तामसी प्रकृति: नवरात्रि के पहले तीन दिन

योग में तीन गुणों - तमस, रजस और सत्व – की चर्चा की गई है। आज जानते हैं तामसी प्रकृति और उसके नवरात्री से संबंध के बारे में–
तामसी प्रकृति: नवरात्रि के पहले तीन दिन
 

तमस, रजस और सत्व – इन तीन गुणों की चर्चा योग में की गई है। नवरात्रि के नौ दिनों की प्रकृति भी इन तीन गुणों के अनुसार होती है। इनमे पहले तीन दिन तमस से जुड़े हैं। क्या है तमस की प्रकृति? पढ़िए और जानिए सद्‌गुरु से..

मैं आश्रम में हमेशा लोगों से कहता रहता हूं कि चाहे आप कुछ भी कर रहे हों, रोजाना कम से कम एक घंटे तक आपकी उंगलियों को मिट्टी का साथ मिलना चाहिए।
दुनिया में मौजूद सारे गुणों को योग में तीन श्रेणियों में बांटा गया है‌‌ - तमस, रजस और सत्व। इन्हें तीन मूल गुण माने गए हैं। तमस का अर्थ होता है- जड़ता। रजस का मतलब सक्रियता से है और सत्व का अर्थ होता है, सीमाओं को तोड़ना। नवरात्रि के पहले तीन दिन तमस प्रकृति के होते हैं, जब देवी अपने उग्र रूप में होती हैं, जैसे दुर्गा और काली। तमस पृथ्वी की प्रकृति है जो सबको जन्म देने वाली है। हम जो समय गर्भ में बिताते हैं, वह समय तामसी प्रकृति का होता है। उस समय हम लगभग निष्क्रिय स्थिति में होते हुए भी विकसित हो रहे होते हैं। इसलिए तमस धरती और आपके जन्म की प्रकृति है। आप धरती पर बैठे हैं। आपको उसके साथ एकाकार होना सीखना चाहिए। वैसे भी आप उसका एक अंश हैं। जब वह चाहती है, एक शरीर के रूप में आपसे जुड़कर आपको एक चलता-फिरता मनुष्य बना देती है। और जब वह चाहती है, वापस उसी शरीर को अपने आप में समा लेती है।
जब वह चाहती है, एक शरीर के रूप में आपसे जुड़कर आपको एक चलता-फिरता मनुष्य बना देती है। और जब वह चाहती है, वापस उसी शरीर को अपने आप में समा लेती है।
यह बहुत जरूरी है कि आप लगातार अपने शरीर की प्रकृति को याद रखें। फिलहाल आप मिट्टी का एक ढेर हैं, जो अकड़ के साथ चल-फिर रहा है। जब धरती आपको अपनाना चाहती है, तो आप एक छोटा सा पिंड बन जाते हैं। मैं आश्रम में हमेशा लोगों से कहता रहता हूं कि चाहे आप कुछ भी कर रहे हों, रोजाना कम से कम एक घंटे तक आपकी उंगलियों को मिट्टी का साथ मिलना चाहिए। बागवानी का कोई काम करें। इससे आपके शरीर को स्वाभाविक रूप से याद रहता है कि आप नश्वर हैं। आपके शरीर को पता चल जाता है कि वह स्थायी नहीं है। शरीर में यह बोध होना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि इंसान अपनी आध्यात्मिक खोज पर ध्यान केंद्रित कर सके। यह बोध जितना तीव्र होता है, आध्यात्मिक भावना उतनी ही प्रबल हो जाती है।

 
 
  0 Comments
 
 
Login / to join the conversation1