तिब्बती बौद्ध धर्म का इतिहास – गुरु पद्मसंभव ने कैसे किया सभी धर्मों का मेल

गौतम बुद्ध के कुछ समय बाद बौद्ध धर्म तिब्बत पहुंचा था। तिब्बती बौद्ध धर्म की स्थापना में नालंदा मठ और गुरु पद्मसंभव ने बड़ी भूमिका निभाई थी। जानते हैं इस इतिहास के बारे में।
बौद्ध धर्म की शिक्षा
 

बौद्ध धर्म की शिक्षा

सद्‌गुरु :  आजकल अधिकांश लोग, कम से कम पश्चिम के लोग यह मानते हैं कि बौद्ध धर्म तिब्बत में शुरू हुआ था। गौतम बुद्ध ने मुख्य रूप से भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार के इलाक़े में भ्रमण किया था। हमें यह बात समझनी चाहिए कि बुद्ध के बताए हुए मार्ग ने एक धर्म का रूप - बौद्ध धर्म का रूप, उनके दुनिया से जाने के बाद लिया। उनके समय में वह बस देश के कई आध्यात्मिक आंदोलनों में से एक था।

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सद्‌गुरु धमेक स्तूप, सारनाथ, उत्तर प्रदेश में - जहां गौतम ने आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपने पहले पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था।

सद्‌गुरु सारनाथ, उत्तर प्रदेश के धम्मेक स्तूप में, जहां गौतम ने बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद अपने पहले पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था।

वह देश में व्यापक तौर पर आध्यात्मिक खोज को लाना चाहते थे। जब वह आए, उस समय भारत – जो कभी बहुत आध्यात्मिक राष्ट्र रहा था, बहुत अधिक कर्मकांडी हो गया था। इसलिए उन्होंने देश की स्थिति को बदलना चाहा। बाद में उनके मेहनती शिष्य इसे बौद्ध धर्म कहने लगे मगर गौतम ने खुद कभी कोई ऐसी चीज नहीं कही, जिसे धर्म का नाम दिया जाए।

बुद्ध योग से जुड़े हैं

बुद्ध के तरीके और पारंपरिक योगिक सिस्टम अलग नहीं हैं। अपनी खोज के उन आठ सालों के दौरान खुद गौतम भी अलग-अलग योगियों के पास गए। इसलिए भारत में लोगों ने उन्हें एक और योगी के रूप में ही देखा। यही वजह थी कि भारत में बौद्ध धर्म उतना नहीं विकसित हुआ, जितना देश के बाहर।

इस संस्कृति से बाहर लोगों ने ऐसी ज्ञान भरी बातें कभी नहीं सुनी थी। वह बहुत नया और ताजा था क्योंकि लोगों ने कभी उस दिशा में कोशिश नहीं की थी। इसलिए कई देश बुद्ध के रास्ते पर चल पड़े। मगर भारत में लोगों के पास कई विकल्प थे, यह भी कई विकल्पों में से एक था।

भारतीय उपमहाद्वीप के कई बड़े हिस्सों में खास तरह के प्रयोग होते रहे हैं। इन प्रयोगों के तहत इंसान के परम कल्याण को ही सब कुछ माना गया और भौतिक सुख-सुविधाओं को सबसे कम महत्व दिया गया। मुक्ति सब कुछ है, बाकी सब कम महत्व की चीजें हैं।

उस वक्त लोग शानदार तरीके से जीवन जीते थे। हो सकता है, वे उतना लंबा जीवन न जीते हों, जितना आज के लोग जीते हैं। यह भी संभव है कि उन्होंने इतनी आरामदायक जिंदगी न जी हो, लेकिन वे एक एकनिष्ठ(एक ही बिंदु पर केन्द्रित) उद्देश्य के साथ जीते थे और ऐसे में उनका जीवन शानदार होता था। उनकी मौत भी शानदार होती थी। वे युद्ध के मैदान में नहीं मारे जाते थे, बस यूं ही आराम से बैठे-बैठे पूरे आनंद के साथ उन्हें मौत आती थी।

एक बौद्ध कथा - बोधिधर्म की

पूरा तिब्बत देश मानव चेतना को समर्पित था

इस बात का सबसे नया उदाहरण तिब्बत है, जहां इंसान का परम कल्याण ही सब कुछ हुआ करता था। यह एक ऐसा देश है जहां की करीब तीस प्रतिशत आबादी भिक्षुक बन गई थी। बाकी लोगों का भी किसी न किसी तरह से अध्यात्म की ओर झुकाव था। अच्छे रहन-सहन, अच्छे खानपान और अच्छी तरह जीवन जीने से ज्यादा जरूरी उनके लिए धर्म या धम्म का अभ्यास करना था। पिछले 1300 से 1400 सालों के दौरान उन्होंने इस प्रक्रिया को और गहरा कर दिया और पूरे देश को आध्यात्मिक बना दिया। पूरा का पूरा देश शारीरिक सुख-सुविधाओं और मन की इच्छाओं की बजाय मानव चेतना के प्रति समर्पित हो गया। एक तरह से यह एक जबर्दस्त प्रयोग था। इस देश में तमाम ऐसी बातें हुई हैं जो अविश्वसनीय लगती हैं। इस स्थान ने तमाम लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है।

सातवीं शताब्दी में हुआ तिब्बत में बौद्ध धर्म का आगमन

गौतम बुद्ध के जन्म से करीब 500 साल पहले तिब्बत में एक गुरु हुए और उन्होंने यहां की संस्कृति का रूपांतरण कर दिया। उस वक्त यहां शेन राजवंश हुआ करता था। यह बड़े दिलेर और लड़ाकू किस्म के लोग थे। जब उस गुरु का आगमन हुआ तो ये लोग एक तरह के पुरातन जड़ात्मवाद संबंधी पूजा किया करते थे। उन्होंने इन लोगों को एक अलग तरह की पूजा पद्धति को अपनाने के लिए प्रोत्साहित(एन्करेज) किया जो थोड़ी ज्यादा परिष्कृत(रिफाइंड) थी। इस धर्म को बॉन धर्म के नाम से जाना गया।

774 ई. के अंत में बौद्ध धर्म पहली बार तिब्बत पहुंचा। भारत में नालंदा मठ के एक वरिष्ठ मठाधीश तिब्बत पहुंचे और पहले मठ की स्थापना की थी।

774 ई. के अंत में बौद्ध धर्म पहली बार तिब्बत पहुंचा। भारत में नालंदा मठ के एक वरिष्ठ मठाधीश तिब्बत पहुंचे और पहले मठ की स्थापना की थी। इस तरह उन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म की शुरुआत की। इसके बाद पद्मसंभव नाम का एक युवा वहां पहुंचा जिसके भीतर जबर्दस्त आध्यात्मिक और रहस्यमयी शक्तियां थीं। उसकी गुप्त विद्या से स्थानीय लोग जबर्दस्त तरीके से प्रभावित हो गए। इस तरह उसने खुद को वहां स्थापित किया और उसके बाद यह क्रम चलता रहा।

सातवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म ने भारत की तमाम योगिक और तांत्रिक संस्कृति को अपने भीतर समा लिया था। इस समय तक बौद्ध धर्म इन सब चीजों का मिश्रण हो गया था, क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि शुरुआत में बौद्ध धर्म बड़ा शुष्क किस्म का था। यह आम जनता को रास नहीं आता था। यह भिक्षुकों के लिए था। इसीलिए बाद के सालों में कुछ आत्म-ज्ञानियों ने इसमें योगिक और तांत्रिक संस्कृति को भी मिला लिया। उन्होंने इन चीज़ों को बौद्ध जीवन शैली में मिला दिया। तो सातवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म में भारत की तमाम योगिक और तांत्रिक संस्कृति को समाहित कर लिया गया था।

गुरु पद्मसंभव ने किया अनेक धर्मों का मेल

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सिक्किम के समदृम्पत्से में गुरु रिनपोचे (पद्मसंभव) की 36 मीटर लंबी मूर्ति

पद्मसंभव के पास इतनी दूरदृष्टि और समझ थी कि उन्होंने बॉन धर्म में कुछ चीजों को समाहित करके लोगों के सामने वह चीज पेश कर दी जो वह करना चाहते थे। उन्होंने उस वक्त मौजूद धर्म को नष्ट करके नया धर्म लाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बॉन धर्म को आधार बनाया और उस पर बौद्ध, तांत्रिक और योगिक संस्कृति की ‘टॉपिंग’ लगा दी। इससे लोगों के सामने बौद्ध, तंत्र और बॉन का एक विशिष्ट मिश्रण सामने आया। इस मिश्रण को आज आप तिब्बती बौद्ध धर्म के रूप में देखते हैं। यह अपने इन चार पांच घटकों के चलते बेहद खास है, जिन्हें इसमें बड़ी अच्छी तरह से गूंथा गया है। इसमें जो भी चीजें समाहित की गई हैं, वे इसका हिस्सा महसूस होती हैं। ऐसा कहीं नहीं लगता कि उन्हें बाहर से लाकर चिपका दिया गया है।

उन्होंने बॉन धर्म को आधार बनाया और उस पर बौद्ध, तांत्रिक और योगिक संस्कृति की ‘टॉपिंग’ लगा दी।

तो कई मामलों में तिब्बती बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए पद्मसंभव का काम खुद गौतम बुद्ध के काम से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो चीज पेश की, वह सिर्फ बौद्ध धर्म नहीं था, उन्होंने हर वह चीज पेश की जिसकी आवश्यकता थी। यह एक बेहतरीन किस्म का सम्मिश्रण था।

एक हिंसात्मक क्रान्ति से आई आध्यात्मिक प्रक्रिया में गिरावट चीन में सामंती विचारधारा जब अपने चरम पर पहुंची तो वहां जो धनवान थे, वे और ज्यादा धनवान होते गए और जो गरीब थे, वे और गरीब होते गए। इस स्थिति ने एक हिंसात्मक क्रांति को जन्म दिया। क्रांति के मार्ग पर चल रहे लोग भौतिक सुख सुविधाओं की इच्छा रखते थे। सामंती गफलत से वे बाहर आ चुके थे। उन्हें जो भी आलसी और सुस्त दिखाई देता, वे उसे मार डालते। ध्यान करने वाले लोग आलसी और सुस्त नजर आते हैं, क्योंकि वे आंखें बंदकर यूं ही एक स्थान पर बैठे रहते हैं। तिब्बत में बहुत सारे बौध मठ हैं। उन लोगों ने वहां मौजूद हर मठ को नष्ट कर दिया। बहुत सारे लोगों को मार डाला। बाकी बचे जो भिक्षुक थे, उन्हें उन्होंने खेतों और कारखानों में काम पर लगा दिया और यह सुनिश्चित किया वे आंखें बंद करके बैठे-बैठे अपना समय नष्ट न करें।

ये एक बड़ी दुखद घटना है इस क्रांति की वजह से आज काफी आर्थिक सुख सुविधाएं हैं, लेकिन इसने बहुत सी ऐसी चीजों को भी उजाड़ दिया जिनकी भरपाई नहीं की जा सकती। तिब्बत को एक भयानक दुर्घटना माना जा सकता है, क्योंकि उसके जैसे दूसरे स्थान और संस्कृति का निर्माण करना आसान नहीं है।

एक बौद्ध कथा - बोधिधर्म की

मानवीय चेतना के लिए यह एक बेहद दुखद घटना है, क्योंकि एक ऐसे देश का होना साधारण बात नहीं है, जहां की पूरी की पूरी जनसंख्या मानव चेतना के प्रति समर्पित रही हो। ऐसा देश बनाने के लिए लोगों को बहुत ज्यादा समझाने की जरूरत पड़ती है। अगर हमें कुछ सौ साधकों को इस बात के लिए तैयार करना हो कि वे अपनी आंखें बंद करके 24 घंटे तक बैठे रहें, तो यह बड़ा मुश्किल काम है। मुझे नहीं पता कि आप इसे मुश्किल समझते हैं या नहीं, लेकिन मुझे पता है कि यह मुश्किल काम है। ऐसे में अगर यह बात पूरे के पूरे राष्ट्र को समझानी पड़े, तब तो यह और भी मुश्किल काम होगा।

लेकिन इस तरह से किए गए कार्य के कुछ ऐसे हिस्से जरूर होते हैं, जिन्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता। विधियों को और संस्कृति को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन जो ऊर्जा और स्पेस इनकी वजह से पैदा हुई, उसे नष्ट नहीं किया जा सकता।

तिब्बत हर तरह से विशिष्ट है भूभाग के मामले में, लोगों के मामले में और यहां पुराने समय में जो भी घटनाएं हुई हैं, उनके आधार पर यह दुनिया में एक विशेष स्थान है। दुनिया के लगभग हर हिस्से की मैंने यात्रा की है। भारत में बहुत सी सुंदर जगहें हैं। उत्तरी अमेरिका में कई बेहद खूबसूरत जगहें हैं। अफ्रीका शानदार है। यूरोप का अपना अलग आकर्षण है। न जाने कितने खूबसूरत स्थान हैं, लेकिन तिब्बत की आबोहवा अपने आप में खास है। इस धरती पर इतनी ऊंचाई पर इतने बड़े क्षेत्रफल में स्थित शायद यह एकमात्र पहाड़ी मैदान है।

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श्वेत तारा का तिब्बती थांका (तिब्बती पेंटिंग)

यहां आपको एक ही स्थान पर घास के मैदान नजर आएंगे, रेगिस्तान के जैसे बालू के टीले दिखेंगे, हरी-भरी पहाड़ियां दिखेंगी और बर्फ से ढकी चोटियां नजर आएंगी। यह नजारा अपने आप में खास है और बिल्कुल अलग तरह का है। अगर आपके पास खूबसूरत चीजों को देख पाने लायक नजर है, तो यहां आपको ऐसी तमाम चीजें मिलेंगी जो आपने पहले कभी नहीं देखी होंगी। तिब्बती बौद्ध धर्म की सुन्दरता और कमजोरी बाद के कई शिक्षक अपनी मर्जी से तिब्बत नहीं गए, बल्कि जब उत्तर भारत में इस्लामी हमले हुए तो सबसे पहले आध्यात्मिक स्थानों पर हमले किए गए। इसलिए लोग हिमालय की ओर और उससे भी आगे तिब्बत के पठार की ओर चले गए। अगर आप तिब्बती बौद्ध धर्म को देखें, तो हो सकता है कि आपको उसमें तंत्र समझ में न आए लेकिन अगर आप उनके चित्रों, मंडलों और मंत्रों को देखेंगे, तो वह खास तौर पर कश्मीरी शैव धर्म से उठाए गए हिस्से हैं, जो योग और तंत्र का बहुत विकसित पहलू था।

वे इन टुकड़ों से सिर्फ खिलौने बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्होंने अंतरिक्ष यान बना लिया। तिब्बती बौद्ध धर्म की सुंदरता, उसकी सरलता यही है और साथ ही उसकी कमजोरी भी यही है। यह कई रूपों में बहुत अनूठा है।

एक बौद्ध कथा - बोधिधर्म की

 
 
 
 
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