व्यक्तित्व के सीमित पिंजरे को तोड़कर खुले आकाश में उड़ना योग कहलाता है - सद्‌गुरु UNESCO में

गांधी जयंती के अवसर पर, सद्‌गुरु को पेरिस में यूनेस्को मुख्यालय में अहिंसा पर बातचीत में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था। यूनेस्को की मीडिया सर्विसेज के प्रमुख, जॉर्ज पापगियानिस ने सद्‌गुरु के साथ इस साक्षात्कार में चर्चा की। वे व्यक्तिगत और वैश्विक दोनों स्तरों पर योग के परम समाधान बनने की संभावनाओं का पता लगा रहे हैं। सद्‌गुरु कहते हैं कि महत्वपूर्ण बात यह है कि हम योग को अभ्यास के तौर पर नहीं बल्कि लोगों के अनुभव के रूप में सामने लायें।
 
व्यक्तित्व के सीमित पिंजरे को तोड़कर खुले आकाश में उड़ना योग कहलाता है  - सद्‌गुरु UNESCO में
 
 
 

 

जॉर्ज पेपेगिएन्निस: मुझे यह कहना है कि आज का यह अवसर यूनेस्को में होने वाले कुछ विशेष अवसरों में से है क्योंकि ऐसाकभी कभी ही होता है कि हम ऐसे स्थान पर हों जहाँ सेसाफ़ तौर पर ऐसेविचार और सुझावमिलें जिनसे हम समझ सकें कि हमें अपनी रोजाना की ज़िन्दगी कैसे जीनी चाहिये, कैसे हमें कुछ बहुत हीपीड़ादायकसमस्याओं के समाधानमिल सकते हैं और कैसे हम सबमिल कर अपने सामने आने वाली समस्याओं और चुनौतियों का मुकाबला कर समझदारीसे इन्हेंसुलझासकते हैं।

आज, जब कि हम यूनेस्को से होने वाला सीधा प्रसारण फेसबुक पर भी प्रसारित कर रहे हैं, मुझे एक विशिष्ठ व्यक्ति का परिचय कराते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है, जिन्हें शायद आप पहले सेजानते हैं औरफेसबुक पर देख चुके हैं, और वोहैं, सद्‌गुरु।

सद्‌गुरु: धन्यवाद्, जॉर्ज। नमस्कार।

जोर्ज: बहुत धन्यवाद। आपको नमस्कार। पेरिस में यूनेस्को मुख्यालय में हम आज जोन मिरो की सुन्दर कलाकृति के सामने बैठकर बातचीत करने जा रहें हैं। वैसे हमने कुछ समय में होने वालीबैठक के मुद्दों के बारे में बात कीहैजिससे मुझे एक बहुतसकारात्मक संदेश मिला है।

मैं यह कहना चाहूँगा कि कल मुझे आपको यहाँ यूनेस्को में चर्चा करते हुए देखने का जो सुअवसर मिला वहमेरे लिए जीवन को खोल कर देखने केएक साधन जैसा था, और कभी ऐसा लगा जैसे यह विशेष रूप से जीवन के लिये मार्गदर्शन हो, और आप यह सब फेसबुक पर, सीधे प्रसारित हो रहा था। आप और आपकी टीम, यहअदभुत है।है।इसलिएहम रोज़ यह करते हैं,और कभी- कभीयूनेस्को से भी हम अपना संदेशफेसबुक पर प्रसारित करते हैं, मैं आपसे यहपूछना चाहता हूँ।।।।।।। मैं एक ऐसी शख्सियत से बात कर रहा हूँ जिनकी गणना, इंडिया टुडे द्वारा, भारत के 50 सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों में की गई है। आप एक योगी हैं, एक दिव्यदर्शी, एक युगदृष्टा, और सर्वाधिक लोकप्रिय लेखकों में से हैं...

सद्‌गुरु: लोग ऐसी कुछ बातें कहते हैं, मैं नहीं कहता(हँसते हैं)।

जॉर्ज : और जो मुझे मालूम हुआ है उसके अनुसार वे कुछ गलत नहीं कहते। आपने ईशा फाउंडेशन की भी स्थापना की है। आपका कार्य, आपका जीवन पूरी तरह से समर्पित है...

सद्‌गुरु: यह एक अच्छा बदलाव है क्योंकि मेरे लिये, जीवन और काम में कोई अंतर नहीं है।

जॉर्ज: ऐसे कुछ दिन होते हैं, जब मैं भी ऐसे अंतर नहीं करता, या शायद मुझे ऐसा लगता है। मुझे इसमें दिलचस्पी है, कल बातचीत के दौरान आपने कई बार इसकी चर्चा की। तब भी, जब आप अपने विचार रख रहे थे और यहाँ यूनेस्को में अपनी उपस्थिति के बारे में कह रहे थे, जिस संस्था की स्थापना दूसरे विश्व युद्धके कारण हुए महाविनाश के परिणामों को देख कर इस संकल्प के साथ हुई कि फिर कभी ऐसा विश्व युद्ध नहीं होने देना है। हम यहाँ अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये निरंतर संघर्ष कर रहे हैं, और आप जो कार्य कर रहे हैं तथा आप जिन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हें देखते हुए, मैं यह जानने के लिये उत्सुक हूँ कि क्या हम योग की परम्पराओं से उन चुनौतियों का उत्तर पा सकते हैं, जिनका हम मुकाबला कर रहे हैं?

पूरे ब्रह्माण्ड के खिलाफ होने का कोई फायदा नहीं

सद्‌गुरु: मैं कहूँगा, पूरी तरह से। जिस तरह से योग अमेरिका में आया है,और आप तो न्यूयॉर्क से हैं,तो बहुत से लोगों के लिये यह बस एक शौक की तरह है,उनके लिये इसका मतलब बस लुलुलेमन पैन्ट्स से है,या फिर, “मैं योग इस तरह से करता हूँ”, “ये अत्यंत मजेदार है”…आदि। लेकिन योग यह नहीं है। योग शब्द का अर्थ है मेल या एक हो जाना। देखिये, किसी व्यक्ति का अनुभव अभी यह कुछ ऐसा है। अभी आप हैं और पूरा ब्रह्माण्ड है। जब किसी भी कारण से आप के लिये जीवन थोड़ा मुश्किल हो जाता है तो स्थिति ऐसी हो जाती है जैसे सारा ब्रह्माण्ड आप के खिलाफ है।‘आप विरुद्ध ब्रह्माण्ड’ यह एक मूर्खतापूर्ण लड़ाई है लेकिन लगभग हर मनुष्य ऐसी ही स्थिति में होता है। तो हर मनुष्य इस स्थिति में है कि ‘आप विरुद्ध ब्रह्माण्ड’। इसलिए योग का अर्थ है कि आप पूरी जागरूकता के साथ अपने व्यक्तित्व की सीमाओं को तोड़ते है, सिर्फ बुद्धि से नहीं, सिर्फ विचार या भावना से नहीं बल्कि अपने अनुभव में। देखिये, इस समय आपके व्यक्तिगत अनुभव थोड़े बनावटी हैं क्योंकि हम अपनी पहचान अपने शरीर, विचारों,शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक संरचनाओं के रूप में करते हैं, जिसके कारण आप एक अलग व्यक्ति हैं। लेकिन अभी देखा जाये तो हम यहाँ बैठ कर जो सांस ले रहे हैं, वह क्या है? वो वह है जो ये वनस्पतियाँ छोड़ रहीं हैं और हम ग्रहण कर रहे हैं।

लेकिन हम इसका मानवीय स्तर पर अनुभव नहीं करते। यदि आप यह अपने मानवीय अनुभव में ले आते हैं, जैसे आप यहाँ बैठे हैं और पूरी जागरूकता से यह अनुभव करते हैं कि आपके और आपके चारों ओर लगे पेड़- पौधों और वृक्षों के बीच एक आदान प्रदान हो रहा है, अगर आप साफ़ तौर परदेख सकतेकि आपके श्वसन तंत्र का आधा भाग वहां वृक्षों पर लटक रहा है, तो फिर क्या किसी को आपको बताने की आवश्यकता होगी इसे मत काटिए, इसकी सुरक्षा कीजिये, उसे बचाइये। ‘आप यह नहीं करेंगे’, ऐसे उपदेशों की जरूरत नहीं पड़ेगी। तो, मूलतः योग का अर्थ यह है कि आप जागरूकता के साथ अपनी व्यक्तित्व की सीमाओं को नष्ट कर दें जिससे आपके अपने जीवन का अनुभव उतना ही बड़ा हो जाता है जितना ब्रह्माण्ड का, या जीवन का होता है। तो जब यह अनुभव किसी मनुष्य को एक क्षण के लिये भी हो जाता है, एक क्षण के लिये भी यदि आप इन सब लोगों के बारे में वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा अपने हाथों की दस उँगलियों के बारे में, तो फिर किसी को आपको यह बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि आप शांति से रहिये, लोगों से प्रेम कीजिये, उनकी देखभाल कीजिये, उन्हें नुक्सान मत पहुंचाइये। आपको इसकी कोई भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि यह आपके अनुभव में है कि आपके चारों ओर जो कुछ भी है वह आपका ही हिस्सा है। यह दुर्भाग्य है कि अधिकतर लोगों को यह अनुभव सिर्फ तब होता है जब अंत में उन्हें दफना दिया जाता है।

जॉर्ज: राख से राख तक, मिट्टी से मिट्टी तक। अभी, जब आप यह सम्बन्ध समझा रहे थे, जो हमारा मूल रूप से ब्रह्माण्ड के साथ है, तो एक तरह से ब्रह्माण्ड शुरू होता है...

सद्‌गुरु: यह कोई सम्बन्ध नहीं है।

जॉर्ज: यह सब एक ही है...

सद्‌गुरु: सम्बन्ध का अर्थ है कि दो लोग होने चाहियें।

जॉर्ज: हम्म हम्म ... ( बात मानते हुए); यह सब एक ही है।

सद्‌गुरु: यह सब एक ही जीवन है। आप बस धरती पर एक पल के बुलबुले जैसे हैं। जैसे कंप्यूटर पॉप अप होता है। आप बस दो सेकण्ड के लिये आते हैं और बाहर चलेजाते हैं।

जॉर्ज: तो फिर योग कई मायनों में मूल विज्ञान की झलक भी है क्योंकि अभी, जब आप कह रह थे कि जो पेड़ पौधे छोड़ते हैं हम वही अन्दरलेते हैं।।।।।

तकनीक का इस्तेमाल करने वाले हाथों को ठीक करना होगा

सद्‌गुरु: मैं यह कहूँगा कि आप जिसे आधुनिक विज्ञान कहते हैं, वह एक छोटा सा भाग है उसका, जिसे हम योग कहते हैं। यह कुछ अजीब सा लगेगा क्योंकि आधुनिक विज्ञान आज संसार में बड़ी चीज़ है जब कि योग बस एक एक छोटे से साइड फैशन की तरह है जिसेआप करते हैं, लोगों को यह थोडा घमंडीपन लगेगा लेकिन मैं आपको यह बता रहा हूँ कि योग का अर्थ यहहै कि उससे बाहर कुछ भी नहीं है। एक अर्थ में आप जिसे आधुनिक विज्ञान कहते हैं वह भौतिक पदार्थों का अध्ययन है जिससे हम जान रहे हैं कि तकनीक से हम कैसे उनका बहुत सारा लाभ ले सकते हैं, लेकिन यह अदभुत ज्ञान भी हमारे ही खिलाफ हो गया है क्योंकि हममें व्यक्तित्व है, योग का हमारा अनुभव अभी भी एक हो जाना से नहीं है जिसके कारण जो वैज्ञानिक ज्ञान हमारे पास है, वही हमारे विरुद्ध हो गया है। एक तरह से देखें तो विज्ञान इस धरती को किसी भी अन्य वस्तु से अधिक नुक्सान पहुंचा रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, है न?

जॉर्ज: हमारे व्यक्तित्व के कारण...

सद्‌गुरु: क्योंकि यह है, देखिये, हमें समझना पड़ेगा कि जब आप कोई भी साधन, वह कितना भी अदभुत क्यों न हो, किसी को देते हैं तब वह व्यक्ति, जिसके हाथ में वह साधन है, वो यह तय करेगा कि क्या विनाशकारी है और क्या रचनात्मक। जॉर्ज: और वह हाथ है...

सद्‌गुरु: हमने अभी उस हाथ को ठीक नहीं किया है।

जॉर्ज: हाँ, हाँ।

सद्‌गुरु: हमने अभी उस हाथ को ये नहीं सिखाया है, कि सबको अपना ही एक हिस्सा मानना है। वो हाथ सोचता है, वो सबसे अलग है।

जॉर्ज: जैसा कि मैंने बातचीत शुरू होते समय कहा, हम यहाँ रोज संघर्ष कर रहे हैं, और हमारे समूह के उन लोगों के लिये जो फेसबुक पर इस सीधे प्रसारण में अब शामिल हो रहे हैं और उनके लिये भी जो सद्‌गुरु के फेसबुक परिवार का हिस्सा हैं, हम पेरिस के यूनेस्को मुख्यालय से आपके सामने सीधे प्रसारण में हैं, एक ऐसे साहसी काम के रूप में, जो हमें इस बातचीत में, और एक खोज अभियान मेंआगे बढ़ायेगा। जहां तक संभव हो सके, इस बातचीत का हिस्सा बने रहिये, मैं आपके सवालों पर नज़र रखूँगा।

सद्‌गुरु: क्यों जॉर्ज, क्या मेरे साथ होनाइतना मुश्किल हो गया है कि आप मुझे एक साहसिक कोशिश बुला रहे हैं? जॉर्ज: नहीं, एक साहसिक कोशिश और हमें ऐसी साहसी खोज करनी चाहिए, और इसीलिए हम यहाँ इकठ्ठा हुए हैं। क्या व्यक्तिवाद एक संपत्ति, एक ताकत बनने की बजाय एक खतरा बन गया है?

जब हम पिंजरा तोड़कर उड़ते हैं, तब योग कहलाता है

सद्‌गुरु: व्यक्तिवाद एक तरह से अपने आप में एक धर्म बन गया है। यह बहुत खतरनाक है। यह विशेष अधिकार आपको प्रकृति ने दिया है कि आप व्यक्तिगत अनुभव ले सकते हैं, जब कि आप इस धरती पर सिर्फ दो क्षण का बुलबुला मात्र हैं.... मेरे और आपके पहले अनगिनत लोग यहाँ आकर गये हैं, वे कहाँ हैं? कोई निशान बाकी नहीं है, वे सब मिट्टी की सतह भर हैं। तो यह शरीर भी उसी तरह मिट्टी हो जाएगा लेकिन अभी तो मैं एक व्यक्ति हूँ और यह एक बड़ी बात है कि मैं एक व्यक्ति की तरह जीवन का अनुभव ले सकता हूँ। मेरे पास जीवन के मेरे अपने अनुभव हैं। यह अद्भुत विशेषाधिकार हर व्यक्ति के पास है लेकिन हमने इसको अपने ही विरुद्ध खड़ा कर लिया है। हम अपनी व्यक्तित्व का एक पिंजरे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, एक ऐसे पिंजरे की तरह जिसे हम तोड़ नहीं सकते। हम एक पिंजरे में हैं, एक अंडे में जिसे हम कभी नहीं फोड़ते। यदि आप उसे फोड़ देते हैं तो यह योग है। अगर पक्षी उड़ता है तो यह योग है, नहीं तो यह बस एक पिंजरा है।

जॉर्ज: तो हम इन समस्याओं का, इन चुनौतियों का सामना योग के माध्यम से करने के लिये अपना ध्यान कहाँ केन्द्रित करने से शुरुआत करें? ऐसा लगता है कि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जो एक गोल चक्कर में घूम रही है.... मानवता जाति एक गोल चक्कर में घूम रही है और कुछ लोगों के पास.... । कुछ बहुत ही कठोर विचार हैं जो हम आजकल सुनते हैं, विभिन्नता के महत्व को समझने में जो जबरदस्त कमी दिखती है, सहनशीलता का अभाव, दूसरों में अपने को न देख सकना, यह सब कुछ वैसा ही है, जैसा दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने से पहले दिखता था। अतः केवल इतिहास ही हमें पाठ नहीं पढ़ा रहा बल्की अन्य संसाधन एवं विश्व में हमारा स्थान बताने वाले माध्यम भी इशारे कर रहे हैं। उदाहरण के लिये योग के माध्यम से, हम कैसे इस विनाश का रास्ता बदल सकते हैं....हम कैसे गलतियां दोहराने से अपने को रोक सकते हैं?

सद्‌गुरु: शायद आप उस तरह की गलतियां न दोहरायें जैसी पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई थीं क्योंकि दोनों पक्षों के सैनिक फेसबुक मित्र हो सकते हैं...आप जानते ही हैं, कुछ भी हो सकता है।

जॉर्ज: यह ब्रह्माण्ड की गहराई पर निर्भर करता है!

25 लोगों के बदलने से दुनिया बदल सकती है

सद्‌गुरु: तो आवश्यक रूप से हम हमेशा मरम्मत का काम करते हैं, कभी मूल समस्या का हल निकालने की कोशिश नहीं करते। जब आप कहते हैं,“हम इससे कैसे निपटें?”, किसी ने मुझसे पूछा था... यूरोप के एक अत्यंत विशिष्ठ व्यक्ति ने एक बार मुझे पूछा, “सद्‌गुरु, अगर कोई एक ऐसी चीज़ हो जो हम आपके लिये कर सकें और जो इस विश्व को बदल दे, तो वो कौनसी चीज़ है?” मैंने बस नाम गिनाये। मैंने कहा, मैं ये पच्चीस लोग चाहता हूँ, सिर्फ पांच दिन के लिये। उसने पूछा, ये पच्चीस लोग कौन हैं, मैंने विश्व के मुख्य देशों के पच्चीस राष्ट्र प्रमुखों के नाम गिनाये। आप मुझे पांच दिन के लिये इन्हें दे दीजिये

जॉर्ज: ये हमारे लिये लोगों का प्रेम गड़बड़ कर रहा है। कृपया जारी रखिये।

सद्‌गुरु: तो ये लोग जो विश्व में जिम्मेदारी और सत्ता के पदों पर हैं, यदि उनके विचार और महसूस करने का तरीका तथा जीवन को अनुभव करने के ढंग में दस से पच्चीस प्रतिशत भी फर्क आता है, यदि दस प्रतिशत भी फर्क होता है, तो विश्व में सिर्फ समाधान दिखेंगे, समस्या नहीं। उदाहरण के लिये मैं एक बहुत आधारभूत बात कर रहा हूँ, जो करोड़ों लोगों पर असर कर रही है। एक अंदाजा लगाया जा रहा है कि अगले दस वर्षों में करोड़ों लोग इधर से उधर विस्थापित(माइग्रेट) होंगे। इस तरह के कुछ आंकड़े हैं।

पोषकता, विश्व के लगभग 27 से 28% लोग कुपोषित हैं लेकिन वर्ष 2014 में, आंकड़ों के अनुसार, हमने 18।6 बिलियन लोगों के लिये काफी हो इतना अन्न पैदा किया था और विश्व की जनसँख्या उसकी एक तिहाई है लेकिन लगभग 30% लोगों को खाने को नहीं मिलता। यह मामला कुछ ही महीनों में हल हो सकता है अगर विश्व के नेताओं में सहानुभूति, दया और करुणा का गहरा भाव हो।

सिर्फ एक देश चाहे तो पूरे विश्व की समस्याओं को सुलझा सकता है

सहानुभूति, दया और करुणा उन मूल्यों के रूप में नहीं जिन्हें आप अपना सकते हैं, बल्कि सिर्फ इसलिये कि आपने दूसरे जीवन का अनुभव अपने जीवन के रूप में किया है। यह योग है। तो हम यदि योग का प्रयोग नहीं पर उसका अनुभव ला सकें, जिम्मेदार लोगों को योग का अनुभव करा सकें, वे लोग जिनके पास बहुत अधिक सत्ता है तथा संभावना भी। देखिये, ऐसा पहली बार हुआ है कि हमारे पास ज़रूरी संसाधन, योग्यता और तकनीक है कि हम इस धरती पर हरेक मानवीय समस्या का समाधान पा सकते हैं। ऐसा कभी संभव नहीं था। आप दूसरे विश्व युद्ध की बात कर रहे हैं, उस समय भी यह संभव नहीं था। पच्चीस वर्ष पहले भी हमारे पास हरेक समस्या का समाधान पाने की सम्पन्नता नहीं थी। यह लोगों की पहली पीढ़ी है जिसके पास हर समस्या का समाधान पाने की योग्यता है। बस बात यह है कि हमारे पास जागरूकता की समावेशी भावना नहीं है। हम अभी भी राष्ट्र अथवा समाज के मुकाबले में व्यक्तिगत स्तर पर सोचते हैं। इससे परे जाकर हम जीवन का अनुभव नहीं कर पा रहे। अनुभव के बिना विचार नहीं बदलते। आप का अनुभव कहीं भी हो, आपके अनुभव का स्तर क्या है, वही विचार होता है। कुछ शिक्षण के साथ, कुछ विचार विमर्श के साथ, आप इसे एक कदम आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह उससे आगे नहीं जाता।

यदि आपका अनुभव में विश्व बदलता है, जैसा कि मैं पहले कह रहा था, यदि आपके अनुभव में आपकी सांस इस पेड़ से अभी जुडी हुई है तो विश्व में आपको पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलन चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। सभी लोग वही करेंगे जो उन्हें करना चाहिये। अगर कम से कम ऐसा विश्व के नेताओं के साथ होता है, तो वे वही करेंगे जो उन्हें करना चाहिये क्योंकि आजकल उनके पास संसाधनों की स्थिति ऐसी है कि एक ही देश सारे विश्व की समस्या को हल कर सकता है, वास्तव में विश्व की सभी समस्याओं को, पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि, आप इन सभी को हल कर सकते हैं, विश्व के एक या दो राष्ट्र विश्व की सभी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। लेकिन अभी तक हमने दूसरों के जीवन को अपने जीवन की तरह अनुभव नहीं किया है। जॉर्ज: तो फिर हम ऐसे समय में क्यों हैं जब समुद्रों का तापमान बढ़ रहा है, जिसका जबरदस्त असर पर्यावरण पर पड़ेगा जैसा हम देख रहे हैं... और जलवायु पर भी। हम जलवायु में परिवर्तन देख रहे हैं जैसे वे भयंकर समुद्री तूफ़ान जैसे पहले कभी नहीं देखे गये। धरती हम से कह रही है, हम सुन ही नहीं रहे और हम... और मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि हम सब एक ही हैं, एक ही इकाई हैं, लेकिन यह सन्देश गूँज ही नहीं रहा।

सद्‌गुरु: मुर्दे समझ गये हैं - कि ये एक इकाई है। जीवित लोगों को अभी समझ आनी बाकी है।

सद्‌गुरु: देखिये, आज अधिकांश विश्व एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और इस अर्थ में वे 25 (नेता) उन बिलियंस का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन बिलियंस के द्वारा इन 25 का सशक्तिकरण किया गया है। तो वे लोग ऐसे नहीं हैं जो कहीं से टपक पड़े हैं, ये वे लोग हैं जिन्हें अन्य लोगों ने ऊपर पहुंचाया है। अतः ये 25 काफी हैं क्योंकि वे बहुत सारी चीज़ों को बदल सकते हैं। धरती पर नीतियाँ एक अधिक मानवीय आधार पर बदल सकती हैं।

ख़ुशी की खोज से परेशानियां पैदा हुई हैं

जब हम समुद्रों के बढ़ते तापमान के बारे में बात करते हैं तो, आप जानते हैं कि कई पर्यावरण सम्बन्धी तत्व एक विशेष दिशा में काम कर रहे हैं। यह इस तरह से देखा जा सकता है, अब तक मनुष्यों ने इस पृथ्वी पर जो कुछ किया है वह मानव कल्याण की खोज में किया है। अमेरिकी संविधान में भी लिखा है, “ख़ुशी की खोज में”। लेकिन ख़ुशी की खोज करना एक गलत दिशा में आगे बढ़ना है, क्योंकि ख़ुशी या दुःख, दोनों सिर्फ आपके अन्दर ही होते हैं। अगर आपको लगता है की यह या वह पा लेने से या दुनिया को या ब्रह्माण्ड को जीत लेने से आप को ख़ुशी मिलेगी तो असल में आप का जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही विनाशकारी है। जब थोड़े से ही लोग ऐसी आकांक्षा रखते थे तो यह सामान्य लगता था लेकिन अब यदि 6 बिलियन लोग ऐसी इच्छा रखेंगे तो यह विनाशकारी ही होगा। जो भी विनाश आप देख रहे हैं वह सब इस खुशी को हासिल करने की दौड़ के कारण ही है, जिसको विज्ञान और तकनीक ने और मजबूत किया है, है न?

जॉर्ज: ये व्यक्ति की ख़ुशी की खोज है, जरुरी नहीं कि मानवता की ख़ुशी की खोज हो।

सद्‌गुरु: ओह, वे सब मानव ही हैं, सही है न?

जॉर्ज: जी हाँ, ठीक है लेकिन मुझे लगता है जब हम मानव ख़ुशी की तलाश की बात करते हैं, तो यह एक सामूहिक प्रयास है। हम सभी के बारे में बात कर रहे हैं।

सद्‌गुरु: देखिये यह सामूहिक है। हम सभी के मिल कर करने के कारण ही विनाश हो रहा है, केवल किसी व्यक्ति विशेष के कारण नहीं। हम एक विशेष प्रकार का शहर बनाना चाहते हैं, उसमें हम सब आ जाते हैं, है न? हम किसी एक व्यक्ति पर इसका दोष नहीं डाल सकते, हम सभी हवाई जहाज़ों, मोटर वाहनों, सब तरह की तकनीकों का मजा ले रहे हैं। हम यह सब सिर्फ एक आदमी पर नहीं डाल सकते जो कहीं पर एक कोयले की खदान चला रहा है नहीं, वह खदान इसलिये चला रहा है क्योंकि हम उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। तो हम सब इसमें एक समान शामिल हैं। कुछ ज्यादा फायदा ले रहे होंगे, कुछ कम। वो अलग बात है लेकिन हमने एक ऐसी दिशा पकड़ ली है कि आप दुनिया में से ख़ुशी निचोड़ रहे हैं। नहीं, ऐसा नहीं है। हर मानवीय अनुभव आपके अन्दर पैदा होता है।

अगर हम इस एक चीज़ को मान लें तो यह मूल बात है। मान लीजिये की आप वहां बैठे हैं और आप पूर्ण रूप से अपने आप में आनंद में हैं, मेरी तरह। मेरी आँखों को देखिये, मैं हर समय नशेड़ी की तरह दिखता हूँ। मैंने कभी कोई नशीला पदार्थ नहीं लिया है, लेकिन हर समय अपार आनंद में होता हूँ। तो अगर आप हर समय अपने स्वाभाव से ही अपार आनंद में रहते हैं, तो आप कहीं बाहर ख़ुशी खोजने नहीं जायेंगे, आप बस वही करेंगे जिसकी ज़रूरत है, न ज्यादा, न कम। आजकल हम सब कुछ अधिकता में कर रहे हैं क्योंकि हम श्रेष्ठ हो गये हैं, हम तकनीक के साथ श्रेष्ठ मानव बन गये हैं। जो काम 10,000 लोग करते थे वो आज एक ही आदमी एक दिन में कर डालता है, सही है न? 10,000 लोग जिस काम को करते थे वो आज एक आदमी इसलिये कर पा रहा है क्योंकि हम तकनीकि रूप से सशक्त हो गए हैं। जब आप इस तरह से सशक्त हो जाते हैं और फिर भी आप ख़ुशी की तलाश में हैं तो आप सारी पृथ्वी को पूरी तरह से खोद डालते हैं, सही है न? तो तापमान का बढ़ जाना, पृथ्वी की एक बहुत छोटी सी प्रतिक्रिया है। बड़ी प्रतिक्रियाएं भी जरुर आयेंगी।

जॉर्ज: लोगों को हिम्मत कहाँ से मिलेगी? आप पच्चीस के बारे में कह रहे थे, अगर हम इन पच्चीस के बारे में बात करते हैं तो उनको उनके लोगों ने उनका नेतृत्व करने की सत्ता दी है, वे लोग एक लोकतांत्रिक व्यस्था में हैं, जैसा हमने कहा, शासन लोकतान्त्रिक पद्धति से तय होता है। उनके नेताओं को यह शक्ति जनमत से मिली है। लेकिन फिर भी सवाल यह है कि, हमने सोने की खदान के बारे में कहा, तो वह व्यक्ति जो सोने की खदान चला रहा है वह उस नेता के प्रचार के लिये भी धन दे रहा होगा अतः वो नेता उसके अधिकार की रक्षा करेगा, या उस सोने की खदान को बचायेगा जिससे उसका काम चलता रहे.....

सद्‌गुरु: कोयले की खदान, कोयले की।

जॉर्ज: अरे, कोयले की खदान, सोने की,.. जो भी हो....सोने की, कोयले की,पेट्रोलियम...

सद्‌गुरु: मूल बात है, धरती का दोहन।

जॉर्ज: मूल रूप से, यह पृथ्वी को खोदना है। और फिर, क्योंकि किसी को न कहने की हिम्मत लानी पड़ेगी, अपने स्वार्थ के विरुद्ध, अपने व्यक्तिगत लाभ के विरुद्ध, जिससे हमारे पास जो है, उसे बचाया जा सके....

लोगों की अभिलाषा पर रोक लगाने से काम नहीं बनेगा

सद्‌गुरु: नहीं नहीं, यह विचार असफल हो चुका है, इस अर्थ में कि आप मनुष्य की अभिलाषा को नियंत्रित करने का प्रयत्न कर रहे हैं—यह कभी न करें,यह सही ढंग से काम नहीं करेगा। लोग अपने कार्यालय तक टेस्ला (इलेक्ट्रिक कार) में जाते हैं पर घर पर एक जबरदस्त शक्तिशाली गाड़ी पार्क करके रखते हैं। यह सभी जगह होता है। तो मनुष्य की अभिलाषा को रोकने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि यह मनुष्य का स्वभाव है कि उसमें इच्छाएं पूरी करने की तड़प होती है। अगर हम उसे एक पद्धति नहीं बताते, एक वैज्ञानिक पद्धति, एक तरह से...., मैं कह रहा हूँ वैज्ञानिक, क्योंकि यह दोहराई जा सकती है और लोग इसका अध्ययन कर सकते हैं... अपने ही अन्दर नतीजे पाने के लिये। यह एक अजीब चीज़ लग सकती है।“अरे, बहुत से लोग यह कह चुके हैं”। लेकिन मुद्दा ये नहीं है। मुद्दा अन्दर मुड़ने की फिलोसोफी का नहीं है, मुद्दा जानने की प्रक्रिया का है।

देखिये, यह एक तथ्य है कि हरेक मानवीय अनुभव का एक रासायनिक आधार होता है, है कि नहीं? मान लीजिये मैं आपको एक सरल विधि सिखाता हूँ जिससे आप अपने रसायन को इस तरह तैयार कर सकते हैं कि वह आपको एक अपार आनंद प्रदान करता है। अब आपको जीवन में भागदौड़ करने की ज़रूरत नहीं है, जब तक कि आपको अपने लिये एक विशेष उद्देश्य न मिल जाये। तब आप दौड़ेंगे नहीं, आप बस जीतने के लिये नहीं दौड़ेंगे क्योंकि आप मजे में हैं, आपने जीवन को पहले ही, कई अर्थों में जी लिया है, क्योंकि आप अपने अन्दर एक बहुत शांतिपूर्ण, आनंदपूर्ण, अद्भुत जीवन जी रहे हैं। अब आप वो करेंगे जो आवश्यक है, यह एक तथ्य है कि मनुष्य जब अन्दर से अच्छा महसूस करता है तो वह अपने आसपास की सब चीजों के साथ भी अच्छा ही करेगा। जब वह बुरा महसूस करता है तब वह उसे भी बांटता है। अभी, जब आप कह रहे हैं कि हम ख़ुशी की तलाश में हैं तो यहाँ एक पूरा मानव समाज है जो अधिकांश रूप से अपने अन्दर बुरा है। उन्हें जीवन में आराम का पता ही नहीं है। जीवन की अपार शांति या जीवन का अद्भुत सौदर्य तो छोड़िये, वे यह भी नहीं जानते कि आराम से कैसे रहा जाये। वे हमेशा उधेड़बुन में होते हैं, या तो यह कर रहे होते हैं या वह कर रहे होते हैं, कुछ भी मजबूरन कर रहे होते हैं।

जॉर्ज: अरे, आपने उनके लिये एक और मुद्दा उठा दिया, जो फेसबुक पर सद्‌गुरु से जुड़ रहे हैं....

सद्‌गुरु: नहीं नहीं, उनसे यह मत कहिये कि फ़ोन का प्रयोग न करें, वे सब चले जायेंगे।

जॉर्ज: नहीं, मैं देखना चाहता था कि क्या हम तकनीक के इस भाग पर बातचीत कर सकते हैं जो हमारे जीने के तरीके को बदल रहा है और भविष्य में जो हमारे जीवन में सही ढंग से अर्थपूर्ण बदलाव करने की हमारी योग्यता, जिसके लिये हम संघर्ष कर रहे हैं, के लिये विपरीत असर वाला सिद्ध हो सकता है। यहाँ यूनेस्को मुख्यालय में, हमारे जीवंत फेसबुक अभियान में, सद्‌गुरु हमारे साथ हैं। उनके लोग भी फेसबुक पृष्ठ पर हैं जो हमारे साथ मिल कर पोस्ट कर रहे हैं और हम इस बारे में बात कर रहे हैं इस विश्व में हम कहाँ पर हैं, विश्व के लिये हमारी जिम्मेदारियां क्या हैं और जब हम अपने सामने खड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं तथा कुछ मिनट पहले हमने ये बात की। मैं कुछ ऐसा करने का प्रयत्न कर रहा था जिससे हमारी बातचीत का स्तर बढ़े।

सद्‌गुरु: आप जब मुझसे बात कर रहे होते हैं, तब फ़ोन पर कुछ और कर रहे होते हैं... इसे व्यभिचार कहते हैं।

जॉर्ज: अगर हम व्याभिचार की नई व्याख्या करें तो वाकई यह हो सकता है। लेकिन ये चल रहा है...आप जानते हैं, मैं इतना बड़ा तो हूँ कि मैं मोबाइल फ़ोन से पहले के विश्व को जानता हूँ और अब ये मोबाइल फ़ोन नहीं रहा। मोबाइल तकनीक के कारण सभी प्रकार की जानकारी तक मेरी अभूतपूर्व पहुँच हो गयी है। दुनिया की अधिकतर जगहों पर जहाँ मैं जाता हूँ, इसने हमें सुविधा दी है कि हम इस बातचीत को बिना किसी मुश्किल के ऐसे ढंग से भेज सकें जो हमारी संस्था के लिये संभव है, वैसे ही जैसे आपके लिये भी है - कि बहुत अधिक लोगों तक पहुँचा जा सके और फिर इसका एक पहलू यह भी है कि बहुत नम्र शब्दों में अगर कहें तो यह एक भटकाने वाली चीज़ है। शायद व्यभिचार सही शब्द है... तो फिर हम कैसे इसे संभालें?

सद्‌गुरु: मुझे लगता है, बातचीत के सबसे पहले भाग में ही हमने इसको छुआ था — हमें मिली हुई बहुत सी सुन्दर, उपयोगी चीज़ों को हम अपने ही विरुद्ध कर लेते हैं। इसलिये नहीं क्योंकि तकनीक के साथ कोई गड़बड़ है, तकनीक आपकी सहायक होती है, कई मायनों में यह आपको सशक्त बनाती है। अभी हम इसको स्मार्टफ़ोन कहते हैं क्योंकि बहुत से लोगों की यही सबसे स्मार्ट वस्तु है। तो ये फोन, क्या ये कोई समस्या है? नहीं, समस्या है हमारी बाध्यता। आप जानते हैं, कई लोगों ने धूम्रपान इसलिये छोड़ दिया है क्यों कि वे सारा समय एसएम्एस भेजते रहते हैं?

जॉर्ज: क्या यह सही है? क्या हम इसे एक लाभ कहेंगे?

हर चीज़ को अपनी मजबूरी बना लेना समस्या है

सद्‌गुरु: बाध्य हो जाना यह समस्या है। जब लोग खाना शुरू करते हैं, उन्हें पता नहीं होता, कब रुका जाये। जब वे पीना शुरू करते हैं तो नहीं समझते, कब रुकना चाहिये। धूम्रपान शुरू करते हैं तो रुकने का नाम नहीं लेते। जब वे फ़ोन का प्रयोग शुरू करते हैं तो नहीं जानते, कब रुकना चाहिये। हमें मनुष्यों की इस बाध्यता के ऊपर काम करना है। यह बाध्यता इसलिये आती है क्योंकि हर वह काम जो आप करते हैं, वो अपनी ख़ुशी और खुशहाली के लिये करते हैं।

जॉर्ज: अभी के आंकड़ो के अनुसार एक व्यक्ति 210 बार अपना फ़ोन जांचता है, दिन में 210 बार वो अपना फ़ोन उठाता है - लेकिन बात नहीं करता।

सद्‌गुरु: बस उनके पास कुछ करने के लिये नहीं है, और वे फोन उठाते हैं...

जॉर्ज: हाँ, और शायद धूम्रपान नहीं करते।

सद्‌गुरु: हाँ, क्योंकि दोनों हाथ व्यस्त हैं। आप धूम्रपान नहीं कर सकते।

जॉर्ज: या फिर दिमाग भी काम नहीं करता।

सद्‌गुरु: नहीं, महत्वपूर्ण बात ये है — हम ख़ुशी की तलाश में हैं, ठीक है? अब फ़ोन ने आपको अपनी ख़ुशी पाने के लिये एक साधन दे दिया है अन्यथा आपको किसी से मिलने के लिये कहीं जाना पड़ता, आपको कुछ दूरी चलनी पड़ती। लोग पहले भी ऐसा करते थे मगर यह दिखता नहीं था - क्योंकि अब आप एक मिनट में 100 लोगों तक पहुँच सकते हैं।

जॉर्ज: प्रसन्नता, स्वयं-संतुष्टि — क्या इन्हें आपस में बदला जा सकता है?

सद्‌गुरु: देखिये, अगर आप वाकई (अन्दर से) प्रसन्न हैं, तो आप कभी भी किसी भी तरह की संतुष्टि नहीं खोजेंगे।

जॉर्ज: तो आप फ़ोन नीचे रख देंगे।

सद्‌गुरु: मुद्दा ये नहीं है। आप फ़ोन का उपयोग कर रहे हैं या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह का काम और किस तरह की बातें करते हैं। बस महत्वपूर्ण यह है कि आप किसी भी तरह से बाध्य नहीं हैं, न फ़ोन के लिये, न धूम्रपान के लिये, न भोजन के लिये न ही किसी भी चीज़ के लिये। इसका अर्थ यह है कि आप एक होशपूर्वक जीने वाले व्यक्ति हैं।

हमें ‘होना’ सीखना होगा

देखिये, केवल मनुष्य के साथ यह शब्द, ‘बीइंग’ जुड़ा है, ह्यूमन बीइंग, ठीक है? हम बाघ बीइंग, हाथी बीइंग, या मगरमच्छ बीइंग नहीं कहते। ऐसा कुछ भी नहीं, सिर्फ ह्यूमन बीइंग। यह इसलिये है क्योंकि हमें यह मालूम होना चाहिये कि ‘होना’ कैसे है। जानना चाहिये कि कैसे ‘होना’ है का अर्थ है कि मैं अपने विचारों को, अपनी भावनाओं को, अपने रसायनों को, अपने शरीर को वैसा बना सकता हूँ, जैसा मैं चाहता हूँ। लेकिन यह ही एक बात है, एक वर्णन है जिससे अधिकतर मनुष्य बहुत दूर हैं। वे नहीं जानते कि उन्हें कैसे होना चाहिये। उनका एक ही मार्ग है, गतिविधि, हर समय गतिविधि, मजबूरन की गई गतिविधि क्योंकि सिर्फ गतिविधि के माध्यम से वे अपने होने को स्थापित कर रहे हैं लेकिन यह वैसा नहीं है जैसा जीवन होता है। आप एक बीइंग हैं, एक ह्यूमन बीइंग। यदि आप जानते हैं कि कैसे होना है तो आप तय कर सकते हैं कि आपके विचार कैसे हों, भावना कैसी हो, कार्य कैसे हों। यह योग है — पहली बात यह कि आप जान जाएं कि ‘होना’ कैसे है। एक बार आप जान जायें कि आप को कैसे ‘होना’ है, फिर आपकी चुनी हुई गतिविधि तथा जीविका के अनुसार आप अपना जीवन एक विशिष्ठ समय में, विशिष्ठ परिस्थिति में अपनी सर्वोत्तम योग्यता, बुद्धि के साथ बितायें।

जॉर्ज: सद्‌गुरु, मुझे लगता है, इस बात पर अब हम इस अदभुत बातचीत को पूर्ण कर सकते हैं।

सद्‌गुरु: क्या मैंने कोई गलत बात कह दी?

जॉर्ज: बिलकुल नहीं! कुछ गलत नहीं कहा बल्कि आपने वास्तव में सबकुछ साथ में ला दिया। और मुझे लगता है कि यह हमेशा बहुत महत्वपूर्ण है कि लोगों को, जिनमें कम से कम मैं भी शामिल हूँ, यह अवसर अवश्य दिया जाये कि उन्हें एक ऐसी पूर्ण बात मिले, जिस पर वे विचार कर सकें और जिसमें सभी विशेष बातें आ जाती हों।

सद्‌गुरु: शांति, प्रेम, आनंद, ये, वो आदि को अलग-अलग मत देखिये। यदि हम केवल यह जान लें कि कैसे होना है तो आपका शरीर, आपकी शारीरिक संरचना और मनोवैज्ञानिक संरचना आपसे आदेश लेंगे। जो यह एक चीज़ हो जाये, तो आपको उन बातों के पीछे नहीं भागना पड़ेगा। आप बढ़िया रहेंगे।

जॉर्ज: इस बात पर, सद्‌गुरु, आपका बहुत बहुत धन्यवाद। हमारे सभी फेसबुक समूहों को धन्यवाद, इस बातचीत में शामिल होने के लिये धन्यवाद और हम आपके लिये शुभ दिन की कामना करते हैं, हमारी कामना है कि आप इन शब्दों पर गहराई से विचार करें, हमारी शुभकामना है कि आप ये बातें अपने साथ ले जायें और अपनी रोजाना की ज़िन्दगी का हिस्सा बनायें। तो अभी, सद्‌गुरु के साथ, मैं जॉर्ज पेप्पेगिएनिस, यूनेस्को मुख्यालय से सीधे प्रसारण में, आप सब के लिये एक सुन्दर दिवस की और सकारात्मक बदलाव वाले दिवस की कामना करता हूँ।

Love & Grace

 
 
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