है और आप उससे चूक गए? मान लीजिए कि यही स्वर्ग है और आपको इसका एहसास कभी नहीं हुआ - यह जीने का कितना भयानक तरीका है। और मैं आपको बता रहा हूं, यही स्वर्ग है, क्योंकि आपके अनुभव का आधार आपके भीतर ही है। अगर आप उसका नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते हैं, तो आप अभी ही उसको स्वर्ग बना सकते हैं। आपका असहनशील पड़ोसी, बगल के घर में शोर मचाने वाला बच्चा, आपकी सास, ये सारे लोग इसलिए जोड़े गए हैं ताकि आपके जीवन में थोड़ा मसाला हो - थोड़ी हलचल के लिए - लेकिन असल में यही स्वर्ग है।