कैसे दे सकते हैं- मृत व्यक्ति को सुख

इस ब्लॉग में, सद्‌गुरु उन लोगों के लिये, जो मृत्यु के निकट हैं या जिनकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है, शांति की एक नई संभावना के बारे में बात कर रहे हैं।
 
 
 
 

कालभैरव कर्म

 

हम कालभैरव कर्म नाम का एक नया संस्कार शुरू कर रहे हैं। यह मरे हुए लोगों के लिए ही है, यह तय करने के लिये कि वे बेहतर जगह पर हों। जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो आप को लगता है कि वह मर गया है। लेकिन जहां तक उस व्यक्ति का संबंध है, उसने अपना शरीर छोड़ा है और वह सब जिसे वह जीवन मानता था। जब उसने अपना शरीर छोड़ा तो उसकी बुद्धि, विवेक, निर्णय लेने की क्षमता भी छूट गयी। सवाल है कि विवेक, बुद्धि छूटने का क्या मतलब है? मान लीजिए किसी की, जिसे आप अच्छी तरह जानते थे, मृत्यु हो गई। आप अब बहुत दुखी हैं। कुछ देर तक आप शोक में रहेंगे, फिर कुछ समय बाद अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे, ‘इस शोक में बने रहने का कोई मतलब नहीं है, मुझे अब जो जरूरी है, वह करना चाहिए’। लेकिन कोई और, जो इस तरह विवेक का उपयोग नहीं करता, वह ऐसी शोक की अवस्था में बहुत ज्यादा समय तक बना रहेगा क्योंकि उसकी विवेक-बुद्धि वैसे काम नहीं कर रही है, जैसे करना चाहिए। तो इसी तरह, विवेक बुद्धि छूट जाने के बाद मृत व्यक्ति की भी जो इच्छाएं हैं, वे कई गुना बढ़ जाती हैं। अगर उसकी इच्छाएँ खुशनुमा हैं तो खुशियां बढ़ेंगी और अगर उसकी इच्छाएँ दुखदाई हैं तो उसके लिये दुखों का अंबार लग जाएगा।

हम चाहते हैं कि लोग आनंदपूर्वक, शांतिपूर्वक रहें। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते, वे आनंद से नहीं रह पाते तो कम से कम उनकी मृत्यु शांतिपूर्वक हो। यदि वे यह भी नहीं कर पाते तो उनकी मृत्यु के बाद हम उनके लिये कुछ करना चाहेंगे। तो यदि आप मर भी जाते हैं तो भी मैं आप को आध्यात्मिक बनाने की कोशिश नहीं छोडूंगा।

 

खुशियों का सागर

सभी संस्कृतियों में इस बारे में जानकारी है, चाहे जहाँ की भी हों या किसी भी धर्म से जुड़ीं हों कि जब कोई इंसान मर रहा हो, तो वो चाहे कोई भी हो, आप को उसके लिये अच्छा वातावरण बनाना चाहिए। अगर आप का दुश्मन भी मर रहा है, तो उस एक क्षण में आप को उसके लिए अप्रिय माहौल का निर्माण नहीं बनाना चाहिए।

चाहे अंतिम क्षण हो या उसके तुरंत बाद, हम उस जीवन के लिए कुछ ऐसा कर सकते हैं कि उस जीवन में ख़ुशनुमा भाव जगे और बढ़े। अगर खुशनुमा बातें होती हैं, चाहे एक बूंद के बराबर भी, यदि आप उस मरने वाले या मरे हुए इंसान में डालते हैं तो कुछ समय बाद उसके लिये यह खुशियों के एक सागर जैसा हो जाएगा, क्योंकि अब उसके पास विवेक-बुद्धि नहीं है कि वह उसे रोक सके।

यह सब यौगिक परंपराओं का एक भाग रहा है, कि यदि कोई मर गया है और इस बारे में जागरुक नही था कि सही ढंग से मृत्यु को प्राप्त करे तो कोई और उसके लिये यह सब करता है।

तो हम उस व्यक्ति के लिये कुछ ख़ुशनुमा चीज़ें कर सकते हैं। यह क्रिया 14 दिनों तक की जाती है, यदि मरने वाला व्यक्ति 50 साल से ज्यादा उम्र का रहा हो और स्वावभिक रूप से मरा हो। यदि वह 50 साल से कम आयु का रहा हो तो यह क्रिया 48 दिनों तक की जाती है। कोई ऐसा व्यक्ति जो बहुत उर्जावान रहा हो पर दुर्घटना या आत्महत्या से मरा हो तो ऐसे 33 साल से छोटे लोगों के लिये 90 दिनों तक और 33 साल से बड़े लोगों के लिये 48 दिनों तक यह क्रिया करते हैं। इसके अलावा एक और संस्कार है, 'कालभैरव शांति', जो मृत्यु के बाद कभी भी किया जा सकता है।

 

शांतिपूर्वक मृत्यु

यह सब यौगिक परंपराओं का एक भाग रहा है, कि यदि कोई मर गया है और इस बारे में जागरुक नही था कि सही ढंग से मृत्यु को प्राप्त करे तो कोई और उसके लिये यह सब करता है। लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले 100 -150 सालों में ये परंपराएं हम भूल गए हैं। जो हो रहा है वह भ्रष्ट और व्यापारिक तरीके से हो रहा है। अगर आप के निकट का कोई प्रिय व्यक्ति मर गया है तो वे आपसे कहेंगे, मृत व्यक्ति के लिये जूता दो, छाता दो, गाय या घोड़ा दो, और इस नए ज़माने में तो मर्सिडीज़ भी मांग सकते हैं। जो मर गया है उसे जूते की ज़रूरत नहीं है, जिसका शरीर छूट गया है वह जूता नहीं पहन सकता। जो व्यक्ति अंतिम संस्कार करा रहा है उसे पहनने को जूता चाहिए तो उसे साफ़ तौर पर मांग लेना चाहिये। कम से कम नाप का तो मिलेगा। मृत व्यक्ति के नाप का होगा तो उसे बेचना पड़ेगा।

तो, भैरवी मंदिर की ऊर्जा का उपयोग करते हुए, हम कुछ खास संस्कार करेंगे। अगर कोई मर गया है जिसे आप जानते हैं या फिर आप ऐसे किसी को जानते हैं जिसके किसी प्रियजन की मृत्यु हो गई है और यदि आप उस मृत व्यक्ति का कोई कपड़ा कुछ ख़ास समय के अंदर हमें भेजते हैं तो एक खास संस्कार किया जा सकता है।

हम चाहते हैं कि लोग आनंदपूर्वक, शांतिपूर्वक रहें। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते, वे आनंद से नहीं रह पाते तो कम से कम उनकी मृत्यु शांतिपूर्वक हो। यदि वे यह भी नहीं कर पाते तो उनकी मृत्यु के बाद हम उनके लिये कुछ करना चाहेंगे। तो यदि आप मर भी जाते हैं तो भी मैं आप को आध्यात्मिक बनाने की कोशिश नहीं छोडूंगा।

●●● आशीर्वाद !!

सम्पादकीय टिप्पणी : 'कायांत स्थानम', ईशा अंतिम संस्कार सेवा है जो प्राचीन परंपराओं एवं मृत्यु संस्कारों को शक्तिशाली ऊर्जा आधार के साथ पुनर्जीवित करती है और हम यह सेवा भाव से करते हैं, किसी व्यापारिक उपक्रम की तरह नहीं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को हम यह सेवा दे सकें, इसके लिये आप का साथ एवं सहयोग अपेक्षित है।

 

ज्यादा जानकारी के लिये कृपया पधारें--

‘कायांत स्थानम- ईशा मृत्यु संस्कार सेवा’

 

 
 
 
 
  0 Comments
 
 
Login / to join the conversation1