राष्ट्रीय युवा दिवस – वक्‍त आ गया धर्म से उत्तरदायित्व की ओर बढ़ने का
आज स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन और राष्ट्रीय युवा दिवस पर पढ़ते हैं सद्‌गुरु का युवाओं के लिए संदेश। सद्‌गुरु बता रहे हैं कि आप युवा हैं या बूढ़े हैं, ये इससे तय नहीं होता कि आप किस साल पैदा हुए थे। युवा वही कहलाता है जो हमेशा सत्य को खोजने को तैयार है।
 
 

सद्‌गुरु : जब हम युवा कहते हैं, तो हम उस जीवन के बारे में बात कर रहे हैं जो अभी बन रहा है, जो अब भी ऐसी स्तिथि मे है जहाँ यह अहंकार से भरा या भटका हुआ नहीं है। एक ऐसा जीवन जिसमें उम्मीद दिखाई देती है, एक ऐसा जीवन जहाँ जीवन को जानने, समझने, और इसके सच को तलाशने की इच्छा दिखाई देती है।

भारत की युवा जनसंख्या को खोजी बनना होगा

जब मैं ‘सच’ की बात करता हूँ, तो यह समझना होगा कि ‘सच’ शब्द कई तरह से इस्तेमाल किया जाता रहा है। जब हम सच्चाई कहते हैं, तो ज्यादातर लोग यह सोचते हैं कि ये किसी दूसरी दुनिया की चीज़ है।

  आप युवा हैं या बूढ़े ये इससे तय नहीं होता कि आपका जन्म किस साल में हुआ है।
मैं चाहता हूं कि आप इसे इस तरह से देखें - जो सचमुच काम करता हो, वह ‘सच’ है, चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो। आप चलना चाहते हैं, तो क्या आपका पैरों पर चलना बेहतर होगा या फिर चलने के लिए अपने सिर का प्रयोग करना? क्या आप अपने सिर पर चलना चाहते हैं? नहीं, यह चलने का अच्छा तरीका नहीं है, आप आखिर में गंजे हो जाएँगे। पैर चलने के लिए बेहतर हैं। मैं आपके लिए यह बहुत सरल बना रहा हूं, लेकिन ‘सच’ का मूल रूप से मतलब यही है। वह क्या है जो जीवन के विभिन्न आयामों में वास्तव में काम करता है। यह खोजना ही ‘सच’ की खोज करना है। भारत एक ऐसी संस्कृति है जो हमेशा खोज करने वालों की धरती रही है, विश्वास करने वालों की नहीं। मूल रूप से इन दोनों में अंतर यह है कि - या तो हर चीज के बारे में आपकी अपनी धारणाएं हैं, या आपने हर चीज के बारे में ठोस विचार बना रखें हैं, या आप जीवन के किसी भी पहलू की सच्चाई की तलाश के लिए तैयार हैं क्योंकि आप चाहते हैं कि यह जीवन सर्वोच्च तरीके से घटे। आज हमारा भाग्य हमारे हाथों मे है क्योंकि भारत की पचास फ़ीसदी जनसंख्या की आयु पच्चीस वर्ष से कम है। इस धरती पर किसी और देश का ऐसा भाग्य नहीं। लेकिन इस भविष्यवाणी को सच में बदलने और कोई अन्य आपदा न बनाने के लिए, युवाओं को सत्य को खोजने वाला बनना होगा। न कि किसी विचारधारा, किसी विश्वास प्रणाली,सिद्धांत या किसी फिलोसोफी को मान लेने वाला। आपको सच तलाशने वाला बनना चाहिए।

जीवन की प्रकृति को समझना चाहते हैं तो आप युवा हैं

युवा होने का सही अर्थ यह है कि आप झूठी बातों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं, आप यह जानना चाहते हैं कि वास्तव में क्या है जो काम करता है। आपके शरीर के स्तर पर क्या काम करता है? आपके मन के स्तर पर क्या काम करता है? आपकी भावनाओं के स्तर पर क्या काम करता है? आपकी जीवन ऊर्जाओं के स्तर पर क्या काम करता है? बाकी दुनिया के साथ आपके रिश्ते के स्तर पर क्या काम करता है? जीवन के हर क्षेत्र में वह क्या है जो सर्वोत्तम काम करता है? और इस जीवन के लिए सर्वोच्च तरीके से जीने की संभावना पैदा करता है? अगर आपने यह खोज और मांग छोड़ दी है, तो आप युवा नहीं रह गए। आप बूढ़े हो गए हैं। आप एक ही जगह बस गए हैं, कब्र की तैयारी शुरू हो गई है - आप रुक चुके हैं। आप युवा हैं या बूढ़े ये इससे तय नहीं होता कि आपका जन्म किस साल में हुआ है। क्या आप जीवन के बारे में निष्कर्ष बना चुके हैं या आप अब भी जीवन की संभावनाओं के प्रति खुले हैं और इसकी प्रकृति को समझना चाहते हैं - यही बात आपको युवा या बूढ़ा बनाती है। यह महत्वपूर्ण है कि हर जिंदगी युवा बनी रहे। विशेषकर इस राष्ट्र और दुनिया भर के युवाओं के लिए, यह बहुत ज़रूरी है कि वो सच की खोज करने वाले हों।

जीवन की हर चीज़ का उत्तरदायित्व लेना होगा

समय आ गया है कि इस दुनिया की आबादी, विशेष रूप से युवा, धर्म से उत्तरदायित्व की ओर आगे बढ़े। आप अपनी ज़िंदगी को जो रूप देते हैं वह सौ प्रतिशत आपका उत्तरदायित्व है। इसके लिए तारे, ग्रह या ऊपर की शक्तियां ज़िम्मेदार नहीं हैं। यह आपके हाथ में है कि आप इस जीवन को कैसा बनाना चाहते हैं। जवान होने की मूलभूत बात यह है कि आप जो भी हैं, उन सभी चीज़ों का उत्तरदायित्व लेने के लिए हमेशा तैयार रहें। आप एक व्यर्थ का जीवन नहीं बन गए हैं जो बस सितारों की ओर देख कर सोच रहा है, "मैं परेशान क्यों हूँ? मैं सफल क्यों नहीं हूँ? आखिर क्यों ... मेरी जिंदगी सुंदर क्यों नहीं है? "आप ऊपर नहीं देख रहे हैं। आप अपने अन्दर देखने और उत्तर ढूंढ़ने के लिए तैयार हैं। इसका मतलब ये है कि आप सच की खोज में हैं।

युवा सच्चाई का खोजी होना चाहिए। केवल तभी वे युवा बने रहेंगे। अगर आप निष्कर्ष निकालते हैं, अगर आप विश्वास प्रणाली, सिद्धांतों, विचारधाराओं के आधार पर खुद की पहचान बनाते हैं, तो आप युवा होने के बावजूद भी बूढ़े हो जाते हैं। यह मेरी इच्छा और मेरा आशीर्वाद है कि इस दिन जब स्वामी विवेकानंद ने कई साल पहले कहा था कि, "आप मुझे सौ युवक दीजिए जो वास्तव में प्रतिबद्ध हैं, मैं इस देश का चेहरा बदल दूंगा।" क्या हम इतने नपुंसक हैं कि हम ऐसे सौ युवा नहीं बना सकते? हमें ऐसे लाखों युवाओं का निर्माण करने में सक्षम होना होगा जो वास्तव में प्रतिबद्ध हैं - अपने अस्तित्व की सच्चाई जानने के लिए, अपनी सफलता की सच्चाई जानने के लिए, अपनी विफलताओं का सच जानने के लिए, अपने जीवन के सुंदर पहलुओं के सच को जानने के लिए, अपने जीवन की कुरूपता जानने के लिए। यदि आप ये सब नहीं जानना चाहते तो आप युवा नहीं हैं। जवान होते हुए भी बूढ़े न बनें।

 
 
 
 
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