मैं नहीं चाहता था किसी भी नियम में बंधना - स्वामी गुरुभिक्षा

ईशा योग केंद्र के एक संन्यासी, स्वामी गुरुभिक्षा, उनको ईशा तक लाने वाले गूढ़, रहस्यमय मार्ग, आश्रम में अपने शुरुआती दिनों में सद्‌गुरु के साथ उनके व्यक्तिगत क्षणों तथा संन्यास में दीक्षित होने की अपनी यात्रा और अदभुत अनुभवों के बारे में बता रहे हैं।
मैं नहीं चाहता था किसी भी नियम में बंधना - स्वामी गुरुभिक्षा
 

आध्यात्मिक आमना - सामना

स्वामी गुरुभिक्षा वे मेरी तरफ एकटक घूरना बंद ही नहीं कर रहे थे। पिछले दस मिनिटों से उनकी बड़ी बड़ी, असामान्य रूप से काली और गहरी आँखें मुझ पर ही गड़ी हुयी थीं। मेरे कोमल हृदय में जबरदस्त डर पैदा हो गया, "क्या वे मुझे अपने साथ ही ले जायेंगे" ? मैं रोने लगा और अपने दादाजी का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा। हम ट्रेन में थे और दादाजी मेरे पास ही बैठे हुए थे। जब तक दादाजी मुझे शांत करने लगे तब तक अगला स्टेशन आ गया और योगी जैसा दिखने वाला वह व्यक्ति स्टेशन पर उतरने के लिये उठा। गाड़ी से उतरने के पहले, उन्होंने मेरे कान में श्री मुरुगा का एक विशेष नाम हल्के से, फुसफुसा कर कहा। मुझे शांत करने में दादाजी और पास बैठे लोगों को कुछ समय लग गया। जब हम बाद में अपने स्टेशन पर उतरे तो दादाजी मुझे श्री मुरुगा के एक मंदिर में ले गये और मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि उस मंदिर का वही नाम था (जो उस योगी ने मेरे कान में फुसफुसा कर कहा था)। मैं उस समय सिर्फ पाँच वर्ष का था -- पर वो चेहरा, सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा के चेहरे से मिलते जुलते उस चेहरे की तीव्रता -- आज भी मेरी स्मृति में ऐसे अंकित है जैसे कि वह कल की ही बात हो। संभवतः ये मेरे अंदर किसी तरह की आध्यात्मिक जागृति की शुरुआत थी।

swami gurubiksha side profile

जब मैं तीन साल का था तो मेरे पिता की मृत्यु हो गयी थी। जब मैं बीस साल का हुआ तो मेरे दादाजी भी चल बसे। मेरे जीवन में, बहुत जल्दी ही, मैं पारिवारिक संपत्ति और कुछ आर्थिक मामलों के अदालती मुकदमों में बुरी तरह उलझ गया था। मेरी उम्र के हिसाब से, मैं कुछ जल्दी ही परिपक्व हो गया। उन्हीं दिनों मेरी मुलाकात योगी रामसूरत कुमार से हुयी। वे वास्तविक रूप से एक उन्नत व्यक्ति थे और उनकी कृपा से मैं अपनी अधिकतर सांसारिक उलझनों में से बाहर आ गया।

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं भवन निर्माण के काम में लगना चाहता था जिसका मुझे बहुत आकर्षण था, जिसमें मुझे बहुत रुचि थी। पर योगी राम ने सलाह दी कि मैं कर्ज़ा देने और आर्थिक सौदे करने के अपने पारिवारिक कारोबार को ही चलाऊँ। उस समय मुझे ये पता नहीं था कि मेरी ये कुशलता आगे जा कर मुझे ईशा की नाज़ुक आर्थिक परिस्थिति को संभालने में बहुत सहायक होगी - जिस काम में मैं 1992 आखरी दिनों में लग गया।

पहले पाँच लोगों का संघ

sanga of first five

युवावस्था में आते आते मैं योग का एक बड़ा प्रशंसक बन गया था और मैं सद्‌गुरु की योग कक्षा में सिर्फ इसलिये गया ज्योंकि योग से मुझे प्रेम हो गया था। लेकिन 1992 में, सम्यमा के बाद, मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं सद्‌गुरु को छोड़ ही नहीं सकता, मुझे तो बस उनके साथ ही रहना है। सारे तमिलनाडु में होने वाली उनकी योग कक्षाओं में मैंने वॉलिंटियरिंग करना शुरू कर दिया। उसी वर्ष मैं सिंगनल्लूर के ऑफिस में आ गया। पूर्णकालिक स्वयंसेवकों के रूप में जो पहले पाँच लोग आये थे, मैं उनमें सबसे बड़ा था। हम लोग एक परिवार की तरह रहते थे और काफी झगड़ते भी थे। सद्‌गुरु और विज्जी अक्का अक्सर हमारे लिये खाना बनाते और हमारे झगड़े सुलझाते। उन्हें हमारी छोटी छोटी ज़रूरतों की भी चिंता रहती थी और वे उन्हें पूरा करते थे - ऐसी भी जो हमारे माता पिता भी कई बार न करें - मेरे जीवन के वे सबसे अच्छे दिन थे।

किसी भी कारण से हो, मेरी टाँग खींचने का कोई मौका सद्‌गुरु छोड़ते नहीं थे। एक बार मेरे तैयार किये हुए कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करते हुए उन्होंने मेरी कोई गलती सुधारी और फिर अगले कागज़ पर हस्ताक्षर करने लगे तो विज्जी अक्का ने मेरे सामने ही, शरारतन, सद्‌गुरु से पूछा, "आप जैसे हमारी गलतियां हमें बताते हैं, वैसे उसकी गलती उसे बता क्यों नहीं रहे" ? "अगर मैं उसकी गलतियाँ उसे बताने लगूँ तो मेरा सारा दिन उसी से बात करने में और उसे समझाने में निकल जायेगा", सद्‌गुरु बोले और अगले कागजों पर हस्ताक्षर करते रहे। वे लोग जो मेरी तरफ इतना ध्यान दे रहे थे तो मुझे मजा आ रहा था। लेकिन तब भी मैं उलझन में था, मेरे गुरु कौन हैं - योगी रामसूरत कुमार या सद्‌गुरु ? जल्दी ही मुझे ये बात पता चल गयी।

एक चमत्कार और एक बदलाव

बाद में, 1993 में, मैं अपने गृहनगर जाने की योजना बना रहा था। मैं जब निकलने को था तो अचानक ही सद्‌गुरु ने मुझसे कहा, "तुम दो लोगों से मिलोगे जो मेरे बारे में पूछेंगे तो उनको बताना कि मैं अच्छा हूँ और मैंने भी उनके बारे में पूछा था"। मेरे घर से बाहर निकलते समय उन्होंने उसे दोहराया। मुझे उसके बारे में कुछ समझ नहीं आया कि इस सब का क्या अर्थ है ? लेकिन जब भी कोई मुझसे बात करता था तो मैं सावधान हो जाता था, चाहे ट्रेन में या घर पर या रास्ते में या दुकानों पर या कहीं भी। लेकिन एक दिन गुज़र गया और किसी ने भी मुझसे उनके बारे में नहीं पूछा। फिर भी मैं सावधान था। अगले दिन मैं अपने मामा से मिलने गया तो पहली बात जो उन्होंने मुझसे पूछी वो थी, "योग कैसा है"? जिस ढंग से उन्होंने ये पूछा, मुझे ऐसा लगा कि वे सद्‌गुरु के बारे में ही पूछ रहे थे! तो क्या योग और जग्गी एक ही हैं ? मैं एक पल सोचता रहा और फिर बोला, "योग ठीक है"। पर मैं यह नहीं कह पाया कि योग ने भी आप के बारे में पूछा था।

मैं इसी सोच में अगले दो दिनों तक पड़ा रहा कि एक हो गया, अभी एक और बाकी है! या फिर, दोनों बाकी हैं ? लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। कोयम्बटूर वापस आते समय मैं मदुरै में अपनी बहन से मिलने गया तो उसके पति ने पूछा, "जिग्गी कैसे हैं"? मैंने तुरंत जवाब दिया, "जिग्गी अच्छे हैं और वे भी आप के बारे में पूछ रहे थे"। यह सुन कर वे आश्चर्यचकित हो गये कि सद्‌गुरु ने उनके बारे में पूछा था। उनकी दशा देख कर मैं जोर जोर से हँसने लगा। जब तक मैं वापस सिंगनल्लूर पहुँचा, मैं यही सोच रहा था कि ठीक है, एक योग था, एक जिग्गी लेकिन किसी ने जग्गी के बारे में तो नहीं पूछा।

मैं परेशान था और मुझसे रहा नही जा रहा था तो मैंने जा कर सारी कहानी विज्जी अक्का को सुनायी। उन्हें भी आश्चर्य हुआ कि वाकई मामला क्या था, सद्‌गुरु ने ऐसा क्यों कहा ? बाद में उसी दिन मैं सद्‌गुरु की कक्षा में वॉलिंटियरिंग करने गया । जैसे ही हमें साथ आने का मौका मिला, वे मेरे ऊपर गुर्राये, "मैं जो भी तुम्हें करने को कहता हूँ, क्या तुम एक भी काम सही ढंग से नहीं कर सकते"? मैं सोचने लगा,"मैंने गलत क्या किया"? उसी क्षण वे जोर से हँसने लगे और बोले, "मुझे विज्जी ने इस बारे में सब कुछ बताया था"।

आज तक मुझे ये नहीं पता कि ये सब क्या था पर मेरे सरल मन के लिये यह सब एक चमत्कार जैसा ही था कि उन्हें आगे होने वाली घटनाओं का आभास हो जाता था। मैं यह निश्चित रूप से जान गया कि सद्‌गुरु ही मेरे गुरु थे। उनके साथ मेरी प्रतिबद्धता की दृष्टि से यह घटना मेरे लिये एक महत्वपूर्ण बदलाव थी।

सद्‌गुरु की सादगी और प्रतिबद्धता

फरवरी 1993 में सद्‌गुरु ने आश्रम की ज़मीन का सौदा पक्का कर लिया था। वे सारे तमिलनाडु में बहुत से साधकों के घरों पर जा कर आश्रम बनाने के लिये चंदा मांगते थे। एक बार इसी काम के लिये सद्‌गुरु के साथ करुर जाने का मुझे सौभाग्य मिला। सद्‌गुरु को पैसे माँगते देख कर मुझे बहुत दुःख होता था, मुझसे ये सहन नहीं हो पा रहा था। बहुत से लोग ज्यादा देते थे और कई लोग बहुत कम भी देते थे लेकिन सद्‌गुरु उन सभी के सामने एक समान नम्रता से झुकते थे।

होलनेस कार्यक्रम का लिव - इन अनुभव

12 जुलाई 1994 के दिन हम होलनेस कार्यक्रम के लिये आश्रम जा रहे थे और सद्‌गुरु की कार के पीछे थे। बारिश इतनी जबरदस्त हो रही थी कि एक जंगली नाले की तरह बहने वाली इररुतुपल्लम में भी भयानक बाढ़ आ गयी थी और हममें से कोई भी उसे पार नहीं कर सकता था। तो हमें एलनदुरै में ही हमें कुछ स्वयंसेवकों के घर पर रुकना पड़ा और होलनेस कार्यक्रम की तारीख एक दिन आगे करनी पड़ी। ईशा के इतिहास में पहली बार और सिर्फ एक ही बार ऐसा हुआ है जब किसी कार्यक्रम को एक दिन के लिये भी रोकना या आगे बढ़ाना पड़ा हो।

मेरे लिये, होलनेस कार्यक्रम दूसरे बाहरी आध्यात्मिक अनुभवों जैसा नहीं था, जैसा कि वह कुछ अन्य लोगों के लिये था। अपने अंदर मैं जो था, जैसा था, वहाँ से इस कार्यक्रम ने मुझे एक अलग, ऊपरी स्तर पर, अत्यंत तीव्रता के साथ रहने के स्तर पर पहुँचा दिया। पहले तीस दिनों के बाद, सद्‌गुरु ने होलनेस कार्यक्रम में भाग ले रहे लोगों को दो समूहों में बाँट दिया - हम सात का एक 'लिव -इन' समूह था और बाकी सब 'शिक्षक' समूह में थे - उन्हें ईशा योग शिक्षक बनने के लिये प्रशिक्षित किया जाना था। अधिकतर, सद्‌गुरु सारा समय शिक्षक समूह के साथ ही होते थे और हम सात वहाँ बस रह रहे थे। हम अपनी साधना, बागवानी और छोटे मोटे काम करते रहते। कुछ समय बाद हमें ऐसा लगने लगा जैसे सद्‌गुरु ने हमें बाहर कर दिया है और हम सब बहुत उदास, मायूस थे, हमारा दिल टूट रहा था कि सद्‌गुरु हमारे साथ बिलकुल भी समय नहीं बिता रहे थे। मैंने एक दिन बिल्कुल रोने की स्थिति में उनसे कहा, " कृपा कर के हमारे साथ भी थोड़ा समय बिताइये, सद्‌गुरु"!

सद्‌गुरु ने मेरी तरफ बहुत प्यार से देखा और अगले दिन वे हमसे मिलने आये। वे लीनिंग पेड़ पर बैठ गये और हम सब उनके चारों ओर। फिर उन्होंने समझाया, "तुम लोग जो भी कर रहे हो, बहुत प्रेम से करो। अगर तुम सफाई करते समय घासफूस भी उखाड़ रहे हो तो वो भी प्रेम से करो। तुम्हारी साधना और तुम्हारे आत्मज्ञान को मैं संभाल लूंगा"। इस तरह हमें सद्‌गुरु से आत्मज्ञान का पहला वादा उस समय मिला।

होलनेस कार्यक्रम के दौरान, सद्‌गुरु ने सभी सहभागियों से एक बार इस विषय पर चर्चा करने को कहा कि भविष्य में आश्रम के रहिवासियों के लिये क्या नियम होने चाहियें ? जैसे जैसे चर्चा आगे बढ़ रही थी, नियमों की सूची तेजी से लंबी होने लगी। मैं इससे बहुत ही चकित था और चिंतित भी। मैं इनसे पूरी तरह से घबरा गया और उस शाम को मैं सद्‌गुरु के पीछे पीछे उनके कमरे तक गया। अंधेरा हो चुका था और मुझे याद है, उनके हाथ में टॉर्च थी। उनके दरवाजे पर हम रुके तो उन्होंने मेरी तरफ देखा और मैंने अचानक ही कहा, "जग्गी, मुझे कोई नियम नहीं चाहिये"। उन्होंने बहुत ही मृदुता से कहा, "ठीक है, तुम्हारे लिये कोई नियम नहीं होंगे"। यद्यपि मैं आज भी आश्रम के सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करता हूँ लेकिन वो क्षण मेरे लिये एक बड़ी यादगार है कि कैसे इतने प्यार से, नरमी से सद्‌गुरु ने मेरी बच्चों जैसी हरकत को संभाल लिया था।

होलनेस के समाप्त होने पर हम सभी को बस एक ही धुन लगी थी कि कैसे ध्यानलिंग की प्राणप्रतिष्ठा में हम सद्‌गुरु को सहयोग दें। वे दिन अत्यधिक तीव्र, बहुत अधिक गतिविधियों और तीव्र साधना के दिन थे। मैं कानूनी एवं आर्थिक मामलों का ध्यान रख रहा था और मंदिर के गुम्बद तथा परिक्रमा में लगने वाली निर्माण सामग्री को चुनने और खरीदने के काम में भी लगा था। फिर, 1996 की महाशिवरात्रि के दिन मुझे ब्रह्मचर्य की दीक्षा मिली। ये ब्रह्मचारियों का दूसरा समूह था।

क्या मुझे सही में मालूम था कि महासमाधि क्या होती है?

जनवरी 1997 में विज्जी अक्का का महासमाधि लेना मेरे लिये एक भयानक और अत्यंत पीड़ादायक धक्का था। मैं खास तौर पर एकदम हतोत्साहित एवं दुःखी था। एक कारण ये था कि विज्जी अक्का के साथ मेरे सुंदर संबंध थे - मैं उनसे सब कुछ कह सकता था। जो बातें मैं सद्‌गुरु से नही कह पाता, वो भी उन्हें बताता था। और, दूसरा, सद्‌गुरु और विज्जी अक्का, दोनों ने मुझे पहले ही कई बार बताया था कि ऐसा होगा पर मुझे कभी भी विश्वास नहीं हुआ कि ये वास्तव में होगा। जब ये हो गया तो मुझे ऐसा लगा कि मैं पूरी तरह से बेवकूफ बन गया था।

अगस्त 1996 में पहली बार मैंने विज्जी अक्का को सद्‌गुरु से कहते सुना कि वे जाना चाहती हैं। हम लोग ध्यान यात्रा के बाद दिल्ली से कोयंबतूर, ट्रेन से आ रहे थे। तब यह सुन कर मुझे लगा कि ये उनके बीच की सामान्य नोक झोंक है। फिर एक बार टी ब्लॉक के बाहर सद्‌गुरु ने मुझे रोक कर कहा कि विज्जी महासमाधि लेना चाहती हैं और मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ये कदम उठाने से मैं उन्हें कैसे रोकूँ। तब भी मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया।

उनकी महासमाधि से एक सप्ताह पहले, सद्‌गुरु ने मुझे किसी काम के लिये मैसूर जाने को कहा। उस समय मुझे विज्जी अक्का कुछ अलग ही लग रहीं थीं। मैंने उनसे कहा, "विज्जी, आप कुछ अलग लग रहीं हैं! क्या चल रहा है"? वे तुरंत सद्‌गुरु की ओर मुड़ीं और बोलीं, "देखिये, उसे भी लग रहा है कि मैं कुछ अलग लग रही हूँ"। तब सद्‌गुरु ने मुझसे कहा, "ये इसलिये है कि वे शीघ्र ही महासमाधि लेने वाली हैं"। तब भी, तब भी मुझे नहीं लगा कि ऐसा होगा। मैं महासमाधि के बारे में जानता था और मुझे संदेह था, "विज्जी अक्का कैसे साधना के उस उच्चतम स्तर पर पहुँच सकती हैं"?

तो जब मैंने सुना कि वे चली गयी हैं, तो मुझे ऐसे लगा जैसे मेरे ऊपर बम गिरा हो। मेरे पास अपने दुःख, अपने नुकसान को व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं हैं पर मुझे, अंदर ही अंदर, उनसे ईर्ष्या भी हो रही थी।

तीव्रता की एक और छलाँग

यद्यपि मेरा दुःख, मेरा नुकसान शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकता, तब मेरे पास उस बात पर सोचते रहने के लिये समय नहीं था। ध्यानलिंग प्राणप्रतिष्ठा की तैयारी के काम ने हमें पूरी तरह से व्यस्त रखा था। एक ब्रह्मचारी के रूप में, वे दिन मेरे जीवन के लिये सबसे अधिक तीव्र, गहरे थे। विज्जी अक्का की महासमाधि के चार महीनों बाद, सद्‌गुरु ने मुझसे आंध्र प्रदेश के कुडप्पा में 400 लोगों के एक मंदिर की यात्रा पर जाने के आयोजन की व्यवस्था करने को कहा। हमारे कुडप्पा प्रवास के पहले एक साधिका ने अपना सारा स्वर्ण दान में देते हुए यह इच्छा प्रगट की कि उसका एक स्वर्ण कवच इस मंदिर के लिंग के लिये बनाया जाये। जब वो तैयार हो गया तो उस स्वर्ण कवच को सुनार के पास से हम एक छोटी शोभा यात्रा के रूप में लाये और फिर उसे कुडप्पा मंदिर में अर्पण करने के लिये ले गये। कुडप्पा के उस मंदिर में सद्‌गुरु ने पहली बार अपने गुरु के बारे में बताया।

उन्होंने सभी ब्रह्मचारियों को उस रात, उसी मंदिर के उसी मंडपम में एक शक्तिशाली प्रक्रिया करवाई, जहाँ पिछले जन्म में बैठ कर उन्होंने ध्यानलिंग की योजना बनायी थी। ये प्रक्रिया बहुत ही ज्यादा शक्तिशाली थी और मेरी बाँह अजीब ढँग से ऊपर नीचे हो रही थी और मुझे पता चला कि सारी रात मैं एक हाथी के चिंघाड़ने जैसी आवाज मैं जोर से कर रहा था। मैं अगले कुछ महीनों तक ऐसी अवस्था में बार बार चला जाता था। इस तरह कुडप्पा मंदिर की यात्रा के बाद मेरी तीव्रता ने एक और बड़ी छलाँग लगायी।

ध्यानलिंग तुम्हें क्या बता रहा है ?

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ध्यानलिंग की प्राणप्रतिष्ठा 24 जून 1999 के दिन बहुत शानदार ढंग से पूरी हुई।

वर्ष 2000 में मैंने अपना पहला 'लिंग अर्पणम' किया। फिर एक बार जब मैं टी ब्लॉक में फूल तोड़ रहा था तो सद्‌गुरु से भेंट हो गयी। उन्होंने पूछा, "तो, ध्यानलिंग तुम्हें क्या बता रहा है"? मैं एक बार फिर उलझन में पड़ गया और क्या कहूँ ये समझ नहीं पा रहा था, तो बोल पड़ा, "कुछ नहीं"! बाद में मुझे उनके ये पूछने का महत्व पता चला। इसके पहले भी मैं मंदिर में सेवा तो कर ही रहा था पर मेरे लिये वो बस एक मंदिर था, एक ऐसा मंदिर जिसकी प्राणप्रतिष्ठा सद्‌गुरु ने की थी। लेकिन जब उन्होंने मुझे ये पूछा तो उसके बाद मेरी समझ में आया कि सद्‌गुरु ही ध्यानलिंग हैं और ध्यानलिंग ही सद्‌गुरु हैं। तब से मुझे वे दोनों एक ही लगने लगे।

मेरी शुरुआती यात्रा में मेरी प्रतिबद्धता सिर्फ सद्‌गुरु के लिये ही थी। मैं क्यों यहाँ था और क्यों मैंने ब्रह्मचर्य लिया, इसका कारण यही था कि मैं उनके बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन लिंग अर्पणम के बाद, ध्यानलिंग मेरे लिये एक विशाल सर्व उपस्थिति बन गया। आज भी, जब मैं बाहर लोगों के साथ काम और बातें, खास तौर पर आर्थिक मामलों की बातें कर के थक जाता हूँ तो मैं आ कर ध्यानलिंग के पास दो घंटे बैठता हूँ और फिर से शांतचित्त, ऊर्जामय हो जाता हूँ।

आध्यात्मिक परिपक्वता की ओर यात्रा

sadhguru offering food to sw gurubiksha

संन्यास की दीक्षा मिलने पर मैं एक साधक के रूप में काफी ज्यादा परिपक्व हो गया। वर्ष 2003 में ब्रह्मचारियों की एक सभा में सद्‌गुरु ने हम 10 लोगों को संन्यास की दीक्षा दी और हमें ये नाम दिये जिनसे आज हम जाने जाते हैं। उस समय मुझे इसका अर्थ समझ नहीं आया पर मुझे जल्दी ही पता चल गया कि मेरे अंदर कुछ मूल रूप से बदल गया था। मेरी बहुत सी बाध्यतायें, मजबूरियाँ अपने आप समाप्त हो गयीं और मैं अपने मार्ग पर पूरी तरह से स्थिर हो गया। तब से, अंदर ही अंदर, मुझे लगता है कि मैं मुक्त हो गया हूँ लेकिन साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि ऐसा नहीं है।

अपने कथन को विराम देने से पहले मैं यह बात साझा करना चाहता हूँ कि आश्रम में मुझे सभी लोग बहुत अदभुत लगते हैं। जब मैं बाहर के लोगों को देखता हूँ तो उन्हें बहुत सारी मामूली बातों में फँसा हुआ पाता हूँ - धन, संबंध, मकान, कारें, उनका अपना रुतबा और न जाने क्या क्या पर यहाँ ऐसा कुछ नहीं है। हमें प्रकृति ने जिन सीमाओं, मर्यादाओं में लपेट कर रखा है, हम उनके अंदर भले ही संघर्ष कर रहे होते हैं लेकिन हमनें जागरूकतापूर्वक या उसके बिना भी अपने बहुत सारे अनावश्यक बंधनों को काट लिया है। मेरे लिये यह बहुत बड़ा वरदान, आशीर्वाद है कि मैं ऐसे लोगों के साथ, ध्यानलिंग के साथ और अपने गुरु के साथ रहता हूँ।

संपादकीय टिप्पणी : महीने के हर दूसरे सोमवार को इस स्थान को देखिये जहाँ हम 'दिव्यता के पथ पर' श्रेणी के अंतर्गत ईशा ब्रह्मचारियों की जीवन यात्राओं को आप के साथ साझा करते हैं।