महाराष्ट्र के शनि सिगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर उठे विवाद ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। तो क्या यह महिलाओं के साथ भेद-भाव है या इसके पीछे कोई वजह है?

प्रश्न :

सदगुरु, कुछ खास मंदिरों में महिलाओं को क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है? उदाहरण के तौर पर शनि मंदिर में ऐसा किया जा रहा है। ऐसा भेदभाव क्यों?

सदगुरु :

लिंग भैरवी के गर्भ गृह में पुरुषों को जाने की इजाजत नहीं है, लेकिन उन्होंने कभी भी इसका विरोध नहीं किया। क्योंकि पुरुष शादीशुदा और घरेलू हैं, इसलिए विरोध नहीं करने के लिए ट्रेंड हैं। इसे समझने की जरूरत है कि इस तरह के मंदिर प्रार्थना करने के लिए नहीं होते। इनमें अलग तरह की ऊर्जा होती हैं।

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महिलाओं के बायोलाॅजी की प्रकृति कुछ ऐसी है कि तंत्र-मंत्र की ये शक्तियां उनकी शारीरिक व मानसिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।
जब हमने जाना कि सौर मंडल के ग्रहों का हमारे शरीर विज्ञान, हमारी मानसिक संरचना और हमारे जीवन पर असर पड़ता है तब हमने विभिन्न ग्रहों के मंदिर बनाये। भारतीय ज्योतिषी कुछ जटिल गणना करके ये बताते हैं कि किस ग्रह का आपके ऊपर सबसे ज्यादा प्रभाव होगा। यह गणना आपके जन्म की तारीख और समय और जन्मस्थान के अक्षांश और देशांतर के आधार पर होती है। ये चीजें एक हद तक आपके लिए प्रासंगिक होती हैं। लेकिन यदि आपकी पहुंच भीतरी तकनीक तक हो गई है तो ये ग्रहों के प्रभाव को बराबर कर देगी।

शनि एक दूर का ग्रह है जो कि तीस वर्षों में सूर्य का एक चक्कर लगाता है। शनि का चक्कर, पृथ्वी का चक्कर और आपके जन्म से संबंधित आंकड़ों पर विचार करके ज्योतिषी गणना कर सकते हैं कि आपके जीवन के किस दौर में शनि का आपके ऊपर क्या प्रभाव है। शनि सूर्य का एक पुत्र है। सूर्य का दूसरा पुत्र भी है जिसे यम कहा जाता है। शनि - शासन, चिंता, अवसाद, बीमारी और विपत्ति का देवता है। यम मृत्यु का देवता है। ये दोनों भाई-भाई हैं जो हमेशा एक साथ काम करते हैं। इन दोनों की मां यानि सूर्य की पत्नी का नाम छाया है। छाया का मतलब परछाई होता है। यह ऐसा विज्ञान है जो संकेतों या इशारों के जरीये व्यक्त किया गया है। सूर्य हमारे लिए प्रकाश का स्रोत है। उसकी पत्नी को छाया इसलिए कहा गया है क्योंकि जहां सूर्य की रोशनी होगी वहां छाया भी होगी।

चूंकि तांत्रिक प्रक्रियाएं यहां की जाती हैं, इसलिए इन जगहों की ऊर्जाएं महिलाओं के लिए अनुकूल नहीं होती हैं। स्त्री को प्रकृति ने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है - अगली पीढ़ी के निर्माण का, इसलिए उसका शरीर इस तरह की ऊर्जाओं को लेकर अधिक ग्रहणशील और नाजुक होता है।

शनिवार सप्ताह का सातवां दिन होता है। यह शनि का दिन है, इसीनिए आप इसे शनिवार कहते हैं। भारतीय ज्योतिष विज्ञान के अनुसार शनि सातवां ग्रह है। ग्रह का मतलब होता है पकड़ना या प्रभाव डालना। आधुनिक खगोल विज्ञान के हिसाब से शनि छठा ग्रह है। लेकिन भारतीय ज्योतिष शास्त्र उन सभी आकाशीय पिण्डों ग्रह मानता है जो पृथ्वी पर बसे जीवन पर अपना बहुत ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इस हिसाब से सूर्य और चन्द्र की गणना भी ग्रहों के रूप में ही की जाती है। यही कारण है कि शनि सातवां ग्रह समझा जाता है।

सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि, ये सब ग्रह क्रमानुसार इस पृथ्वी पर बसे जीवन को बहुत शक्तिशाली तरीके से प्रभावित करते हैं। बेशक शनि सातवां ग्रह है लेकिन वो बहुत प्रभावशाली है। जहां स्वास्थ्य और प्रसन्नता आपको जीवन में मुक्ति देते हैं वहीं बीमारियां और अवसाद आपकी जिंदगी पर गंभीरतापूर्वक हावी हो जाती हैं। सवाल यह है कि क्या ग्रह जैसी बाहरी ताकतों को आप इस बात की अनुमति दे रहे हैं कि वो आपको प्रभावित करें? या आप चाहते हैं कि आपकी भीतरी प्रकृति का केवल आपके ऊपर प्रभाव हो। इसलिए भारतीय ज्योतिष परंपरा में इस विद्या को गहराई से जानने वाले विद्वान उन लोगों के बारे में भविष्यवाणियां करने से इंकार कर देते हैं जो आध्यात्मिक राह पर चल रहे होते हैं या जिनके जीवन पर किसी आध्यात्मिक गुरु का प्रभाव होता है। क्योंकि शनि का एक चक्कर तीस साल में पूरा होता है, इसलिए तीस साल में एक बार आप उससे प्रभावित होने के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं।

इसी समय को हिंदी प्रदेशों में साढ़े साती कहा जाता है और तमिल में येलेराई शनि कहा जाता है। यह समय साढ़े सात साल तक चलता है। इस दौरान आप बीमारी, अवसाद, विपत्ति और मृत्यु की जकड़ में जल्दी से आ जाते हैं। आपकी स्थिति इतनी नाजुक हो जाती है कि बाहरी प्रभावों से आप आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। साढे़ साती के दौरान हो रही मुश्किलों को दूर करने के लिए शनि मंदिरों में कई तरह की धार्मिक प्रक्रियाएं और अनुष्ठान किए जाते हैं।
शनि देव के कई मंदिर हैं जहां शनि को ईश्वर माना जाता है। इस समय यह विवाद चल रहा है कि महाराष्ट्र के शनि सिगनापुर मंदिर में महिलाओं को अंदर जाने की अनुमति दी जाए या नहीं। इस मंदिर में बहुत शक्तिशाली प्रक्रियाएं की जाती हैं। शनि मंदिरों का उपयोग खास तौर से तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक के कामों के लिए किया जाता है।

क्योंकि शनि का एक चक्कर तीस साल में पूरा होता है, इसलिए तीस साल में एक बार आप उससे प्रभावित होने के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं।इसी समय को हिंदी प्रदेशों में साढ़े साती कहा जाता है और तमिल में येलेराई शनि कहा जाता है।
विशेष रूप से तांत्रिक प्रभावों को दूर करने या उनसे बचने के लिए लोग इन मंदिरों में आते हैं। इसके अलावा जब उन्हें लगता है कि वो या उनके परिवार का कोई सदस्य किसी बाहरी प्रभाव से ग्रस्त है तो वे वहां आते हैं। चूंकि तांत्रिक प्रक्रियाएं यहां की जाती हैं, इसलिए इन जगहों की ऊर्जाएं महिलाओं के लिए अनुकूल नहीं होती हैं। स्त्री को प्रकृति ने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है - अगली पीढ़ी के निर्माण का, इसलिए उसका शरीर इस तरह की ऊर्जाओं को लेकर अधिक ग्रहणशील और नाजुक होता है। विशेष रूप से गर्भावस्था और मासिक धर्म के दिनों में तो इन ऊर्जाओं से प्रभावित होने या कहें चोटिल होने की संभावना और बढ़ जाती है।
ते क्या महिलाओं को ऐसे मंदिर के गर्भगृह में बिल्कुल भी नहीं जाना चाहिए? अगर वो ठीक तरह से इसके लिए प्रशिक्षित हैं तो वो जा सकती हैं। लेकिन इस उद्देश्य के लिए पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को प्रशिक्षित करना बहुत मुश्किल काम है, सिर्फ इसलिए क्योंकि जीवन के इस मामले में पुरुषों को कुछ जैविक लाभ प्रकृति से पहले से ही मिले हुए हैं। महिलाओं की बायोलाॅजी की प्रकृति कुछ ऐसी है कि तंत्र-मंत्र की ये शक्तियां उनकी शारीरिक व मानसिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।
तंत्र मंत्र के प्रभावों को हटाने और झाड़-फूंक करने के लिए कुछ खास तरह की ऊर्जाओं का उपयोग किया जाता है जो महिलाओं के लिए बिल्कुल भी अच्छी नहीं होती। शनि अच्छा नहीं है। लेकिन वो हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है। हमें उसका भी सामना करना है, उससे निपटना है। तंत्र-मंत्र की इन शक्तियों की वजह से महिलाओं से कहा जाता है कि वे वहां दाखिल न हों जहां इस तरह चीजें होती हैं। उनके शरीर के लिए यह अच्छा नहीं होता है।
जब जीवन में कुछ चीजंे बिगड़ने लगती हैं तो आपको एक खास तरीके से उनसे निपटना पड़ता है। हो सकता है कि आपका तरीका सुखद न हो। ये मंदिर इन्हीं उद्देश्यों के लिए के लिए बनाए गये हैं। आज कुछ लोग इसे भेदभाव की नजर से देखते हैं। उनको लगता है कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाकर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा रहा है। यह भेदभाव नहीं बल्कि समझदारी है।
अगर किसी दिन पुरुष लिंग भैरवी के सामने विरोध प्रदर्शन करने लगें और गर्भगृह में दाखिल होना चाहें तो मैं लिंग भैरवी के द्वार पर ताला लगा दूंगा। मैं उनको गर्भगृह में दाखिल होने नहीं दूंगा क्योंकि ये पुरुषों के लिए नहीं बनाया गया है। ये भेदभाव नहीं है। ये विवेक से लिया गया निर्णय है जो बहुत जरूरी है।

हो सकता है कि जिस तरीके से इसे लागू किया जा रहा है वो तरीका अशिष्ट हो और उसे देखकर लगता हो कि ये भेदभाव की नीति है। इसी वजह से महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं। अगर किसी दिन पुरुष लिंग भैरवी के सामने विरोध प्रदर्शन करने लगें और गर्भगृह में दाखिल होना चाहें तो मैं लिंग भैरवी के द्वार पर ताला लगा दूंगा। मैं उनको गर्भगृह में दाखिल होने नहीं दूंगा क्योंकि ये पुरुषों के लिए नहीं बनाया गया है, जब तक वो इसके लिए ठीक तरह से प्रशिक्षित नहीं किए जाएं। ये भेदभाव नहीं है। ये विवेक से लिया गया निर्णय है जो बहुत जरूरी है। ध्यानलिंग की व्यवस्था भी आधे चन्द्र मास तक पुरुष संभालते हैं और अगले आधे चन्द्रमास में इसका प्रबंधन महिलाओं के हाथों में चला जाता है। ध्यानलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कुछ इसी तरह की गई है।
वेेलांगिरी हिल मंदिर जैसे कुछ खास मंदिरों में भी जाने से महिलाओं को रोक दिया जाता है। क्योंकि रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। इस रास्ते पर पहले जंगली जानवरों का खतरा बना रहता था इसलिए ऐसा समझा जाता था कि यह रास्ता महिलाओं के लिए असुरक्षित है। लेकिन आज इन नियमों पर ढील दी जा सकती है।
शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जो मांग उठी है, इसके लिए जरुरत है लोगों को शिक्षित करने की, उन्हें इन मंदिरों के पीछे के विज्ञान के बारे में बताने की। हमें यह बताना चाहिए ये किन चीजों के बारे में हैं और क्यों इनको बनाया गया था। आज लोकतांत्रिक उत्साह के कारण हम समानता की स्थापना करना चाहते हैं लेकिन कई मामलों में यह कार्य महिलाओं के लिए अहितकारी होगा। वरना तो हम एक ही प्रजाति के दो लिंग हैं। इस तरह के कुछ मामलों के अलावा दो ही जगहों पर लिंग-भेद रखा जाना चाहिए - एक बाथरूम और दूसरा बेडरूम।
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