इस श्रृंखला में हर माह, ईशा ब्रह्मचारियों में से कोई एक, अपनी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि एवं विचारों से ले कर, पवित्र दिव्यता के पथ पर चलने के अपने अनुभवों को साझा करते हैं, तथा बताते हैं कि इसका उनके जीवन के लिये क्या अर्थ है?

स्वामी वासुनंद: "मुझे यह सब करना पड़ेगा?", एक पत्रिका में योग विषय पर एक लेख के साथ कई टेढ़े-मेढ़े आसनों के चित्रों को देख कर मैं हताश होते और घबराते हुए सोच रहा था। मेरा भतीजा लगातार जोर दे रहा था कि मैं योग कक्षा में जाऊँ, पर मैं इस बारे में बिल्कुल भी आश्वस्त नहीं था कि मैं इस तरह की कसरतों के लिये बना था। पर उसने मुझे कोई मौका ही नहीं दिया और इस तरह मैं सद्‌गुरु के साथ अपनी पहली योग कक्षा में आया - जहाँ आकर मेरा जीवन हमेशा के लिये बदल गया।

जब सद्‌गुरु ने हमें शून्य में दीक्षित किया, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे सारा कमरा बीज मंत्र की ध्वनि के साथ कंपित हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी तन्मयावस्था या बेहोशी में होऊँ। कार्यक्रम समाप्ति के दिन हम सब कोयम्बटूर के सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा सेवा आश्रम में इकठ्ठे हुए थे। उस दिन मुझे पता चला कि जहाँ मैं रहता था, वहाँ से ये स्थान सिर्फ 1 कि.मी. दूर था पर मैं वहाँ कभी नहीं गया था। वहाँ सद्‌गुरु श्री ब्रह्मा का फोटो देख कर मैं सोच रहा था, "ये तो हमारे सद्‌गुरु की तरह दिखते हैं"! मेरे ऊपर इस कक्षा का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था पर जिस तरह से स्वयंसेवकों ने अपने आप को समर्पित किया था, उसने मुझे सबसे ज़्यादा प्रेरित किया। अतः, कक्षा के बाद मैं उनके साथ काम करना चाहता था और मैंने सक्रिय रूप से वॉलिंटियरिंग करना शुरू कर दिया। शुरुआत में, मैं केवल कोयम्बटूर या उसके आसपास होने वाले कार्यक्रमों में दीक्षा दिवस पर ही वॉलिंटियरिंग करता था, पर जल्दी ही मैं कोयम्बटूर में ईशा की सभी गतिविधियों के साथ जुड़ गया और हर रविवार को आश्रम जाने लगा।

चीखता हुआ मौन

मई 1995 में आश्रम के पहले सम्यमा कार्यक्रम में मुझे वॉलिंटियरिंग करने का अवसर मिला। 200 से ज्यादा प्रतिभागियों के समूह के लिये, हम बस 11 स्वयंसेवक थे, जो सब कुछ कर रहे थे - सुरक्षा, हॉल तैयार करना, भोजन बनाना, हॉल में वॉलिंटियरिंग, सब कुछ। अभी जो टी-ब्लॉक (ट्रायंगल ब्लॉक-ईशा योग सेंटर में एक बिल्डिंग) का दूसरा दरवाजा है, वहाँ से हम भोजन के बड़े-बड़े बर्तनों को ख़ुद से उठा कर लाते थे। ये बहुत थकाने वाला और मुश्किल काम था पर मुझे इसमें बहुत मजा आता था। तब तक मैंने सम्यमा नहीं किया था इसीलिए सारा वातावरण मुझे और भी रहस्यमय लगता था। सारा आश्रम एक तरह के गूढ़ मौन से भरा हुआ लगता था पर हम लोगों को चीखते हुए, कई प्रकार के जानवरों की आवाज़ें निकालते हुए और सारी जगह पर लोटते हुए देखते थे। पहले दो दिनों के बाद, सारे प्रतिभागी मध्यरात्रि में, चांदनी में होने वाली साधना के लिये आने लगे और इसका हिस्सा होना अपने आप में ही बहुत अद्भुत बात थी। और फिर जल्दी ही अपने पहले सम्यमा कार्यक्रम में मुझे भी इसका स्वाद मिला।

साधना के अवसर जो मैंने गँवाये

मैं एक बार करूर में चल रही एक कक्षा के लिये वॉलिंटियरिंग कर रहा था। सद्‌गुरु एक स्वयंसेवक के घर पर रह रहे थे जो उन जैन गुफाओं के बहुत पास में था जिनका जिक्र सद्‌गुरु अक्सर करते हैं। सद्‌गुरु वहाँ जा कर आये थे और उन्होंने हमें बताया था कि वह स्थान अभी भी बहुत ही ऊर्जावान है और किसी भी आध्यात्मिक साधक को साधना करने के लिये अत्यंत सहायक है। कक्षा पूरी करने के बाद सद्‌गुरु ने मुझे और एक अन्य स्वयंसेवक को बुलाया और कहा कि हम उस छोटी पहाड़ी पर जायें और वहाँ अपनी क्रियायें करें। मैंने उनसे विनती की, “सद्‌गुरु, आप भी हमारे साथ आईये"। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने अब क्रियायें करना बंद कर दिया है"। मेरी उनके बिना वहाँ जाने की इच्छा नहीं थी और मैंने वो अवसर खो दिया। आज तक मैं उन गुफाओं की ओर नहीं गया हूँ और मुझे पश्चात्ताप होता है कि मैंने क्यों उस समय सद्‌गुरु की बात नहीं मानी?

प्रचुरता से भरा जुलूस

एक और तीव्र वॉलिंटियरिंग का अनुभव मुझे तब मिला जब आवुडयार (ध्यानलिंग का आधार मंच) करूर से लाया गया। सिंगनल्लूर कार्यालय से मैं जुलूस में शामिल हुआ, जहाँ पर विज्जी माँ ने आवुडयार के लिये आरती की थी। हम सब इतने उत्साहित थे कि हमने उस जुलूस को प्रचुरता से भरे उत्सव का रूप दे दिया था। स्वयंसेवकों ने अपने चेहरों को रंग लिया था, सिर पर रिबन बांध लिये थे, वे ड्रम बजा रहे थे और पूरे रास्ते पर नाच रहे थे। मैं उस ट्रक के एकदम पिछले हिस्से में था जिसमे आवुडयार को रखा गया था पर मैं बिना रुके थिरक रहा था। सद्‌गुरु हमारे साथ बाद में शामिल हुए। एक संकरे पुल पर अपनी सीमा से ज्यादा वजन से भरे ट्रक को निकालने का चमत्कार कर के उन्होंने हमारे उत्साह को और भी बढ़ा दिया।

अंतिम दर्शन

23 जनवरी 1997 की शाम को मुझे एक अन्य स्वयंसेवक का फोन आया कि मैं कुछ चीज़ें ले कर तुरंत ही आश्रम में आऊँ। जब मैं वहाँ पहुँचा तभी मुझे पता चला कि वो चीजें विज्जी माँ के अंतिम संस्कार के लिये चाहिये थीं। एक ब्रह्मचारी को वो चीजें देने के बाद मैं उनके अंतिम दर्शन के लिये कतार में लग गया। उनके पैर छूने के लिये जब मैं उनके पास गया तो मेरी आँखें सद्‌गुरु की आँखों से मिलीं। आज भी मुझे सद्‌गुरु की वह दृष्टि याद है, यद्यपि उसकी गहराई का वर्णन मैं नहीं कर सकता। हम रात भर आश्रम में रहे और सुबह अंतिम संस्कार के बाद ही वापस लौटे।

तीन निमंत्रण

उन वर्षों में मैंने सद्‌गुरु से तीन बार पूछा कि क्या मैं पूर्णकालिक रूप से आश्रम में आ सकता हूँ? उन्होंने हर बार 'हाँ' कहा, पर मैं ही अपने मन को तैयार न कर सका। वास्तव में, एक तरफ मेरी गहरी इच्छा थी कि मैं सद्‌गुरु द्वारा दी जा रही आध्यात्मिक प्रक्रिया के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हो जाऊँ, पर दूसरी तरफ मेरे पास इस सब के बारे में पूर्ण स्पष्टता या समझ नहीं थी। आश्रम में ब्रह्मचारियों को कठोर परिश्रम करते देख कर मैं सोचता था कि क्या मैं अपने आप को इस तरह समर्पित कर सकूँगा? धीरे धीरे मुझे समझ में आया कि मैं इसके बारे में चाहे जितना सोचूँ, कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। मेरे पास उस सब के लिये कोई स्पष्टीकरण नहीं था जो मुझे वॉलिंटियरिंग के समय या सद्‌गुरु की उपस्थिति में अनुभव होता था पर मैं अपने विचारशील मन को भी अनसुना नहीं कर पा रहा था जो मुझे ऐसी बात के लिये पूर्णतः समर्पित होने से रोक रहा था जो मुझे समझ नहीं आ रही थी । आख़िरकार, 1997 में मैं पूर्णकालिक रूप से आश्रम में आ ही गया। 2000 में मुझे ब्रह्मचर्य की दीक्षा मिली। दीक्षा के बाद, अपने अंदर मुझे एक विशेष स्वतंत्रता का अनुभव हुआ।

ईंटें बनाना

आश्रम में पूर्णकालिक आ जाने के बाद मेरी पहली ज़िम्मेदारी के रूप में मुझे ध्यानलिंग के लिये ईंटें बनाने का काम मिला। मैं भौतिकशास्त्र का स्नातक था और आश्रम में आने से पहले स्टेशनरी उत्पादन के अपने पारिवारिक कारोबार में अपने भाई की सहायता करता था। अतः भवन निर्माण कार्य के बारे में मुझे दूर-दूर तक कुछ भी पता नहीं था। चूंकि मैं जानता था कि इन ईंटों का उपयोग ऐसे महान काम के लिये होना है तो ये गतिविधि करते समय मैं वास्तव में घबराया हुआ था। पर हम ईशा में जो कुछ भी करते हैं, उसके साथ जैसा होता है, ठीक वैसा ही यहाँ, मेरे काम के साथ हुआ। सब कुछ ठीक तरह से हुआ। तीन महीनों में हमने दो लाख ईंटें बनायीं। उन ईंटों को रखने के लिये हमने विशेष रूप से पाँच शेड्स निर्मित किये थे और वहाँ उन्हें व्यवस्थित रूप से जमा कर के रखना तथा खास तौर पर उन्हें बारिश से बचाना अपने आप में एक बहुत बड़ा काम था क्योंकि उन दिनों, इस क्षेत्र में लगभग साल भर बारिश होती रहती थी। उन ईंटों को पकाने के लिये हमने अल्पकालिक भट्टियाँ बनायी थीं और उन्हें देख कर हम स्वयं आश्चर्य से भरे रहते थे कि कैसे ये सब हो गया? उनमें से अधिकतर ईंटों का उपयोग ध्यानलिंग के भवन में ही हुआ और बाकी ईंटें, मुझे लगता है, टी ब्लॉक के निर्माण में लगीं।

“कोई शिकायत नहीं!”

जब रसोईघर को टी-ब्लॉक से पुराने भिक्षा हॉल में लाया गया, जो स्पंदा हॉल से लगा हुआ था, तब मुझे खाना पकाने के काम को संभालने की जिम्मेदारी दी गयी। मेरे पास पाक-कला का कौशल नहीं था, पर कार्यक्रमों के दौरान खाना बनाने का जो भी अनुभव था, उसके आधार पर मैंने अपना काम शुरू किया। कुछ लोगों को मेरा बनाया खाना पसंद आता था, कुछ को नहीं, पर मैं हमेशा अपना सर्वोत्तम देता था। एक बार, दिन में 2000 लोगों के लिये हमने खाना बनाया - और मैं बहुत अधिक रोमांचित था कि हम यह कार्य कर सके। मुझे इस बार यह सुन कर बहुत आश्चर्य हुआ कि 2017 की महाशिवरात्रि के अवसर पर ईशा ने 1 लाख से भी अधिक लोगों के लिये भोजन बनाया। मैं समझ सकता हूँ कि अक्षया (आश्रम की रसोई) टीम के लिये ये कितना विशाल काम रहा होगा!

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मेरी इच्छा है कि एक दिन मैं सद्‌गुरु को आत्मज्ञानी की दृष्टि से देखूँ!

भोजन बनाने के काम में मेरी सबसे पसंदीदा यादें वे हैं जब मेरी विनती पर कई बार सद्‌गुरु हमारे साथ खाने के लिये आये थे। फिर मुझे सिंगनल्लूर कार्यालय भेजा गया जहाँ मुझे रसोईघर का प्रबंधन करना था। इसमें सब कुछ शामिल था - सब्जियाँ खरीदने से बर्तन धोने, और खाना बनाने के बाद फर्श साफ करने तक। इस दौरान एक बार मैं अपनी एक व्यक्तिगत समस्या ले कर सद्‌गुरु के पास गया। मैं कुछ बता सकूँ इसके पहले ही वे बोले, "कोई शिकायत नहीं"! जिस तरह से उन्होंने मुझसे ये कहा, मुझे मेरे अंदर समझ आ गया कि अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को मुझे स्वयं संभालना सीख लेना चाहिये, और अपने व्यक्तिगत झगड़ों में उन्हें उलझाने की बजाय, वे जो कर रहे हैं, उन्हें वह करने देना चाहिये। तब से मैं कभी भी कोई समस्या ले कर उनके पास नहीं गया। सिंगनल्लूर कार्यालय में भी खाना बनाने की जिम्मेदारी का सर्वोत्तम पुरस्कार यही था कि कुछ अवसरों पर वहाँ भी सद्‌गुरु खाना खाने के लिये आये।

अंतिम भागीदारी

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2004 में मैं फिर से आश्रम में आ गया जहाँ मुझे दूसरे गेट (वेलकम पॉइंट के पास के सुरक्षा कार्यालय) की सुरक्षा व्यवस्था देखनी थी। यहाँ पर मेरी मुलाकात कुछ छोटे जीवों से हुई, जिन्होंने अगले 14 वर्षों तक मेरा ध्यान अपनी ओर खींचे रखा - और ये आज भी वैसा ही है।

एक दिन, शाम के लगभग 5 बजे कुछ गाँव की लड़कियाँ मेरे पास आयीं और पूछने लगीं कि क्या मेरे पास कोई ऐसी साइकिल है, जो वे थोड़ी देर चला सकें! पहले तो इस विनती से मैं आश्चर्य में पड़ गया पर जब मैंने उनकी ओर थोड़ा ध्यान दिया तो मेरी समझ में आया कि वे बहुत गरीब बच्चियाँ थीं जो साइकिल चलाने का थोड़ा मजा लेना चाहतीं थीं। दुर्भाग्यवश, मेरे पास कोई साइकिल नहीं थी और मुझे आश्रम में भी कोई साइकिल नहीं मिली। उनसे बातें करते समय पता चला कि वे पास के आदिवासी गाँव धनिकण्डी से हैं। यह जान कर भी मुझे आश्चर्य हुआ कि वे रोज शाम को खाने के लिये आश्रम में आतीं थीं और बहुत से ब्रह्मचारियों को जानतीं थीं। मैंने एक लड़की से पूछा, "तुम कौन सी कक्षा में पढ़ती हो"? उसने थोड़ा गर्व के साथ कहा, "आठवीं" ! उसको थोड़ा चिढ़ाने के लिये मैंने उसे कुछ अंग्रेज़ी शब्द लिखने को कहा। मुझे ये देख कर धक्का लगा कि वो कुछ अक्षर भी सही ढंग से नहीं लिख सकती थी। अन्य बच्चियों से पूछने पर पता चला कि उनकी हालत भी वैसी ही थी। मुझे इससे बहुत खराब लगा और मैंने उनसे कहा कि कल से वे खाने के लिये एक घंटा जल्दी आयें तो मैं उन्हें कुछ अंग्रेज़ी और गणित सिखाऊंगा। वे सब अगले दिन 1 घंटा जल्दी आ गयीं और अंग्रेज़ी पढ़ने के लिये बहुत उत्सुक थीं। पर आगे जो हुआ, मैंने उसकी कल्पना भी नहीं की थी।

पच्चीस की कक्षा

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वहाँ 4 से 14 वर्ष की उम्र के कुल 25 बच्चे आ गए थे। वे बहुत ख़ुश थे और इतना ज्यादा शोर कर रहे थे कि मेरे लिये उन्हें पढ़ा सकना असंभव था। तब मैंने कहा, "कल से सिर्फ छठी से नवीं कक्षा के बच्चे ही आना"। यह सुन कर कुछ बच्चे निराश और दुःखी हो गये पर मैं अकेला इतने बड़े ग्रुप को नहीं संभाल सकता था। अगले दिन से हमारी कक्षा ईशा के दूसरे गेट के सुरक्षा कार्यालय के पास के कमरे में लगने लगी। धीरे-धीरे अन्य आदिवासी गाँवों के बच्चे भी हमारी कक्षा में आने लगे।

वर्ष 2006 में सद्‌गुरु ने घोषणा की कि वे ईशा विद्या स्कूल का प्रारंभ करने वाले हैं। मुझे याद है कि मैं बहुत आश्चर्य में था कि क्या ये ज़रूरी है कि ईशा इतनी बड़ी पहल करे क्योंकि इस काम में बहुत ज्यादा साधनों की ज़रूरत पड़ेगी, और मैंने सोचा "इस क्षेत्र में बहुत सारे सरकारी स्कूल हैं, तो हमारे लिये यही काफ़ी होगा कि हम इन बच्चों को सिर्फ अतिरिक्त ट्यूशन दें!" पर बाद में जब मैं ईशा विद्या स्कूल देखने गया और मैने वह विशाल संरचना देखी, शिक्षकों और स्कूल के पाठ्यक्रम को देखा तो मैं अपने भीतर सद्‌गुरु के आगे नतमस्तक हो गया कि उन्होंने ग्रामीण बच्चों के लिये इतना अद्भुत अवसर प्रदान किया था। ये उन्हें शहरी बच्चों के समकक्ष बना देगा, यह सोच कर मैं बहुत खुश था।

शुरुआत में ऐसी योजना बनायी गयी थी कि एक सामान्य सी प्रवेश परीक्षा पास करने वाले, पहली से नवीं कक्षा तक, सभी उम्र के बच्चों को भरती किया जाये। मैं गाँव-गाँव घूमा और 60 बच्चों को प्रवेश के लिये तैयार कर के उनसे आवेदन ले लिये, पर वे सब प्रवेश परीक्षा में फ़ेल हो गये। तब हमने तय किया कि सिर्फ 5 वर्ष के बच्चों को के.जी. कक्षा में प्रवेश दिया जाये। हम फिर से हर आदिवासी गाँव गये और लोगों को समझाया कि वे अपने छोटे बच्चों को के.जी. कक्षा में पढ़ने के लिये भेजें। किसी तरह से हमने 100 आदिवासी बच्चों को ईशा की सम्पूर्ण छात्रवृत्ति देते हुए पढ़ने के लिये इकट्ठा किया। इसमें ट्यूशन, यूनिफ़ॉर्म, किताबें, कॉपियाँ, स्टेशनरी और बस में आने-जाने का खर्च, सब कुछ शामिल था। वर्ष 2015 में हमारे ईशा विद्या के इस प्रथम समूह ने दसवीं बोर्ड की परीक्षा दी और वे सभी औसतन 89.6% अंकों के साथ सफल हुए। इनमें से कुछ बच्चे अब मेडिकल और इंजिनीयरिंग कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। यह सब सद्‌गुरु की कृपा है।

ग्रामीण भारत को पढ़ाना आसान नहीं है

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ईशा विद्या में प्रवेश लेने वाले कुछ बच्चों ने पहले ही साल में स्कूल छोड़ दिया। इसके कई सामाजिक कारण थे - किन्हीं के माता पिता नहीं थे, किन्हीं के शराबी पिता, या मानसिक रूप से बीमार माता- पिता - ऐसी बहुत सी दिल को दुखाने वाली परिस्थितियाँ घरों में थीं। इससे मैं अंदर ही अंदर बहुत अशांत था। हमने किसी तरह से प्रयत्न कर के, कुछ दानी लोगों और ईशा साधकों की सहायता से छात्रवृत्ति की व्यवस्था की और ऐसी 13 लड़कियों को कोयम्बटूर के पीएसएसजी आवासीय स्कूल में भरती कराया। पर मुझे यह देख कर जबरदस्त धक्का लगा कि एक साल के ही अंदर उनमें से भी, 11 लड़कियों ने होस्टल को फिर से छोड़ दिया। उनके इस व्यवहार से मैं इतना हताश हो गया कि अगले 2 साल तक आदिवासी गाँवों के बच्चों को पढ़ाने की मेरी इच्छा ही नहीं हुई। "इन लोगों को पढ़ाने का प्रयत्न करना पैसे और समय की बर्बादी है", मैं ऐसा सोचता रहा। लेकिन एक दिन मैं उनमें से एक लड़की से मिला जिसने उस आवासीय स्कूल में पढ़ाई जारी रखी थी। उसमें बहुत फर्क आ गया था और उसे इस तरह आगे बढ़ते देख कर मैं बहुत खुश हुआ। फिर हमने निर्णय किया कि हम टूटे हुए परिवारों की बच्चियों को सहयोग देंगे ताकि वे आवासीय स्कूलों में पढ़ सकें। उनमें से अगर कुछ एक भी अपनी दुर्दशा से बाहर आ सकें तो ये एक अच्छा प्रयत्न होगा।

हमें समझ में आया कि बहुत सी लड़कियों ने इस कारण से पढ़ाई छोड़ दी थी क्योंकि वे वहाँ पर अकेलापन महसूस करतीं थीं। अतः फिर हमने एक ही गाँव की बच्चियों के ग्रुप को लेना शुरू किया। वे दो लड़कियाँ, जिन्होंने साहस पूर्वक हमारे द्वारा उपलब्ध कराये गये अवसर का लाभ लिया था, हमारी बात को समझाने के लिये हमारी प्रचारक बन गयीं और उन्होंने नए बच्चों को पढ़ाई में आगे बढ़ने में सहायता की। आज ऐसी 30 लड़कियाँ कोयंबटूर में ईशा की पूर्ण छात्रवृत्ति पर पढ़ाई कर रही हैं। आश्रम के आसपास लगभग 20 आदिवासी गाँवों में 10 साल पहले सिर्फ 2 या 3 स्नातक थे। अब हर साल कई स्नातक तैयार हो रहे हैं। पहले बैच की जिन 2 लड़कियों ने पढ़ाई नहीं छोड़ी थी, उनमें से एक ने पिछले साल बीएड पूरा कर लिया है और अब वो ईशा विद्या में पढ़ाती है। ये बच्चे मुझे गर्व की अनुभूति देते हैं।

यह देख कर मुझे बहुत खुशी होती है कि आश्रम के आसपास के गाँवों में रहने वाले लोग अब हमको अपना ही एक हिस्सा मानते हैं। अपने जीवन की किसी भी समस्या के लिये वे हमारे पास आते हैं - चाहे ये उनके स्वास्थ्य के बारे में हो या कोई दुर्घटना, पानी की कमी, किसी कार्यक्रम का आयोजन या कभी -कभी उनके पारिवारिक झगड़े भी! कुछ साल पहले, एक दिन मुझे फोन पर सूचना मिली कि किसी युवा लड़की ने ज़हर पी लिया था और उसकी जान ख़तरे में थी। हम तुरंत गाँव पहुंचे और उसे अस्पताल ले गये। किसी अस्पताल में आत्महत्या का मामला आसान नहीं होता क्योंकि इसमें कानूनी पेंच होते हैं पर किसी तरह से प्रयत्न कर के हम उसे बचा पाये। पता लगा कि किसी पारिवारिक झगड़े के कारण उसने ऐसा किया था। हमने उसे समझाया, मार्गदर्शन दिया और फिर आश्रम में उसे नौकरी भी दी। ऐसे ही, अभी हाल के एक मामले में भी एक लड़की को इसी तरह बचाने के बाद, फाउंडेशन ने उसे आदियोगी के पास, एक दुकान चलाने के लिये दी है। ग्रामीण महिलाओं के लिये आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने का बहुत महत्व है। जब भी मैं उसकी दुकान के पास से निकलता हूँ, तो वो मेरा अभिवादन करती है, और दौड़ कर मेरे पास आती है तथा अपने जीवन की प्रगति के बारे में बताती है। उसे खुश देख कर मेरा ह्रदय भी प्रसन्न हो जाता है।

भयानक घटना के बावजूद

मेरे जीवन के कुछ अत्यंत यादगार क्षण उन दिनों के हैं जब हम सद्‌गुरु के साथ मैंगलोर गये थे। पूरी यात्रा इतनी भरी पूरी एवं साहसिक थी कि आज भी जब मैं उसके बारे में सोचता हूँ तो उन यादों की मधुरता में खो जाता हूँ। उस यात्रा में एक जगह एक नदी आयी जिसमें बाढ़ आयी हुई थी। आगे जाने के लिये उसे पार करना ज़रूरी था, और कोई रास्ता नहीं था। पानी की धार इतनी तेज़ थी कि मुझे नहीं लग रहा था कि मेरे जैसा कोई उसे कभी पार कर सकेगा क्योंकि न तो मुझे तैरना आता था, और न ही मुझमें इतना साहस था। एक बच्चे या युवक के रूप में मैं कभी जंगल या पहाड़ की किसी यात्रा पर भी नहीं गया था। अब इस खतरनाक रूप से बहते पानी की शक्तिशाली धारा को चल कर पार करना मेरे लिये एक भयानक काम जैसा था।

सद्‌गुरु और कुछ ब्रह्मचारी जो तैरना जानते थे, पहले नदी को पार कर के गये और वे अपने साथ एक लंबी रस्सी का एक सिरा ले गये। फिर ये रस्सी नदी के दोनों किनारों पर बांधी गयी, जिससे तैरना न जानने वाले हम कुछ लोग उसको पकड़ कर चल सकें। जब नदी में उतरने की मेरी बारी आयी तो एक क्षण के लिये मेरी साँस रुक सी गयी। पर और कोई चारा न देखते हुए मैंने धीरे-धीरे चलना शुरू किया। कई बार पानी मेरे कंधों तक आ जाता था और कई बार मुझे मेरे पैरों के नीचे जमीन नहीं मिलती थी पर मैं पानी में से चल कर बाहर आ गया। जब मैं नदी के दूसरे किनारे पर पहुँच गया तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने उस दिन कोई बहुत बड़ा काम कर लिया था।

उसी यात्रा में हम कुमार पर्वत गये, जहाँ सुब्रमण्या ने अपना शरीर छोड़ा था। उससे पहली रात को ही सद्‌गुरु ने हमसे कहा था कि हम समूह में चलें, अकेले अकेले नहीं। उन्होंने हमें चेतावनी भी दी थी (शायद हमें डराने के लिये, जिससे हम सतर्क रहें) कि हमें मार्ग में बाघ या नागराज कोबरा मिल सकते हैं। हमारे समूह ने सूर्योदय से पहले, सुबह 5 बजे निकलने का तय किया था। एक-एक कदम ध्यान से रखते हुए, हम बहुत सावधानी से चले और 11 बजे तक वहाँ पहुँच गये। कुछ घंटे उस चोटी पर बिता कर हमने उतरना शुरू किया और शाम को 5 बजे तक हम वापस आ गये। मैंने राहत की सांस ली कि इस पहाड़ी यात्रा में हमें बस एक खरगोश मिला और किसी बाघ या कोबरा से हमारी कोई मुठभेड़ नहीं हुई।

साधना इस मार्ग पर टॉर्च की तरह काम करती है

जैसा कि मैंने पहले कहा, मैंने आध्यात्मिक प्रक्रिया के मार्ग के बारे में कोई भी स्पष्टता या समझ के बिना ही ब्रह्मचर्य ले लिया था। मैंने इस मार्ग पर चलना सिर्फ इसलिये स्वीकार किया था क्योंकि मैं सद्‌गुरु के साथ रहना चाहता था, और एक स्वयंसेवक के रूप में अपने आप को पूर्ण रूप से समर्पित करना चाहता था। शायद ये एक बड़ा कारण था कि अपनी साधना को मैं ठीक तरह से नहीं रख पा रहा था और हमेशा जिस भी गतिविधि में संलग्न होता, उसको प्राथमिकता देता था। कई बार मैं ये गतिविधि करते समय अपने अंदर ही अंदर बहुत संघर्ष कर रहा होता था, पर हमेशा यही सोचता कि ऐसा इसलिये हो रहा था क्योंकि मैं बाहर की किसी चीज़ को सही ढंग से नहीं कर रहा था। पिछले साल मैं फिर से सम्यमा में शामिल हुआ और बाद में, उसी साल मैंने सम्यमा साधना भी की। संघ (ईशा ब्रह्मचारी एवं संन्यासी) के सहयोग से पिछले एक साल में मैं अपनी साधना को नियमित एवं सही कर पाया हूँ। अब मेरे अंदर जो अंतर आया है, वो बहुत ही स्पष्ट है - जिस दिन मेरी साधना होती है और जिस दिन ये नहीं होती, उन दिनों के मेरे अनुभवों में स्पष्ट रूप से बहुत अंतर होता है।

साधना में इस स्थिरता ने इस मार्ग के उद्देश्य और सौंदर्य के बारे में मेरे अंदर काफी स्पष्टता ला दी है। इस कारण से अब मैं अपने भीतर स्वयं को सद्‌गुरु के और भी निकट अनुभव करता हूँ। मेरी इच्छा है कि किसी दिन मैं सद्‌गुरु को एक आत्मज्ञानी की दृष्टि से देखूँ। मैं संघ के प्रति अत्यंत कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने मुझे इच्छा के इस स्तर पर पहुँचाया है।

"यद्यपि इस मार्ग पर कई संघर्ष और बाधायें हैं, एक ध्वनि है जो मुझे मार्ग पर रखती है - शंभो!"

Editor's Note: Watch this space every month as we share with you the journeys of Isha Brahmacharis in the series, "On the Path of the Divine."