क्या अध्यात्म में प्रगति के लिए ब्रह्मचर्य जरुरी है?

आध्यात्मिक मार्ग पर संन्यास और ब्रह्मचर्य हमारे देश की परम्परा रही है। क्या ब्रह्मचर्य का मतलब अविवाहित होना या कुंवारापन है, या फिर इसके अलावा भी कुछ है?
 

अगर आप वाकई आगे बढऩा चाहते हैं तो आप अपने जीवन के हर आयाम में विवशता छोडक़र चेतनता लाएं। यही ब्रह्मचर्य है।

प्रश्न: सद्‌गुरु, आध्यात्मिकता के मार्ग पर आगे बढऩे के लिए क्या अविवाहित रहना जरूरी है?

सद्‌गुरु: ‘अविवाहित’ शब्द ब्रह्मचर्य का अनुवाद नहीं है। अविवाहित रहने का मतलब है आपके शरीर व उससे ज्यादा आपके मन में जो प्राकृतिक रूप से शारीरिक जरूरतों की बात चल रही है, उसे आप रोकना चाहते हैं।

ब्रह्मचारी वह होता है, जो अपनी शांति व आनंद के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना चाहता। यह कोई मामूली बीड़ा नहीं है, जो उन्होंने उठाया हुआ है।
इसलिए ब्रह्मचर्य को कुंवारापन कहना ठीक नहीं होगा। जब हम ब्रह्मचर्य की बात करते हैं तो इसका मतलब है कि आप अपनी ऊर्जा को इस तरह से व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहे हैं कि आपकी खुशी, आपका प्रेम, हर वो चीज जिसकी आपको जरूरत होती है, वह सब आपको अपने भीतर ही मिल जाए। आपने अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर इतना तो जान ही लिया होगा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी आपको प्रिय क्यों न हो, चौबीसों घंटे आपके प्यार और खुशी को बनाए रखने के लिए भरोसेमंद नहीं हो सकता।

ब्रह्मचारी अपना आनंद खुद पैदा करता है

क्या आपने इसका अनुभव कर लिया है या आप अभी भी उम्मीद लगाए बैठे हैं? ब्रह्मचारी वह होता है, जो अपनी शांति व आनंद के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना चाहता।

 कुंवारापन एक भद्दा शब्द है, क्योंकि बिना जरूरी समझ या जरूरी साधना अथवा जरूरी ऊर्जा के अगर आप खुद को रोकने की कोशिश करेंगे तो और दुखी ही होंगे।
यह कोई मामूली बीड़ा नहीं है, जो उन्होंने उठाया हुआ है।  तो यह समझने की बात है, कि अगर कोई व्यक्ति सचमुच जीवन के उच्चतर आयाम के बारे में जानना चाहता है तो इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि उसके भीतर हरदम आनंद और शांति बनी रहे। अगर यह आपके भीतर नहीं होगा तो आप किसी न किसी चीज के पीछे भागते रहेंगे। अगर आप लगातार शांति और आनंद का अनुभव नहीं करेंगे तो आप खुशी पाने के लिए मजबूरीवश काम करते रहेंगे। ब्रह्मचारी वह होता है, जो अपनी शांति व आनंद के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना चाहता। यह कोई मामूली बीड़ा नहीं है, जो उन्होंने उठाया हुआ है। अगर एक बार इंसान ऐसा बन जाए जहां उसकी शांति, उसका प्रेम, उसका आनंद किसी दूसरे का मोहताज न हो तो फिर उसके पास अगले आयाम में खुद को विकसित करने के लिए जरूरी आधार तैयार हो जाता है। अगर यह आधार उसके पास नहीं है, तो स्वाभाविक तौर पर वह बाध्यकारी गतिविधियों में ही अटका रहेगा।

जीवन के हर आयाम में विवशता छोड़नी होगी

एक तरीके से ब्रह्मचर्य का एक बुनियादी मतलब यह भी है कि इंसान एक बाध्यकारी व विवश व्यक्ति से एक चेतनापूर्ण व जागरूक व्यक्ति में बदल जाए।   

तो अगर आपने यह देख व जान लिया है कि भौतिक प्रकृति से भीतरी प्रकृति कहीं ज्यादा गहन और अलग है, तो आप अपने जीवन में एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना चाहेंगे, जो उस तरह की प्रकृति के लिए सहायक व उपयोगी बन सके।
कुंवारापन एक भद्दा शब्द है, क्योंकि बिना जरूरी समझ या जरूरी साधना अथवा जरूरी ऊर्जा के अगर आप खुद को रोकने की कोशिश करेंगे तो और दुखी ही होंगे। अब आप अपनी बाध्यकारी गतिविधियों को कई तरीकों से सजाते रहें, उसे खूबी की तरह बखानते रहें, लेकिन क्या आप यह देख पा रहे हैं कि आप यह विवश होकर कर रहे हैं? यह एक सचेतन व्यवहार तो नहीं है। एक बार किसी व्यक्ति को यह बात समझ में आ गई कि अगर वह इसी तरह से बाध्यकारी गतिविधियों में लगा रहा तो वह कभी वहां नहीं पहुंच पाएगा, जहां वह पहुंचना चाहता है तो जाहिर है कि वह सचेतन होने की कोशिश करेगा। तो इसी समझ के आधार पर हम यह कहते हैं कि अगर आप वाकई आगे बढऩा चाहते हैं तो आप अपने जीवन के हर आयाम में विवशता छोडक़र एक चेतनता लाएं। यही ब्रह्मचर्य है। कुंवारापन एक भद्दा शब्द है, क्योंकि बिना जरूरी समझ या जरूरी साधना अथवा जरूरी ऊर्जा के अगर आप खुद को रोकने की कोशिश करेंगे तो और दुखी ही होंगे।

जीवन दो अलग-अलग स्तरों पर काम करता है

मैं जानता हूं कि आज के दौर का फंडा है- ‘चलता है।’ मैं नहीं समझ पा रहा कि लोग क्या चलने की बात कर रहे हैं।तो अगर आपने यह देख व जान लिया है कि भौतिक प्रकृति से भीतरी प्रकृति कहीं ज्यादा गहन और अलग है, तो आप अपने जीवन में एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना चाहेंगे, जो उस तरह की प्रकृति के लिए सहायक व उपयोगी बन सके। देखिए, सतही तौर पर जीवन की प्रक्रिया में शामिल होना एक बात है, जबकि उसके मूल में जाना दूसरी बात। प्रकृति दो अलग-अलग स्तरों पर काम करती है। प्रकृति का एक आयाम आत्मसुरक्षा और प्रजनन के अलावा और कुछ जानता ही नहीं। यह प्रकृति का सतही आयाम है। जिसमें बस खाना, सोना, बच्चे पैदा करना और मर जाना जैसी चीजें होंगी। अगर आप अपने शरीर के हिसाब से चलेंगे तो यही सारी चीजें होंगी। लेकिन इसी के साथ आपके भीतर प्रकृति का दूसरा आयाम भी है, जो असीमित तरीके से विस्तार पाना चाहता है। आप किसे ज्यादा महत्व देते हैं, यह आप पर निर्भर करता है। अगर आप भौतिक प्रकृति को ज्यादा महत्व देते हैं तो आप बस इतना ही जान पाएंगे। अगर आप उस भीतरी प्रकृति को ज्यादा महत्व देते हैं, जो असीमित विस्तार पाना चाहती है तो जीवन अलग ही होगा। तो अगर आपने यह देख व जान लिया है कि भौतिक प्रकृति से भीतरी प्रकृति कहीं ज्यादा गहन और अलग है, तो आप अपने जीवन में एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना चाहेंगे, जो उस तरह की प्रकृति के लिए सहायक व उपयोगी बन सके। इसी समझ के साथ ब्रह्मचर्य आध्यात्मिक प्रक्रिया का अंग बना।