प्रश्नकर्ता : सद्गुरु, ध्यानलिंग को एक गुम्बद से क्यों ढँका गया है? क्या इसका कोई वैज्ञानिक कारण है?

सद्गुरु: जो कुछ भी चमकता है, उजाला फैलाता है, वो चाहे प्रकाश हो या गर्मी, हमेशा गोलाकार रूप में चमकता है। अगर हमने कोई चौकोर इमारत बनायी होती और अगर आप संवेदनशील हों तो आपको उस स्थान पर कुछ गड़बड़ ज़रूर महसूस होती। तो ध्यानलिंग के लिये गोलाकार भवन की ही ज़रूरत थी।

ध्यानलिंग क्षेत्र को डिज़ाइन करने में जो समझौते मुझे करने पड़े उसके लिये अभी तक मुझे काफी शर्मिंदगी महसूस होती है। हर बार जब मैं वहाँ जाता हूँ तो यही सोचता हूँ कि ये क्या बन सकता था पर हम सीमित समय और सीमित धन की वजह से बस इतना ही कर पाए। शुरुआत में मैं इसे जमीन के 60 फुट नीचे बना कर उसके चारों ओर पानी का बड़ा तालाब बनाना चाहता था। ये इसे बनाने का सबसे अच्छा तरीका होता। पर जब हमने निर्माण शुरू किया तो मुझे इसे एक खास समय के अंदर बना लेना जरूरी था क्योंकि मेरा जीवन एक खास अवस्था में से गुज़र रहा था। समय और पैसे सीमित होने के कारण हमें ये जल्दी करना पड़ा। तो मैंने एक दूसरी डिज़ाइन बनायी पर वो भी काफी खर्चीली थी। तब मुझे एक तीसरी डिज़ाइन के लिये तैयार होना पड़ा। अब हम हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं कि हम इस तीसरी डिज़ाइन को ज्यादा से ज्यादा सुंदर और हर तरह से योग्य बनायें क्योंकि 'वे' (ध्यानलिंग) जो कुछ भी हैं, उनकी सजावट की चीज़ें ज़्यादा नहीं हैं। तो हम जो भी कर सकते हैं, उसे करने के लिये हर तरह की कोशिश कर रहे हैं।

वास्तुकला के हिसाब से, ध्यानलिंग गुम्बद अपने आप में अनोखा है। साधारणतया गुम्बद आधे गोलाकार होते हैं जैसे ताजमहल या गोल गुम्बज़ में हैं। पर हमने तय किया कि हम इसे अंडाकार बनायेंगे। आज जिस तरह से इस अंडाकार ढाँचे का एक भाग खड़ा है, उसको स्टील, कंक्रीट या सीमेंट के बिना बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती थी। इसी कारण से ये गुम्बद अनोखा है। आप अगर इसे बस ऐसे ही देखें, तो आपको ये अर्ध गोलाकार दिखेगा पर वास्तव में ये एक अंडाकार है। हम इसे इसी तरह बनाना चाहते थे क्योंकि लिंग भी अंडाकार ही है तो लिंग की ऊर्जा के लिये अंडाकार गुम्बद सबसे अच्छी भेंट है। 

हमने सिर्फ ईंटों को ही क्यों इस्तेमाल किया और सीमेंट, स्टील या कंक्रीट क्यों नहीं लगाया? इसका कारण ये है कि अगर सबसे अच्छा कंक्रीट भी लगाया जाये तो भी उसका जीवन ज्यादा से ज्यादा 125 साल होता है। तो हम अगली पीढ़ियों के लिये मुसीबत खड़ी करना नहीं चाहते थे। सोचिये, क्या होगा अगर 100 साल बाद उसका कोई कंक्रीट का खंबा लोगों पर गिर पड़े? क्या आप उनकी मुश्किल का अंदाज़ा लगा सकते हैं? यहाँ हम ऐसा ढाँचा बनाना चाह रहे थे जो 3,000 से 5,000 साल तक खड़ा रहे क्योंकि ये एक ऐसी चीज़ है जिसका आनंद लोग बहुत लंबे समय तक लेते रहेंगे। अगर आप इजिप्त या पश्चिम एशिया की किसी पुरातत्व खुदाई का काम देखें, तो पुराने समय के जो अवशेष सबसे पहले मिलते हैं वे हैं मिट्टी के बर्तन, क्योंकि जब मिट्टी को आग में पकाते हैं तो उसका जीवन हमेशा के लिये हो जाता है। मिट्टी की ईंटें भी मिट्टी के बर्तनों जैसी ही हैं - उनका जीवन हमेशा के लिये है।

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गुम्बद का एक और पहलू ये है कि यह तनाव से नहीं खड़ा है, जैसा कि ज्यादातर आधुनिक इमारतों में होता है। ज्यादातर इमारतों में छत और गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बीच जबर्दस्त संघर्ष चलता रहता है। इमारत को गुरुत्वाकर्षण शक्ति नीचे गिराना चाहती है और छत इसको ऊपर खींचना चाहती है - पर किसी दिन, जीत तो गुरुत्वाकर्षण शक्ति की ही होती है। तो, ये गुम्बद ईंटों, मिट्टी, चूने और वनस्पतीय गोंदों से बना कर टिकाया गया है। आसान सी तकनीक ये है कि सभी ईंटें एक साथ ही नीचे आने की कोशिश कर रहीं हैं, पर ये नीचे नहीं आ सकतीं। ये वैसा ही है जैसे कि दस लोग एक साथ किसी दरवाजे से निकलने की कोशिश करें तो नहीं निकल सकते, वे वहीं फंस जायेंगे। जब तक कोई एक आदमी एक कदम पीछे हटने का विनय नहीं दिखाता, तब तक ये नहीं होगा। और, मुझ पर भरोसा रखिये, ईंटों में ऐसा कोई विनय नहीं होता।

हर ईंट को 24 घंटे तक पानी में डुबो कर रखा गया था जिससे ये निश्चित हो जाये कि वह पूरी तरह पकी हुई है। अधपकी ईंटें अगर पानी में रखीं जायें तो वे गल जायेंगी। जो ईंटें 24 घंटे तक नहीं गलतीं, वे अच्छे से पकी होती हैं, और उनका जीवन हमेशा के लिये होता है। हमने हर ईंट को मिलीमीटर तक मापा, क्योंकि अगर वे अलग-अलग नाप की होंगीं तो गिर जायेंगी। एक-एक ईंट को रख कर गोल दायरे बना कर गुम्बद को बनाया गया था। महत्वपूर्ण बात ये है कि जब आप ईंटों की एक सतह बनाना शुरू करते हैं तो उसे उसी दिन पूरा करना होता है। अगर आप ऐसा नहीं करते तो रात में ही ये गिर जायेंगी। एक बार, जब ये पूरी हो जाती हैं तो फिर नहीं गिर सकती। 

ईशा योग सेंटर, भूकंप विज्ञान के हिसाब से एक संवेदनशील जगह में है। इसीलिये हमने गुम्बद को रेत की बुनियाद बना कर उस पर नीवं डाल कर बनाया। हमने उस जगह को 20 फ़ीट गहरा खोद कर उसे रेत से भर दिया। अब ये एक कुशन की तरह काम करता है और कितने भी झटके लगें, ये सहन कर लेगा।

फिर हमने एक और साहसी काम किया। हमने गुम्बद में नौ फुट का एक छेद बना कर रखा जिससे अंदर की गर्म हवा बाहर निकलती रहे। लोगों को लगता है कि गुम्बद के ढाँचे में कोई छेद रखना नामुमकिन है। लोगों ने कहा, "गुम्बद पूरी तरह से बंद होना चाहिये, नहीं तो ये गिर जायेगा"। मैंने कहा, "चिंता मत करो, ये उस तरह से नहीं खड़ा है। ये गुम्बद धरती की सभी शक्तियों के साथ सामंजस्य में है, ये बिल्कुल आराम में है- आप ये भी कह सकते हैं कि ये ध्यान कर रहा है क्योंकि इमारत में कोई तनाव नहीं है"। इसीलिये, मैं लोगों को कहता हूँ, "जब इमारत ही ध्यान कर रही है तो तुम तो बहुत आसानी से कर सकते हो"।

जिन 1,80,000 ईंटों को हमने गुम्बद बनाने में इस्तेमाल किया, उन्हें हमारे स्वयंसेवकों ने बनाया था और नापा था। मैं वहाँ बैठा और मैंने उन्हें समझाया, "देखो, इसका मतलब ये है कि मैं इसे तुम्हारे हाथों में सौंप रहा हूँ। हमें हर ईंट जिस नाप की चाहिये, उससे अगर कोई दो मिलीमीटर भी कम हुई तो ये पूरा ढाँचा गिर जायेगा"। तो वहाँ सभी लोग- पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे - रात दिन वहीं बैठे रहे और उन्हें नापते रहे। मैं इस इमारत को इसी तरह बनाना चाहता था - लोगों के प्यार से, किसी और चीज़ से नहीं।

Editor's Note: यह सद्गुरु का सपना है कि ध्यानलिंग सभी के लिए उपलब्ध हो, सिर्फ अभी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी। ध्यानलिंग परिसर को पूरा करने के लिए धन जुटाने में मदद के रूप में, ईशा इस हफ्ते अपना ऑनलाइन अभियान शुरू कर रही है। हम आध्यात्मिक प्रक्रिया को सभी के लिए उपलब्ध कराना चाहते हैं और यह हमारे लिए एक अवसर है, कि हम इससे जुड़ें और जो हम दे सकते हैं वह देकर इसे एक सच्चाई बनाएं। ध्यानलिंग के विस्तार की योजनाओं के बारे में अधिक जानने और इनमें शामिल होने के लिए, कृपया देखें: www.giveisha.com/temple