अनूठी गुरु-शिष्य परंपरा
इस हफ्ते हम गुरु-शिष्य परंपरा पर एक नजर डालेंगे, जिसके द्वारा योग विज्ञान हजारों साल तक एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुंचता रहा।
 
गुरु शिष्य
 

इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने जाना कि भगवान शिव ही पहले योगी हैं, और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। लेकिन आदियोगी ने इस बारे में कभी कुछ नहीं लिखा। उन्होंने सात ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया जो योग के सात बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन सात रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। योग में आई जटिलता को देख कर पतंजलि ने मात्र 200 सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को समेट दिया। इंसान की अंदरूनी प्रणालियों के बारे में जो कुछ भी बताया जा सकता था वो सब इन सूत्रों में शामिल था। इस हफ्ते हम गुरु-शिष्य परंपरा पर एक नजर डालेंगे, जिसके द्वारा योग विज्ञान हजारों साल तक एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुंचता रहा।

भारत में हजारों साल तक गुरु-शिष्य परंपरा फलती-फूलती रही और आगे बढ़ती रही। हमारी संस्कृति में गुरु अपने शक्तिशाली सूक्ष्म ज्ञान को अटूट विश्वास, पूर्ण समर्पण और गहरी घनिष्ठता के माहौल में अपने शिष्यों तक पहुंचाते थे। परंपरा का मतलब होता है ऐसी प्रथा जो बिना किसी छेड़-छाड़ और बाधा के चलती रहे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह ज्ञान बांटने की अटूट श्रृंखला है।

इस परंपरा के बारे में समझाते हुए सद्‌गुरु कहते हैं, “भारत ही एक अकेला देश है, जहां ऐसी परंपरा थी। जब किसी को अंतर्ज्ञान प्राप्त होता है, तो वह किसी ऐसे व्यक्ति को खोजता है, जो पूरी तरह से समर्पित हो, जिसके लिए सत्य का ज्ञान अपनी जिंदगी से बढ़ कर हो। वह ऐसे समर्पित व्यक्ति को खोज कर उस तक अपना ज्ञान पहुंचाता है। यह दूसरा व्यक्ति फिर ऐसे ही किसी तीसरे व्यक्ति की खोज कर, उस तक वह ज्ञान पहुंचाता है। यह सिलसिला बिना किसी बाधा के हजारों साल तक लगातार चलता रहा। इसी को गुरु-शिष्य परंपरा कहा जाता है। 

 किसी इंसान को अनुभव के एक आयाम से दूसरे आयाम में ले जाने के लिए एक ऐसा साधन या उपाय चाहिए, जिसकी तीव्रता और ऊर्जा का स्तर आपके मौजूदा स्तर से ऊपर हो। इसी साधन को हम गुरु कहते हैं।

हालांकि उन प्राचीन लोगों को लिखना आता था, लेकिन जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं को कभी लिखा नहीं जाता था, क्योंकि एक बार लिख देने पर तमाम गलत लोग उसको पढ़ कर उसका गलत मतलब निकालते। सिर्फ वैसे ही इंसान को इसकी जानकारी होनी चाहिए, जो अनुभव के एक खास स्तर तक पहुंच चुका हो; दूसरों को नहीं। इसलिए इस तरीके से उस ज्ञान का प्रसार होता था। जब गुरु-शिष्य परंपरा टूटने लगी, तब उन्होंने आध्यात्मिक सत्य को लिखना शुरू किया; उसके पहले तक यह कभी लिखा नहीं गया था। जब आपने कुछ लिख दिया तो उन ग्रंथों को सबसे पहले विद्वान शोधकर्ता पढ़ते हैं। एक बार जब यह इन विद्वानों के हाथ लग गया तो समझिए बस सब खत्म, सत्य समाप्त हो गया।”

योग एक विज्ञान है, जो किसी इंसान को इस लायक बनाता है कि वह पांचों इंद्रियों के परे जा कर अपनी असली प्रकृति को जान सके। ऐसा करने के लिए जरूरी है कि उसको आवश्यक ऊर्जा का सहारा मिले। सद्‌गुरु समझाते हैं, "आपने जिस चीज का कभी अनुभव न किया हो, वो आपको बौद्धिक रूप से नहीं समझाई जा सकती। उसे समझाने के लिए आपको अनुभव के एक बिलकुल अलग आयाम में ही ले जाना होगा। किसी इंसान को अनुभव के एक आयाम से दूसरे आयाम में ले जाने के लिए एक ऐसा साधन या उपाय चाहिए, जिसकी तीव्रता और ऊर्जा का स्तर आपके मौजूदा स्तर से ऊपर हो। इसी साधन को हम गुरु कहते हैं।'’

“गुरु शिक्षक नहीं होते। गुरु और शिष्य का रिश्ता ऊर्जा पर आधारित होता है। वे आपको एक ऐसे आयाम में स्पर्श करते हैं, जहां आपको कोई और छू ही नहीं सकता। एक ऐसा स्थान जहां – आपके पति, आपकी पत्नी, आपका बच्चा, आपके मां-बाप – कोई भी आपको छू नहीं सकता। वे सिर्फ आपके जज्बात, आपके मन या आपके शरीर को ही छू सकते हैं। अगर आप अपनी चेतना की महत्त्म ऊंचाई तक पहुंचना चाहते हैं, तो आपको बहुत ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होगी – जितनी ऊर्जा आपके पास है उसके अलावा और भी बहुत ज्यादा। गुरु और शिष्य का रिश्ता इतना पवित्र और अहम इसलिए हो गया है, क्योंकि जब कभी शिष्य के विकास में कोई मुश्किल आती है, तो उसको ऊर्जा के स्तर पर थोड़ा सहारा चाहिए होता है। इस सहारे के बिना उसके पास ऊंचाई तक पहुंचने के लिए जरूरी ऊर्जा नहीं होती। वही व्यक्ति जो उर्जा के धरातल पर आपसे अधिक ऊंचाई पर होता है, आपको यह सहारा दे पाता है, कोई और नहीं।”

सद्‌गुरु ने योग के प्रसार में मदद के लिए कई साधन तैयार किए हैं। पारंपरिक योग के प्रसार के शक्तिशाली स्थान के रूप में भव्य और असाधारण आदियोगी आलयम को प्राण-प्रतिष्ठित किया गया है। वैसे, गुरु-शिष्य परंपरा के संदर्भ में सद्‌गुरु हमें एक और साधन के लाभ के बारे में बता रहे हैं: “चूंकि गुरु-शिष्य परंपरा टूट रही है, इसलिए ध्यानलिंग उस दिशा में एक शक्तिशाली साधन है। यह कोई देवता नहीं, महज एक साधन है। अगर आप वहां कुछ मिनट भी बैठने के इच्छुक हैं, तो आप पाएंगे कि इससे आप पर कुछ असर होने लगा है। और तो और, अगर यहां कोई ऐसा व्यक्ति बैठे, जो ध्यान से बिलकुल अनजान है, जिसको ध्यान की बिलकुल जानकारी नहीं है, वह भी कुछ ही मिनटों में ध्यान करने लगेगा। एक बार जब वह ध्यानलिंग के दायरे में आ जाता है, तो अंदर कहीं भी बैठा हो, स्वाभाविक रूप से ध्यानमग्न हो जाता है।”

 
 
 
 
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