आध्यात्मिक खोज - सद्‌गुरु के साथ नौका विहार का अनुभव!

खोजी सरिल सिमोन ने सद्‌गुरु के साथ कुछ समय बिताया, और वे आधी रात में एक झील में नौका यात्रा पर गए। पढ़ते हैं उनके बीच हुई चर्चा के बारे में।
आध्यात्मिक खोज - सद्‌गुरु के साथ नौका विहार का अनुभव!
 

मन में पल-पल चलते विचारों के बारे में सद्‌गुरु ने समझाया

मैं सब-कुछ शांतिपूर्वक सुन रही थी, लेकिन उस मौन में भी मेरा दिमाग चल रहा था। मैंने सोचा यदि हमारी हर इच्छा और लालसा के पीछे सचमुच अनंत को पाने की चाह ही होती है तो उसको पाने का सही तरीका क्या है? पूरी तरह शांत, स्थिर बैठे सद्‌गुरु को देखकर मन में विचार आया कि हमको उस पार ले जाने वाले नाविक कहीं वही तो नहीं!

मेरी ओर देखे बिना वे बोले, ‘मन में इतने सारे सवाल लेकर आप ये यात्रा नहीं कर सकतीं।’

मेरी ओर देखे बिना वे बोले, ‘मन में इतने सारे सवाल लेकर आप ये यात्रा नहीं कर सकतीं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘यह कुछ ऐसा ही है मानो हम नाव में बैठकर चांद पर जाना चाहते हैं। यदि हम उस नाव के सहारे कोशिश करेंगे तो कहीं नहीं जा पायेंगे। चांद पर जाने के लिए आपको एक सही वाहन चाहिए। भौतिकता के सहारे अनंत तक पहुंचने की कोशिश नाव में बैठ कर चांद पर जाने जैसी ही है।’

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सद्‌गुरु द्वारा बोले गए मंत्र पर ध्यान टिक गया

जैसे-जैसे शाम गहरा रही थी मेरे अंदर का मौन और भी गहरा हो रहा था। मेरा ध्यान सद्‌गुरु द्वारा बोले जाने वाले उस मोहक मंत्र की ओर बार-बार लौट रहा था और उसके बारे में सोचते-सोचते आग, संध्या, शांति और सत्संग - सबने मिलकर बड़ी सरलता से स्वाभाविक रूप से मुझे ध्यान में लीन कर दिया। ध्यान की उस अवस्था में, मैं रिलैक्स महसूस कर रही थी, शायद पहले से कहीं अधिक। वह एक अद्भुत अनुभव था- वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता।

सच कहूं तो यह प्राचीन नहीं है। यह मेरे मन में तब आया जब मैं हिमालय में था, पर वह एक लंबी कहानी है।

मैंने कहा, ‘सद्‌गुरु, जिस मंत्र का आज रात आपने उच्चारण किया था वह मन में तरंग पैदा करनेवाला था। वह कहां से आया है? क्या वह बहुत प्राचीन है?’ ‘यह मंत्र केवल तरंग नहीं है। मंत्र तो केवल एक माध्यम है। सच कहूं तो यह प्राचीन नहीं है। यह मेरे मन में तब आया जब मैं हिमालय में था, पर वह एक लंबी कहानी है।’ ‘क्या आप हमें वह कहानी सुनायेंगे?’ मैंने पूछा और तब उन्होंने अपनी कहानी शुरू की।

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केदार के पास कांति सरोवर की कहानी

‘केदार के ऊपर कांति सरोवर है, जहां आपने पिछले साल यात्रा की थी। आम तौर पर लोग वहां नहीं जाते। बड़ी कठिन चढ़ाई है। कई साल पहले मैं वहां चढक़र एक चट्टान पर यूं ही बैठ गया था। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इस धरती पर सबसे प्रथम योग कार्यक्रम का स्थान यही है। मिथक के अनुसार चालीस हजार साल पहले प्रथम योगी और योग परंपरा के प्रथम गुरु शिव ने यहां सप्तऋषियों को योगविज्ञान में दीक्षित किया था।

मेरा शरीर, पर्वत, सामने की झील, सब-कुछ ध्वनि बन गये। आप जानती हैं कि आधुनिक विज्ञान ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि संपूर्ण अस्तित्व केवल कंपन है।

‘इसको शब्दों में बांधना बड़ा मुश्किल है पर मेरे वहां बैठने के थोड़ी ही देर बाद मेरा हर अनुभव ध्वनि में बदल गया। मेरा शरीर, पर्वत, सामने की झील, सब-कुछ ध्वनि बन गये। आप जानती हैं कि आधुनिक विज्ञान ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि संपूर्ण अस्तित्व केवल कंपन है। क्वांटम सिद्धांत अब बताता है कि पदार्थ जैसी कोई चीज है ही नहीं, सब-कुछ केवल ऊर्जा का कंपन है। और जहां भी कंपन होगा ध्वनि अवश्य होगी। तो फिर प्रश्न उठता है कि यदि यह ध्वनि है, तो मैं इसे सुन क्यों नहीं पाता? आप इसलिए सुन नहीं पातीं, क्योंकि सुनने की आपकी क्षमता आवृत्तियों(फ्रीक्वेंसी) के एक छोटे-से दायरे तक ही सीमित है। हम अल्ट्रासोनिक और सबसोनिक आवृत्तियों(फ्रीक्वेंसी) को नहीं सुन सकते। ट्रांजिस्टर न सुन सकनेवाली आवृत्तियों को सुनने वाली आवृत्तियों में बदल देता है।

‘मैं केदार के ऊपर उस स्थान पर बैठा हुआ था और हर चीज ध्वनि में बदलकर मेरे अंदर एक बिलकुल अलग रूप में गूंजने लगी। वैसे तो संस्कृत के लिए मेरे मन में बहुत आदर है, पर मैंने कभी इसको सीखने की कोशिश नहीं की क्योंकि मेरी अपनी दृष्टि ने मुझे कभी निराश नहीं किया और मैं संस्कृत में लिखे प्राचीन ग्रंथों को पढ़कर सारी पारंपरिक बातों से अपना दिमाग नहीं भरना चाहता था।

मुझे अच्छी तरह याद है मैं वहां मौन बैठा हुआ था, लेकिन मेरे अंदर मेरी ही आवाज में संस्कृत भाषा में ऊंचे स्वर में गाना चल रहा था मानो माइक्रोफोन से आवाज आ रही हो, और जैसे कि मैं स्वयं ही वह गाना हूं। नाद ब्रह्म विश्वस्वरूपा...।

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गहरे मौन में लीन बैठे रहे सद्‌गुरु के सान्निध्य में

हम तीनों कुछ समय तक गहरे मौन में लीन बैठे रहे, फिर सद्‌गुरु ने मुस्कुराकर कहा, ‘शेरिल, यह चर्चा हम कल शाम आगे बढ़ायेंगे, रात खत्म होने को है।’

मैं यह वार्तालाप बंद नहीं करना चाहती थी, लेकिन हम उस टापू पर और देर तक बैठे नहीं रह सकते थे। अपनी घड़ी की ओर देखकर मैं चौंक गयी, सुबह के चार बजने वाले थे। नाव पर अभी चार घंटे ही बीते थे। लेकिन इन चार घंटों में मैंने यह जान लिया था कि मैं अनंत के बहुत समीप हूं, जहां संसार ऐसे रूप धरता है, जो हमारी समझ के बाहर हैं। लौटते समय मुझे लग रहा था कि हर चीज मेरी कल्पना से कहीं अधिक विचित्र है!

और यह विचित्रता अभी और भी बढ़ने वाली थी...

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